जसबीर चावला की कविता - हाउस ऑफ़ स्लेव्स

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हाउस आफ स्लेव्स

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-जसबीर चावला

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'हाउस आफ स्लेव्स'

गुलामों का घर

अर्थ यही है अंग्रेजी का

सेनेगल

ओबामा गये जहां

पत्नि मिशेल/बच्चीयां साशा/आलिया संग

अफ्रीकी दौरे में

**

भावुक हो गये

याद कर

उन अत्याचारों को

युरोपियनों/गोरों ने

कभी ढहाये थे

कालों/अश्वेतों पर

**

सत्रहसौ छियत्तर निर्मित

सेनेगल गुलामघर

गुलामो का भण्डार गृह

समन्दर किनारे

गोरी आईसलेंड पर

हालेंड नें रचा

व्यंग देखिये

अश्वेत सेनेगल/अश्वेत गुलाम

आईसलेंड 'गोरी'

**

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पुर्तगाल/हालेंड/इंग्लेंड/फ्रांस/स्पेन

सबके गुलामघर

मन्डियां/बाजार

अफ्रीकी देशों में

पकड़े/रखे/खरीदे जाते

अश्वेत/गुलाम

गोरे यूरोप/ अमेरिका

निर्यात के लिये

ताउम्र गुलामी के लिये

मर कर भी

न लौटने के लिये

**

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ओबामा ने देखा होगा

आठ गुणा आठ फुट का कमरा

ठूंसे जाते

बीस बीस गुलाम

पीछे हाथ बांध

बाजू/गला बांधने की चेन

बच्चों/ठूंसी औरतों

जवान लड़कियों के

अलग अलग कमरे

जुदा जुदा

परिवार से

**

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दासता से मुक्त होती/पीछे छोड़ी जाती

जवान/अश्वेत लड़कियां

चमत्कार से

हो जाती जो गर्भवती

गोरों के बलात्कार से

**

कम वजनी गुलामों

का कमरा

जहां

फिट/मोटे/हो सकें

वे

खा कर

स्टार्च युक्त खाना

जैसे ब्रायलर चिकन/बिजींग डक

को खिलाया/ठूंसा जाता हैं

दाना

वजन बढ़ाने को

आज भी

**

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समुद्र की जेट्टी देखी

जहाजों पर चढते गुलाम

मां/बाप/बच्चे

अलग अलग

देशों के लिये

'डोअर आफ नो रिटर्न'देखा

पार कर जिसे कोई लौट नहीं पाया

आंकडे़ देखे/सुने/समझे

डेढ/दो करोड़

असभ्य(?)गुलाम

भेजे गये

सभ्य(?)गोरों के देश

बंधे हाथ

तीन शताब्दियों में

**

जीवन से

मुक्त होते

वे गुलाम

जो कूद पड़ते

डूब जाते/गोली खाते/निवाला बनते

किसी खूंखार शार्क का

जो समन्दर में फेंके बीमार/घायलों को

खाने दौड़ी आती

**

याद आया होगा

ओबामा को

अपना

अश्वेत केन्याई मूल/अतीत

उपन्यास'अंकल टाम्स केबिन'

टाम काका की कुटिया

मार्टिन लूथर किंग

गोलियों से मरे जो

अश्वेत अधिकारों के लिये

**

दिल/आंख भर आई होंगी

बहुत काम बाकी है

करने को

अमेरिका में

अब भी

मानवाधिकारों का हनन

कम नहीं होता

**

मेरे यहां भी

गांव/शहर/देश/आस पास/समाज

मन/व्यवहार में

मौजूद हैं

गुलामघर

**

जाति/वर्ण

लिंग/ऊंच/नीच

नफरत/साम्प्रदायिक

व्यवस्था के गुलामघर

बंधुआ मानसिकता

व्यवस्था

अतीत के खंडहर

ये गुलामघर

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(जसबीर चावला - chawla.jasbir@gmail.com )

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