कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उनकी दो लघुकथाएं

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कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उनकी दो लघुकथाएं (31 जुलाई-1880 ) (प्रस्तुति : गोवर्धन यादव)

राष्ट्र का सेवक

राष्ट्र के सेवक ने कहा:- देश की मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है नीचों के साथ भाईचारे का सलूक, पतितों के साथ बराबरी का बर्ताव, दुनिया में सभी भाई हैं, कोई नीचा नहीं, कोई ऊँचा नहीं.

दुनिया ने जयजयकार की---कितनी विशाल दृष्टि है, कितना भावुक हृदय ! उसकी सुन्दर लडकी इन्दिरा ने सुना और चिंता के सागर में डूब गई. राष्ट्र के सेवक ने नीची जात के नौजवान को गले लगाया. दुनिया ने कहा- “यह फ़रिश्ता है, पैगम्बर है, राष्ट्र की नैया का खेवैया है.” इन्दिरा ने देखा और उसका चेहरा चमकने लगा. राष्ट्र का सेवक नीची जात के नौजवान को मन्दिर में ले गया, देवता के दर्शन कराए और कहा- “हमारा देवता गरीबी में है, जिल्लत में है,परस्ती में है.”

इन्दिरा ने देखा और मुस्कराई. इन्दिरा राष्ट्र के सेवक के पास जाकर बोली- “श्रद्धेय पिताजी, मैं मोहन से ब्याह करना चाहती हूँ.” राष्ट्र के सेवक ने प्यार की नजरों से देखकर पूछा-“मोहन कौन है ?”. इन्दिरा ने उत्साह भरे स्वर में कहा-“ मोहन वही नौजवान है, जिसे आपने गले लगाया, जिसे आप मन्दिर ले गए, जो सच्चा, बहादुर और नेक है”.

राष्ट्र के सेवक ने प्रलय की आंखों से उसकी ओर देखा और मुंह फ़ेर लिया.

देवी

रात भीग चुकी थी. मैं बरामदे में खडा था. सामने अमीनुद्दौला पार्क नींद में डूबा खडा था. सिर्फ़ एक औरत एक तकियादार बेंच पर बैठी हुई थी. पार्क के बाहर सडक के किनारे एक फ़कीर खडा राहगीरों को दुआयें दे रहा था-“ खुदा और रसूल का वास्ता....राम और भगवान का वास्ता....इस अन्धे पर रहम करो”. सडक पर मोटरों और सवारियों का तांता बन्द हो चुका था. इक्के-दुक्के आदमी नजर आ जाते थे., फ़कीर की आवाज जो पहले नक्कारखाने में तूती की आवाज थी, जब खुले मैदानों की बुलन्द पुकार हो रही थी. एकाएक वह औरत उठी और इधर-उधर चौकन्नी आंखों से देखकर फ़कीर के हाथ में कुछ रख दिया और फ़िर बहुत धीमे से कुछ कहकर एक तरफ़ चली गई. फ़कीर के हाथ में कागज का एक टुकडा नजर आया जिसे वह बार-बार मल रहा था. क्या उस औरत ने यह कागज दिया है?.यह क्या रहस्य है?. उसको जानने के कुतूहल से अधीर होकर मैं नीचे आया और फ़कीर के पास जाकर खडा हो गया. मेरी आहट आते ही फ़कीर ने उस कागज के पुर्जे को उंगलियों से दबाकर मुझे दिखाया और पूछा-“बाबा, देखो यह क्या चीज है?.”

मैंने देखा-दस रुपये का नोट था. बोला-“दस रुपये का नोट है, कहाँ पाया ?”. मैंने और कुछ न कहा. उस औरत की तरफ़ दौडा जो अब अन्धेरे में बस एक सपना बनकर रह गई थी. वह कई गलियों में होती हुई एक टूटे-फ़ूटे मकान के दरवाजे पर रुकी, ताला खोला और अन्दर चली गई.

रात को कुछ पूछना ठीक न समझकर मैं लौट आया. रात भर जी उसी तरफ़ लगा रहा. एकदम तडके फ़िर मैं उस गली में जा पहुंचा. मालूम हुआ, वह एक अनाथ विधवा है. मैंने दरवाजे पर जाकर पुकारा-“देवी, मैं तुम्हारे दर्शन करने आया हूँ.”. औरत बाहर निकल आयी-गरीबी और बेकसी की जिन्दा तस्वीर. मैंने हिचकते हुए कहा-“ रात आपने फ़कीर को.........”. देवी ने बात काटते हुए कहा—“ अजी वह क्या बात थी, मुझे वह नोट पडा मिल गया था, मेरे किस काम का था.”

मैंने उस देवी के कदमॊंपर सिर झुका दिया.

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गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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