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श्याम गुप्त के पांच पद

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ब्रज की भूमि भई है निहाल ।

सुर  गन्धर्व  अप्सरा  गावें नाचें  दे दे  ताल ।

जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल ।

पुरजन परिजन हर्ष मनावें जनम लियो नंदलाल ।

आशिष देंय विष्णु शिव् ब्रह्मा,  मुसुकावैं गोपाल ।

बाजहिं  ढोल  मृदंग मंजीरा  नाचहिं ब्रज के बाल ।

गोप  गोपिका करें  आरती,  झूमि  बजावैं  थाल ।

आनंद-कन्द प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज-ग्वाल ।

सुर दुर्लभ छवि निरखे लखि-छकि श्याम’ हू भये निहाल ।।

 

जनमु लियो वृषभानु लली ।

आदि-शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली ।

जलज-चक्र रवि-तनया विलसति, सुलसित लसति भली ।

पंकज-दल सम खिलि-खिलि सोहे, कुसुमित कंज अली ।

पलकन पुट-पट मुंदे श्याम’ लखि मैया नेह छली ।

विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली ।

नित नित चंद्रकला सम बाढ़हि, कोमल अंग् ढली ।

बरसाने की  लाड  लड़ैती, लाड़न लाड़   पली ।।

 

 

कन्हैया उझकि उझकि निरखै ।

स्वर्ण खचित पलना चित-चितवत केहि विधि प्रिय दरसै ।

जहँ पौढ़ी वृषभानु लली, प्रभु दरसन कौं तरसै ।

पलक पांवड़े मुंदे सखी के, नैन कमल थरकैं ।

कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों, फर फर फर फरकै ।

तीन  लोक  दरसन कौं तरसें,  सो दरसन तरसै ।

ये तो नैना बंद किये हैं, कान्हा  बैननि  परखै ।

अचरज एक भयो  ताही छिन,  बरसानौ  सरसै ।

खोलि दिए दृग भानुलली, मिलि नैन, नैन हरखै।

दृष्टिहीन माया, लखि दृष्टा, दृष्टि खोलि निरखै ।

बिन दृष्टा के दर्श श्याम, कब जगत दीठ बरसै ।।

 

 

कान्हा तेरी वंसी मन तरसाए ।

कण कण ज्ञान का अमृत बरसे, तन मन सरसाये ।

ज्योति दीप मन होय प्रकाशित, तन जगमग कर जाए ।

तीन लोक में गूंजे यह ध्वनि,  देव दनुज मुसकाये ।

पत्ता-पत्ता, कलि-कलि झूमे, पुष्प-पुष्प खिल जाए ।

नर-नारी की बात कहूँ क्या, सागर उफना जाए ।

बैरन छेड़े तान अजानी , मोहनि  मन्त्र चलाये ।

राखहु श्याम’ मोरी मर्यादा, मुरली मन भरमाये ।।

 

 

प्रेम है जग जीवन का सार ।

कहें श्याम सुन सखा, प्रेम ही संसृत का आधार ।

प्रीतिभाव-रत गोप-गोपिका, करें नित्य व्यापार ।

मम वियोग विरहानल तन-मन, दीन्हे कर्म बिसार ।

अज्ञानी जन ब्रज रज जनमे, डूबे प्रेम अपार ।

सखा जाहु गोकुल नगरी कों, अति आभार तुम्हार ।

निर्गुण ब्रह्म ज्ञान कौ ऊधो, दीजो तत्व-विचार ।

विरह-वेदना तन-मन छूटे, भूलें राग, विकार ।

निर्गुण-ब्रह्म को भजें त्याग गुन, श्याम’ प्रीति-व्यवहार ।।

 

  ऊधो ! ब्रह्म ब्रह्म क्या गावै ।

जो हम तुम सब एक ब्रह्म को काकौं योग बतावै ।

ब्रह्म, ब्रहम को क्या उपदेशे काकौं ज्ञान सिखावै ।

ये कान्हा की प्रेम नगरिया प्रेम ही ब्रह्म कहावै ।

योग-गठरिया विरह-अगन ते ऊधो खसकि न जावै।

संदेसौ तुम ज्ञान कौ लाये मन कौ भरम न जावै ।

निरगुन निरगुन कहत फिरौ पर ज्ञान कौ गुन भावै।

श्याम’ प्रेम ही ब्रह्म,ज्ञान,सत,निरगुन,सगुन कहावै ।।

---

डॉ. श्याम गुप्त

drgupta04@gmail.com

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