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सप्ताह की कविताएँ

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  ०जसबीर चावला० कैसे कह दूं कि मैं आज़ाद हूं तुम कहते हो मैं आज़ाद हूं तुम आज़ाद हो हम सब आज़ाद हैं * हां मैं आज़ाद हूं यह कहने के लिये...

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०जसबीर चावला०

कैसे कह दूं कि मैं आज़ाद हूं

तुम कहते हो
मैं आज़ाद हूं
तुम आज़ाद हो
हम सब आज़ाद हैं
*
हां मैं आज़ाद हूं
यह कहने के लिये
कि मैं आज़ाद हूं
तुम्हारी हर बात
सहने के लिये
हर हाल में
रहने के लिये
मैं आज़ाद हूं
यही लक्ष्मण रेखा मेरी
यही हद है
*
तुम सिद्ध हस्त हो
कहीं भी/कभी भी
कुछ भी कर सकते हो
पक्के खिलाड़ी
हथेली में सरसों
उगा सकते हो
सरकार
बना/ बिगाड़ सकते हो
हवा में/दिल में/दिल्ली में
या
भोपाल में
तुम
सर्वगुण सम्पन्न
सगुण निर्गुण निराकार
प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो
कर सकते हो हर जोड़ तोड़
हर जोड़ में बेजोड़
लगा सकते टांका
किसी को चूना
चमका सकते छवि
अतीत के खंडहर की
खोल सकते कलई
एक दूजे की
मैं चाह कर
उतार नहीं सकता
तुम्हारा मुलम्मा
तुम्हारा नकाब
यह मेरी आज़ादी है
*
मैं आज़ाद हूं
तुम्हें
ओर तुम्हें ही
चुनने के लिये
साल दर साल
पांच साल
तुम्हें ही सुनने के लिये
एक नाथ के बदले
दूसरे नाथ के लिये
बांबी से बंाबी
तुम्हारे ही साथ के लिये
मैं आज़ाद हूं
*
मैं आज़ाद हूं
तुम्हारे भ्रष्टाचार के लिये
तुम्हारे मुंह से झड़ते
हर विचार के लिये
मुझे आज़ादी है चुनाव की
कैसे मरना चाहता हूं
भूख से
भय से अत्याचार से
या थोपे/ठूंसे गये
कुत्सित विचार से
पुलिस के प्रहार से
मैं आज़ाद हूं
तुम्हें हीं चुनूं
मतपत्र में कालम नहीं होता
'कोई स्वीकार नहीं का'
न प्रतिकार का
*
भूलूं
तुम्हें मैंने चुना
कि तुम आज़ाद रहो
बेलगाम रहो
पस्त रहो
तनसे/मन से/कपड़ों से
अस्त वयस्त रहो
सत्तामद में
मस्त रहो
लूटते रहो/गिरवी रखो
देश को/विदेश को
संसाधनों को
तुम
आकाश कुसुम
न छू सकूं
न आवाज दे सकूं
न वापस बुला सकूं
संविधान जो कहता है
यह तुम्हारी आज़ादी है
*
नहीं चाहता ऐसी आजादी
मुझे चाहिये
दूसरी आज़ादी
दलों के दलदल से परे
चुनें प्रतिनिधि
जन जन के
जवाबदेह हों
हर जन के
जहां न हो भारी तंत्र
गण के
***

(अन्ना हज़ारे के विचारों के आधार पर)

--
// मसखरों के हाथ प्रजातन्त्र //


जाति जाति
अगली पांति ।।
पिछड़े पिछड़े
क्यों बिछड़े ।।
अगड़े अगड़े
अब बिगड़े ।।
खाप खाप
माई बाप ।।
एसटी एसटी
कैसे कटी ।।
एससी एससी
सबकी एजेंसी ।।
दलित दलित
सबका गणित ।।
भतीजा भतीजा
साला जीजा ।।
बेटी बेटी
मत पेटी ।।
राम राम
गया राम ।।
प्रजा प्रजा
चख मजा ।।
तंत्र तंत्र
मकड़ मंत्र ।।
***
-----------

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम'


एक उपहार ग़ज़ल


भू से आकाश तक छा गई चाँदनी.
पार दहलीज कर आ गई चाँदनी.


