रविवार, 28 जुलाई 2013

राजीव आनंद का व्यंग्य : कुत्‍ते-बिल्‍ली की बारिश हो रही थी

एक व्‍यंग्‍य कुत्‍ते-बिल्‍ली की वारिश हो रही थी

एक अनुवादक है आचार्य फनीन्‍द्र जिनका कहना है कि ‘मैं हिन्‍दी भले ही गलत लिखूं पर अंग्रेजी अशुद्ध बिल्‍कुल नहीं लिख सकता․ आचार्य फनीन्‍द्र कई वर्षों से शब्‍दों के शिल्‍पी बन साहित्‍य के सृजन में लगे रहे परंतु उन्‍हें कमाई के नाम पर कुछ हाथ नहीं लग रहा था․ एक नहीं, दो नहीं,

चार-चार कालजयी रचनाओं के बाद भी खाए-खाए पर आफत थी․

कोई भूखा जब भूख से विचलित हो जाता है तो विद्रोह कर उठता है․ आचार्य फनीन्‍द्र भूखे भी थे और थे साहित्‍यकार लिहाजा उनका विद्रोह कुछ अलहदा किस्‍म का था․ उन्‍होंने साहित्‍य सृजन के बजाए अनुवाद करने की ठानी․ अनुवाद के ठेकेदारों से मिलने के बाद बुद्धि से कुशाग्र आचार्य फनीन्‍द्र को यह समझते देर नहीं लगी कि हिन्‍दी का लेखक जितना कमाता है उससे कहीं ज्‍यादा अनुवादक अर्जित करता है․ आचार्य फनीन्‍द्र को जान कर खुशी हुई कि वर्तमान दौर में अनुवाद भाषा की समृद्धि के लिए नहीं किए जाते, अनुवाद अच्‍छे और पठनीय हो ये अब आवश्‍यक नहीं रह गया है․ बस क्‍या था आचार्य फनीन्‍द्र विदेशी दूतावासों के चक्‍कर लगाना शुरू कर दिए क्‍योंकि विदेशी दूतावासों आजकल अपने-अपने साहित्‍य के अनुवाद के लिए धन देने लगी है․ आचार्य फनीन्‍द्र को एक धांसू अनुवादक श्री रूपान्‍तरण से मूलाकात हुई, इनकी खासियत यह थी कि हिन्‍दी ठीक से नहीं जानते थे, हिन्‍दी के मुहावरे, व्‍याकरण, शब्‍द संपदा से बिल्‍कुल अपरिचित थे परंतु ‘धांसू अनुवादक' के खिताब से नवाजे गये थे․ आचार्य फनीन्‍द्र ने श्री रूपान्‍तरण के एक विदेशी उपन्‍यास ‘कॉलरा' का हिन्‍दी अनुवाद पढ़ने के लिए मांगी․ जब आचार्य फनीन्‍द्र उसे पढ़ना शुरू किए तो पता चला कि उपन्‍यास ‘कॉलरा' का हिन्‍दी अनुवाद न सिर्फ बेरस व बेजान है अपितु भाषा की बारीकियां और शब्‍द सौष्‍ठव का सर्वथा अभाव है परिणामस्‍वरूप अनुवाद इतनी बोझिल और निर्जीव थी कि अगर अनुवाद की पुस्‍तक पर गोली दागी जाए तो गोली भी बोर होकर आठ-दस पन्‍ने से अधिक नहीं जाएगी, लिहाजा आधी उपन्‍यास पढ़ते-पढ़ते आचार्य फनीन्‍द्र एक भयानक पीड़ा से गुजरते हुए ऐसा महसूस किया कि अगर पूरी किताब जबरन पढ़ने की कोशिश किया तो उन्‍हें कुछ भी हो सकता है․ उपन्‍यास ‘कॉलरा' का हिन्‍दी अनुवाद आचार्य फनीन्‍द्र ने

