रविवार, 11 अगस्त 2013

नन्दलाल भारती की कहानी - एक और चक्रव्यूह

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डाँ.नन्दलाल भारती

एम.ए. । समाजशास्त्र। एल.एल.बी. । आनर्स ।

पी.जी.डिप्लोमा-एच.आर.डी.

एक और चक्रव्यूह /कहानी

गांव के पुराने लोग बहुत कम बचे है। एकाध ही ऐसे लो है जो गुलाम देश में पूरे होशो-हवास में जीवित है, उनके बताये अनुसार आजादी के पन्द्रह साल पहले सामीराम का जन्म हुआ था। देश गुलाम तो था ही शोषित वर्ग नरक का जीवन जीते हुए कई तरह की गुलामियों से जूझ रहा था। ऐसे बुरे दौर में सामी का जन्म हुआ था। सामीराम के बाप खोलूराम की खेतीबारी की जमीन बंच गयी थी क्योंकि खोलूराम तनिक होशियार था,कई गोरों से उसकी जान पहचान हो गयी थी। पखण्डी लाल खोलूराम के कान में कह दिये थे देख खोलुआ ज्यादा चम्मचागीरी किया तो हाथ धो जायेगा,तू ये मत सोचना कि गोरे बाबूओं से तुम्हारी छनने लगी है। अरे गोरे बाबू तो तुम्हारा क्या बस्ती के कुएं तक का पानी नहीं पीते है। तुम्हारी क्या सुनेंगे ? मुझसे होशियारी नहीं करना । खोलू बोला था लाला-पूरी बस्ती के अछूतों की जमीन उनके कब्जे से हटती जा रही है।

लाला-खोलुआ तुम अपनी चिन्ता करो। दूसरों की चिन्ता करोगे तो हाथ मलते रह जाओ। बस्ती के शोषितों की नसीब तो गांव के जमींदारों की चौखट पर लिखी हुई है। गुलाशमों को जमीन की क्या जरूरत है। तुम और तुम्हारे लोग बाबू लोगों की हलवाई करो,उनके बंधुआ मजदूर बने रहो। जिन्दगी बीतती रहेगी।

खोलूराम-लालाजी हम शोषितों को कब तक आतंक के साये में बसर करना पड़ेगा। देश की आजादी के लिये जंग छिड़ी हुई है। बस्ती के कितने लोग मारे गये,उनका कही जिक्र भी नहीं है। बाबू लोग घर में आवाज लगा देते है तो उनकी जयजयकार होने लगती है। अरे मरते है तो हमारे लोग। लाल क्यों रोज एक और चक्रव्यूह रचे जा रहे है शोषितों के दुश्मनों से मिलकर। लाला/पटवारी तुम भी शूद्र ही हो पर तनिक तुमको दर्जा उपर का मिल गया है। इसलिये अपने रूतबे खातिर हक से वंचित करने पर जुटे हुए हो।

पखण्डी लाल-कैसी बात कर रहा है खोलू। मुझसे बराबर कर रहे हो। मुझमें और तुम में बड़ा अन्तर है।

खोलूराम-लाला मैं तो अनपढ़ हूं पर इतना जानता हूं कि ये जो जातीय भेद के आधार पर बंटवारा हुआ है,वह तो हम शोषितों के लिये बहुत बुरा है। जाति व्यवस्था ने तो हमें आदमी होने के सुख से वंचित कर दिया है। इसके बाद भी दो बीसा माटी का सहारा था वह भी जमींदारी प्रथा लूट रही है। हम लोग कैसे जीयेगे लालाजी।

पखण्डी-तुम लोगों के लिये उंची जातियों के लोशगों के चौखट है।

खोलू-वाह रे बाबू कैसाई के खूटें की गाय बना कर रहोगे।

पखण्डी-तुम गंवारों से क्या माथा खपायें कहते हुए साइकिल आगे बढ़ा दिये।

धीरे-धीरे लाला पूरी बस्ती के शोषितों की जमींन गांव के जमींदारों के नाम टांक दिये कुछ ले देकर। बस्ती के सारे शोषित जमीन से हाथ धाते जा रहे थे। खोलूराम पखण्डी के साइकिल बढ़ाते ही गाँव के प्रधान रामबिहारी जमींदार की शरण में भाशगा-भागा गया। रामबिहारी,हवेली से दूर खेत के किनारे ऐशगाह बने रखे थे,गांजा,शराब-कबाब और शबाब का जमींदार खूब आनन्द लेते थे। खोलूराम जमींदार के ऐशगाह के सामने खड़ा होकर बोला बाबू दया करो।

