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प्रमोद यादव के रेखाचित्र

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पुस्तक समीक्षा - दलित विमर्श की कसौटी पर ‘मुर्दहिया’

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दलित विमर्श की कसौटी पर ‘मुर्दहिया’डॉ. विजय शिंदेसंसार में मनुष्य का आगमन और बुद्धि नामक तत्व के आधार पर एक-दूसरे पर वर्चस्व स्थापित करने की अनावश्यक मांग सुंदर दुनिया को बेवजह नर्क बना देती है। सालों-साल से एक मनुष्य मालिक और उसके जैसा ही दूसरा रूप जिसके हाथ, पैर, नाक, कान... है वह गुलाम, पीडित, दलित, कुचला। दलितों के मन में हमेशा प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों? पर उनके ‘क्यों’ को हमेशा निर्माण होने से पहले मिटा दिया जाता है। परंतु समय की चोटों से, काल की थपेडों से पीडित भी अपनी पीडाओं को वाणी दे रहा है। एक की गुंज सभी सुन रहे हैं और अपना दुःख भी उसी तरीके का है कहने लगे हैं। शिक्षा से हमेशा दलितों को दूर रखा गया लेकिन समय के चलते परिस्थितियां बदली और चेतनाएं जागृत हो गई। एक, दो, तीन... से होकर शिक्षितों की कतार लंबी हो गई और अपने अधिकारों एवं हक की चेतना से आक्रोश प्रकट होने लगा। कइयों का आक्रोश हवा में दहाड़ता हुआ तो किसी का मौन। अभिव्यक्ति और प्रकटीकरण का स्वरूप अलग रहा परंतु वेदना, संघर्ष, प्रतिरोध, नकार, विद्रोह, आत्मपरीक्षण सबमें बदल-बदल कर आने लगा। ईश्वर से भेजे इंसान एक जैसे, सबक…

चंद्रेश कुमार छतलानी की लघुकथा - थोड़ी सी प्यास

लघुकथा: थोड़ी सी प्यासकिसान हीरा की पत्नी घाट से जो मटका भर कर लाती थी, उसमें छोटा सा छेद हो गया था| उस पर हाथ रखते रखते भी पानी ज़मीन पर गिर ही जाता| जैसे तैसे वो पानी लेकर आती थी| उसने अपने पति से इस बात की शिकायत की कि, अब इस मटके से पानी भरना संभव नहीं है, आप नया मटका ले आओ| हीरा थोड़ा व्यस्त था, जब तक वो नया मटका खरीदता, तब तक पुराने मटके का छेद काफी बढ़ गया और बहुत सारा पानी तो रास्ते में ही गिर जाता| नया मटका आते ही पुराना मटका हीरा की पत्नी ने बाहर फैंक दिया, वहां काफी कीचड़ थी, उसमें मटका घुल गया| मटके के गिरे हुए पानी ने धरती की शायद थोड़ी सी प्यास बुझाई थी, इसलिये धरती ने अपनी गोद में जगह दे दी... थोड़ी सी प्यास बुझाने का क़र्ज़ चुकाया....शायद यही अंतर है, प्रकृति और इंसान में ! - चंद्रेश कुमार छतलानी--
Regards,
Chandresh Kumar Chhatlani
+91 99285 44749
http://chandreshkumar.wetpaint.com

शैलेन्‍द्र नाथ कौल का आलेख - पर्यावरण - बच्‍चे क्‍या करें

पर्यावरण - बच्‍चे क्‍या करें ? (बालवाणी, हिन्‍दी संस्‍थान लखनऊ के जुलाई-अगस्‍त 2013 में प्रकाशित) बच्‍चों आप सबने अपने स्‍कूल की किताबों में पर्यावरण के विषय में बहुत कुछ पढ़ा है । पर्यावरण दिवस पर आप में से बहुतों ने चित्रकला प्रतियोगिताओं और रैलियों में भी भाग लिया होगा । प्रकृति ने वनों और नदियों के रुप में जो नैसर्गिक सौंदर्य हमें प्रदान किया है, उसमें निरन्‍तर कमी आ रही है और यह बहुत ही चिन्‍ता का विषय है। यह बहुत ही आश्‍चर्य की बात है कि बच्‍चों को तो पर्यावरण का सुरक्षित रखने के लिए जागर�क बनाया जाता है और आप अपनी जागरुकता दिखाते भी हैं परन्‍तु वास्‍तविकता में बड़े लोग अर्थात आपके या आपके कई मित्रों के माता-पिता पर्यावरण के प्रति उतने जागरुक दिखायी नहीं देते । बड़े लोगों की पर्यावरण के प्रति उदासीनता चिन्‍ता का विषय है । आज आवश्‍यकता इस बात की है कि बच्‍चे स्‍वयं तो जागरुक हों ही वरन अपने माता-पिता को भी जागरुक बनायें और इस बात का अहसास करायें कि यदि बड़े लोग पर्यावरण के प्रति उदासीन होंगे या लापरवाही बरतेंगे तो इससे उनके ही बच्‍चों की हानि होगी । पेड़ कार्बन डाइआक्‍साइड को आक्…

