सोमवार, 26 अगस्त 2013

ललिता भाटिया की लघुकथा

स्नेह बंधन 

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नेहा के पति को जब से व्यापार में घाटा  हुआ हे तब घर का माहौल तनाव से भरा हे । नेहा समझ नहीं पा रही थी कि पति की मदद कैसे करें । एक दिन टी वी पर एक सीरियल देखते हुए नेहा को आइडिया सूझा । वो भी इस बार राखी पर भाई से पापा के मकान का आधा हिस्सा मांग लेगी । अब तो वो कानूनन पापा की आधी जायदाद की हकदार हे । ये ख्याल आते ही उस का मन हल्का हो गया । अब उन्हें कोई तकलीफ नहीं रहेगी । वो राखी से एक दिन पहले ही भाई के घर चली गई । रात के खाने के बाद वो यही सोचती रही कि सुबह राखी बंधने के बाद वो किन शब्दों में भाई भाभी से अपने दिल की बात कहेगी । तनाव से दिमाग की नसें मानो फटने को हो रही थी । रात पता नहीं कब नींद आई पर जब सुबह आँख खुली तो नेहा ने खुद को हस्पताल के बिस्तर पर पाया । 

भाई मैं यहाँ कैसे ,

कुछ नहीं अब तुम बिलकुल ठीक हो । बाद में नेहा को पता चला उस रात उसे दिल का दौरा पड़ा था । एक हफ्ते बाद वो डिस्चार्ज हो कर घर आई । घर आ कर पता चला कि  भाई ने उस का इलाज करवाने के लिए घर का आधा हिस्सा बेच दिया हे । वो खली हाथ घर से गई थी ओर लोटी तो हाथ चाहे खाली थे पर मन भाई के स्नेह्बंधन से परिपूर्ण हो गया । 

Lalita Bhatia Rohtak

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी3:33 pm

    बहुत अच्छी रचना , बधाई

    -विकास सोनी

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