सोमवार, 26 अगस्त 2013

शकुन्तला यादव का आलेख - हरितालिकाव्रत(तीज)

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सुहागिनों के अखण्ड सौभाग्य का रक्षक

—हरितालिकाव्रत(तीज)

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(श्रीमती शकुन्तला यादव)

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मध्यप्रदेश, पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और झारखण्ड आदि प्रांतों में भाद्रपद शुक्ल तृतीया को सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने अखण्ड सौभाग्य की रक्षा के लिए बडी श्रद्धा, विश्वास और लगन के साथ हरितालिकाव्रत(तीज) का उत्सव मनाती हैं. जिस त्याग-तपस्या और निष्ठा के साथ वे व्रत रखती हैं, वह बडा ही कठिन होता है. इसमें न तो वे फ़लाहार-सेवन करती हैं और न ही जल गृहण करतीं हैं.

व्रत के दूसरे दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात व्रतपारायण स्त्रियाँ सौभाग्य-द्रव्य एवं वायन छूकर ब्राह्मणॊं को दान देती है. उसके बाद ही जल पीकर पारण करती हैं. इस व्रत में मुख्यतः शिव-पार्वती तथा श्री गणेश की पूजा की जाती है, इस व्रत को सर्वप्रथम गिरिराजकिशोरी उमा ने किया था, जिसके फ़लस्वरुप उन्हें भगवान सदाशिव वर के रुप में प्राप्त हुए थे. इस दिन स्त्रियाँ वह कथा सुनती हैं,जिसमें पार्वतीजी के त्याग, संयम, धैर्य तथा एकनिष्ठ पातिव्रत-धर्म पर प्रकाश डाला गया है,जिससे सुनने वाली स्त्रियों का मनोबल ऊँचा उठता है.

कहते हैं , दक्षकन्या सती जब पिता के यज्ञ में अपने पति शिवजी का अपमान न सहकर योगाग्नि में दग्ध हो गयी थीं, तब वे मैना और हिमाचल की तपस्या के फ़लस्वरुप उनकी पुत्री के रुप में पार्वती के नाम से जन्मी थीं. इस नए जन्म में भी उनको पूर्व की स्मृतियाँ अक्षुण्य बनी रही थी और वे नित्य ही भगवान शिव के चरणॊं में भक्तिभाव से निमग्न रहती. जब वे वयस्क हो गयीं तब पिता की आज्ञा से शिवजी को अपने मनोकूल वर की प्राप्ति के लिए तपस्या करने लगे.

उन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर बडी कठोर साधनाएं कीं. जब उनकी तपस्या फ़लोन्मुख हुई, तब एक दिन देवर्षि नारद हिमवान के यहाँ पधारे. हिमवान ने अपना अहोभाग्य माना और उनकी बडी श्रद्धा के साथ आथित्य-सत्कार किया. कुशलक्षेम के पश्चात नारदजी ने कहा -“भगवान विष्णु आपकी कन्या का वरण करना चाहते हैं, उन्होंने मेरे द्वारा यह संदेश कहलवाया है. इस सम्बन्ध में आपका जो विचार हो उससे मुझे अवगत कराएं. नारदजी ने अपनी ओर से भी प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया. हिमवान राजी हो गए, उन्होंने स्वीकृति दे दी. देवर्षि नारद पार्वती के पास जाकर बोले-“ तुम्हें तुम्हारी कठोर तपस्या का फ़ल मिल गया है. तुम्हारे पिता ने भगवान श्री विष्णु के साथ तुम्हारा विवाह पक्का कर दिया है”. इतना कहकर नारदजी अन्तर्ध्यान हो गए.

उनकी बात पर विचार करके पार्वती के मन में बडा कष्ट हुआ. और वे तत्काल मूर्छित होकर गिर पडीं. सखियों के उपचार से होश में आने पर उन्होंने शिव को वर के रुप में चुन लिए जाने का अपना मंतव्य कह सुनाया. इस बात को सुनकर सखियों ने कहा;-“तुम्हारे पिता तुम्हें लिवा जाने के लिए आते ही होंगे. जल्दी चलो, किसी दूसरे गहन वन में जाकर हम छुप जाएँ.” ऎसा ही हुआ. उस वन के एक पर्वतीय कन्दरा के भीतर पार्वतीजी शिवलिंग बनाकर उपासनापूर्वक उनकी अर्चना-पूजन आरम्भ की.

कठोर तपस्या से शिव का सिंहासन डोल उठा और वे पार्वतीजी के समक्ष प्रकट हुए और उन्होने उसे पत्नि के रुप में वरण करने का वचन देकर अन्तर्ध्यान हो गए. तत्पश्चात अपनी पुत्री का अन्वेशण करते हुए हिमवान भी वहाँ आ पहुँचे और सब बातें जानकर उन्होंने पार्वतीजी का विवाह भगवान शंकर से साथ कर दिया.

देवी पार्वतीजी ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के हस्त नक्षत्र में यह आराधना की थी, इसलिए इस तिथि को कुवारी कन्याएं अपने भावी वर की प्राप्ति की कामना से व्रत करती हैं. तथा सुहागन स्त्रियाँ अपने पति के दिर्घायु होने के लिए व्रत करती चली आ रही हैं. “आलिभिर्हरिता यस्मात तस्मात सा हरितालिका” अर्थात सखियों के द्वारा हरी गयीं- इस व्युत्पत्ति के अनुसार व्रत का नाम “हरितालिका” हुआ. इस व्रत के करने से नारी को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

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  1. आपने लिखा....हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए शनिवार 31/08/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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