क्वाँरी रातोँ की तनहाई गाने लगी;
सोलह सिँगार कर आ गई चाँदनी.


कुल-कुटुम्ब,मित्रजन; हो रहे मन-मगन;
प्रीति का स्वर मधुर गा गई चाँदनी.


प्रणय-गठबंध कर, इक नई राह पर;
चंद्र-सा वर सुघड़ पा गई चाँदनी.


आश माँ की फली, प्यारी दुल्हन मिली;
दिल गया सुख से भर भा गई चाँदनी.


---


अनुज नरवाल रोहतकी


ग़ज़लें


थोडा ही सही पर दिल में मलाल रखिये


नाराजगी दूर करने को ज़ेब में गुलाल रखिये


कोई नहीं पूछता है नाक किसी का ज़माने में


मशवरा है अपनी जेब में खुद का रुमाल रखिये


ताज़ टूटे, सत्ता-सिंहासन टूटे जब चल जायेगा


किसी का दिल न टूटे इस बात का ख़्याल रखिये


'अनुज' यूं ही नहीं मिलते जवाब हर बात के


हर बात में शक रखिये हर बात में सवाल रखिये


2-

क्या बताएं बात बढी कैसे
उनसे आंख लड़ गई कैसे
फूटी आंख वो कभी भाया नहीं
दोस्ती हममें हुई कैसे
है खुशी तो फिर खुलके हंसों
आंखें तिरी भर गई कैसे
कब का छोड चुका हूं शहर तिरा
फिर बात मिरी छिड़ी कैसे
ठोकरों पे रखता था दौलत को तू
फिर नियत तेरी बदली कैसे
दोस्ती में काहे का हिसाब ‘अनुज’
झगडे की वजह ये बनी कैसे
-- 

3-शरारत करने का मोका रखता हूँ 

दिल में अपने एक बच्चा रखता हूँ
इस दौर में मिशाल ए इमानदारी को
घर में अपने एक कुत्ता रखता हूँ
राहे आसान जहाँ भी मिल जाये
राह में अपनी खुद कांटा रखता हूँ
जब भी जाता हूँ आसमां की सैर पे
जेब में टुकड़ा मिट्टी का रखता हूँ
बटुवे में पैसे हो जरुरी नहीं 'अनुज'
मगर याद से फोटो माँ का रखता हूँ -

4 -

आह में बोल नहीं होता 

दुवा का मोल नहीं होता
सास बहु के झगडे में
बेटे का रोल नहीं होता
हर चमकती चीज सोनी नहीं होती
हर साबुन निरोल नहीं होता
पशुओ जेसे होते है वो
जिनका कोई गोल नहीं होता
मैं ग़ज़ल नहीं सुनाता जबतक
सुनने का माहोल नहीं होता
मीठा खाने से  शुगर हो सकती
लेकिन मीठा बोल नहीं होता

---------

मुलाकात उनसे मेरी जैसे के तमाशा आम हुआ है

खुदा का फजल है के फिर से मेरा जिक्र आम हुआ है

दिल खू को इधर उधर करता है इश्क नहीं करता

शरारत दिमाग करता है, दिल यूं ही बदनाम हुआ है

भले ही लगे दुनिया को,  ये इश्क है पागलो काम

जानिबे-दिलवालो से इश्क का सदा अहतराम हुआ है

बैचेन रहता था, पागल रहता था, इंतजार करता था

दीदारे-यार हुआ तो बेचारे को आराम हुआ है

लाख कोशिशों के बावजूद जो कभी मुझसे न मिला

वो तब जाके मिला है जब ‘अनुज’ से कोई काम हुआ है ..

