सुशील यादव का व्यंग्य - वे पीट रहे हैं

वे पीट रहे हैं ......

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ये पढ़ के आपको लगा होगा कि वे कहीं मास्टर जी होंगे ,बच्चों से नाराजगी निकाल रहे होंगे|

दूसरा ख्याल गुंडा-मवाली को लेकर आया होगा ,हो न हो , हप्ता वसूली के विवाद में पिटने –पिटाने वाला खेल खेल रहे होंगे |

आपने ये भी सोच लिया होगा कि सांप निकल जाने पर कोई लकीर पीट रहा होगा |

ना भाई ना आप, कदाचित सर्वथा गलत हैं|

वे जम के पीट रहे हैं, बोलते ही आप समझ जाएंगे, कि उनकी नम्बर दो की कमाई जम के हो रही है |

रिश्वत के छोटे –मोटे संस्करणों की जानकारी मुझे बचपन से थी |

पडौसी रामदीन ,जो नजूल दफ्तर में चपरासी था ,के घर से चिकन बिरयानी ,बासमती चावल की आए दिन खुशबू आया करती थी |अम्मा –बापू बतियाते थे ,अच्छी कमाई कर रहा है |

बापू को अम्मा कोसते हुए कहती ,ये मास्टरी वगैरह छोडो ,ढंग की कोई नौकरी कर लो |

बापू बस में कुछ और करने का रहा क्या था सो करते ?बस कुछ और बच्चे ट्यूशन पढाने बटोर लाते | अम्मा चांदी के गहनों में इजाफा कर लेती और खुश हो जाती |

लखन मास्टर के बेटे ने ओव्ह्र्सीयर बन के खूब कमाई की|दुमंजिला बनाते तक तो वो ठीक-ठाक रहा |फिर बाद में अक्सर झूमते –झुमाते घर आने लगा |

रिश्वत की ‘खुशबू’ के बाद रिश्वत का ‘झूमना’ देखा |

शादी –ब्याह की पार्टी में मिश्राइन भाभी का ‘ज्वेलरी- शो ‘,शर्माइन का साडी कलेक्शन पर व्याख्यान, सब को अपनी ओर खिंचे रहता था |क्या ठाठ थे उनके |

वे अपने-अपने पति के मेहनत(रिश्वतखोरी) का गुणगान करते नहीं अघाती थी |चन्नू के पापा , जब भी कोई नया टेंडर खुलता है ,मुझसे पूछ जाते हैं,कोई सेट चाहिए क्या?

हमारे शर्मा जी दौरे से लौटते हुए कुछ न कुछ उठा लाते हैं |मैं इंनपे बिगडती हूँ ,ये क्या वही-वही फिरोजी कलर ,मैं तो उकता गई हूँ |

वो पार्टी में मजे से रस-झोल गिराते –गिराते खाती ,दुबारा वो साडी या तो काम वाली बाई के हत्थे चढती या उनके बदले कटोरी –गिलास-बाल्टी खरीद लेती |

सुबह-सुबह ,मार्निग वाक् में हम लोग पिछले चौबीस घंटों की घटनाओं का जिक्र कर ही लेते थे |रविवार की सुबह तो सविस्तार बहस हो जाती थी |रिपीट टेलीकास्ट की नौबत बन जाती थी |

हाँ तो बद्रीधर जी ,जो आप क्या –क्या कह रहे थे परसों ,कि हमने शहर के चमचमाते नेमप्लेट ,कुत्तों से सावधान वाले घरों को देख के कभी सफेद -काली कमाई का आकलन किया है ?

ये तो वाकई सोचने वाली बात है ,कि जिस घर के सामने कलफदार कपड़ों में दरबान हो ,खुशबूदार फूल ,कारीने से कटे पौधे , हरे-भरे लान हो , ये सब सेठ –मारवाड़ियों के ठाठ नहीं होते|

वे अपनी कमाई की नुमाइश लगाने की बजाय शाप या फेक्ट्री में खपा देते हैं |

ये ठाठ तो यकीनन अफसर या मंत्री के होते हैं |

दीवाली –होली तो ये लोग ही खूब मनाते हैं |

रात में नियत समय बाद पटाखे छुटाने की मनाही के बावजूद दो-तीन बजे तक धमाल किए रहते हैं |पता नहीं इनके कौन से आका-काका पटाखों का जखीरा छोड़ गए होते हैं ?

ताश की तीन-पत्ती में इनको ‘ब्लाईंड’ खेलते देख के तो यूं लगता है कि इनका बस चले तो , पूरे देश का बजट यहीं झोंक दें|

होली में इनको पक्का रंग मिलता है |इनके यहाँ रंगे जाने का मतलब हप्ते –दस दिन के लिए कलरफुल बने रहना |

सब ओर ‘ड्राई’ रहते हुए, इनके तरफ बाल्टियाँ भरी होती हैं |इनके इन्तिजाम मास्टर अचूक होते हैं |इनको कहीं से कोई आदेश नहीं होता, स्वस्फूर्त संचालित हुए से रहते हैं |

जो पीट रहे होते हैं ,उनसे ‘पिटने-वाले’ बकायदा बहुत खुश रहते हैं |

ऐसा अजूबा, ऐसे सम्बन्ध, बाप-बेटे ,मजदूर –मालिक या दुनिया के किसी रिश्ते में नहीं मिलता |

ये दो-धारी तलवार, जहाँ धार के एक ओर ‘नोक से लेकर पकड’ तक -चपरासी ,बाबू ,क्लर्क ,मुंसिफ ,दरोगा ,डाक्टर,इंजिनीयर ,संतरी-मंत्री हैं ,वहीं दूसरी ओर इनसे फ़ायदा उठाने वाले ठेकेदार और ले-दे कर काम करवाने वाले लोग होते हैं |

इन दोनों ‘धार’ की मार आखिर में येंन-केन प्रकारेण जनता झेलती है |

किसी शहर के सुपर सिविल लाइंस के किसी भी घर का इतिहास झाँक लो , जो आज् दस-बीस-पचास –सौ ,हजार करोड के मालिक हैं ,कल तक वे टूटे स्कूटर में घूमते पाए जाते थे |

पंचर बनाने के जिनके पास पैसे न थे वे आज चार –छ: गाडियां लिए फिरते हैं |

इन्होंने ,जंगल बेच दिए ,जमीन बेच दी, खदान लुटा दिए,टेंडर में घपला किए ,खरीद में, दलाली में हर लेन-देन में गफलत, कमीशन |

चाल-चरित्र और चेहरे में मासूमियत लिए, हर पांच साल बाद आ फटकने वाले लोग कब देश बेच खाएं कुछ कहा नहीं जा सकता ?

**सुशील यादव ,श्रिम सृष्टि, अटलादरा,सन फार्मा रोड ,वडोदरा (गुज)

टिप्पणियाँ


  1. बहुत सटीक रचना है....बधाई.-प्रमोद यादव

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  2. बहुत तीखा व्यंग्य है |

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  3. व्यंग 'महसूस किए जाने लायक' लिखा जा सके ,यही प्रयास किया है |धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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