दिलीप लोकरे का व्यंग्य - धमाकों की दुनिया

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पिछले दिनों में दो अलग अलग क्षेत्रों में हुए धमाकों ने लिखने पर मजबूर कर दिया वरना मैं तो इसे कभी भी लिखने लायक मानता ही नहीं था पर अब जब लिखने बैठा हूँ तो लगता है की वाह ! ये है कोइ धमाकेदार विषय।

वैसे धमाकों का क्या है ? कहीं भी कभी भी किये जा सकते हैं। चाहे वह वैश्विक आतंक का पर्याय व्हाइट हॉउस हो या शांति का प्रतीक बुध्द मंदिर। धमाकों की दुनिया में धमाकों के कई प्रकार व रूप होते हैं । धमाकों का स्वभाव कई शोध के बाद भी कोई समझ नहीं पाया है । कभी तो ये धमाके दीपावली के धमाकों की तरह बड़े सुहाने लगते हैं तो कभी चेचन्या में हुए धमाके से भयानक । कभी अपने आप हो जाते हैं तो कभी बहुत सोच समझ कर किये जाते हैं । कभी तो बच्चे बड़े धमाके कर देते है तो कभी बड़ों के प्रयत्न पूर्वक किये धमाके भी बच्चों की तरह साबित होते हैं ।

इसे करने के हथियार भी अलग अलग होते हैं। प्रेशर कुकर, नारियल, गैस सिलेंडर ,टिफिन सायकल जैसे हथियार जहाँ आतंकवादियों को प्रिय है तो साइबर क्रांति के जमाने में राज नेताओं को धमाके करने के लिए सी डी जैसा हथियार सबसे मुफीज लगता है। कोई मुख्य मंत्री थ्री डी तकनीक से धमाका करता है तो कोई सोशल साईट से। जिन हथियारों से धमाके किये जाते है वें हथियार ही कभी बडे धमाके का सबब बन जाते हैं।

धमाकों का असर उसे की जाने वाली जगह से निश्चित होता है। निश्चित ही यह देश या राज्य पर भी निर्भर करता है। व्हाइट हॉउस पर किया गया धमाका हमेशा दिल्ली की संसद भवन के धमाके से बड़ा ही होता है। या केंद्रीय सरकार की सहयोगी पार्टी के राज्य में हुआ धमाका भी विरोधी पार्टी के राज्य से बड़ा होता है। इसके बाद आता है नंबर, मोहल्ले, मंदिर, मस्जिद, होटल,बाजार, स्टेशन या रास्ते का। धमाके का धमाका बम के आकार से तय नहीं होता , वह हमेशा उसके किये जाने वाले समय से तय होता है । जैसे चुनाव के बाद किये जाने वाला धमाका वह असर कभी पैदा नहीं कर सकता जो असर चुनाव के पहले वाला धमाका करता है।

जैसे धमाकों का अपना विज्ञान होता है वैसे ही उसकी अपनी राजनीति भी होती है। कुछ राजनीतिज्ञों के लिए जहाँ ये दुःख का सबब होते हैं तो कुछ के लिए अपार सुख का। धमाकें कई लोगों को रोजगार मिलने का कारण है तो कई के रोजगार छिन जाने का भी। जहां धमाके होते हैं उसके आसपास की कई कई दुकानें उजड़ जाती हैं लेकिन न्युज चेनल जैसों की कई कई दुकानें जम भी जाती हैं। जैसे कई -कई धमाके होने के बाद भी हमारी व्यवस्था नहीं चेतती वैसे ही हमारे राज नेता भी है। लाख समझाओ कभी नहीं चेतते। अपने कई साथी पकडे जाने के बावजूद वो सभी काम करते रहते है जो कैमरे में कैद हो कर सीड़ी के रूप में सामने आये।

धमाकों की निंदा करना भी किसी बड़े धमाके करने जैसा ही होता है। निंदा करने में भी समय काल के साथ साथ परिस्थिति का बड़ा महत्व है। ये नहीं की मुंह उठा कर चाहे जिस धमाके की निंदा कर दी। राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री या पार्टी अध्यक्ष हमेशा अलग अलग शब्दों में निंदा करते हैं। देश के कर्णधार हर धमाके को आतंकवादियों की कायराना हरकत बताते हैं और आतंकवादी नए धमाके कर राजनेताओं को कायर साबित करते रहते हैं। हर धमाके के बाद नेताओं की ब्लेक कैट कमांडो सुरक्षा बढ़ जाती है और इनके खर्चे से आम आदमी की असुरक्षा ।

धमाके के कई प्रकार के नुकसान है। इसके कारण किसी का बेटा किसी की माँ किसी का भाई किसी का प्रधान मंत्री पद या किसी का मंत्री पद छिन जाता है तो किसी -किसी की पार्टी सदस्यता,और वह भी एन जन्मदिवस के मौके पर। जिस तरह धमाके के अपने प्रकार होते हैं वैसे ही इसे करने वालों के भी कई कई प्रकार होते हैं। फिल्मस्टार ,उद्योगपति ,समाजसेवी और इन सबसे बढकर राजनेता। इन में से हर कोई अलग-अलग प्रकार के धमाके करता है या उसे करने में एक्सपर्ट भी होता है। लेकिन आम आदमी भी अब एन आई ए और एन एस जी के जवानों की ही तरह एक्सपर्ट हो गया है। धमाके के प्रकार से ही समझ जाता है कि उसे करने वाला कौन हो सकता है। खैर अभी इतना ही। बाकी फिर कभी, किसी बड़े धमाके के बाद।

-दिलीप लोकरे

E-36,सुदामा नगर ,इंदौर

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