शनिवार, 6 जुलाई 2013

साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - हिंदी पत्रकारिता में मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श

हिंदी पत्रकारिता में मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श

(‘हंस’अगस्त,2003 के विशेष संदर्भ में)

Ø डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
E-mail - drsatappahavan@gmail. com.

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राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’अगस्त,2003 का विशेषांक “भारतीय मुसलमान : वर्तमान और भविष्य” शीर्षक से प्रकाशित हुआ. हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक विशेषांक के माध्यम से भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक को लेकर विचार−विमर्श हुआ. इस विशेषांक का जोरदार स्वागत हुआ. अतिथि संपादक की जिम्मेदारी हिंदी के सशक्त उपन्यासकार अजगर वजाहत ने संभाली. राजेंद्र यादव ने नये लेखकों को लिखने के लिए प्रेरित किया. नये लेखक स्वातंत्र्योत्तर कालीन समस्याओं को लेकर कुछ लिखना चाहते थे और समाज में स्थित व्यवस्था को शब्दों में बांधना चाहते थे. राजेंद्र यादव ने नये लेखकों की मानसिकता को विचार में लेकर अगस्त‚1986 से‘हंस’का संपादन करना शुरू किया जो आज तक निरंतर जारी है. विगत ढाई दशक की लंबी यात्रा‘हंस’ के लिए विचार –मंथन की यात्रा दृष्टिगोचर होती है.

स्वयं राजेंद्र यादव कहते हैं‚“इस समय हम एक भयानक रचना विरोधी दौर से गुजर रहें हैं−सहित्य में ही नहीं‚पूरे आर्थिक और औद्यौगिक सोच में भी. अपनी जमीन और जरूरत से चीजों का विकास ना करके आसान लगता है ‘विकास’को ‘आयात’ कर लेना. वैचारिक‚रचनात्मकऔरआर्थिक क्षेत्रों के आसान रास्ते हमें दरिद्र‚कर्जदार और परोपजीवी बनाते है. इस माहोल में एक रचना मिश्रित पत्रिका की बात दुस्साहसिक प्रयोग ही है. लेकिन कोई नहीं जानता कि कब कौन−सा प्रयोग ‘सही सुर’पकड ले. रचना और विचार के प्रति विनम्र सम्मन और सरोकार ही ‘हंस’ की आधारनीति है. ”1 राजेंद्र यादव ने विगत ढाई दशका से इस आधारनीति को अपनाते हुए ही ‘हंस’ का संपादन किया हुआ दृष्टिगोचर होता है. कहना जरूरी नहीं कि अपने रचनाकाल में राजेंद्र यादव ने ‘हंस’को जन−चेतना का प्रगतिशील मासिक बनाया. यह रचना काल सांस्कृतिक संकट का रहा है‚देश का जनमानस−अंदर ही अंदर घुमड रहा है और सत्ता केंद्रित राजनीति ने देश को भंवर में फंसा दिया है‚ऐसे रचनाकाल से गुजरते हुए‘हंस’ने एक साहित्यिक पत्रकारिता का मंचा खडा किया. स्वाधीनता संघर्ष में कमाये गए तमाम मूल्य एक−एक कर हमारे हाथों से फिसल रहें थें कि उसी वक्त राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ के माध्यम से इन मूल्यों की रक्षा हेतु प्रयास किया हुआ परिलक्षित होता है. राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’अगस्त,2003 का “भारतीय मुसलमान : वर्तमान और भविष्य” विशेषांक इन्हीं मूल्यों को हमारे सामने प्रस्तुत करता है. भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श छेडने का श्रेया हिंदी पत्रकारिता में ‘हंस’ पत्रिका को जाता है‚इसे मानना होगा. विवेच्य विशेषांक में पिचानवे प्रतिशत से अधिक मुस्लिम अल्पसंख्यक लेखक‚इस्लामिक स्टडीज‚इतिहास‚समाजशास्त्र‚अंग्रेजी‚उर्दू और पत्रकारिता के अध्ययताओं की रचनाएँ प्रकाशित हुई है. हिंदी पत्रकारिता में ऐसा चित्र पहली बार दिखायी दिया‚इस बात को हमें स्वीकार करना होगा. राजेंद्र यादव का कथन दृष्टव्य है‚“जैसे ही हमने विशेषांक की घोषणा की कि लेखों का सिलसिला शुरू हो गया−अधिकांश गैर−मुस्लिमों का उत्साह देखने लायक था. नामवर सिंह‚शमीम हनफी और शम्सुर्रहमान फारूकी की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए हमें बार−बार याद दिलाना पडा कि चाहे स्त्री हो या दलित हम संसार के हर विषय के विशेषज्ञ है‚कुछ उन्हें भी तो बोलने दिया जाए जिनकी यह समस्या है. आप देखेंगे कि विशेषांक में पिचानवे प्रतिशत उन्हीं की रचनाएँ हैं. ”2