महावीर सरन जैन का आलेख - स्वामी विवेकानन्द : मानव सेवा एवं सर्वधर्म समभाव

स्वामी विवेकानन्दः मानव-सेवा एवं सर्वधर्म समभाव प्रोफेसर महावीर सरन जैन स्वामी विवेकानन्द को ठीक तरह से समझने के लिए रामकृष्ण परमहंस को सम्यक् रूप से आत्मसात करना जरूरी है। इसी के साथ जब हम रामकृष्ण परमहंस को जानना चाहते हैं तब यह बोध होता है कि उन्हें भारतीय अध्यात्म परम्परा की पृष्ठभूमि में ही पहचाना जा सकता है। इसी को कुछ विद्वानों ने यह कहकर व्यक्त किया है कि “रामकृष्ण परमहंस को समझना है तो चैतन्य महाप्रभु को समझना होगा और विवेकानन्द को समझना है तो रामकृष्ण परमहंस को समझना होगा”। रामकृष्ण परमहंस भारतीय साधना के प्रतीक योगी हैं। वे भारतीय अध्यात्म परम्परा के आधुनिक-काल के प्रतिनिधि हैं। दिनकर उन्हें “धर्म के जीते जागते स्वरूप” मानते हैं। उनकी जीवनलीला के विविध विचित्र प्रसंगों को पढ़कर अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती है। जैसे गीता में भगवान श्री कृष्ण के विराट रूप को देखकर अर्जुन को विचित्र व्यापक अनुभूति हुई होगी, वैसी ही अनुभूति हमें श्री रामकृष्ण परमहंस के लीला प्रसंगों को पढ़कर होती है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व पर विचार करत…

राजीव आनंद का आलेख - राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

31 अगस्‍त को मैथिलीशरण गुप्‍त की 125वीं जयन्‍ती पर विशेषराष्‍द्रकवि मैथिलीशरण गुप्‍त का अवदान आज भी प्रासंगिक है। यह जान कर आश्‍चर्य और विस्‍मय होता है कि रामचरितमानस के बाद गुप्‍तजी द्वारा लिखित ‘भारत भारती' और ‘जयद्रथवध' हिन्‍दी की ऐसी काव्‍यकृतियां है जो लाखों की संख्‍या में आज भी पढ़ी जाती रही है। आज जब लोक मानस राष्‍द्रीय स्‍वार्थ से विमुख हो अपने स्‍वार्थ भोग में लिप्‍त हैं, गुप्‍तजी का यह आह्‌वान ‘चिरकाल तिमरावृत रहे, आलोक का भी स्‍वाद लो' आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना की यह परतंत्र भारत के लोक मानस के लिए था। निरंतर क्षीण होती राष्‍द्रीय प्रेम का न होना आज देश की सबसे बड़ी समस्‍या है ऐसे माहौल में ‘भारत भारती' के कवि की वाणी की कि ‘हम कौन थे, क्‍या हो गए और क्‍या होगें अभी, आओ विचारें आज मिलकर ये समस्‍याएं सभी' आज की सबसे बड़ी राष्‍द्रीय आवश्‍यकता है। आज भारत में मैथिलीशरण गुप्‍त जैसे देशभक्‍त कवियों की जरूरत है क्‍योंकि गुलाम भारत से ज्‍यादा भयावह स्‍थिति वर्त्‍तमान भारत में मौजूद है। गुप्‍तजी ने भारतीय जीवन की समग्रता में समझने और प्रस्‍तुत करने का प्र…