खोलूराम का क्रुन्दन सुनकर जमींदार धोती समेटते हुए दरवाजे पर खड़ा होते हुए बोले क्या खोलुआ कौन सी विपत्ति आ पड़ी। खोलू की निगाह बरबस कमरे में चली गयी। वह देखकर हैरान हो गया। वहां तो गांव के छोटे जमींदार मुरारी की अंग्रेजी मेमसाहब जैसी बहू साड़ी ठीक कर रही थी। खोलू को समझने में देर ना लगी। गांव का रूतबेदारी रामबिहारी जमींदार किसी की बहू बेटी को अपनी हवश का शिकार बनाना,अपनी शान समझता था । वह हवश से निवृत ही हुआ था कि इतने में खोलु आ गया, जमींदार डांटते हुए बोले अरे कहां देख रहा है खोलू तू तो अपनी विपत्ति लेकर आया था कुछ बोलेगा कि तुमको लगवा मार गया।

खोलू की जैसे जबान लग गयी,वह बड़ी हिम्मत करके बोला माईबाप लाला धरती छिन रहे है।

जमींदार-जा तेरी जमीन जो चली गयी वह तो भूल जा पर जो बची है,वह बची रहेगी पर तू यहां कुछ नहीं देखा है। याद रखना अगर देख लिया तो तेरे वंश मिट जायेगा,जमीन की बात क्या ?

खोलू बस्ती लौटकर आया। घर से बाल्टी लेकर कुएं की ओर भागा,कुएं से दनादन पानी निकालकर नहाने लगा। कम से कम दस बाल्टी पानी अपने सिर पर डाला। खोलूराम को इस तरह नहाते हुये देखकर रमरजिया बोली खोलू इतना क्यों नहा रहे हो।

खोलू-काकी गरमी लग रही है।

रमरजिया-जाड़े की रात है,और तुम को गरमी लग रही है। क्या बात है खोलू बचवा।

खोलू-कुछ नहीं काकी।

रमरजिया-कहां से भागते हुए आये हो।

खोलू- प्रधान के पाही से।

रमरजिया काकी माथा ठोंकने लगी ,इतने खोलू बाल्टी लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा।

कुछ दिन बाद पखण्डी फिर आया,बस्ती के हर घर से कण्डा,भूसा,अरहर के डण्डल एक जगह इक्ट्ठा करने को कहां। ढ़ेर सारा कण्डा भूसा इक्ट्ठा हो गया। बस्ती के पांच हट्टे-कट्टे श्रमिकों को पहुंचाने को बोला किसी को मना करने की हिम्मत तो थी नहीं। खोलूराम को एक तरफ ले जाकर बोला क्यों खोलुआ प्रधान से शिकायत कर आया। अब तो तू बस्ती के मजदूरों का नेता हो गया है। देखा प्रधान कौन की घरवाली के साथ सोये थे।

खोलू-क्या कह रहे हो लालाजी।

पखण्डी-अब तू अंग्रेजों जैसे पैंतरेबाजी कर रहा है। दस बीस गांव में तेरा बेटा सामी पहला स्कूल जाने वाला है। जानते हो स्कूल के बाहर बैठता है, जहां से उसके कान में मास्टर जी की आवाज भर पहुंचती है। सोच ले अंग्रेज कचहरी में कैसे जज बनेगा। पता है न पांच कोस जाता है,पांच कोस आता है। मुझे से पैतरेबाजी नहीं करना। जा अपने घर जा अराम कर,तुमसे भूसा ढोआ दूंगा तो मेरी शिकायत लेकर जमींदार की हवेली पहुंच जायेगा।

