रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - और गंगा बहती रही

सिन्धी कहानी

और गंगा बहती रही

clip_image002मूल: सतीश रोहड़ा

अनुवाद: देवी नागरानी

राधा आख़िर पानी से बाहर निकल आई और घाट की तीसरी सीढ़ी पर बैठ गई। उसके बालों और कपड़ों से पानी बहता हुआ नीचे उतरती सीढ़ियों की धार में मिलता जा रहा था। राधा ने सामने देखा, सूरज की पहली किरणें गंगा के पानी में झिलमिला रही थीं, पर सूरज अभी पूरी तरह से ज़ाहिर नहीं हुआ था।

राधा सूरज की लाली की ओर देखते हुए अपने ख़यालों में खो गई। वह सुबह का उजाला होने के पहले घाट पर पहुँची थी और कुछ पल घाट की अंतिम सीढ़ी पर खड़े होने के पश्चात् वह नीचे पानी में उतर गई। उसका इरादा तो पानी में और आगे बढ़ने का था, पर जब पानी उसकी नाक तक पहुँचा तो वह रुक गई, चाहते हुए भी आगे न बढ़ पाई। उसने वहीं पर डुबकियाँ लेनी शुरू की और लगातार लेती रही, जैसे वह अंतिम डुबकी के साथ अन्दर ही समा जाए... बाहर न आए। पर जैसे ही उसकी सांस फूलने लगी, उसका सिर ख़ुद-ब-ख़ुद पानी से बाहर निकल आया। चंद घड़ियों के लिये वह गर्दन तक के पानी में खड़ी रही और फिर आहिस्ता-आहिस्ता घाट की तरफ़ बढ़ने लगी। घाट पर पहुँच कर वह बाहर निकल आई और घाट की दो सीढ़ियों को छोड़कर तीसरी पर बैठ गई। धीरे-धीरे अंधेरा कम हुआ जा रहा था और सामने सूरज के आगमन की तैयारियाँ नज़र आ रही थीं। राधा जहाँ बैठी थी वहीं बैठी रही। सामने गंगा की धार बह रही थी और साथ उसके बह रही थी राधा की ज़िन्दगी की गंगा, जिसका एक सिरा उसे स्कूल के साथ जुड़ा हुआ दिखाई दे रहा था।

राधा उस वक़्त दसवीं कक्षा में थी। बोर्ड की परीक्षा नज़दीक आ रही थी, इसलिये वह स्कूल टीचर के पास ही साइन्स और गणित की ट्यूशन लेने उसके घर जाती। कुछ दिनों के पश्चात् टीचर का एक दोस्त, जो किसी और स्कूल में पढ़ाता था, वहाँ आने लगा। वह विज्ञान और गणित के सिवाय और विषयों में उसकी मदद करता था। कुछ दिनों के बाद - ‘तुझे सभी विषयों का नोट्स बनाकर देंगे, तुम्हें परीक्षा में आने वाले सवालों के जवाब पहले ही लिखवा देंगे। तुम्हें इतने अच्छे नम्बर मिलेंगे कि तुम ‘मेरिट लिस्ट’ में आ पाओगी।’

बार-बार ऐसे वाक्य सुनने के बाद राधा के लिये और सोचने को कुछ नहीं रहा। फिर वही हुआ जो होना था। दोनों उस्तादों ने किये हुए वादों की क़ीमत राधा से वसूल करली।

राधा ने ट्यूशन पर जाना छोड़ दिया। माँ के पूछने पर कहा - ‘अभी परीक्षा नज़दीक आ ही है, मैं ख़ुद पढूँगी।’ राधा बोर्ड की परीक्षा तो दे आई, पर महीना पूरा होने के पश्चात् माँ को इस बात के नतीजे की भनक पड़ी। राधा की माँ उसे पीछे वाले एक कमरे में ले गई और दरवाज़ा अन्दर से बंद किया, जिसे देखकर राधा के दिल की धड़कन धीमी होने लगी। माँ ने उसे बालों से पकड़ते हुए ज़ोर दार चांटा मारा कि राधा के अन्दर का राज़ बाहर उलटी की तरह आ गया। माँ ने फिर दो-चार चांटे और लातें उसे यूँ मारी कि राधा बस चुपचाप सहती रही और रोती रही।

अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ जाने की कहकर, राधा की माँ राधा को लेकर बहुत दूर अपनी एक सहेली के पास गई। दस पंद्रह दिन में राधा के शरीर पर लगे पाप के निशान मिटवा दिए और लौट आई। अब राधा घर का सब काम करती रहती है, खाती है, सोती है, बतियाती है, पर उसकी चंचलता, आँखों की चमक और चेहरे की रौनक गायब है। गंगा बहती जा रही है।

कुछ अरसे के बाद राधा की माँ का एक बहुत दूर का भांजा गोपाल, उसके घर आकर ठहरा। गोपाल पास के ही शहर में रहता है। उसका अपनी पत्नी के साथ झगड़ा हुआ है, जो झगड़ा करने अपने मैके चली गई है। गोपाल अपने दिल का हाला राधा की माँ के साथ करता है और उसके तलाक लेने की भी बात बताता है। इस तरह गोपाल हमदर्दी बटोरकर अक्सर उनके यहाँ आकर रहता और तलाक की बात फिर-फिर दोहराता। जाने कैसे राधा की माँ को गोपाल को पत्नी से तलाक मिलना अपनी बेटी राधा की मुक्ति के साथ जुड़ा हुआ लगा। इसलिये गोपाल और राधा के बीच भी नज़दीकियाँ बढ़ने लगी। इस बात को राधा की माँ नज़र अंदाज़ करती रही।

‘मैं उसे तलाक देने के बाद तुमसे शादी करना चाहता हूँ, अपना घर-परिवार होगा, मेरे पास किसी चीज़ की कमी नहीं है’ ऐसी बातें ‘नोट्स और अच्छे नंबरों’ से ज़्यादा दिलकश थीं फिर वही हुआ जो होना था। गोपाल का आना कम होकर बंद हो गया और राधा की माँ चौकन्नी हुई। दो-चार तमाचे मारे और राधा का अंदर खाली हो गया, भीतर तो कुछ नहीं रहा पर पेट! राधा की माँ ने सोचा शायद गोपाल का ज़मीर अब भी ज़िन्दा हो और वह राधा से शादी करने को तैयार हो जाए, इसलिये वह तक़लीफ़ लेकर उसके घर गई। पहले तो वह हज़ार आनाकानियाँ करता रहा, फिर बेशर्म होकर बोला - ‘मौसी तुमने तो दुनिया देखी है। झूठी थाली लेकर कौन डाइनिंग टेबल पर रखेगा ?’ राधा की माँ बिना कुछ कहे लौट आई। फिर किसी रिश्तेदार के पास जाने के बहाने बेटी को उसी सहेली के पास ले गई। इस बार राधा बहुत रोई, चीखी-चिल्लाई - ‘मुझे बच्चा चाहिए, मैं उसे पालूँगी।’ पर सब व्यर्थ ! माँ की मार ने फिर से राधा के शरीर की स्लेट से वो निशान मिटा दिए और वह साफ़ सुथरी होकर घर पहुँची।

अब राधा का दुनिया से मोह निकल गया। माँ के मना करने के बावजूद भी वह सफ़ेद कपड़े पहनने लगी, बाहों में लोहे के कड़े और गले में रुद्राक्ष की माला डाल ली। अब उसका ज़्यादा समय पड़ोस की एक दरबार में सेवा करते हुए गुज़ारती।

दरबार में वक़्त-वक़्त पर साधू सन्त आते रहते, सत्संग करते रहते, उन महापुरुषों का उपदेश सुनते-सुनते राधा भी सत्संग करना सीख गई। उसका स्वर वैसे भी बहुत सुरीला था, सो उसके गाए भजन सभी के दिलों को छू लेते थे। सन्तों की ग़ैर हाज़िरी में वह सत्संग करती और इस तरह वह सत्संगियों की चहेती बन गई जो अब उसे ‘सखी राधा’ कहकर पुकारतीं।

