शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

पुस्तक समीक्षा - अनुभूति और अनुभव की अभिव्यक्ति : सूरज के बीज

पुस्तक समीक्षा अनंत अलोक

अनुभूति और अनुभव की अभिव्यक्ति

स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के मायाजाल में उलझा आज का लगभग हर रचनाकार मुक्त होने को छटपटा तो रहा है लेकिन मुक्त नहीं हो पा रहा है |जिस किसी ने भी एकबार अपनी टांग इस मायाजाल में डाल दी वह इसमें उलझता ही चला गया | साहित्य के लिए ये अच्छा है या बुरा ये एक विचारणीय विषय है लेकिन जाल में उलझने से दायरा तो सिमित हो ही जायेगा न ! बावजूद इसके हर कोई इसमें टांग फ़साने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा है| ऐसे विमर्शों की हवा निकलने के बाद स्वभाविक है की रचनाकार का क्या होगा |

किसी भी काल का रचनाकार उस काल के स्वतंत्र प्रभाव से प्रस्फुटित अनुभूति को अभिव्यक्ति देकर अपनी रचनाधर्मिता का परिचय दे सकता है और यही समकालीनता भी है | रविन्द्रनाथ ठाकुर ने भी स्त्री , दलित और शोषितों पर अपनी लेखनी चलाई लेकिन किसी मायाजाल से बाहर रहकर ,क्योंकि वक्त की कतरनी के आगे न तो कोई मायाजाल ही अधिक दिनों तक टिक पाता है और न ही ऐसा रचनाकार | नदी के प्रवाह के साथ चलना, चलना नही बह जाना होता है | स्वाभाविक है कि लोग बहने वाले के साथ बहते नहीं है बल्कि चलने वाले के साथ चलते हैं | लेकिन सब बहते भी नहीं है ,कुछ ऐसे भी होते हैं जो चलते हैं जो अपना रास्ता खुद बनाते हैं , जो हर बंधन से मुक्त होते हैं | ऐसी ही एक रचनाकार हैं पूनम शुक्ला ,जिन्होंने अपनी अनुभूति को अभिव्यक्ति देकर न केवल रचनाधर्मिता का परिचय दिया है बल्कि समकालीनता से भी साक्षात्कार करवाया है | कवयित्री कभी समुद्र की लहरों से प्रश्न करती है, कभी बचपन में खो जाती है तो कभी गरीबी , नशा और शिक्षा जैसे मुदों पर गंभीर चिंतन करती है | अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘सूरज के बीज’ में कवयित्री संवेदनाओं की उर्वरता खोती सामाजिक धरा पर अनुभूति का हल चला कर विश्वास एवं प्रेम रूपी सूरज बीज बोती है | देखिये ‘’रहने दो लोगों को ठूंठ /उन्हें पतझड़ में ही /लगाने दो कृतिम पुष्प / अपने में ले आओ वसंत / विश्वास प्यार का वसंत |’’ तीन खण्डों में विभाजित इस काव्य संग्रह के प्रथम खंड ‘पतझड़ आ गया है ‘ में कवयित्री चिंता और चिन्तन करती है | कवयित्री देश के भविष्य के प्रति चिंतित है क्योंकि जो देश का भविष्य है वो बचपन भूख, अज्ञानता और दरिद्रता में जकड़ा हुआ है | जो घर पर पिता से बईमानी और निकम्मेपन की तालीम ले रहा है एक बानगी देखिये ‘’ क्या है इस देश का भविष्य / जब बचपन ही है भूखा ,नंगा और झूठा /जब पड़ गए हैं निशान बाप की बेईमानी के / निकम्मेपन के | ‘’ शिक्षा के बदलते स्वरूप और सर्वांगीण विकास के स्थान पर शिक्षा को केवल जानकारी तक सिमित कर देने वाले शिक्षा ढांचे से व्यथित कवयित्री पुकार उठती है “ रट रहा है कल टेस्ट है / ये लेसन पढ़ना वेस्ट है / ये चाट जाऊं बेस्ट है / इम्पोर्टेन्ट कट एंड पेस्ट है |”

जब चारों और बेईमानी का बोलबाला हो, सब ओर चोर ही चोर नजर आयें तो इक्का दुक्का ईमानदार अल्पसंख्यक हो जाता है और खुद को ही असहाय महसूस करता है ऐसे में वो भी उनसे हाथ मिला ले तो आश्चर्य कैसा | ऐसे में व्यंग्य करती हुई कवयित्री कहती है “क्यों है रे तू / इतना सच्चा /इतना भोला मेरे मन / कुछ तो सीख /इस सभ्य समाज से कुछ तो सीख | “ अन्ना के बहाने पूनम शुक्ला ने एक सुंदर देशभक्ति गीत बुना है तथा क्रांति और परिवर्तन का नारा बुलंद किया है , बोल देखिये ; “ बस रुदन है पवन में / डूबी व्यवस्था अटल में / क्रान्ति फिर से चाहिए / आज अपने वतन में |” निराशा में आशा की किरण बिखेरती कवयित्री कहती है “ये आंसू नहीं खजाना है /खजाना है नई आशाओं का / ये विनम्रता है जो पिघलती है /देगी यही नई गंध / इस धरा को |” काव्य संग्रह की उत्कृष्ट कविता ‘हो रहा समुद्र मंथन ‘ में कवयित्री ने नो प्रतीक और बिम्ब गढ़े है उससे मन स्वतः ही कह उठता है भई वाह ! आप भी देखिये “ पहाड़ो के चारों तरफ/ बल खाती सड़कें / लगती हैं ऐसी / की लपेट रखा है वासुकी सर्प ने मंदराचल को / और हो रहा है समुद्र मंथन |” ये अनुभूति का ही कमाल हो सकता है किसी साधना या शब्द क्रीडा से शायद ही ऐसा सजीव चित्र प्रस्तुत किया जा सके | ख़ुशी हासिल करने के लिए कोई न कोई कीमत तो चुकानी पड़ती है , इस बात को कवयित्री ने शायराना अंदाज में कुछ यूँ कहा है “ये रौशनी ये फिजायें यूँ ही नहीं मिलती / हमे कभी गम को कभी तम को मानना पड़ा |” छंदमुक्त और मुक्तछंद काव्य के समुद्र में उतर जाएँ तो कहीं कहीं अनुप्रास अलंकार की छटा भी बिखरी मिलती है जो कवयित्री के गंभीर चिन्तन के साथ साथ साहित्य के समग्र एवं सतत अध्ययन का साक्षात प्रमाण प्रस्तुतु करती है | कुल मिला कर कविता संग्रह आधुनिक काव्य जगत में हस्तक्षेप करता नजर आता है | कवयित्री को अनंत की अनंत मंगल कामनाएं एवं बधाई |

काव्य संग्रह : सूरज के बीज

कवयित्री : पूनम शुक्ला

प्रकाशक : अनुभव प्रकाशन

गाजियाबाद ,दिल्ली , देहरादून

मूल्य : 150 रूपये

समीक्षक : अनंत अलोक

‘साहित्यालोक ‘ ददाहू

सिरमौर हिमाचल प्रदेश

173022

mob : 09418740772

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