---

यारो बारहा गुल ए इश्क नहीं खिलता 

यकीन मानिए वक्त कभी उल्टा नहीं चलता 

आखिर खुद को कोसने के सिवा कुछ नहीं मिलता 

जो शख्स वक्त के साथ साथ नहीं चलता 

हर काम मुमकिन है गर खुदपे यकीन हो 

हौसलों को तोड़ने से कभी काम नहीं चलता 

तुम क्यों उदास हो मुझ से जुदा होकर 

सूरज कभी सदा के लिए नहीं ढलता 

कभी याद आये तो आ जाया करो मिलने 

फिर न कहना आपसे अनुज नहीं मिलता 

कभी हमको वक्त नहीं था उनसे मिलने का 

अब वक्त है तो  'अनुज ' नहीं  मिलता 

 

मनोज 'आजिज़'


ग़ज़ल


फिर एक नई शम्मे आस जली

बावक़्त पस्त जुनूँ की बात टली

अर्से हुए कि कोई वादे निभाए

फिर वफ़ा की ख़्वाब पली

रौशनी आई जिन्दगी की तंग गलियों में

कब किसकी हमेशा रौशनदान जली

दम घुंटता है यहाँ ऐ 'आजिज़'

झूठे वादों से बुरी हालात भली

------------

नीतेश जैन


आज भी अकेला है ये दिल

ये राहें

बड़ी ही हसीन होती है

किसी को इन पर भटकना होता है

तो किसी को मंजिल नसीब होती है

लेकिन न मेरी कोई राह है

और न कोई मंजिल

एक दिन किसी की तलाश में

उसके नजदीक ले आया ये दिल

वो तो है खुदा की परछाईं

मैं ही नहीं था उसके काबिल

जैसे पहले तन्‍हा था

वैसे ही आज भी अकेला है ये दिल


आज भी हर दिन ये यादें

बहुत कुछ कह जाती है

उनके साथ बिताये लम्‍हों को

यूं ही ताज़ा कर जाती है

एक वक्‍त था जब उसके गमों में

और मेरी मुस्‍कुराहट थी वो

लेकिन अब अकेली है मेरी मुस्‍कुराहट

और अकेला हूं मैं

ना ही खुद को पाया

ना ही उसे किया हासिल

जैसे पहले तन्‍हा था

वैसे ही आज भी अकेला है ये दिल

---------------

अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव

2 कविताएँ
वे ....आते ही होंगे ......
निकल चुके हैं ......दलबल के साथ ....
जीपों ..और ...मोटर साइकलों ..पर ...
तलवारों ...छुरों ...बन्दूकों के ..साथ
मुझे मारने .. .क्योकि मैंने ..
सच ... बोला ...है .......


मुझ अकेले को .....मारने .......
वे दल बल से आते हैं ....
क्योकि वे कायर हैं ...डरपोक ...हैं ..
वे ...सच से .........बहुत ....डरते हैं ...
हालाँकि मैं कोई .................
अभिताब बच्चन या .धर्मेन्द्र ...नहीं
जो अकेले ही उन्हें ...मार भगा ऊँगा ....
या मार मार कर ......उन्हें गिरा कर
ज़मीन पर बिछा दूँगा ...


मुझे पता है .....................कि ..
जब वे आयेंगे ...मेरे आस पास वाले ..
जान पहिचानी .............मिलनेवाले
कहीं छुप जायेंगें .. .छुप छुप कर ....
तमाशा देखेंगे ......उनके ज़ुल्म का ..
मेरे ...पिटने का ......अकेले होकर भी
उन कायरों की भीड़ का ....
भरपूर ..... .मुकाबले का ...
दो ...चार उनमें तो अवश्य गिरेंगें ...
क्योंकि आत्मबल मेरे साथ है ...
सच मेरे साथ है ...मैं भागूँगा नहीं .....
डटकर ... मुकाबला ...करूँगा ....
बेदम होकर ..... .गिरने तक ........
वीरगति .... .मिलने तक ...


