देवेन्द्र पाठक 'महरूम' के दोहत्थड़ दोहे

बारिश, बिजली, बाढ़ भूकंपन  -भूस्खलन.
किया प्रकृति ने कोप अब नर्क हुआ जीवन.(1)

कुदरत के इस क़हर मेँ राजनीति का खेल.
पदलिप्सा को कब तलक देश सकेगा झेल. (2)

पुण्य- धर्म औ मोक्ष का दकियानूसी मोह.
घर का दीप बुझा गया आया हाथ विछोह.(3)

हुआ बहुत निर्लज्ज अब सत्ता का बर्ताव.
जन मन को है दे रहा नित्य घाव पर घाव.(4)

सेवा मेँ भी चाहती राजनीति अब श्रेय.
पद ,सत्ता- सुख रह गया एक मात्र अब ध्येय (5) 

नदियोँ ने अब छोड़ दी है अपनी मरजाद.
उनका मुक्त प्रवाह हम रहे असीमित बाँध (6) 

हम ही करते प्रकृति से रहे खूब खिलवाड़.
दुष्फल है अतिवृष्टि, भूक्षरण,  विनाशक बाढ़.(7) 

देवभूमि  मेँ जो किया मानव ने दुष्कर्म.
उसका ही प्रतिफल मिला  आहत है हर मर्म.(8)

भूमि नदी, पर्वत, हवा, जल, वन  पेड़, प्रकाश. जी
व जगत के देव ये इनसे प्रगति-विकास. (9)

सुविधाभोगी  हो गया  जब से है इंसान.
तब से ही होने लगी यह धरती श्मशान.(10)

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