रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - मुस्कान और ममता

सिन्धी कहानी

मुस्कान और ममता

clip_image002मूल: कहानीकार: कला प्रकाश

अनुवाद: देवी नागरानी

यह ममता की मूर्ति मेरे सामने बेजान पड़ी है। ख़ुद बेजान है पर ममता को जानदार बनाकर गई है। नई ज़िन्दगी को जन्म देकर, अपनी ज़िन्दगी कुर्बान करने वाली इस नारी की तरफ़ देखते ही मेरी आँखें भर आती हैं। उसकी हर एक बात याद आती है, शायद मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ।

कल रात मेरी रात पाली थी। चक्कर लगाते उसके बिस्तरे के पास आई। दिन वाली नर्स ने बताया - ‘इसे आज तकलीफ़ है, शायद रात को ही डिलिवरी हो जाए।’

‘अच्छा!’ मैंने खुशी से उसका हाथ पकड़ते हुए कहा। फिर उसके ज़र्द चेहरे की तरफ़ मुस्कराकर देखते हुए कहा - ‘बस तीन घंटों की देरी है, बताओ बेटा चाहिये या बेटी?’

पीड़ा की वज़ह से उसका चेहरा पसीने से तर था, फिर भी मेरा सवाल सुनकर वह मुस्कराई। मैंने फिर पूछा - ‘बताओ?’

आँखों में शर्म मुस्कराया, शायद यह पहला बच्चा था। मैंने मेज़ से घंटी उठाकर उसे देते हुए कहा - ‘जब ज़्यादा तकलीफ़ हो तब यह घंटी ज़ोर-ज़ोर से बजाना।’ मुझसे घंटी लेकर, तकिये के नीचे रखते हुए वह मुस्कराई। मैं भी अपने काम में लग गई।

रात को क़रीब तीन बजे उसने घंटी बजाई। मैं दौड़ती हुई गई। बिस्तर से उठते उसने तकिये की दाईं तरफ़ रखे गुलाब के दो तीन फूल उठा लिये। मैंने उसे बाँहों का सहारा देते हुए पूछा- ‘ये फूल डिलिवरी रूम में ले चलोगी ?’

उसने कहा - ‘सिस्टर तुम्हें दे रही हूँ !’

फूलों से कितना प्यार था उसे। उससे मेरी पहचान भी फूलों के ज़रिये हुई थी। नीचे ‘आउट डोर पेशेंट डिपार्टमेंट’ में रोज़ सुई लगवाने आती थी। मुझे बिलकुल भी याद नहीं आता कि उसने कभी किसी दर्द की शिकायत की हो। बाक़ी औरतों की तरह कभी मेरा समय बर्बाद नहीं किया। इसीलिये वह जब भी दरवाज़े से भीतर आती तो मैं हँसकर उसका स्वागत करती। एक दिन मुझे गुलाब का फूल देते हुए उसने कहा – ‘सिस्टर बिना पहचान के हर रोज़ एक मधुर मुस्कान से मेरा स्वागत करती हो, इस शुक्र अदाई के लिये यह फूल दे रही हूँ, क़बूल करोगी ?’

मैंने खुश होकर कहा -‘ज़रूर।’

इस वार्ड में वह पिछले हफ़्ते से रही पड़ी है। उसका पति चन्दर हर रोज़ उसके लिये फूल लाता है। पहले दिन मैं दिन की ड्यूटी पर थी। मुझे बुलाकर अपने पति से परिचय करावाया। उसे मेरा नाम बताते हुए कहा - ‘यह सिस्टर बहुत ही मधुर मुस्कान की मालकिन है। ‘

उस दिन शाम छः बजे जाते समय चंदर मेरे पास आया और कहने लगा - ‘सिस्टर, कोई खौफ़-ख़तरा तो नहीं है ?’

मैंने कहा - ‘बिलकुल नहीं, थोड़ी कमज़ोर है इसलिये उसे पहले ही दाख़िल कर दिया है। सुई के साथ दवा भी दे रहे हैं। वह बिलकुल ठीक हो जाएगी।’

डिलिवरी रूम के बाहर निहायत सुन्दर और तंदुरुस्त बच्चों की तस्वीरें टंगी हुई हैं। चन्दर की निगाहें उनपर जा अटकीं। कुछ रुककर, हिचकिचाते हुए कहा - ‘मुझे मोटे और तंदुरूस्त बच्चे पसंद हैं, ऐसे बच्चे जिन्हें धक्का मारो तो भी न रोएँ।’ मुझे लगा वह कहने को तो कह गया , पर बाद में ख़ुद बहुत शरमाया।

अल्ला! वह अभी आता ही होगा। उसे ऐसी अशुभ ख़बर सुनाने के लिये मैं ही क्यों ड्यूटी पर हूँ ? इतना साहस मैं कहाँ से लाऊँगी जो उसे सुना सकूँ कि उसकी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं!