वे गोलियों से ....मुझे छलनी कर देंगे ...
चिल्ला .. ...चिल्ला ...कर कहेंगें ...
देखो मोहल्ले वालो ....(जो छुपे होंगे )
सच बोलने का नतीज़ा ...
हमसे भिड़ने का नतीजा .....
कुत्ते की मौत ..मरा है ....
देखो सड़क पर लावारिस मरा पड़ा है ...
बड़ा ...सच का बंदा बनता था
उछला . .उछला .. ..फिरता था


वे ख़ुशी मानते . ..नारे लगाते
जीपों .. मोटर साइकिलों ...पर
चले जायेंगें . बीच चौराहे पर ..पड़ी
मेरी खून से लथपथ लाश .
लोगों की भारी तमाशबीन भीड़ ...
सब चर्चा करेंगे बेमौत मरा ये .बुढ्ढा ..
बड़ा ...सच ...... .सच करता था .........
अरे सच से इसे क्या मिला .....?
भाई जैसे ज़माना चले ...वैसे ...चलो ...
क्यों ऐसे लोगों से ............
पँगा लेना जान से हाथ धोना


पुलिस की गाड़ी आ गयी है ...
उसे देख पब्लिक छटने लगी है ...
दरोगा मुझे देखकर पहिचानने की ..
कोशिश कर रहा है ...
सिपाही भीड़ को हटा कर ..
.आस ..पास मार्किंग कर रहा है
इन्हें किसने मारा ...?
दरोगा पूँछ रहा है .....
सब चुप इधर उधर देख रहे हैं ..
कोई बोलता नहीं ....डर ..छाया है ...
दहशत का ........राज है ..
कौन लोग थे ..? कितनी संख्या में थे ..?
आप लोगों ने ....क्या देखा ...
कोई कुछ नहीं बोलता
लोग चुपचाप ...खिसक रहें हैं ...


एक पगला भीड़ से बाहर आता है ..
दरोगा को बताता है बुढ्ढा पागल था ...
सच के लिये भागता था ....
सच को पूजता ...था ....
झूठ को बेनकाब करता था ..
भ्रष्टाचार का.अनाचार का विरोध करता था
इसे तो मरना ही था सो मर गया ...
दरोगा जी इसे उठाइये ....
रस्में .. .निभाइये ..
पंचनामा बनाइये ...
पोस्ट मार्टम ...कराइये ..
अन्तिम संस्कार ....
सरकारी खर्चे पर कराइये
नहीं तो ..लाश नदी के पानी में डाल ...
छुटकारा ,, ,पाइये ...


इसका तो यही अन्जाम होना था
इसका तो यही अन्जाम होना था अरे ..
क्या .कोई पत्थर से भी सिर फोड़ता है ...?..
मैं सोच रहा था ...
मैंने सच ही तो बोला था .........



(समाप्त) ये आज के समाज की सच्चाई है कि लोग सामाजिक
सरोकारों से मतलब नहीं रखते पर व्यवस्था को
पानी पी पी के गरियाते हैं जो थोड़े बहुत लोग बुराइयों का विरोध
करतें हैं उन पर अत्याचारों का कहर टूट पड़ता है और आमतौर
पर लोग उनका साथ नहीं देते
--
आदमी रोता हुवा ...
भद्दा दिखता है ....गन्दा दिखता है ...
और वोही आदमी मुस्कराता .
हँसता ... अच्छा दिखता है .......
जानतें हैं ... .क्यों ......?
क्योंकि भगवान चाहतें हैं ...
कि वोह हँसे ....मुस्कराये ...
इस दुनिया में सबको खुश रखे .....
खुशियाँ ..... .मनाये ......
इसके लिये उन्होंने बनाई ....
यह सुन्दर दुनियाँ .....
कलकलाती नदियाँ .......
हरे भरे पहाड़ ...... .मस्त हवाएँ ..
सुन्दर पशु ....पक्षी ....

