गुरुवार, 1 अगस्त 2013

श्रद्धा थवाइत का संस्मरणात्मक आलेख - देव दरिन्दे

देव दरिन्दे

मंदिर में खचाखच भीड़ भरी थी. लोग अपने अपनों के साथ भगवान के दरबार में खड़े थे. कुछ लोग पुण्य की तलाश में आए थे, तो कुछ आनंद की तलाश में, तो कुछ अपनी आपाधापी भरी जिंदगी से दूर प्रकृति की गोद में, उसकी सुन्दरता में, अपनी अधीरता भूलने आए थे. ऐसे खुशनुमा वातावरण में लेकिन न जाने वह जलजला कहाँ से आ गया. उसे तो किसी ने भी नहीं बुलाया था. कोई चाहता भी नहीं था कि वो आए, पर क्या सचमुच? भगवान भी नहीं चाहते थे.

कहते हैं कि भगवान की मर्जी के बिना दुनिया का एक पत्ता भी नहीं हिलता पर यह तो जलजला था, अपनी सीमा में आई दुनिया की हर चीज हिलाता, बहाता, डुबाता, पटकता. इस से टकराती इमारतें ताश के पत्ते की तरह ढह रही थी. ढोर-ढांगर,इन्सान, सामान इस जलजले में सब सामान थे. जलजले में बिखरना,बहना,थमना, बचना,डूबना,दबना,चीख-पुकार, चहुं ओर पानी, बाहर भी और अंदर आँखों में भी, लोग डूब रहे थे, दिल तो डूबा ही जा रहा था.

जाने इसमें ईश्वर की मर्जी थी कि नहीं, यदि थी तो क्यों? मेरी बुद्धि कि सीमा तो बहुत कम है, ईश्वर की मर्जी का ओर-छोर भी मेरी समझ का नहीं. समझ में आ रहा था तो बस इतना कि यदि कोई इस जलजले से बचा तो यह एक चमत्कार है- ईश्वरीय चमत्कार.

आहा कितनी अच्छी सुबह है, एकदम ताजगी से भरी. अपनी हवा में आजादी की, अनुशासन की, उत्साह की सोंधी-सोंधी महक समेटे. अरे यह तो बच्चों की प्रभात फेरी की आवाज है. चलो देखते हैं. बच्चों की अनुशासित, उत्साहित कतारें हाथों में झंडे लिए, महापुरुषों की, गणतंत्र दिवस की जयजयकार करते हुए सड़क पर आगे बढ़ते आ रही है. सड़क के दोनों ओर इमारतें, इमारतों से झांकते, अपने बचपन को याद करते, बच्चों के उत्साह से अपने सुप्त उत्साह को जगाते प्रभातफेरी देखते लोग. अचानक इमारतों से झांकते लोग सड़क पर बच्चों पर गिर पड़े अपनी पूरी इमारतों के साथ. इमारतों की छत, दीवारें, घर के सामान,देशी-विदेशी, सस्ते-महंगे,सब धूल में मिलने लगे.जयकारे, नारे, बातचीत का शोर, दूरदर्शन पर गणतंत्र दिवस परेड का शोर, देशभक्ति गानों का शोर सब एक ही पल में बचने की कोशिशों, चीख-पुकार,इमारतों के ढहने ,टूटने-गिरने ,धमाकों के शोर से होता हुआ कराहटों, सिसकियों से गुजरता सन्नाटे में बदल गया है. शोर नितांत सन्नाटे से अच्छा होता है. कोई शोर कोई उत्साह नहीं, चहुं ओर विनाश की तांडव-लीला, जमीं दरकी हुई, मन दरके हुए, दरकी जमीं मकानों इंसानों को लील गई है.

जमीन को देख समंदर भी उफनता बढ़ता आ रहा है. सोच रहा है, मैं ही पीछे क्यों रहूँ, बादल, जमीन सभी तो तांडव कर रहे हैं, जिंदगियां लील रहे है, मैं भी इन्सान के कर्मों का बदला लूँ. मानव प्रकृति का उपयोग करता है, दुरूपयोग करता है. प्रकृति सहनशील है, सहती रहती है पर जब प्रकृति के गुस्से का ज्वालामुखी फटता है तब उसके शब्दकोष से क्षमा शब्द का विलोप हो जाता है.जो सामने आ जाये उसे प्रकृति का कोपभाजन बनना पड़ता है. कभी सीधे खुद सजा पा कर कभी उसके अपनों की सजा के माध्यम से. समय बदलता रहता है, कभी प्रकृति के पक्ष में कभी मानव के पक्ष में. आज वह क्रोधित समंदर के पक्ष में है.

आज वह बढ़ा चला आ रहा है.अपनी लहरों को पटकते, फेन उफनाते, रास्ते की सभी बाधाओं को मटियामेट करते, जीवित अजीवित सभी को अपने में समेटते, देखो बढ़ा चला आ रहा है. यह जाने रुकेगा भी या निगले इंसानों मकानों समेत पूरी जमीन ही निगल लेगा, हे भगवान क्या एक दिन इसीतरह असमान निगल लेगा इस जमीन निगले समंदर को.

