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जसबीर चावला की तीन चित्रमय कविताएँ

 

वे सब कहां गईं

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वह तोड़ती पत्थर
इलाहाबाद के पथ पर
कहां है वह
निराला की
कालजयी रचना की
'रचना'
उसे मिलते हैं कम
पत्थर
तोड़ता है अब क्रशर
हर गंाव/शहर
*
अब बबूल की दातुन नहीं बेचती
ख्वाजा अहमद अब्बास की नायिका
हम गर्व से कहते हैं
दातुन नहीं बच्चे भी पेस्ट करते हैं
{पूछता बच्चा दातुन किसे कहते हैं}
*
रेणू/कृश्न चंदर की नायिकाएं
बांसचटाई/सूपड़ा/टोकरी/झाड़ू/डलियाएं
नहीं बनाती/बेचती
प्लास्टिक ने उन्हें बाहर कर दिया
वन से बंास नहीं मिलते
हम भी नहीं खरीदते
{बच्चे नहीं जानते}
*
कभी कदा दिख जाती है
गारोड़िया लुहारन/बंजारन
लोहा कूटती
धोंकनी धौंकती
चूल्हा फूंकती
सड़क किनारे
बिना पते की गाड़ी/घर
के साथ
न जाने किस
महाराणा की आन बान
की रक्षा में
बिता रही
सतत निर्वासन
नहीं जानती
उसके औजार
अब
टाटा बनाता है
यही किसान को भाता है
*
कहां है/किस हाल है
पत्तल/दोने वाली
धुनकी से तुन्न तुन्न कर
रूई पींजने वाली
रशीदा पिंजारन
*
कहां गईं
कहां सबके घरवाले
लगाकर ताले
प्रेमचन्द का होरी
हीरामन/शेलेन्द्र की
'चलत मुसाफिर मोह लिया रे
पिंजरे वाली मुनिया'
गोदान की धनिया
*
लील गया सबको
विकास का बनिया
***



खबर है कि कोई खबर नहीं

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केलिफोर्निया/बाली के जंगलो मे भीषण आग
चीन की कोयला खदानों में िवस्फोट
बंगलादेश में भयंकर बाढ़/नौकाओं का डूबना/जलप्लावन
सैकड़ों/हजारों का मरना/लाखों बे घरबार
जापान में भूकंप
हिंद महा सागर में सोमाली डाकूओं द्वारा जहाजों पर हमला
नाविक बंधक/सौदेबाजी/लाखों डालर में रिहाई
घर वालों के आरोप/सरकार की ढिलाई
पेशावर/करांची/बगदाद/ गाजा पट्टी
बसों /स्कूलों /मस्जिदों में/बमों के आत्मघाती हमले
शिया/सुन्नी/अहमदिये/कादियानी मसले
फ्लोरिडा/ ओखलाहोमा में हरिकेन/चक्रवात/तूफान
न्यूयार्क/शिकागो में कई फुट गहरी बर्फ की चादर
खबर क्या है/सबको पता है
रोज की सुर्खियां हैं
अखबारी पन्नो की
बेमन से उड़ती निगाह वाली सुर्खियां
छोड़ो/वहां/यहां/ऐसा ही होता है
होना ही है
कोई संवेदना/स्फुरण/स्पंदन नहीं
सिहरन/उत्सुकता/सहानुभूति नहीं
न मन तनिक रुकता/अटकता/सोचता है
न ही चाय के प्याले में तूफान आता है
**
मेरे देश के हर शहर/गांव मे
हत्या/लूट/बलात्कार/चोरी
डकेती/आगजनी/सीनाजोरी
भारतीय दंड विधान की हर धारा
घट रही हर पल/क्षण
टेक्सचोरी/जांचे/छापे
जांच आयोग
किस किस को नापें
हर वाहन/रेल/टकरानें/ उलटनें के लिये
लू से/शीत लहर/बाढ़/आग से
मरने के लिये
हम अभिशप्त हैं
हर त्रासदी के लिये
**
दिन प्रतिदिन/हर माह/ हर साल
खबरें नहीं
अखबारी कर्मकांड
गढी हुई
प्रायोजित पेड खबरें
एक ही शब्दावली
बेरंग/बेरस खबरें
कब नहीं घटी ये घटनाएं
कल भी/आज भी/कल भी घटेगी
चौंकना कैसा
**
किस किस को याद कीजिये
किस किस को रोईये
आराम बड़ी चीज है
अखबार ढक के सोईये
...?

image

खैंच रे राम्या खैंच



''''''''''''''''''''''''


तलाव चौक
कस्बा खरगोन
खुरदरी/पथरीली नगीं जमीन
देख रहे तमाशबीन
निम्न मध्यमवर्गीय युवक
निर्ममता से खींच/पीट रहा
जमीन पर अधलेटी
महिला के बाल पकड़
घसीट रहा
चीख रही महिला प्रतिरोध में
नहीं जाऊंगी/रहूंगी
तेरे घर
मर जाऊंगी
*
हाथ से आंचल ढंाकती/साड़ी संभालती
लोलुप निगाहों से बचने की
असफल कोशिश करती
बेबस/कातर निगाहों से
ताकती
मदद की अपेक्षा करती
*
अधेड़ वय का एक व्यक्ति
चिल्ला रहा बार बार
मैं ससुर हूं लड़की का
खैंच रे राम्या खैंच
राम्या खैंच
उसे घसीट/खींच
*
किसी एक ने की हिम्मत
उसे रोका/टोका
छोड़ दे उस महिला को
मत मार
तल्खी से बोला अधेड़
आप मत बोलो बाबूजी
बीच में
यह उसकी बीबी है
घर नहीं जा रही/घर छोड़ आई
मरद है यह उसका
हक है उसका
*
चाहे पीटे/मारे/काटे
मरद लुगाई का मामला है
आपका कोई हक नहीं
खैंच राम्या खैंच
खैंच राम्या खैंच
*
बीत गये/कमोबेश
साढे पांच दशक
क्या बदला
'मैं'
तुम/हम/आज भी
चश्मदीद हैं
उस घटना/घटनाओं के
तमाशबीन हैं
चुप हैं
आज भी
ताक रही कातर/सूनी निगाहें
आ रही आवाजें
दांए से बांए से
समाज के हर वर्ग से
हर दिशा से
खैंच रे राम्या खैंच
खैंच.......!


****


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कविताएँ सभी भावपूर्ण है और मर्म को छूती हैं .
खासकर अंतिम कविता.बहुत उम्दा.

Bahut khoob

* चाहे पीटे/मारे/काटे मरद लुगाई का मामला है आपका कोई हक नह खच राया खच खच राया खच

इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है. -

अल्पनाजी समाज में पूरी तरह संवेदन शीलता का अभाव है.कम ही लोग पीड़ित या वंचितों के पक्ष में खड़े
होते हैं. कविताओं ने आपके मर्मज्ञ मन को छुआ,धन्यवाद .

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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