गोवर्धन यादव का आलेख - कर्मयोगी श्रीकृष्ण

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(जन्माष्टमी के पावन पर्व पर विशेष) कर्मयोगी श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एकदम निराला-अद्भुत और अनूठा है. देवताओं और अब तक हुए अवतारों की परम्परा में वे अन्यतम व्यक्ति हैं. उन्होंने जीवन को गहराई से उतरकर, उसको समग्रता मे देखा और जिया. जहाँ राम मर्यादापुरुषोत्तम के रुप में जाने गए, बुद्ध करुणा के सागर कहलाए, लेकिन उन्हें पूर्णावतार न कहकर अंशावतार ही कहा जाता है. क्योंकि वे अपनी-अपनी मर्यादाओं में बंधे रहे,जबकि श्रीकृष्ण ने किसी बंधन को स्वीकार नहीं किया. इसलिए वे पूर्णावतार कहलाए. उन्होंने मनुष्य जीवन को भरपूर उत्साह के साथ जिया. अतः वे कभी अप्रांसगिक नहीं हो सकते. श्रीकृष्ण ने जीवन को उसके समस्त यथार्थ के रुप में देखा और विभिन्न परिस्थितियों से स्वयं गुजरते हुए उसे हमारे सन्मुख प्रस्तुत किया. दूसरी ओर इन्होंने कभी भी मौतिक जीवन का न तो निषेध किया और न ही बचने की बात की. कभी वे कालियादह में उतरकर कालिया से जा भिडते हैं, तो कभी गोपियों के सिर पर रखी दूध-दही-माखन की मटकियां को फ़ोड देते हैं और तो और वे अपने ही घर में, ऊँचे सींकचें पर रखी माखन की मटकी उतार अपने ग्वाल-बाल मित्रों को …

प्रमोद भार्गव का आलेख - मानवीय गुणों के अवतार - श्रीकृष्ण

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· संदर्भ 28 अगस्‍त श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर विशेष मानवीय गुणों के अवतार श्रीकृष्‍णप्रमोद भार्गवहाल ही में एक भारतवंशी ब्रितानी शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं और पुरातात्‍विक व भाषाई साक्ष्‍यों के आधार पर दावा किया है कि भगवान कृष्‍ण हिन्‍दू मिथक और पौराणिक कथाओं के काल्‍पनिक पात्र न होते हुए एक वास्‍तविक पात्र थे। सच्‍चाई भी यही है। ब्रिटेन में न्‍यूक्‍लियर मेडीसिन के फिजिशियन डॉ․ मनीष पंडित ने अपने अनुसंधान में बताया है कि टेनेसी के मेम्‍फिस विश्‍वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर डॉ․ नरहरि अचर द्वारा एक शोध पत्र में उल्‍लेख है कि खगोल विज्ञान की मदद से महाभारत युद्ध के काल का पता लगाया है। इसी आधार पर जब डॉ․ पंडित ने तारामंडल के साफ्‍टवेयर की मदद से डॉ․ अचर के निष्‍कर्षों की पड़ताल की तब वे आश्‍चर्यचकित रह गये जब दोनों निष्‍कर्षों में अजीब संयोग पाया गया। कृष्‍ण का जन्‍म 3112 बी․सी․ में हुआ। डॉ․ पंडित द्वारा बनाई गई दस्‍तावेजी फिल्‍म ‘‘कृष्‍ण इतिहास और मिथक'' में बताया गया है कि पांडवों और कौरवों के बीच महाभारत की लड़ाई ईसा पूर्व 3067 में हुई थी। इन गणनाओं के अनुसार कृष्…

सुजाता शुक्ला की कहानी - यायावर

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यायावर वो यायावर था ।अलग अलग स्थान जाना न सिर्फ उसका शौक था, बल्कि उसकी प्रवृत्ति थी । उम्र के हिसाब से भी ज़्यादा जगह का भ्रमण कर चुका था वो ,इन दिनो वो एक पहाड़ी रास्ते से होकर चमोली पहुंचा था पहाड़ की खूबसूरत वादियाँ उसके मन को लुभा रही थी झरनों का निर्मल स्त्रोत उसके मन में शांति का अनुभव करा रहा था । वो एक चट्टान के किनारे बैठ गया और उसकी खूबसूरती को निहारने लगा ।सहसा उसके मन में आया ,बिलकुल इसी की तरह हूँ मैं। भला झरनों के निर्मल को कोई बांध पाया है । कहाँ से निकल के कहाँ बही चली जाती है अनवरत , क्या कभी ये कोई सोच पाया है ।मगर उसका लक्ष्य है बहना और निरंतर बहते रहना । किस तरफ बह के जाएगी उसे भी नहीं पता शायद मैं भी इसका अनुकरण कर रहा हूँ। वो सोच ही रहा था कि किसी पहाड़ी धुन से उसकी तंद्रा भंग हुयी । कुछ पहाड़ी लड़कियां पहाड़ी गीत गाते उसी कि ओर चली आ रही थी वे समूह में थी देख कर लग रहा था मानो आज उनका कोई त्योहार है पहाड़ी कपड़ों में सुसस्सजित नख तक शिख तक शृंगार किए हुए ये लड़कियां खुशी से आल्हाड़ित हो रही थी कुछ  बच्चे भी उनके साथ तालियाँ बजाते हुए चले आ रहे थे अब मुझे जाना चाहिए उस…