इस दरबार का मुख्य आश्रम हरिद्वार में है और वरिष्ठ स्वामी वहीं रहते हैं। दिवाली के मौक़े पर हरिद्वार में काफ़ी धूम-धाम होती है, हिन्दुस्तान में जहाँ कहीं भी उनकी शाखाएँ हैं, इस मौक़े पर सभी स्वामी का दर्शन करने आते। इस बार भी वही हुआ, सत्संगियों ने हरिद्वार जाने का प्रबन्ध किया और राधा के जाने का सवाल ही नहीं उठता था क्योंकि एक वही तो थी जो सब को जाने के लिए प्रोत्साहित व बंदोबस्त करती रही।

हरिद्वार में प्रधानाचार्यों को भी यह संदेश मिला। आखिर मुक़र्रर दिन पर सभी सत्संगी हरिद्वार आश्रम पहुँचे। स्टेशन से आश्रम तक और वहाँ रहने, खाने-पीने का प्रबंध बहुत ही अच्छा किया गया था। आश्रम में उपदेश, ध्यान, अभ्यास, स्वामी जी का प्रवचन सभी प्रेम से सुनते और मग्न रहते।

पाँच दिन गुज़र गए इस कार्यक्रम को और आज सखी राधा ने दो दिलसोज़ भजन गाए जो कृष्ण के वियोग में राधा की रूह की बेचैनी और तड़प का बयान कर रहे थे। लगा कि भजन में राधाकृष्ण की व्याकुलता जैसे सखी राधा के रूह की बेचैनी थी। सत्संग पूरा होने के पश्चात् एक दरबार के सेवक ने राधा को यह संदेश दिया कि आपको रात भोजन के बाद स्वामी महाराज के दर्शन के लिये जाना है, यह स्वामी जी की इच्छा है ! संदेश सुनकर सखी राधा के मन में हलचल मच गई, तरह-तरह के सवाल दिल में उठने लगे। स्वामी महाराज ने उसे क्यों बुलाया है ? यह बात उसे समझ में नहीं आई ! भोजन के उपरांत भी उसके मन में काफ़ी हलचल थी। वह अपने कमरे में गई। राधा के बाल, छलेदार है और बहुत खूबसूरत भी। उनकी सुंदरता छुपाने के लिये वह सिर पर एक रेशमी स्कार्फ बाँध लिया करती थी। पता नहीं कि स्कार्फ के कारण उसके बालों की सुंदरता कम होती है या उसके चेहरे का आकर्षण और बढ़ता है। आज सुबह से, भजन गाते समय तक भी वह स्कार्फ सर पर बांधे हुए थी। कमरे में आते ही उसने उसे खोला और ब्रश से छलेदार बालों को सहलाती रही और सँवारती रही। ऐसा उसने क्यों किया, इसका पता ख़ुद उसे नहीं है !

तब तक सब सत्संगी रसोई कर चुके थे। दरबार के बीच वाला खाली मैदान था। दरबार के एकदम पीछे स्वामी महाराज का घर है। जिसे सब ‘स्वामी मंदिर’ कहते हैं। वहीं महाराज जी अकेले रहते हैं। दरबार के बाजू से मुड़कर स्वामी मंदिर में जाया जा सकता है। वैसे दरबार में से भी स्वामी मंदिर के लिये रास्ता है, पर वह सिर्फ़ स्वामी जी इस्तेमाल करते हैं और वह भी कभी-कभी। राधा को इस रास्ते का पता था, इसलिये उसे वहाँ पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मंदिर का दरवाज़ा खुला पड़ा था, राधा अन्दर पहुँची जहाँ स्वामी महाराज तख़्त पर पलथी मारकर, आँखें बंद किये हुए विराजमान थे। इसके बावजूद राधा के अंदर पहुँचते ही उन्होंने कहा - ‘आओ देवी, बैठो।’