पर आदमी ने क्या किया ...?
नदियाँ गन्दी की ...
हरे भरे पहाड़ उजाड़ ....
हवाओं में ज़हर भर दिया ....और
पशु पक्षियों का अधाधुन्द शिकार ..कर
दिये जंगल के जंगल उजाड़ ...
खड़े कर दिये कांकरी टों के
जंगल और पहाड़ ......
सब नष्ट कर डाला और
करते ही जा रहें हैं ....
अपने रोने का सामान ....
इक्कठे ही करते जा रहें हैं ...


भगवान ने आदमी के लिये ...
बनाई ... औरत .....
उसे आदमी बनाये रखने के लिये ..
उसे जन्म देने ...उन्होंने माँ बनाई ..
उसके साथ खेलने बहिन बनाई ..
प्यारा जीवन जीने पत्नी बनाई
पुत्रियों के रूप में देवियों का प्यार दिया ..
और आदमी ने नारी के हर रूप की ...
बेईज्जती की ... उसे कोख में ही ...
मार डाला ...मूर्खता की हद कर दी ...
जब वह नारी के प्रति असंवेदनशील बना
वह रक्षाबंधन भूल गया …………
शादी के ..पवित्र बन्धन भूल ......गया .
वह पुत्रियों का ...खिलखिलाना भूल गया
वह भूल गया कि ....नारी . .शक्ति है
लक्ष्मी ..दुर्गा ..पार्वती ..के रूप में भक्ति है
वोह हर तरह से .......... .
पूजनीय ...है सम्माननीय ...है
वोह ....साथिन है आदमी की हर रूप में
वोह .....अर्धांगिनी है आदमी की हर रूप में
खुशियों की चाँदनी या ग़मों की धुप में

पर आदमी ने उसे नष्ट करने की ठान ली
सेक्स रेशियो ... .घटने लगे
लड़के ....कुवारे .... रहने .... लगे
अब ..जब ..समाज में यह असन्तुलन होगा
तो परि डाम भी समाज को ही भुगतना होगा


ये बढ़ते अपराध नारी के प्रति .....
ये रेप ... हत्याएँ .....ये सब क्या हैं ......?
कि नर ...नारी का सहज रेशियो डगमगा गया है
आदमी ...अपने ही भाग्य को खा गया है
और अब वोह कुंठित है रोता है
पर ......अपने किये पर लज्जित नहीं होता है
वोह किये जा रहा है मूर्खता पर मूर्खता
भगवान भी आखिर उसे कहाँ तक सम्भालता


भगवान का बनाया आदमी ..अब रो रहा है
बस रो रहा है ..वोह हँसना भूल गया है
वोह मुस्कराना भूल गया है
और यह हमारा हरा भरा सुन्दर सन्सार
नरक बन गया है ..बद से बदतर बनता जा रहा है
बद से बद तर बनता जा रहा है ....


न जाने आदमी ..........कब चेतेगा ...?
अपनी .... गल्तियों को समझेगा
और उन्हें ....आगे ... .होने से .........रोकेगा ...
फ़िलहाल भगवान भी बेचारे और लाचार हैं
आदमी को समझाने में
उसकी अक्ल ठिकाने लगाने में
उनके प्रयास बेकार हैं ...
उनकी बात न सुननेके हठ पर ............
आदमी बेवकूफी की हद तक जाने को तैय्यार है



(समाप्त) कहतें हैं आदमी भगवान की उत्कृष्ट रचना है
उसे भगवान ने बुद्धि रुपी निधि दी है पर वह
उसका सदूपयोग न करके विनाश की और कदम बढ़ा
रहा है और भगवान की आवाज़ जो उसके ही अंतस
में है नहीं सुनता

--


(ऊपर का चित्र : सौजन्य - जसबीर चावला)

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रचनाकार: सप्ताह की कविताएँ
सप्ताह की कविताएँ
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