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रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - सारे मज़े लड़के ही क्यों लूटें?

व्यंग्य

सारे मज़े लड़के ही क्यों लूटें?

डॉ. रामवृक्ष सिंह

दुपहिया वाहनों के एक विज्ञापन में हिन्दी फिल्मों की एक नायिका दर्शकों से अंग्रेजी में एक सवाल पूछती है, जिसका अर्थ है कि सारे मज़े लड़के ही क्यों लूटें। लैंगिक स्वतंत्रता के इस युग में यह सोचना ही अपराध है कि किसी लिंग विशेष के लोग सारा मज़ा लूट लें और उसके विपरीत लिंगी मज़े की गिज़ा से महरूम रह जाएँ। इसलिए दुपहिया वाहन-निर्माता ने यह तरकीब निकाली, जिसमें लड़कियों को बताया गया कि सारा मज़ा लड़के लूटे लिए जा रहे हैं। अरे, तुम भी आगे बढ़ो और मज़े लूटो। बाकी सब बात हमें ठीक लगती है, लेकिन एक बात पर आपत्ति है। वह यह कि मज़े लूटने के लिए दुपहिया वाहन का होना कोई ज़रूरी नहीं है। यदि ज़रूरी है तो बड़ी तकलीफ वाली बात है। इसका आशय तो यह हुआ कि जिन लड़कों और लड़कियों के पास दुपहिया नहीं है, वे ग़रीब तो मज़ा लूट ही नहीं सकते। इसका एक निहितार्थ यह भी है कि जिन लड़के-लड़कियों के पास दुपहिया नहीं, बल्कि चौपहिया है, वे कहीं अधिक मज़ा लूट सकते हैं। है न?

खैर.. बात हो रही थी, सारा मज़ा सिर्फ लड़कों द्वारा लूट लिए जाने की, और लड़कियों के उससे महरूम रह जाने की। हम अपने निजी अनुभव से कह सकते हैं कि लड़कों को अकेले-अकेले मज़ा लूटने में कोई मज़ा नहीं आता। उनको भी पूरा मज़ा तभी आता है, जब लड़कियाँ उसमें बराबर की साझेदारी करें। टेलीविज़न पर दिखनेवाले एक चैनल का स्लोगन ही है- मज़ा तो सबके साथ आता है। इस स्लोगन में अतिव्याप्ति दोष हो सकता है। हो सकता है कि कुछ लोगों को सबके साथ मज़ा आता है, तो कुछ को केवल किसी-किसी के साथ। लेकिन यह तो निश्चित है कि मज़े के लिए किसी का साथ चाहिए। इधर इंग्लैंड आदि कुछ देशों ने इस मामले में कानूनी बाधाओं को भी हटा दिया है और समलैंगिकों द्वारा आपस में लिए जानेवाले मज़े को भी वैध घोषित कर दिया है।

महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। लेकिन जहाँ तक मज़े का संबंध है, वे हमेशा से ही पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर, उसके साथ-साथ चली हैं। इसलिए दुपहिया वाहन के विज्ञापन में एक तथ्यगत विसंगति हमें नज़र आती है। पुरुष की क्या बिसात कि वह सारा मज़ा अकेले गड़प ले। सच्चा मज़ा तो महिला संगिनी के साथ ही आता है।

दुपहिया वाहन प्रायः दो व्यक्तियों के बैठने के लिए बनाए जाते हैं। एक व्यक्ति आगे, दूसरा व्यक्ति उसके पीछे। दुपहिया कंपनियों ने अब अपने वाहनों की सीटों को कुछ इस कोण पर बनाना शुरू कर दिया है कि पीछे बैठनेवाला व्यक्ति आगे बैठने वाले की पीठ पर लगभग लदा रहता है। नैसर्गिक रूप से प्रकृति ने पुरुष जाति को स्त्री जाति की तुलना में अधिक भारी-भरकम और मज़बूत डील-डौल वाला बनाया है। इसकी तुलना में स्त्री जाति को नाज़ुक और गदबदा बनाया है। इसलिए जब दुपहिया चलाने का काम पुरुष कर रहा होता है और महिला पीछे बैठी होती है तब महिला के पीठ पर लद जाने के बावजूद पुरुष को वाहन चलाने में कोई परेशानी नहीं होती। हमारे अनुभव की बात तो यह है कि ऐसी स्थिति में हमें आनन्द आता है। किन्तु स्थिति इसके उलट हो जाए, तो क्या होगा? इसका न हमें अनुभव है, न अभ्यास।

वैसे यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि अपने देश की सड़कों की हालत इतनी खस्ता है और यातायात इतना अनुशासनहीन है कि दुपहिया या चौपहिया, किसी भी तरह का वाहन लेकर बाहर निकलना मज़ा तो क्या खासी मुसीबत का काम है। इसमें किसी को मज़ा आता हो तो आए, हमें जो यह काम सज़ा जैसा ही लगता है। और मज़े लेने का काम यदि कोई सड़क पर शुरू कर दे, तो बाकी वाहन चालकों की क्या हालत होती है, यह तो भुक्त-भोगी ही बता सकते हैं। सड़क पर अपने पीछे किसी नकाबपोश को बिठाए हुए, कोई लड़का जब अपनी बाइक पर सन्न से निकल जाता है तो आपका मन काँप उठता है या नहीं? हमारा मन तो काँप उठता है और लगता है कि यदि ज़रा-सी चूक हो गई होती, तो दोनों दुपहिए आपस में टकरा जाते और किसी न किसी का हाथ-पैर ज़रूर टूट जाता।