विवेच्य विशेषांक में प्रकाशित अधिकतम रचनाएँ मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखी गयी है. मेरी−तेरी उसकी बात‚अतिथि संपादक की कलम से‚ मुस्लिम समाज: विचार और जीवन‚कविताएँ/नज्म/गजलें‚कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें आदि उपशीर्षक मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श का परिचय देते हैं. मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श को ‘हंस’ के माध्यम से यादव जी ने साहसिक और सार्थक ढंग से उजागर किया और साथ ही पुनरूत्थानवादियों को दो टूक जवाब दिया. ‘हंस’ ने अपनी रचनाओं द्वारा समाज को मानसिक रूप से जीवित रखने का प्रयास किया है और अपनी एक विचारधारा बनाई है. इस विचारधारा से पाठक समाज में फैली बुराइयों से लड़ने के इरादे को और मजबूत कर रहे हैं. राजेंद्र यादव द्वारा संपादित अगस्त,2003 के विशेषांक में मुस्लिम पीडितों और शोषितों के प्रति एक सहज स्वाभाविक चिंता की परंपरा अपनायी है. इसलिए यह जुझारूपन की परंपरा भी है. इसमें समझौते और अवसरवाद के लिए जरा भी गंजाइश नहीं हैं. ‘हंस’की भूमिका नये जीवनमूल्यों के निर्माण में उसके योगदान‚उच्चस्तरीय रचनात्मक हस्तक्षेप‚उसका आंदोलनकारी तेवर और आज के जमाने की माँगों को उजागर करती है. “भारतीय मुसलमान : वर्तमान और भविष्य” शीर्षक विशेषांक सही अर्थों में मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज का एक्स−रे है.

मुस्लिम समाज के सामाजिक आचार‚विचार और संस्कार आदि पर मुस्लिम रचनाकरों ने अपनी बात रखी है वह अधिक प्रासंगिक लगती है. विशेषांक के संदर्भ में अतिथि संपादक असगर वजा‌हत का कथन दृष्टव्य है‚“हंस के प्रस्तुत विशेषांक का उद्देश्य न केवल मुस्लिम समाज की गहरी पड़ताल करना है‚बल्कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदायों के बीच संवाद की स्थिति भी पैदा करना है. निश्चित रूप से जानकारी के अभाव में अविश्वास पैदा होता है‚जिनके कारण सांप्रदायिक शक्तियों को घृणा और उन्माद फैलाने का मौका मिल जाता है. सांप्रदायिक व्यक्तियों और दलों को छोडकर पूरा देश यह मानता है कि सांप्रदायिकता और हिंसा से किसी तरह की कोई समस्या नहीं सुलझ सकती‚बल्कि सांप्रदायिकता देश के विकास‚एकता और अखंडता के रास्ते में सबसे बडी बाधा है. ”3 कहना सही होगा कि सांप्रदायिक शक्तियों को ‘हंस’ के माध्यम से खदेडा है और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को मुख्यधारा में लाने का प्रयास हुआ परिलक्षित होता है. राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’ का रचना परिवेश धार्मिक कट्टरपन‚नैतिकता का ऊँचा आदर्श‚बडे−बुढों के नियंत्रण में विवाह‚बालविवाह आदि मान्यताओं के ऊँचे दुर्ग तोड़ता हुआ परिलक्षित होता है. समसामयिक चेतना तथा आधुनिक भावबोध विवेच्य विशेषांक के रचना परिवेश में निर्मित रचनाओं में गहराई से उभरा है. मुस्लिम रचनाकरों ने सामाजिक विषमता और राजनीतिक संघर्ष के उद्− घाटन से सामाजिक चेतना को प्रस्तुत किया है. भारतीय मुस्लिम समाज की समस्याएँ और चिंताएँ पाठकों के सामने रखना विवेच्य विशेषांक का प्रमुख उद्देश्य रहा है. “किसी भी देश में जब धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या राजनीतिक संदर्भ में की जाती है तो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का मुद्दा महत्त्वपूर्ण मुद्दा समझा जाता है. अल्पसंख्यकों का वर्गीकरण कई आधारों पर किया जाता है. धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में अल्पसंख्यकों को धार्मिक आधार पर ही रखा जा सकता है. भारत में यूँ तो अनेक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय हैं‚परंतु मुस्लिम समुदाय के अतिरिक्त अन्य समुदायों की संख्या इतनी कम है कि देश की राजनीति में वे महत्त्वपूर्ण कारक नहीं बन पाए. ”4 अतः कहा जा सकता है कि भारतीय मुस्लिम समाज के नेतृत्व का प्रभाव अल्पसंख्यक राजनीति पर पड सकता है. मुस्लिम समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के साथ− साथ राजनीतिक एंव धार्मिक स्थिति भी इतनी अच्छी नहीं रही है. अतहर फारूकी‚असगर अली इंजीनियर‚परवेज अनवर‚जोया हसन और नसरीन हुसेन आदि मुस्लिम चिंतकों ने विवेच्य विशेषांक में अपने विचार मुस्लिम समाज के संदर्भ में रखें हैं‚जो आज अधिक प्रासंगिक लगते है. “धार्मिक अनुभूति स्वतः प्रमाण है. वह स्वतः सिद्ध है. वह अपना परिचय स्वयं देती है. लेकिन धार्मिक द्रष्टाओं को अपने आंतरिक विश्वासों को इस तरह प्रमाणित करना पड़ता है कि वे विश्वास युग की विचारधारा को संतुष्ट कर सकें”5 भारतीय मुस्लिम समाज की विचारधारा परिवर्तन की ओर झुकती परिलक्षित होती है. विवेच्य विशेषांक की रचनाओं में मुस्लिम समाज में स्थित जन−चेतना प्राणतत्त्व के रूप में परिलक्षित होती है.