खोलू-लालाजी एक और चक्रव्यूह।

लालाजी का रूतबा गरज उठा। यह गरज कई जमींदारों के कान में पड़ी,अब क्या एक और चक्रव्यूह सामी के स्कूल से दूर करने का सफल हो गया। हां सुन-सुन कर सामी कुछ लिखना पढ़ना सीख गया था । उसमें पढ़ने की इतनी ललक जो थी पर तालीम नहीं ले पाया। लाख प्रयास के बाद भी। हां वह शम्भुख ऋषि बनने लगा बस्ती के बच्चों को अक्षर ज्ञान कराने लगा परन्तु सामी के इस प्रयास को विद्रोह मान लिया गया। अंग्रेज हवलदारों ने दस डण्डे मारकर छोड़ दिया था। इसके बाद रामबिहारी जमींदार ने खोलुराम और सामी को एक नौकर से अपनी हवेली बुलवाये।

खोलुराम और सामी रामबिाहरी की कचहरी में हाजिर हुए ।

रामबिहारी भड़क उठे सामी की ओर इशारा कर बोले क्यों कल का लवण्डा दो अक्षर पढ़ क्या लिया, चला बस्ती के मजदूर के लवण्डो को बिगाड़ने। साले बस्ती के पिल्ले तुम्महारी राह पर चल पड़े तो गांव छावनी बन जायेगा।

खोलुराम-बाबू मेरे सामी ने इतना कौन सा अपराध कर दिया।

रामबिहारी-जानते नहीं हो तुम्हारी बिरादरी के लोगों के लिये पढ़ाई नहीं बनी है,बस हम जमीदारों और बड़ी जाति के लोगों के खेतों में घरों में काम करो और दो रोटी खाकर चैन से सोओ।

सामी-बाबू हम भी इंसान है।

रामबिहारी-जबान लड़ाता है। जानते नहीं हो रामायण काल में शम्भुख को जान गंवाना पडा था ऐसी ही गलती के लिये।

सामी-ये गलती तो नहीं।

रामबिहारी-देश को आजाद होने में अभी सौ साल लगेगे समियां तू है कि अभी से फड़फड़ा रहा है। तू जगजीवन भीमराव बनना भूल जा। खोलूआ ले जा इसको समझा देना।

जैसे सामी के पांव में जंजीर और जबान पर ताले जड़ दिये गये। सचमुच सामी में समाज के लिये कुछ करने का जज्बा था पर उसकी जज्बे को रामबिहारी और दूसरे जमींदारों की साजिशों ने दफन कर दिया। सोलू के बार-बार समझाने के बाद भी सामी अपने रास्ते पर चल पड़ता था जो उसकी जान के लिये भी खतरा बनता जा रहा था,आखिरकार खोलू ने सामा का गौना करवा लाया। थकहारकर सामी बाप के बताये रास्ते पर चलने लगा। सामी की प्रतिष्ठा बस्ती के लोगों में बढ़ती चली गयी थी। देश की आजाद के लिये भी कई बार बस्ती के लोगों के साथ अंग्रेजों से लोहा भी लिया था परन्तु आजादी की दास्तान में न उसका और नहीं बस्ती के किसी छोटी जाति वाले आजादी के लड़ाकुओं का नाम शामिल हुआ। हाँ गांव और के आसपास के कई लोग स्वतन्त्रता सेनानी घोशित हो गये थे क्योंकि ये उच्च वर्णिक थे जबकि ये लोग गोरों के बूट की आवाज सुनकर घर में घुस जाते थे। खोलु ही क्या बस्ती के कई मजदूर जो अंग्रेजो से लोहा लिये थे एक-एक कर अनाम मरे गये।

खोलु को भले ही आजादी के दीवानों में शामिल नहीं किया गया पर खोलु मरते वक्त सामी से कहा था बेटा तुमको ना पढ़ा पाने का गम तो मुझे है पर खुशी इस बात की है कि मैं आजाद देश से विदा हो रहा हूं अपने सपूत बेटे के कंधे पर जिम्मेदारी डालकर।