एक बार हम भोपाल शहर से भोजपुर मंदिर की ओर जा रहे थे। उन दिनों लगभग 28 किलोमीटर का वह रास्ता प्रायः सुनसान ही रहता था। एक मोड़ पर क्या देखते हैं कि एक बाइक चालू हालत में लुढ़की पड़ी है। उससे थोड़ी दूरी पर एक युवक-युवती ज़मीन पर धूलि-धूसरित, चोटिल अवस्था में कराह रहे हैं। हमने गाड़ी रोककर उन्हें उठाया। पानी-वानी पिलाया। हड्डी-पसली टूटी है कि नहीं, यह मालूम किया। जब दोनों सही-सलामत वन-पीस उठकर बैठ गए तो हमें तसल्ली हुई। फिर हमने पूछा कि यह बताओ कि ऐसी दुर्घटना घटी कैसे। पता चला कि पहले बाइक लड़का चला रहा था, और लड़की पीछे बैठी थी। फिर लड़की के मन में आया कि लाओ हम चलाते हैं। फिर मज़े लेते-लेते यह दुर्घटना घट गई। अब फैसला तो आपको ही करना है कि यह मज़ा पाने वाली बात हुई या सज़ा पानेवाली।

हम पहले ही कह चुके कि मज़ा पाने के लिए दुपहिया या चौपहिया, किसी का भी होना कोई पूर्वापेक्षा नहीं है। साहिर साहब का एक शेर है- जगा-जगा के गए क़ाफिले सहर के मुझे। मज़े मिले इन्हीं रातों में उम्र भर के मुझे। इससे इतना तो ज़ाहिर है कि उन्होंने जो भी मज़ा पाया, वह सोते हुए पाया, वरना सहर यानी सुबहों के काफिले उन्हें जगा-जगाकर क्यों जाते! अब भला सोचिए कि वाहन चलाते समय यदि कोई सोने का मज़ा लेने लगे तो क्या होगा! कुछ लोग शराब और वाहन-चालन, दोनों के मज़े लेने लगते हैं, और मज़े-मज़े में ही जान गँवा बैठते हैं। इसलिए जहाँ तक मज़े का संबंध है, हम तो यही कहेंगे कि मज़े लो, खूब लो, किन्तु अपनी जान का और दूसरों की जान का भी खयाल रखो। कहीं ऐसा न हो कि आप तो मज़ा लें और उसी चक्कर में किसी ग़रीब की जान चली जाए। रात को फुटपाथ पर सोने को विवश बहुत से हिन्दुस्तानी लोग अमीर कार-चालकों के इसी शगल की कीमत अपनी जान देकर या हाथ-पैर से अपाहिज होकर चुका चुके हैं।

और आखिरी टिप्पणी, लड़कियों के भी बराबरी से मज़ा लेने पर। चाहे दुपहिया-चौपहिया चालन हो, या कोई और काम, तात्कालिक तौर पर चाहे जितना मज़ा मिल जाए, लेकिन उसका दूरगामी परिणाम यदि सुखद न हो तो मज़ा लेने के लोभ से हमें थोड़ा बचकर ही चलना चाहिए। लड़के तो मज़ा लेकर अपने रास्ते निकल जाते हैं, लेकिन प्रकृति ने महिला जाति को जो विशेषता बख्शी है, उसके कारण यदि तात्कालिक आनन्द का कोई दूरगामी सिरदर्द आपके गले पड़ जाए तो क्या कीजिएगा? इसलिए क्या यह अच्छा नहीं होगा कि सारा मज़ा अभी लेने के चक्कर में न पड़ें और सही मौके का इन्तज़ार करें। आखिर मज़ा लेने की इतनी जल्दी क्या है!

(इस लेख में कुछ भी अश्लील नहीं है। जिन्हें ऐसा लगता है, वे कृपया आत्मावलोकन करें और सामने जो विकराल समस्या खड़ी है, उस पर ज़रा ग़ौर फर्माएँ।)

विषय:

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वाह महोदय,
एक दम से नूतन विषय पर इतनी कटीली चुभीली और गंभीरबात को
इतने प्यार से समझाना- वाह क्या बात है

सभी को ध्यान से समझने की आवश्यकता है।

सामाजिक मार्गदर्शन भी साहित्यकार का धर्म है जो आपने निभाया है.

विज्ञापन विशेषज्ञों ने तो सब संबंधों को ऐसा मर्यादाविहीन बना दिया है कि टीवी देखना लगभग छूट गया है।

साधुवाद।

सादर
डॉ राजीव रावत

umda tipnni ki hai badhai

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