भारतीय मुस्लिम समाज का आर्थिक‚शैक्षिक पिछडापन ही अनेक समस्याओं का कारण है‚इस बात को मानना होगा. श्री. सीताराम यचुरी कहते हैं‚“भारतीय मुसलमानों का भविष्य धर्मनिरपेक्ष ढाचें पर निर्भर करता है. यदि भारत में धर्मनिरपेक्षता सफल रहती है‚तब ही भारतीय मुसलमानों को बराबर के अधिकार मिल सकते है और मिलेंगे. ”6 संपूर्ण भारतीय समाज में सहिष्णुता निर्माण का कार्य होना आवश्यक है. सहिष्णुता के कारण सामाजिक शांति स्थापित हो सकती है. विवेच्य विशेषांक में भारतीय मुस्लिम समाज की गरीबी‚दुर्दशा‚अंधविश्वास और कुरीतियों‚कर्ज के बोझ से दबे हुए किसानों उनके तीज−त्यौहारों और सरल तथा निश्चल जीवन का वर्जन कर पाठकों के सामने सामाजिक चेतना के तत्त्व प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. इससे स्पष्ट होता है कि विवेच्य विशेषांक में भारतीय मुस्लिम समाज में स्थित जन−चेतना का व्यापक स्वरूप परिलक्षित होता है. “लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था के लिए शिक्षा नागरिकों में विचार व्यक्त करने‚भाषण करने‚सभा आयोजन करने‚संगठन बनाने‚ कहीं भी निवास करने व्यवसाय−व्यापार पेशा करके जीविका कमाने‚अपने धर्म−उपासना का पालन करने की स्वतंत्राता देती है. प्रत्येक नागरिक में भाईचारे व एक−दूसरे के प्रति आदर‚विश्वास एवं सहयोग की भावना का संचार हो. शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में‘न्याय’ दिलाने का मार्गदर्शन दे ”7 कहना आवश्यक नहीं कि शिक्षा के कारण ही सामाजिक परिवर्तन संभव हो रहा है. भारतीय मुस्लिम समाज का शैक्षणिक परिदृश्य कमजोर दृष्टिगोचर होता है. मुस्लिम समाज में शिक्षा का महत्त्व स्थापित करने के लिए जो नए प्रयास हो रहे हैं उनका विस्तार के साथ विवेच्य विशेषांक में विवेचन हुआ है.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति सैयद शाहिद महदी‚अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति नसीम अहमद‚हेडलाइन प्लस की संपादक शीबा फहमी‚हबीब तनवीर आदि मुस्लिम विचारकों ने भारतीय मुस्लिम समाज की सच्चाईयों को पाठकों के सामने रखा है. कैफी आजमी‚मोहम्मद अल्वी‚अरमान नज्मी‚असलम हसन‚राशिद तराज जैसे मानवतावादी साहित्यकारों की कविताएँ‚नज्म और गजलें भारतीय मुस्लिम समाज का सामाजिक सच सामने रखती हैं. “मेरे आका”8 तहमीना दुर्रानी‚“पहला सज्दा”9 किश्वर नाहीद‚ “मेरे बचपन के दिन”10 तसलीमा नसरीन का आत्मकथ्य समकलीन मुस्लिम समाज की व्यवस्था को हमारे सामने रखते हैं. विवेच्य विशेषांक में संपादित रुकैया सखावत हुसैन‚रशीद जहाँ‚खालिदा हुसैन‚नासिरा शर्मा आदि प्रतिनिधिक मुस्लिम कहनीकारों की कहनियाँ मुसलमानों की स्थिति और उनकी समस्याओं को पाठकों के सामने रखती है. अगस्त,2003 में प्रकशित “भारतीय मुसलमान : वर्तमान और भविष्य” ‘हंस’का विशेषांक मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय का सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया दस्तावेज है‚इस बात को हम नकार नहीं सकते. भारतीय मुस्लिम समाज के सारे तथ्यों को प्रस्तुत विशेषांक में उजागर किया है. अतः कहना उचित होगा कि राजेंद्र यादव का यह प्रयास भारतीय मुस्लिम समाज के भविष्य के लिए निश्चित ही सही मार्गदर्शक तत्त्व बनेगा. भविष्य में भारतीय मुस्लिम समाज का अध्ययन करते समय इस विशेषांक का आधार सामग्री के रूप में उपयोग कर ही अनुसंधाताओं को आगे बढ़ना होगा. इस में दो राय नहीं.