अभी अभी तो थी। तीन घंटों के अन्दर यह क्या हो गया ? मैं ग्यारह साल इस अस्पताल में नौकरी कर चुकी हूँ। मैंने अनेक मौतें अपनी आँखों के आगे देखी हैं। फिर इसकी मौत पर आज मैं क्यों अपने बस में नहीं हूँ ? शायद उसके साथ मेरा नाता गहरा हो गया था! आँखों के सामने अभी भी रात वाला मंज़र रक्स कर रहा है, कुछ और दिखाई नहीं देता।

चार बजे के क़रीब निहायत दर्द भरी आवाज़ में उसने पुकारा। मैंने पास जाकर पूछा - ‘क्या हुआ, क्या हुआ है? घबराओ मत, कहो क्या बात है!’

असहनीय दर्द को छेदती एक सिसकी सुनाई दी। वह सिर्फ इतना कह पाई - ‘मुझे न जाने क्या हो रहा है सिस्टर ! मैं बता नहीं सकती।’

उसकी आवाज़ में बेपनाह पीड़ा समाई थी। मैंने उसके पेट पर कान रखकर बच्चे की हालत जांची। हालत कुछ बिगड़ी नज़र आई। मैंने वॉर्ड ब्वॉय को भेजकर डॉक्टर कुमारी शाह को उसके क्वाटर से बुलवा लिया। पंद्रह मिनट की जाँच के उपरांत, पेशानी पर चिंता के चिन्ह लिए उसने कहा - ‘डिलिवरी फ़ौरन ही होनी चाहिए, नहीं तो इसे ख़तरा है।’

मैंने पास वाले वॉर्ड से दो नर्सें मँगवा लीं। प्रभात के पाँच बजे तक प्रसव पीड़ा निरन्तर बढ़ती रही। आख़िर जब ख़ुद को रोक न पाई तो रो पड़ी। मैंने बहुत दिलासा दिया कि ऐसा मत करो। मेरे हाथों पर स्नेह से दबाव डालते हुए कहने लगी - ‘मुझे खुद शरम आ रही है सिस्टर कि मैं रो रही हूँ। पर मैं क्या करूँ ? मुझे जाने क्या हो रहा है?’

उसकी इसी असहाय, बेबस आवाज़ ने मुझे रुला दिया। उसके ‘सिस्टर’ कहने के अंदाज़ में भी एक अपनापन था। उसका दुख मेरे लिये असहनीय हो गया।

डॉ. शाह ने लौटकर आते ही कहा - ‘उसको ऑक्सीजन दो’। फिर उसका ब्लडप्रेशर देखकर मुझे बुलाते हुए कहा - ‘हालत बिगड़ रही है।’

यह तो मैं भी देख रही थी। उसे ऑक्सीजन दिया गया, पाँच-पाँच मिनट बाद सुई भी लगती रही। यहाँ डॉ. शाह उसका ब्लडप्रेशर देख रही थी, वहाँ उसका रोना तीव्र होता रहा। डॉ. शाह ने बिना समय गँवाए उससे काग़ज़ पर हस्ताक्षर लिये और अपना काम शुरू किया। दस-पंद्रह मिनट में डिलिवरी हो गई !

बच्चे ने ‘ऊँआ..ऊँ..आँ..’ की, और उसके होठों पर मुस्कान दौड़ गई, ममता को अमर करने वाली मुस्कान! बच्चे की ‘ऊँआ..ऊँ..आँ..’ से उसे क्या मिला, कितना मिला, इसका मूल्यांकन फ़क़त एक माँ ही कर सकती है। उसकी नब्ज़ ढीली होती गई, वह ख़ुद पीली पड़ती गई। मैं जिस वक़्त उसे चौथी सुई लगा रही थी, तब घायल ममता ने मुझसे पूछा - ‘सिस्टर, बेबी का वज़न कितना है?’ मैंने भरे गले से कहा - ‘पाँच पाउन्ड !’

उसने अपनी आँखें बंद करते हुए धीमे से कहा - ‘तुम चन्दर से कहना छः पाउन्ड वज़न है।’

मेरा हृदय चूर-चूर हो गया, ज़बरदस्ती मुस्कराते हुए कहा - ‘हाँ, हाँ, तुम चिंता मत करो, मैं सात पाउन्ड कहूँगी।’

