गुरुवार, 1 अगस्त 2013

अमित कुमार सिंह का आलेख - मिस्त्र के बहाने लोकतंत्र की मीमांसा

मिस्त्र के बहाने लोकतंत्र की मीमांसा

डॉ अमित कुमार सिंह

मिस्त्र का राजनीतिक घटनाक्रम अत्यंत नाटकीय है. तहरीर चौक इसका साक्षी बना है. पहली बार लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को सेना द्वारा हटा दिया गया और वहॉ के मुख्य न्यायधीश को सेना ने नया राष्ट्रपति चुना . इसके बाद तहरीर चौक उत्सव का रंगमंच बन गया. ठीक वैसे ही,जैसे मिस्त्र के तानाशाह होस्नी मुबारक को तीन दशक के बाद सत्ता से हटाने के बाद जनता ने फरवरी 2011 में जश्न मनाया था. अब तहरीर चौक मोहम्मद मुर्सी और वर्तमान राष्ट्रपति के समर्थकों के बीच एक खूनी संघर्ष का एक मंच बन गया है. मिस्त्र में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रहा है. केवल एक वर्ष के अंतराल में, लोगों का लोकतंत्र से मोहभंग होना कई प्रश्न खडॆ क़रता है. सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि क्या यह मुर्सी के विफलता की पटकथा है,या मिस्त्र की इस्लामिक पृष्ठभूमि इस घटना के लिये दोषी है, या फिर लोकतंत्र की अवधारणा ही स्वंय शंका एवं संदेह के घेरे में है?

इस्लामिक देशों के अतिरक्त चीन में भी लोकतंत्र नहीं है. चीन में साम्यवादी शासन है. चीन पश्चिम के मुल्कों को बुर्जुवावादी कहता है और स्वंय को सच्चा लोकतंत्र घोषित करता है. चीन की आर्थिक प्रगति अदभुत है. क्यूबा भी साम्यवादी मुल्क है लेकिन चीन से सर्वथा भिन्न. क्यूबा जनता को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में एक बेमिसाल उदाहरण है.

दूसरी ओर, अमेरिका और ब्रिटेन को लोकतंत्र का आदर्श प्रतिरूप माना जाता है. लोकतंत्र अर्थात स्वतंत्रता,समानता और बन्धुत्व का शासन. परंतु क्या अमेरिका और ब्रिटेन इस मापदंड़ पर खरे उतरते हैं? इराक और अफगानिस्तान पर,अमेरिका और ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अभियान का वहॉ के नागरिकों ने सख्त विरोध किया था फिर भी उनका हमला जारी रहा. इस लड़ाई में लाखों बेगुनाह लोग मारे गए. अमेरिका सदैव लोकतंत्र और मानव-अधिकार की मुखालफत करता है असलियत में उसका चरित्र पाखंड़ी है. अमेरिका के राष्ट्रीय जॉच एजेंसी के एक खुफिया कार्यक्रम का भंड़ाफोड़ कर एडवर्ड स्नोड़ेन ने इसे जगजाहिर कर दिया है. उसके दावे के अनुसार,सरकार सभी नागरिकों के फोनटेप गुपचुप तरीके से रिकार्ड़ कर रही थी. यही नहीं,अमेरिका 42 देशों की जासुसी कर रहा था. इसका प्रमाण मिला है. अभिप्राय है कि लोकतंत्र के आदर्शवादी उदाहरण में भी लोकतंत्र का मर्म और धर्म गायब है.

पश्चिम के अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी जनता का सरकार से मोहभंग हो रहा है. इटली,यूनान,स्पेन,जर्मनी,रुस में जनता आक्रोशित है. इन देशों में जनता के आर्थिक स्वप्न का बुलबुला फट गया है . सरकार लाचार है और जनता बेबस. इसके अतिरिक्त विकासशील देशों का लोकतंत्र भी बीमार है. भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. यहॉ जनता हताश और निराश है. कारपोरेट घरानों का वसंत उत्सव जारी है. ब्राजील में अरबों रुपया विश्व कप फुटबाल के आयोजन में स्वाहा हो रहा है. इसे लेकर जनता व्यथित है.

