शनिवार, 6 जुलाई 2013

राजीव आनंद का व्यंग्य - खेल बना धंधा

व्‍यंग्‍य रचना खेल बना धंधा

जीवन को खेल और खेल को जीवन समझने वालों को धक्‍का तब लगा जब उन्‍हें पता चला कि मैदान में जिस खिलाड़ी को प्रतिभावान समझकर वे जोर-जोर से तालियां बजाते है दरअसल वे खिलाड़ी उसके हकदार है ही नहीं क्‍योंकि वे तो पैसे लेकर जीत रहे होते है या यूं कहिए कि उसे पैसे लेकर जिताया जाता है, चाचा चौधरी ने नुक्‍कड़ के चाय दूकान पर जमा अपने युवा भतीजों से कहा.

वो कैसे चाचा जी, एक भतीजे ने सिगरेट छुपाते हुए पूछा ?

चाचा चौधरी यही तो चाहते थे, वे कहना शुरू किया कि ‘‘ धौनी को मोटरसाइकिल और पेंट-शर्ट बेचते हुए विज्ञापन में नहीं देखते हो, ये क्‍या है, अपने हुनर से हासिल प्रसिद्धि के सहारे ही न आज समान बेचने के लिए कंपनी इन्‍हें करोड़ों देती है ?

लेकिन चाचा विज्ञापन तो सभी बड़े-बड़े नेता, अभिनेता, खिलाड़ी सभी करते है, इसे बिकना कैसे कहा जा सकता है, विज्ञापन युग की पैदाइश एक भतीजे ने पूछा ?

चाचा चौधरी तुनक गए और कहिन कि देखो, भतीजे, विज्ञापन को अगर बिकना नहीं कहते हो तो ये क्‍या है कि खिलाड़ियों के जर्सी में तरह-तरह के लोगो लगे होते है और खिलाड़ियों के बल्‍ले पर प्रायोजकों का लोगो रहता है, ये बिकना नहीं है क्‍या ? चाचा चौधरी ने पूछा ?

तपाक से एक युवा भतीजे ने चाचा चौधरी पर प्रश्न दागा कि चाचा, मैं भी तो ‘ली' की जर्सी पहनता हॅूं, तो क्‍या मैं बिक गया ?

चचा चौधरी भनाए हुए से युवा भतीजे को बाजार का समाजषास्‍त्र समझाया. देखो भतीजे, तुमने ‘ली' कंपनी की जर्सी खरीदा तो कोई बात नहीं, पैसे देकर तुमने जर्सी खरीदा परंतु जब भारतीय टीम ‘ली' जर्सी का इस्‍तेमाल खेल के दौरान करेगी तो क्‍या खिलाड़ी उस जर्सी को तुम्‍हारी तरह खरीद कर नहीं न पहनेंगे ?

अरे हां चाचा, आपने तो सटीक उत्‍तर दिया.

असल में क्‍या है भतीजे, चाचा चौधरी थोड़े गंभीर होते हुए बोले कि आज कल ‘बाजारवाद' का युग है समझे, जैसे समाजवाद, साम्‍यवाद, मार्क्‍सवाद, लेनीनवाद का युग हुआ करता था न, वैसे ही आज बाजारवाद का युग है.

वो कैसे चाचा, एक अतिगंभीर युवक जो अब तक नुक्‍कड़ के चाय दूकान की बेंच के कोने में बैठा अखबार के पन्‍नों में ‘रोजगार कॉलम' के विज्ञापन का अध्‍ययन कर रहा था, पूछा ?

वो ऐसे भतीजे, चाचा चौधरी बोले, देखो बाजारवाद का सीधा अर्थ यह है कि बाजार तुम्‍हें मजबूर कर देगा वो चीज खरीदने को जिसकी तुम्‍हें आवश्यकता नहीं. कहते है न ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है' अब हम कहता हूँ कि ‘आवश्यकता आविष्कार बाजार की जननी है.'

चाचा कुछ समझा नहीं, जरा और स्‍पष्‍ट कीजिए, उस गंभीर-सा भतीजा ने पूछा ?

चाचा कहिन कि अरे भतीजे, अब देखो, एक समान में दो समान फ्री दिया जाएगा,

जहां लोग देखते है, खरीदने के लिए तैयार, पैसा तो उन्‍हें तीन समान का ही चुकाना पड़ता है न !

अब तक चुपचाप सिगरेट का धुंआ उगलता हुआ एक युवा भतीजे ने पूछा, हां तो चाचा आप खेल में धंधा और बिकाउ खिलाड़ी के संबंध में कुछ बोल रहे थे.

अरे हां, भतीजे हम तो विषय से भटक रहे थे, चाचा चौधरी ने कहा, लेकिन भतीजे वृहद परिपेक्ष्‍य में बिकाउ खिलाड़ी और खेल में धंधा का संदर्भ भी बाजारवाद से ही जुड़ा है. अब देखो, भतीजे, बाजार है तो पैसा का लेन-देन है और पैसा ही आज का ‘ईश्वर' बन बैठा है. पैसे के लिए कोई भी कुछ भी करने को तैयार है, कुछ भी कर सकता है, कितने भी नीचे तल्‍ले तक जा सकता है. अब क्‍या तुमलोगों को यह जानकर कोई आश्चर्य होता है कि फलां नेता इतना बड़ा घोटालेबाज निकला या फलां अधिकारी अकूत धनसंपति का दो नंबर तरीके से मालिक बन बैठा ?

ये तो आप ठीक कह रहे है चाचा, एक युवा भतीजे ने कहा कि अब तो घोटाला रोजमर्रा का समाचार है जिसे देखो वही घोटाला कर रहा है. नमक तक का घोटाला हो चुका है हमारे देष में.

चाचा चौधरी कहिन लेकिन हमलोग अब तक खिलाड़ियों को घोटालेबाज नहीं समझते थे लेकिन आईपीएल के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया कि खेल घोटाला भी यहां हो चुका. अरे, खेल में अभिनेता, अभिनेत्री, व्‍यवसायी का क्‍या काम, चाचा चौधरी गरजने लगे थे. शाहरूख खान, प्रीटी जिंटा, मुकेश अंबानी ये लोग जो अपनी-अपनी टीमें बना ली थी, उन टीमों में खिलाड़ी खरीदकर ही तो लाए गए और खिलाड़ियों को खरीदने के बाद ठीके पर बुलाए गए ‘चीयर लीडर्स.'

तुम सभी जब मैच देखते थे, चाचा चौधरी उदाहरण देकर भतीजों का भ्रम दूर कर रहे थे, तो अब तक खिलाड़ियों को तालियां बजा-बजा कर उत्‍साहित करते थे न, सभी भतीजों ने एक स्‍वर में कहा, हां, करते तो थे, लेकिन चाचा चौधरी ने कहा कि अब चीयर लीडर्स ठुमके मार-मार कर खिलाड़ियों को उत्‍साहित कर रहीं है. चीयर लीडर्स की ठुमके लगाने वाली महाकलाकारों को भी तो पैसे चाहिए.

इसलिए भतीजों, चाचा चौधरी ने अपने विचार के जीत का झंड़ा गाड़ते हुए कहा कि हम सब अब तक समझते रहे कि खेल स्‍पोटर्समैनशिप के सिद्धांत पर खेला जा रहा है लेकिन ऐसा नहीं है, खेल भी एक धंधा बन चुका है और टिकट ही सिर्फ नहीं बिक रहे बल्‍कि खिलाड़ी भी बिक रहे है.

राजीव आनंद

सेलफोन-9471765417

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