राधा ने स्वामी महाराज जी के सामने ज़मीन पर बैठने का रुख़ किया तो स्वामी महाराज बोले - ‘नहीं देवी, ज़मीन पर नहीं, ऊपर कुर्सी पर बैठो’ और राधा तख़्ते के सामने पड़ी गद्देदार कुर्सी पर बैठ गई। राधा की गर्दन झुकी हुई थी पर बावजूद इसके उसने यह देखा कि स्वामी जी महाराज के हाथ में रुद्राक्ष की माला थी जो वे आहिस्ता-आहिस्ता फिरा रहे थे। वैसे तो उनकी आँखें बंद थीं, पर लगता था जैसे वे बंद आँखों से सब देख रहे थे। कुछ समय के बाद ‘ओम शांति’ कहकर उन्होंने आँखें खोली और हाथ में थामी माला को पास में रखी एक छोटी-सी रंगीन रेशमी थैली में डाला। कुछ पल वे राधा को निहारते रहे और फिर आवाज़ दी - ‘देवी !’ राधा ने सर उठाकर स्वामीजी की तरफ़ देखा, स्वामीजी भी निरंतर राधा की ओर देखते रहे, फिर बोले - ‘देवी, तुम्हारे ललाट में दिव्य ज्योति समाई हुई है। तुम्हारी आत्मा परमात्मा से मिलकर एक होने को व्याकुल है, पर इसके बीच में रुकावट है तुम्हारा मन।’ राधा ने सवाली आँखों से महाराज की तरफ़ देखा, जिसकी उत्सुकता देखते स्वामी महाराज ने कहा - ‘देवी, तुम्हारा मन अभी चंचल है, जब तक वह चंचल रहेगा, तब तक आत्मा-परमात्मा का मिलन न हो पाएगा।’

राधा सर झुकाकर सुनती रही, फिर धीमे स्वर में बोली - ‘स्वामी मन की चंचलता कैसे दूर होगी ?’ स्वामी ने मुस्कराकर कहा - ‘देवी, मन की चंचलता का कारण वासनाएँ होती हैं, जो वासनाएँ तृप्त नहीं होतीं, वो अचेतन मन में घर कर लेती हैं। उसी कारण मन चंचल होता है। इसलिये सबसे पहले जरूरी है अतृप्त वासनाओं को तृप्त करना।’

फिर पता नहीं पड़ा किसकी अतृप्त वासना तृप्त हुई, स्वामी जी की या राधा की !

सुबह के अंधेरे में राधा दरबार से बाहर निकलकर घाट की तरफ चलने लगी। मन में सोचती रही कि आज गंगा मैया में आख़िरी डुबकी लगाकर हमेशा के लिए खुद को अर्पण कर देगी। घाट पर पहुँचकर राधा ने पानी में उतरना शुरू किया, यह सोचते हुए कि वह तब तक पानी में उतरती जाएगी, जब तक उसका समस्त वजूद पानी में लीन नहीं हो जाता। लेकिन जब पानी उसकी नाक तक पहुँचा तो खुद-ब-खुद उसके पाँव रुक गए। अब उसने सोचा कि वह आखिरी डुबकी लगाकर पानी में ही बैठ जाएगी, पर ऐसा भी नहीं हो सका। जैसे ही पानी उसके मुँह और नाक में भरने लगा, उसकी सांस उखड़ने लगी और उसका सिर पानी के ऊपर आ गया। शायद गंगा मैया उसे इस तरह क़बूल करने के लिये तैयार न थी। वह मुड़ी और घाट की ओर चलने लगी। वहाँ पहुँचकर बाहर निकल आई, और घाट की सीढ़ी पर बैठ गई। राधा के कपड़ों और बालों से पानी बहकर, सीढ़ियों से उतरकर गंगा की धारा में मिलता रहा।

अब काफ़ी उजली सुबह हुई थी, घाट पर चाय की दुकान खुल गई है और होटल से आती हुई गीत की आवाज़ राधा के कानों तक पहुँची -

राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते.....

और राधा सोचने लगी ‘मेरी जीवन गंगा ? वह तो बस बहती रहती है, वह किसके पाप धोती आ रही है, किसी और के या उसके? और सामने गंगा चुपचाप बहती रही।

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