ससम्‍मान श्री रूपान्‍तरण को लौटा दिया․

आचार्य फनीन्‍द्र ने सोचा कि उन्‍हें भले ही हिन्‍दी का अच्‍छा ज्ञान नहीं है परंतु अंग्रेजी भाषा पर तो उन्‍हें दक्षता हासिल है इसलिए उनके द्वारा किया गया अनुवाद भी कालजयी ही होगा लिहाजा विदेशी दूतावासों के चक्‍कर लगा-लगा कर धांसू अनुवादक श्री रूपान्‍तरण से पैरवी करवा कर, एक-दो अंग्रेजी भाषा के साहित्‍य का ठेका आचार्य फनीन्‍द्र ने ले लिया और अपने अथक परिश्रम और प्रयास से कुछ महीनों में ऐसा अनुवाद कर डाला, जो आचार्य फनीन्‍द्र के लिए तो कालजयी सिद्ध होने जा रहा था परंतु पाठकों को बता दें कि सही अर्थों में आचार्य फनीन्‍द्र को न तो अंग्रेजी भाषा और न ही हिन्‍दी भाषा का आवश्‍यक ज्ञान था जो अनुवाद के लिए पहली शर्त है․ लक्ष्‍य भाषा का विषय के अनुरूप न तो आचार्य फनीन्‍द्र को समुचित ज्ञान था और न ही विषय का ज्ञान था․ विषय का सटीक ज्ञान न होने के कारण आचार्य फनीन्‍द्र अनुवाद में अर्थ का अनर्थ कर बैठे थे, उदाहरणार्थ जिस अंग्रेजी उपन्‍यास का आचार्य फनीन्‍द्र अनुवाद कर रहे थे उसमें एक वाक्‍य था, ‘‘आए एम गोअींग होम'', जिसका अनुवाद उन्‍होंने किया ‘‘मैं हॅूं जा रहा घर'', आगे ‘रेड इंडियन्स' को ‘लाल भारतीय', ‘सिल्‍वर फ़िश' को ‘रजत मछली' तथा टू रेन केटस एंड डोगस' को ‘‘कुत्‍ते और बिल्‍लियों की बारिश'', ही फेल इन लब'' को ‘‘वह प्रेम में गिरा'', ‘‘ब्‍लू ब्‍लड'' को ‘‘नीले

खून वाला'' के रूप में अनुवाद कर दिया․

दरअसल आचार्य फनीन्‍द्र को यह जानकारी नहीं थी कि मूल सामग्री यदि सूक्ष्‍म भावों को व्‍यक्‍त करती हो तो उसका भावानुवाद करना चाहिए और यदि तथ्‍यात्‍मक, वैज्ञानिक या विचारप्रधान है तो उसका शब्‍दानुवाद करना चाहिए․ आचार्य फनीन्‍द्र को हिन्‍दी के मूर्धन्‍य विद्वान भारतेन्‍दू हरिश्‍चन्‍द्र द्वारा शेक्‍सपीयर के ‘मर्चेन्‍ट अॉफ बेनिस' का अनुवाद ‘दुर्लभ बन्‍धु' अर्थात बंशपूर का महाजन' अनुवाद करने से पहले पढ़ लेना चाहिए था परंतु अनुवाद से ज्‍यादा से ज्‍यादा पैसा कमाने की ललक में आचार्य फनीन्‍द्र को कुछ पढ़ने की फुर्सत ही कहां थी․ उन्‍हें तो बस पंक्‍ति दर पंक्‍ति, शब्‍द दर शब्‍द अनुवाद करते जाना था क्‍योंकि अनुवाद को समझ पाने की सलाहियत उसके पुनरीक्षक को तो और भी नहीं थी․ लिहाजा दूतावासों के अधिकारी खुश थे कि उन्‍होंने अपनी भाषा का साहित्‍य हिन्‍दी में पहुंचा दिया․

श्री रूपान्‍तरण तो अनुवाद करके हिन्‍दी के साथ गजब ढा ही रहे थे अब उन्‍हें आचार्य फनीन्‍द्र का साथ मिल गया था․ अब अनुवाद की दूकान दोनों मिलकर चला रहे थे और साहित्‍य से इतर खूब रूपए कमा रहे थे बिना इस बात की परवाह किए कि उनके द्वारा अनुदित उपन्‍यासों को

कोई पढ़ भी पाएगा या नहीं और अगर कोई पढ़ भी लिया तो क्‍या समझ भी पाएगा ?

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राजीव आनंद

सेल फोन - 9471765417

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