उसने आँखे खोलीं और मुस्कराते हुए कहा - ‘तुम बहुत अच्छी हो सिस्टर!’ ये क्या हो रहा था? उसकी नब्ज़ ढीली पड़ती जा रही थी। समझ नहीं आया वह कैसे बात कर पा रही थी ? कैसे मुस्करा रही थी ? हम सब उदास चहरे लिये एक दूसरे को देखते रहे। उसे बचाने की भरपूर कोशिश हो रही थी, पर मौत तेज़ कदमों से उसकी ओर बढ़ रही थी। हम ज़िन्दगी को मौत से बचाने के प्रयासों में जुटे थे, पर वह जो दो पाटों की कशमकश में थी, उसे कुछ पता ही न पड़ा। मौत न तो उसकी आँखों की चमक छीन सकी, न होठों की मुस्कान। उसके एक ज़िन्दगी का निर्माण किया और मौत को शिकस्त दी थी।

पल के लिये दिल ने चाहा कि उसे बता दूँ कि वह शायद कुछ पलों की मेहमान है, पर उसकी आँखों में जो सुंदर सपने सजे थे, उनको छीनने की शक्ति मुझमें न थी।

मैं भी ‘माँ’ हूँ, मुझे पता है उस पल में उसने कैसे कैसे सपने देखे होंगे। मेरी बेटी ‘कुसुम’ का जन्म भी इसी कमरे में हुआ था, उसके जनम के पंद्रह दिन पहले मैं हॉस्पिटल के सालाना जलसे में आई थी। वहाँ सात साल की एक बालिका ने दिलकश नृत्य किया था। कुसुम की ‘ऊँ..आँ..ऊँ..आँ..’ सुनकर मैंने भी सपने सँजोये थे। सोचा था अपनी बेटी को नृत्य की शिक्षा ज़रूर दिलाऊंगी। मेरी आँखों के आगे अस्पताल के जलसे का स्टेज घूम रहा था, जैसे मेरी कुसुम नाच कर रही हो। सात सालों का सपना मैंने पाँच मिनटों में पाल लिया था।

मुझे यक़ीन है कि उस वक़्त वह भी कुछ ऐसे ही सपनों में खोई होगी। घर में बच्ची के लिये फ़्राक तैयार रख आई होगी। उसे कहाँ सुलाना है, उसका विचार किया होगा। कौन-सा दूध पिलाना है, यह भी सोचा होगा। शायद यह भी तय किया होगा कि उसे कौन से स्कूल में दाख़िल करवाएगी !

सबसे ज़्यादा उत्सुकता उसे उस समय हुई होगी, जब सोचा होगा कि शाम को चन्दर आएगा, बच्चे को गोद में उठाएगा, प्यार करेगा और उसे छेड़ते हुए पूछेगा - ‘वज़न कितना है ?’ वह झूठ भी नाज़ के साथ कहेगी - ‘छः पाउंड।’ चन्दर कहेगा - ‘चल झूठी।‘ वह इतराते हुए कहेगी - ‘विश्वास नहीं होता तो सिस्टर से पूछ लो।’

उस वक़्त वह ऐसे ही मधुर, मृदुल सपनों में खोई थी। जब उसके बचने की उम्मीद दिखाई न दी, तब मैने पूछा - ‘तुम्हारे घर का फ़ोन दे सकोगी?’

‘हाँ! ’ तुम चन्दर को फ़ोन करोगी सिस्टर ?’

मैंने दिल थामकर कहा - ‘हाँ, फ़ोन करके उसे आने के लिए कहती हूँ !’

वह खिल उठी। उससे फ़ोन नम्बर पूछकर मैं बाहर चली आई। लौटकर देखा तो उसका बेजान शरीर पड़ा था।

मेरी आँखों में आँसू भर आए। कुछ पल पहले जो बतियाती थी, वह थी कहाँ ? मैंने उसके हल्दी समान पीले चेहरे की तरफ़ देखा। उसके बेजान होठों पर अब भी मुस्कान थिरक रही थी, जैसे वह लुभावनी मुस्कराहट कह रही हो - ‘मैं अभी तक क़ायम हूँ, मैं ममता हूँ, मुझे कोई नहीं मार सकता! मैं युगों से यूं ही खेलती रही हूँ, मेरे अमर होने के अवसर को कोई नहीं छीन सकता!’

मैंने सोचा - सच है ! निष्काम प्रेम सिर्फ़ माँ ही करती है, बच्चे को प्यार करते हुए फ़क़त माँ ही अपनी हस्ती, अपना वजूद भुला सकती है।

मैंने चारों तरफ़ नज़र फिराई। वह इस कमरे में जो फूल लेकर आई थी, उनकी पंखुड़ियाँ ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं। मैंने उन मुरझाए फूलों की पंखुड़ियाँ समेटीं और उसकी नन्ही बेटी के नन्हें हाथों में दी और उसकी पेशानी चूमते हुए कहा - ‘तुम्हारी माँ को हद से ज़्यादा तकलीफ़ होने के बावजूद भी रोने में शर्म आती थी। उसे मुस्कराना बेहद अच्छा लगता था। तुम उसकी अमर निशानी हो, उम्र भर मुस्कराती रहना!’

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