पूरन सरमा का व्यंग्य - मन्‍त्री जी के बंगले की एक सुबह

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व्‍यंग्‍यएक सुबह मन्‍त्री जी के बंगले कीपूरन सरमामैं जिस समय मन्‍त्री जी के बंगले पर पहुँचा तो सुबह के सवा आठ बज चुके थे तथा मन्‍त्री जी सो रहे थे। धीरे-धीरे लोगों की भीड़ व कोलाहल बढ़ रहा था। मुझे लगा शायद मन्‍त्री बनने के बाद लोगों के शोर से जगने की आदत पड़ गई हो, वरना पहले तो ये पाँच और छः के बीच उठ जाया करते थे। सौभाग्‍य से मन्‍त्री जी मेरे ही क्षेत्र से एम․ एल․ ए․ थे। मैं बहुत बेचैन था। नौ बजे तक उनके जगने के संकेत नहीं मिले तो मैंने वहाँ के कर्मचारी से फिर पूछा-‘क्‍यों भाई अब भी नहीं उठे क्‍या ?'‘बस अब उठने ही वाले होंगे।'‘अरे भाई इस भीड़ में मिलने का नम्‍बर आयेगा तब तक तो अॉफिस में आकस्‍मिक अवकाश का आवेदन पहुँचाना होगा।'‘क्‍या करें साहब रात को देर से सोये हैं। आदमी जागेगा भी तो सोयेगा भी ?' कर्मचारी ने कहा।मैं चुप हो गया। मेरी इच्‍छा हुई कि मैं भागकर इस काम करने वाली सरकार के मुख्‍य मन्‍त्री के पास जाऊँ और कहूँ कि देखिये जनता परेशान हो रही है और आपके मन्‍त्री जी सो रहे हैं। परन्‍तु अपने काम का स्‍मरण करके शांत रहा। वहाँ बेचैनी से टहल रहे एक सज्‍जन से मैंने पूछा-…

पुस्तक समीक्षा - घर घर की राम लीला

सफल और सार्थक व्‍यंग्‍य सुप्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार पूरन सरमा का सोलहवां व्‍यंग्‍य संकलन घर घर की राम लीला' आया है। वे राष्ट्रीय स्‍तर पर चर्चित व्‍यंग्‍यकार है। उन्‍होंने व्‍यंग्‍य के अलावा उपन्‍यास एवं नाटक विधा पर भी कलम चलाई है। उनका एक उपन्‍यास समय का सच काफी चर्चित रहा है। पूरन सरमा व्‍यंग्‍य - लेखन के क्षेत्र में अपनी मौलिकता तथा कथात्‍मक रचनाओं के कारण जाने जाते है। वे साहित्‍य अकादमी से समाद्रत है। लगभग हर पत्र पत्रिका में उनको स्‍थान मिलता रहा हैं। व्‍यंग्‍य हिन्‍दी में आधुनिक काल में पुप्‍पित पल्‍लवित हुआ है। भारतेन्‍दु काल से लगाकर हरिशंकर परसाई, शरद जोशी व श्री लाल शुक्‍ल तक की व्‍यंग्‍य - यात्रा के अवलोकन से स्‍पष्‍ट है कि आज व्‍यंग्‍य साहित्‍य की एक महत्‍वपूर्ण विधा है। पूरन सरमा के इस संकलन में विभिन्‍न विषयों पर लिखे उनके छियासठ व्‍यंग्‍य संकलित है। पूरन जी में विपयों को ढूढंने की क्षमता है और वे रचना के अन्‍त तक विपयों के निर्वहन में सिद्धहस्‍त है। लगभग चालीस वर्षों से वे लिख रहे है। इस संकलन में साहित्‍य, चुनाव, राजनीति, शिक्षा, भ्रष्टाचार, नारी विमर्श, सत्‍ता, सग…