हालांकि जनता का यह आक्रोश लोकतंत्र में उनकी सहभागिता को भी प्रदर्शित करता है लेकिन इतना अवश्य है कि लोकतंत्र जनता की आकांक्षा को पूर्ण करने में असफल साबित हुआ है. लोकतंत्र निर्विवाद और निष्कलंक नहीं है. लाइबेरिया में जंगल और वोलीविया में पानी के निजीकरण का विरोध हुआ है. इसमे पूंजीपतियों की बल्ले –बल्ले देखी जा सकती है. जनता बडी हसरत से सरकार की और तकती है. सरकार धीरे –धीरे जनता से मुंह फेर लेती है. सभी ने देखा है कि दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला और ब्राजील में लुला जैसे महान नेताओं ने सत्ता पर आसीन होने से पहले वर्ल्ड बैंक की जिन परियोजनाओं का विरोध किया था,सत्ता पर आसीन होते ही उन्हें स्वीकार लिया था. ऐसा उदाहरण अन्य कई देशों में भी देखा जा सकता है.

लोकतंत्र की स्वीकृति विश्वव्यापी है. यही कारण है कि इसके उपचार हेतु समय – समय पर सुझाव आते रहे हैं. महात्मा गांधी जनता की सजगता पर बल देते हैं. अंबेदकर आर्थिक और समाजिक लोकतंत्र की स्थापना पर जोर देते हैं. जयप्रकाश नरायण दलविहीन लोकतंत्र की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं. रजनी कोठारी जैसे राजनीतिक चिंतक संस्थाओं को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं. अर्थात लोकतंत्र का उपचार है. इसे दुरूस्त किया जा सकता है. यही आशा लोगों को लोकतंत्र की और आकर्षित करती है. भारत के पडोस भूटान में राजतंत्र के बाद अभी हाल में ही लोकतंत्र की स्थापना हुई है. नेपाल में भी लोकतंत्र की स्थापना का प्रयास जोरों पर है. वर्मा में आंग सुकी द्वारा लोकतंत्र की स्थापना का आंदोलन जारी है. चीन में भी समय-समय पर लोकतंत्र के लिये युवा मांग करते रहे हैं. इन संदर्भों का आशय यही है कि लोकतंत्र में जनता की गहरी आस्था है,फिर लोकतंत्र के प्रति शिकायत का यह भाव क्यों?

यहां लोकतंत्र की तुलना राजतंत्र से उपयोगी हो सकता है. राजतंत्र का भी उदाहरण यही साबित करता है कि जो राजा जनता के प्रति संवेदनशील थें,प्रजा उन्हें पसंद करती थी. जहांगीर के शासन के बारे में यह उल्लेख मिलता है कि उसके महल के बाहर एक घंटा लगा हुआ था,उसे कोई भी किसी समय बजाकर राजा के सामने फरियाद कर सकता था. राजा और प्रजा के बीच ऐसी केमेस्ट्री का उल्लेख प्राचीन भारत में भी मिलता है. कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र के प्रथम अध्याय में यह उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार चंद्रमा समुद्र को खुश करता है,इसी प्रकार राजा प्रजा के नेत्रों को भी आनन्द देता है. विदुर नीति का पच्चीसवां श्लोक भी यही इशारा करता है. इसके अनुसार, जो राजा नेत्र,मन,वाणी और कर्म से प्रजा को प्रसन्न करता है,उसी से प्रजा प्रसन्न रहती है. आशय यही है कि राजा अगर राजतंत्र में भी अच्छा था,तो भी उसकी जयजकार थी. लोकतंत्र में भी कमोवेश ऐसा ही है. पुनः मिस्त्र पर लौटते हैं.

मिस्त्र में मुर्सी ने अर्थव्यस्था को सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. वहॉ की मुद्रा कमजोर होती गई. मुद्रास्फीति बढती गई. बेरोजगारी विकराल रूप धारण करता गई. बिजली कटौती का रोग बढता गया. पेट्रोल की कतार लम्बी होती चली गई. अपराध और मंहगाई आसमान छूने लगी. दैनिक दिक्कतों के अतिरिक्त मुर्सी ने लोकतंत्र को भी कमजोर किया. उन्होंने न्यायलय,मीडिया, तटस्थ नागरिक सेवा,पुलिस और सेना को कमजोर करने का काम किया. शायद यही कारण है कि जनता उनके विरोध में सडकों में निकला आई. सेना के हस्तक्षेप को यहॉ उचित ठहराने का कोई इरादा नहीं है,परंतु इतना सत्य है कि लोकतंत्र में अब तंत्र को लोक के प्रति संवेदनशील होना होगा. लोकतंत्र में शासक का चरित्र अब लापरवाही का होता जा रहा है. यह एक वैश्विक प्रवृति है. ऐसे ही शासकों के लिये धूमिल ने अपनी कविता में कटाक्ष किया था-मैंने किश्तियों की खोज में उन्हें सड़क पर भटकते हुये देखा है.

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AMIT KUMAR SINGH
ASSISTANT PROFESSOR
R.S.M. (P.G.)  COLLEGE
DHAMPUR (BIJNOR)-246761
U.P.

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