साहित्‍यिक समाचार - साकेत का वार्षिक साहित्‍यिक समारोह एवं वैचारिक गोष्‍ठी संपन्‍न

साहित्‍यिक समाचार

साकेत का वार्षिक साहित्‍यिक समारोह एवं वैचारिक गोष्‍ठी संपन्‍न

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विगत सोलह जून को साकेत साहित्‍य परिषद्‌ सुरगी, जिला राजनांदगाँव द्वारा अपनी स्‍थापना के चौदह वर्ष पूर्ण होने पर वैचारिक गोष्‍ठी एवं सम्‍मान समारोह का आयोजन किया गया। विषय था - '' लोक-साहित्‍य में मिथक''। कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि प्रख्‍यात प्रगतिवादी समीक्षक एवं साहित्‍यकार डॉ. गोरेलाल चंदेल, खैरागढ़, ने फेबल (Fable), मिथक (Myth) और लीजेण्‍ड, में अंतर बताते हुए कहा कि हिन्‍दी शब्‍दकोश के लिए मिथक नया शब्‍द है। मिथक शोषित वर्ग द्वारा अपने शोषण का प्रतिकार करने के लिए रची गई कहानियाँ है जिसमें समाज का शास्‍त्र और समाज दोनों विद्यमान रहते हैं। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध गीतकार एवं साहित्‍यकार डॉ. जीवन यदु, खैरागढ़, ने कहा कि मिथक का अभिप्राय मिथ्‍या भी होता है क्‍योंकि इनमें घटित घटनाएँ मिथ्‍या होती है और तर्क व ज्ञान के द्वारा इसकी व्‍याख्‍या संभव नहीं है परंतु इसके द्वारा ज्ञान की तार्किक व्‍याख्‍या अवश्‍य की जाती है। मिथकों की रचना इसी लिए की गई हैं। लोककला व लोककथा के मर्मज्ञ डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि न सिर्फ हमारा लोक साहित्‍य, अपितु पौराणिक साहित्‍य भी मिथकों से भरे हुए हैं। मिथक में लोक का ज्ञान छिपा रहता है। इसमें रहस्‍यमयी प्राकृतिक घटनाओं की लोकव्‍याख्‍या निहित होती है। प्राध्‍यापक डॉ. शंकरमुनि राय ने कहा कि किसी एक भाषा या एक क्षेत्र के ऐसे बहुत से मिथक हैं जो देश के अन्‍य हिस्‍सों में भी पाए जाते हैं। समाज में ऐसे मुहावरे और लोकोक्‍तियाँ भी कहे जाते हैं जो मिथकों पर आधारित होते हैं। जाहिर है, मिथकों का सीधा संबंध समाज से है। श्री यशवंत मेश्राम ने कहा कि लोक-समाज मिथकों के द्वारा अपने शोषण का विरोध करता है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अपने आधार वक्‍तव्‍य में परिषद्‌ के संरक्षक एवं कथाकार श्री कुबेर ने मिथकों का उदाहरण प्रस्‍तुत करते हुए मिथक, मिथकों की उत्‍पत्‍ति एवं समाज में मिथकों की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा कि मिथकों की रचना लोक-समाज के बौद्धिक वर्ग ने ही प्रकृति की अजेय, विकट व रहस्‍यमयी शक्‍तियों की अभ्‍यर्थना हेतु अथवा प्रकृति की ऐसी ही किसी घटना की व्‍याख्‍या करने के लिए अथवा प्रकृति की सुकोमल, विश्‍वकल्‍याणकारी स्‍वरूप से पे्ररित होकर अनायास ही किया होगा परंतु बौद्धिक वर्ग द्वारा रची गई इस तरह की कोई भी कहानी लोक-स्‍वीकार्यता और लोक-मान्‍यता प्राप्‍त करने के पश्‍चात्‌ ही मिथक बन पाई होगी। ज्ञान के आधार पर मिथकों की रचना नहीं हुई है अपितु मिथकों के आधार पर ज्ञान का विकास अवश्‍य हुआ है। हर समाज, हर भाषा, हर जाति, हर देश का अपना-अपना मिथक होता है। मिथकों की रचना समाज की मान्‍यताओं और परिस्‍थितियों के अनुसार ही हुआ होगा।

कार्यक्रम में छत्‍तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक- संगीतकार श्री खुमान साव, साहित्‍यकार आचार्य सरोज द्विवेदी, श्री सुरेश सर्वेद (साहित्‍यकार एवं संपादक विचार वीथी) तथा हास्‍य कवि श्री पद्‌म लोचन शर्मा 'मुँहफट' ने भी अपने विचार व्‍यक्‍त किये। इस अवसर पर परिषद्‌ के सदस्‍य श्री कुलेश्‍वर दास साहू को 'साकेत सम्‍मान-2013' से सम्‍मानित किया गया। कार्यक्रम में 'लोक साहित्‍य में मिथक' विषय पर केन्‍द्रित परिषद्‌ की स्‍मरिका 'साकेत - 2013' का विमोचन भी किया गया।

कार्यक्रम में भिलाई से पधारे साहित्‍यिक संस्‍था सिरजन के प्रांतीय अध्‍यक्ष श्री लोकनाथ साहू तथा संयोजक श्री दुर्गा प्रसाद पारकर, राजनांदगाँव से पधारे श्री चन्‍द्रश्‍ोखर शर्मा, साकेत साहित्‍य परिषद्‌ के सभी सदस्‍यों सहित बड़ी संख्‍या में साहित्‍यानुरागी एवं ग्रामीणजन उपस्‍थित थे।

कार्यक्रम का संचालन परिषद्‌ के सलाहकार श्री ओमप्रकाश साहू 'अंकुर' तथा सचिव श्री लखनलाल साहू 'लहर' ने किया। आभार प्रदर्शन परिषद्‌ के अध्‍यक्ष श्री थनवार निषाद 'सचिन' ने किया।

000 कुबेर, राजनांदगांव

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