दिलीप लोकरे की लघुकथा - कर्फ्यू

कर्फ्यू
स्कूल से जैसे-तैसे घर आया वह बच्चा बहुत डरा हुआ था । स्वाभाविक भी था ।
सुबह जब वह स्कूल के लिए निकला था तब सब कुछ सामान्य था।
मोर्निग-वाक,सब्जी, दूध वाले और स्कूल जाते बच्चे रोज की ही तरह निकले
थे। बाद में हालात बिगड़े और कर्फ्यू की घोषणा हो गयी।
घर पर उसने पिताजी से पूछा " पापा रास्ते पर इतनी पुलिस क्यों खडी है?"
"कर्फ्यू लगा है बेटा" पापा ने जवाब दिया।
" कर्फ्यू क्या होता है ? क्यों लगाते है ?" बच्चे ने स्वाभाविक जिज्ञासा से पूछा।
"बेटा जब लोग खतरनाक हो जाते हैं , बदमाशी करते हैं , किसी के काबू में
नहीं आते तो कर्फ्यू लगाना पड़ता है ताकि लोग घरों से बाहर नहीं आये" पापा
ने फिर जवाब दिया।
"लेकिन पापा वहां सड़क पर तो कुत्ते ,सांड ,सूअर सब घूम रहे थे उन्हें
किसी ने नहीं रोका। आदमी क्या जानवर से भी ज्यादा खतरनाक होता है
?"..........बच्चे ने और भी ज्यादा मासुमियत से पूछा |
और पापा............क्या कहते ...... निरुत्तर थे |
-दिलीप लोकरे
३६ -ई,सुदामा नगर ,इंदौर
diliplokreindore@gmail.com

सुशील यादव का व्यंग्य - पिछवाड़े बुढ्ढा खांसता

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पिछवाड़े बुढ्ढा खांसता बुढ्ढे को जिंदगी भर कभी बीमार नहीं देखा हट्टा-कट्टा,चलता-फिरता ,दौड़ता-भागता मस्त तंदरुस्त रहा। कभी छीक ,सर्दी-जुकाम, निमोनिया-खासी का मरीज नहीं रहा| अभी भी वो सत्तरवे बसंत की ओर पैदल चल रहा है। उसकी सेहत का राज है कि वो , घर की सुखी दाल-रोटी में मगन रहता है। दो बच्चे थे ,शादियाँ हो गई। इस शादी के बाद पत्नी की सीख पर कि बहु–बेटियों का घर है ,समधन पसरी रहती हैं ,आते –जाते खांस तो लिया करो। इस प्रायोजित खांसी की प्रेक्टिस करते –करते उन्हें लगा कि ‘ग्लाइकोडीन’ का ब्रांड एम्बेसडर बनना ज्यादा आसान था, कारण कि टू बी..एच. के. वाले मकान में जहाँ पिचावाडा ही नहीं होता ,आदमी कहाँ जा के खासे ? हमारे पड़ोस में दो दमे के बुजुर्ग मरीज रहते हैं ,उनके परिवार वाले बाकायदा उनको पिछवाड़ा अलाट कर रखे हैं जब चाहो इत्मीनान से रात भर खांसते रहो। एक हमारे चिलमची दादा भी हुआ करते थे ,एक दिन इतनी नानस्टाप, दमदार,खासने की प्रैक्टिस की कि पांच-दस ओव्हर पहले खांसते-खासते ,उनकी पारी सिमट गई ,वे अस्सी पार न कर सके। आजकल हमारे चेलारामानी को पालिटिकली खांसने का शौक चर्राया है। वे लोग लोकल पालि…

राम आश्रय की रचना - भीम गाथा

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भीम गाथा


रचित & संपादित  –
राम आश्रय
चित्रांकन –विपुल सुधाकर
                   भीम गाथा ;----
         भारत रत्न डाक्टर बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के जीवन संघर्षों को अक्षरों में बांधना कोई आसान कार्य नहीं । उन्होंने अपने जीवन में जिन बाधाओं और विपदाओं को हँसते हँसते पार किया और दुनिया को यह दिखा कि संसार की कोई भी बाधा उन्हे उनकी मंजिल को पाने से नहीं रोक सकती है । हमारा हिन्दू समाज अपने ही समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को शिक्षा की सुविधा से विमुख कर के ही नहीं रखा था बल्कि उनकी उन्नति के सारे रास्ते भी बंद करके रखे थे । यहाँ तक की जिस मंदिर की बुनियाद से लेकर प्राण प्रतिस्ठा तक जी जान से तैयार करते,मंदिर का निर्माण होते ही यह उस मंदिर के लिए अछूत हो जाते थे । दर्शन की बात तो बहुत दूर, उन्हे उस गली से निकलना भी मुश्किल था।पाठशाला, चिकित्शालय, सामाजिक उपयोग की जगहों पर उन्हें जाने की मनाही थी ।   जलाशयों में जानवर तो  पानी पी सकता था परंतु मनुष्य जो जलाशयों को बनाता था वह पानी नहीं पी सकता था ।बाबा साहब ने अपने दृण आत्म विश्वास और ज्ञान के बल पर सारे विश्व को बता दिया मान…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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