निष्कर्ष

राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’अगस्त,2003 का विशेषांक “भारतीय मुसलमान : वर्तमान और भविष्य” हिंदी पत्रकारिता क्षेत्र में ऐतिहासिक माननी होगी. हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक विशेषांक के माध्यम से भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक को लेकर विचार−विमर्श हुआ. इस विशेषांक का जोरदार स्वागत हुआ. अतिथि संपादक की जिम्मेदारी हिंदी के सशक्त उपन्यासकार अजगर वजाहत ने संभाली. राजेंद्र यादव ने नये लेखकों को लिखने के लिए प्रेरित किया. नये लेखक स्वातंत्र्योत्तर कालीन समस्याओं को लेकर कुछ लिखना चाहते थे और समाज में स्थित व्यवस्था को शब्दों में बांधना चाहते थे. राजेंद्र यादव ने नये लेखकों की मानसिकता को विचार में लेकर अगस्त‚1986 से‘हंस’का संपादन करना शुरू किया जो आज तक निरंतर जारी है. विगत ढाई दशक की लंबी यात्रा‘हंस’ के लिए विचार –मंथन की यात्रा दृष्टिगोचर होती है.

राजेंद्र यादव ने ‘हंस’को जन−चेतना का प्रगतिशील मासिक बनाया. यह रचना काल सांस्कृतिक संकट का रहा है‚देश का जनमानस−अंदर ही अंदर घुमड रहा है और सत्ता केंद्रित राजनीति ने देश को भंवर में फंसा दिया है‚ऐसे रचनाकाल से गुजरते हुए‘हंस’ने एक साहित्यिक पत्रकारिता का मंचा खडा किया. स्वाधीनता संघर्ष में कमाये गए तमाम मूल्य एक−एक कर हमारे हाथों से फिसल रहें थें कि उसी वक्त राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ के माध्यम से इन मूल्यों की रक्षा हेतु प्रयास किया हुआ परिलक्षित होता है. राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’अगस्त,2003 का “भारतीय मुसलमान : वर्तमान और भविष्य” विशेषांक इन्हीं मूल्यों को हमारे सामने प्रस्तुत करता है. भारतीय मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श छेडने का श्रेया हिंदी पत्रकारिता में ‘हंस’ पत्रिका को जाता है‚इसे मानना होगा. विवेच्य विशेषांक में पिचानवे प्रतिशत से अधिक मुस्लिम अल्पसंख्यक लेखक‚इस्लामिक स्टडीज‚इतिहास‚समाजशास्त्र‚अंग्रेजी‚उर्दू और पत्रकारिता के अध्ययताओं की रचनाएँ प्रकाशित हुई है. हिंदी पत्रकारिता में ऐसा चित्र पहली बार दिखायी दिया‚इस बात को हमें स्वीकार करना होगा. विवेच्य विशेषांक में प्रकाशित अधिकतम रचनाएँ मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखी गयी है. मेरी−तेरी उसकी बात‚अतिथि संपादक की कलम से‚ मुस्लिम समाज: विचार और जीवन‚कविताएँ/नज्म/गजलें‚कथा जगत की बागी मुस्लिम औरतें आदि उपशीर्षक मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श का परिचय देते हैं. मुस्लिम अल्पसंख्यक विमर्श को ‘हंस’ के माध्यम से यादव जी ने साहसिक और सार्थक ढंग से उजागर किया और साथ ही पुनरूत्थानवादियों को दो टूक जवाब दिया. ‘हंस’ ने अपनी रचनाओं द्वारा समाज को मानसिक रूप से जीवित रखने का प्रयास किया है और अपनी एक विचारधारा बनाई है. इस विचारधारा से पाठक समाज में फैली बुराइयों से लड़ने के इरादे को और मजबूत कर रहे हैं. राजेंद्र यादव द्वारा संपादित अगस्त,2003 के विशेषांक में मुस्लिम पीडितों और शोषितों के प्रति एक सहज स्वाभाविक चिंता की परंपरा अपनायी है. इसलिए यह जुझारूपन की परंपरा भी है. इसमें समझौते और अवसरवाद के लिए जरा भी गंजाइश नहीं हैं. ‘हंस’की भूमिका नये जीवनमूल्यों के निर्माण में उसके योगदान‚उच्चस्तरीय रचनात्मक हस्तक्षेप‚उसका आंदोलनकारी तेवर और आज के जमाने की माँगों को उजागर करती है. “भारतीय मुसलमान : वर्तमान और भविष्य” शीर्षक विशेषांक सही अर्थों में मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज का एक्स−रे है. मुस्लिम समाज के सामाजिक आचार‚विचार और संस्कार आदि पर मुस्लिम रचनाकरों ने अपनी बात रखी है वह अधिक प्रासंगिक लगती है.