देखो वह रेलगाड़ी समंदर की लहरों की विपरीत दिशा में दौड़ी जा रही है जैसे अपनी सवारियों को समंदर से बचाने कोशिश कर रही हो. धडाक...ये रेलगाड़ी तो समंदर की ओर आती दूसरी रेलगाड़ी से टकरा गई..... मानो समंदर ने ही भेजा हो पहली की बचने की कोशिश....हिमाकत का जवाब देने को. अब वहां भी वही टकराहट, गढ़गढ़ाहट, चीख-पुकार, लाल-लाल खून, लाल कपडे, लाशों के ढेर, कराहटें, सिसकियाँ, बादल से आए जलजले, भूकंप के तांडव, समंदर की सुनामी के सामान. ये तो हर जगह सामान है भले ही कहीं पानी में डूबी है....भीगी है... रेत में दबी है.... चट्टानों के नीचे से उठती है..... या उठती है जमींदोज मकानों के नीचे से.... पर है दर्द की.... जान बचने की.... अपनों को खोने की,... रोने की ....कराहटें...... सिसकियाँ.....

इन समानताओं के साथ और क्या सामान है इन सब में पता है.... देखो .. बादल फटने के जलजले, समंदर की सुनामी, भूकंप के तांडव के बीच इनसे बचे कुछ लोग घूम रहे हैं, खुशकिस्मत हैं ये.. जो बच गए है.... क्या कहा ... सोच रहे हो की ये देवदूत है जो अधमरों को, बची-खुची सांसे दम लगा कर लेते लोगों को बचा रहे हैं. ईश्वर के भेजे हुए देवदूत. हा ऐसे देवदूत भी घूम रहे हैं... पर ऐसा सोचने वाले तुम ... जरा ध्यान से देखो....वे क्या कर रहे हैं? हर मलबे को ध्यान से देखते, मुर्दों के जिस्म टटोलते, अधमरों की बाकी बची सांसों को भी खींचते. वे अपना खजाना भर रहे हैं और देखो ये हर जगह है, जलजले के मलबे में भी...भूकंप के तांडव में भी ...सुनामी के सुनसान में भी....ट्रेनों के टुकड़ों में भी... हर जगह ...

हे इश्वर...क्या अब भी तुम तक कोई आह नहीं पहुंच पा रही है. मारे भी ईश्वर, बचाए भी ईश्वर. पर नाम होता है बचाने वाले ईश्वर का. इतना भरोसा है लोगो को तुम पर. लेकिन क्यों ईश्वर? क्यों तुमने ऐसा किया. इतने सारे लोगों ने ऐसे क्या पाप किये थे कि उन्हें अलग अलग जगह से एक साथ बुलाकर धरती का बोझ कम कर दिया या ये सारे लोग तुम्हे बहुत प्यारे लगने लगे थे, जो इन्हें अपने पास बुला लिया, क्यों ईश्वर, क्यों? ईश्वर से कोई जवाब नहीं आ रहा है, वो चुप है. जाने क्यों?

देव तांडव कर सब-कुछ विनष्ट कर देते हैं फिर देवदूतों को भेज बचा-खुचा समेटने की कोशिश करते हैं. यही नहीं फिर देवदूतों के काम में बाधा ड़ाल कर उनकी परीक्षा भी लेते रहते हैं. इधर दरिन्दे दया मया के बंधन से दूर मोह -माया के भ्रम में जकडे मानवता को शर्मसार कलंकित करते सब कुछ लुटा चुके लोगों को लुटते चले आ रहे हैं.

देखो.. अरे उधर देखो..इन दरिंदों में कुछ एक वर्दीधारी भी नजर आ रहे हैं जिनका कर्त्तव्य तो देवदूतों का है पर वो पाला बदल दरिंदों का काम करते घूम रहे हैं. अरे नहीं इन्होंने पाला नहीं बदला है, ये कभी देवदूतों के पाले में दिखते हैं कभी दरिंदों के. अब तो ईश्वर के ह्रदय में कुछ हलचल सी हुई लगता है. नहीं. .. हाँ ... अब लगता है की ईश्वर को इन दरिंदों के कर्मो से कुछ वितृष्णा सी हुई है. देखो...देखो... उधर हृदयहीन दरिन्दे आगे बढ़ते आ रहे हैं. ये वर्दीधारी दरिन्दे उस संभ्रांत महिला की ओर बढे जा रहे हैं जिसके चहरे पर ईश्वर ने नजर टिकाई है. जो खून से लथपथ जरुर है पर है होश में. ये क्या... दरिंदों ने हाथ आगे बढ़ा उसका मंगल सूत्र तोड़ लिया और आगे बढ़ गए... कुछ भी नहीं हुआ....

नहीं कुछ तो हुआ है. महिला के चेहरे पर दर्द के बावजूद कठोरता और संकल्प की दृढ़ता दिख रही है. उसने वर्दी पर लगी नामपट्टी का नाम और कंधे पर पद का चिन्ह याद कर लिया है. तो...इससे क्या? क्या होगा इससे. लेकिन जब ईश्वर इतनी बड़ी विनाशलीला कर सकते हैं तो ईश्वर छोटी लीलाएं भी करते हैं. वह संभ्रांत महिला प्रदेश के पुलिस महानिरीक्षक की पत्नीश्री हैं. इसीलिए ईश्वर ने इन महिला के पास भेज उन दरिंदों को मानव देवदूतों से सजा दिला दी. मानव देवदूत न बन सके तो न बने कम से कम दरिन्दे तो न बने.

from- Shraddha

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