सोमवार, 26 अगस्त 2013

दिलीप लोकरे की लघुकथा - कर्फ्यू

कर्फ्यू
स्कूल से जैसे-तैसे घर आया वह बच्चा बहुत डरा हुआ था । स्वाभाविक भी था ।
सुबह जब वह स्कूल के लिए निकला था तब सब कुछ सामान्य था।
मोर्निग-वाक,सब्जी, दूध वाले और स्कूल जाते बच्चे रोज की ही तरह निकले
थे। बाद में हालात बिगड़े और कर्फ्यू की घोषणा हो गयी।
घर पर उसने पिताजी से पूछा " पापा रास्ते पर इतनी पुलिस क्यों खडी है?"
"कर्फ्यू लगा है बेटा" पापा ने जवाब दिया।
" कर्फ्यू क्या होता है ? क्यों लगाते है ?" बच्चे ने स्वाभाविक जिज्ञासा से पूछा।
"बेटा जब लोग खतरनाक हो जाते हैं , बदमाशी करते हैं , किसी के काबू में
नहीं आते तो कर्फ्यू लगाना पड़ता है ताकि लोग घरों से बाहर नहीं आये" पापा
ने फिर जवाब दिया।
"लेकिन पापा वहां सड़क पर तो कुत्ते ,सांड ,सूअर सब घूम रहे थे उन्हें
किसी ने नहीं रोका। आदमी क्या जानवर से भी ज्यादा खतरनाक होता है
?"..........बच्चे ने और भी ज्यादा मासुमियत से पूछा |
और पापा............क्या कहते ...... निरुत्तर थे |

-दिलीप लोकरे
३६ -ई,सुदामा नगर ,इंदौर
diliplokreindore@gmail.com

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