राजेंद्र यादव द्वारा संपादित ‘हंस’ का रचना परिवेश धार्मिक कट्टरपन‚नैतिकता का ऊँचा आदर्श‚बडे−बुढों के नियंत्रण में विवाह‚बालविवाह आदि मान्यताओं के ऊँचे दुर्ग तोड़ता हुआ परिलक्षित होता है. समसामयिक चेतना तथा आधुनिक भावबोध विवेच्य विशेषांक के रचना परिवेश में निर्मित रचनाओं में गहराई से उभरा है. मुस्लिम रचनाकरों ने सामाजिक विषमता और राजनीतिक संघर्ष के उद्− घाटन से सामाजिक चेतना को प्रस्तुत किया है. भारतीय मुस्लिम समाज की समस्याएँ और चिंताएँ पाठकों के सामने रखना विवेच्य विशेषांक का प्रमुख उद्देश्य रहा है. भारतीय मुस्लिम समाज की विचारधारा परिवर्तन की ओर झुकती परिलक्षित होती है. विवेच्य विशेषांक की रचनाओं में मुस्लिम समाज में स्थित जन−चेतना प्राणतत्त्व के रूप में परिलक्षित होती है. भारतीय मुस्लिम समाज के सारे तथ्यों को प्रस्तुत विशेषांक में उजागर किया है. अतः कहना उचित होगा कि राजेंद्र यादव का यह प्रयास भारतीय मुस्लिम समाज के भविष्य के लिए निश्चित ही सही मार्गदर्शक तत्त्व बनेगा. भविष्य में भारतीय मुस्लिम समाज का अध्ययन करते समय विवेच्य विशेषांक का आधार सामग्री के रूप में उपयोग कर ही अनुसंधाताओं को आगे बढ़ना होगा. विवेच्य विशेषांक भारतीय नव सामाजिक आंदोलन का हिस्सा बना है. इस में दो राय नहीं.

संदर्भ निदेश $

1. संपा. राजेंद्र यादव −‘हंस’ अगस्त 1986‚पृष्ठ−05

2. संपा. राजेंद्र यादव −‘हंस’ अगस्त 2003‚ पृष्ठ−04

3. वही‚ पृष्ठ−09

4. मणिशंकर प्रसाद –धर्म‚धर्मनिरपेक्षता और राजनीति‚ पृष्ठ−178

5. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् – धर्म और समाज‚ पृष्ठ−12

6. संपा. राजेंद्र यादव −‘हंस’ अगस्त 2003‚ पृष्ठ−107

7. डॉ. एल. एन. शर्मा – भारत में शिक्षा के सामाजिक आधार‚ पृष्ठ−24

8. संपा. राजेंद्र यादव −‘हंस’ अगस्त 2003‚ पृष्ठ−139

9. वही‚ पृष्ठ−146

10. वही‚ पृष्ठ−149

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डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर 414001. (महाराष्ट्र)
दूरभाष - 09850619074 , E-mail - drsatappahavan@gmail. com.

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