रामविहारी आजादी के पहले भी गांव के मुखिया प्रधान थे आजादी के बाद भी,जब उनको लकवा मार गया तब उसके बेटे कामविहारी ने गांव की प्रधानी पर कब्जा कर लिया। आजादी के बाद तनिक परिवर्तन आया। बस्ती के मजदूरों के जीवन में तो कोई खास तरक्की नहीं हुई पर शोषितों की गिनती होने लगी। स्कूलों में भी शोषितों के बच्चों की पूढ परख होने लगी,जिस स्कूल में शोषित वर्ग के बच्चे होते थे उस स्कूल को सरकारी मान्यता जल्दी मिलने लगी थी। ये सब स्वार्थवश था उच्चवर्णिक लोगों के लिये शोषित वर्ग के बच्चे पिल्लों से भी गये गुजरे थे। कुछ उच्चवर्णिक तो परछाई तक से परहेज करते थे। खैर आजाद के पैंसठ साल बाद भी कम नहीं है।

उधर प्रधानी की अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिये कामविहारी जमींदार को शोषित वर्ग के कम से कम आदमी के अंगूठा निशानी की सूझी। सामी से ज्यादा उपयुक्त उसे कोई नहीं दिखा क्योंकि सामी को तो थोड़ा बहुत लिखने और समझने भी आता था। कामविहारी अपने मरे बाप का वास्ताश और सामी के बाप की उसकी हवेली से नजदीकी की भयावह याद दिलाकर सामी को अपने पक्ष में कर लिया। अब क्या सामी एक और चक्रव्यूह का शिकार हो गया।

सामी कामबिहारी के चक्रव्यहू में फंस गया,ग्राम पंचायत का सदस्य बना दिया। कामबिहारी ने छल करना शुरू कर दिया। पूरी गा्रम पंचायत में सामी ही एक शोषित वर्ग का अछूत सदस्य था। ग्राम पंचायतों की बैठकों में तो उसे बुलाया नहीं जाता था । बुलाया भी लिया गया था उसे दूर बैठाया जाता था। कामबिहारी के खून में शोषितों के हक लूटने की बमीशरी पुरानी थी उसे भनक लग गयी थी। गांव समाज की जमीनें बस्ती के भूमिहीनों में बंट जायेगी। कामबिहारी ने गांव समाज की अधिकतर जमीन धीरे-धीरे अपने परिवार के सदस्यों के नाम करवाना शुरू कर दिया। थोड़ी जमीन गांव के दूसरे जमींदारों के नाम कर दिया जो उनके कब्जे में थी या उनकी जमीनों के आसपास थी। कामबिहारी प्रधान ने पोखर तालाब तक का बन्दरबांट कर लिया। बस्ती के मजदूरों को सदा के लिये भूमिहीन बनाने की साजिश में सफल हो गया। सामी के कान तब खड़े हुए जब बस्ती के मजदूरों को बस्ती के सामने की पोखरी में जाने पर प्रतिबन्ध लग गया। गांव के बड़े जमीदार कुरूपचन्द ने वनसंरक्षण के नाम पर पोखरी पर कब्जा कर मछली पालन शुरू कर दिया। बस्ती के पास क़ी जमीन पर दूसरे गांव के कई लोगों को लाकर पाही बनवा दिया। गांव के पूरब कई एकड़ जमीन जमीदांरों के बच्चों के लिये खेल का मैदान बन गयी। बची कुछ जमीन का भी वही हाल हुआ दूसरे गांव से उच्चवर्णिकों का कब्जा कर दिया गया। यानि बस्ती के मजदूरों को सदा के लिये गुलामी के चक्रव्यूह में फंसा दिया गया।

सामी था तो पंचायत सदस्य पर गांम पंचायत के सदस्यों को उसकी सहमति-असहमति की कोई फिक्र नहीं होती, उससे किसी ना किसी तरह दसख्त करवा ही ली जाती थी दसख्त ना करना उसके लिये फांसी का फंदा भी बन सकती थी।

असापास के गांवों में आवण्टन की शुरूआत हो गयी तब बस्ती के मजदूरों ने अपने सरगना सामी से आवण्टन करवाने की सिफारिश करने लगे। सामी आवण्टन का आश्वासन दे तो दिया पर कामबिहारी से इस विषय में बात किया तो वह बोला अरे-समिया अपना गांव छोटा सा है कितना रकबा है,गांव समाज की जमीन कहा है कि तू चमारों को जमींदार बाने पर तुला है।

सामी-बाबू मेरा गांव छोटा कैसे हो गया पच्चास एकड़ जमीन पर बस्ती के मजूदरों को आवण्टन दिया जा सकता है।

कामबिहारी प्रधान- जमीन कहां है ।

सामी-है बाबू पखण्डी लाला को बुलवाकर पड़ताल करवा लीजिये।

कामबिहारी-ठीक है। पखण्डी को बुलवा लेगें। पखण्डी आया भी और पाखण्ड कर गया।

बस्ती के मजदूरों में तनिक समझ आ गयी थी। कुछ लोग तहसीलदार से मिले भी। तहसीलदार बोले जब प्रधान चाहेंगे तभी आवण्टन हो पायेगा। प्रधान ने गांव के सारी जमीन अपास में बांट लिये है,जब तक पट्टा निरस्त नहीं होगा आवण्टन कैसे हो सकता है। सामी पर बस्ती के मजदूरों का दबाव बढ़ने लगा। ग्राम पंचायत के सदस्यों के सामने सामी आवण्टन की मांग पुरजोर से करने लगा। फिर क्या एक और चक्रव्यूह।

एक दिन दिन रात में पुलिस आयी आयी और सामी को चोरी के इल्जाम में उठा ले गयी। गांव के ही नहीं आसपास के कई जमींदार इसके गवाह बने। सामी को पुलिस ने इतना मारा की उसके अंग-अंग टूट गये। एक कहावत है-जबरा मारै रोवै ना दे। वही किया गांव के जमींदारों और पुलिस ने। सामी पुरजा पुरजा बिखर गया पर चोरी नहीं कबूल। चोरी तो उसने किया ही नहीं था यह तो एक चक्रव्यूह था बस्ती के शोषितों की जबान बन्द करने के लिये। ग्राम पंचायत के सदस्य पुलिस के डण्डे के भरोसे सामी से चोरी नहीं कबूलवा पाये तो एक नई चाल चल दिये गा्रंम पंचायत में भ्रष्टाचार के आरोप में एक और चक्रव्यूह रचकर जेल भेजवा दिये।

आखिरकार सामी जेल से बाइज्जत तो छूटा पर विक्षिप्त हो गया था। उसके जबान पर एक ही बात रहती जमींदार बबूल की छांव है रे बाबा। जमींदारों के चक्रव्यूह से बचना रे बाबा। अपनी तरक्की के लिये लड़ना रे बाबा। बस्ती के मजदूरों पर सामी के इस दर्द भरे गीत का इतना असर हुआ कि शोषितों ने बस्ती के सामने से गुजर रहे हाईवे को एक दिन जाम कर दिया। बस्ती के अपनी गृहस्ती और जानवर सब लेकर सड़क पर डंट गये। कई दिनों के संघर्ष के बाद जिले के कलेक्टर कमिश्नर आये। बस्ती के मजदूरों की समस्यों सुने। जमीदारों के सारे अवैध पट्टे निरस्त हो गये। बस्ती के भूमिहीन मजदूर जमीन मालिक बन गये। जमीन मिलते ही बस्ती में भी तरक्की दिखने लगी। विक्षिप्त सामी कहता जमींदारों के चक्रव्यूह की वजह से अब तक बस्ती की तरक्की कैद थी,फूंक-फूंक कर पांव रखना रे बाबा। संभाल कर रखना रे बाबा। हक के लिये लड़ना रे बाबा। चक्रव्यूह में ना फंसना रे बाबा । कहते कहते पगला सामी दुनिया ये बिछुड़ तो गया पर बस्ती के शोषितों के चक्रव्यूह से उबरने का मन्त्र दे गया। बस्ती वालों ने उसे अमर बना दिया ।

डोँ नन्दलाल भारती 01.06.2013

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जनप्रवाह। साप्ताहिक। ग्वालियर द्वारा उपन्यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन

उपन्यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्त

नेचुरल लंग्वेज रिसर्च सेन्टर,आई.आई.आई.टी.हैदराबाद द्वारा भाशा एवं शिक्षा हेतु रचनाओं पर शोध ।

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