शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

कामिनी कामायनी का आलेख - सुरों की मल्लिका या मल्लिका ए तरन्नुम

॥ सुरों की मल्लिका या मल्लिका ए तरन्नुम ,।।

इस धरती ने अपनी मिट्टी से एक से एक नायाब हीरे गढ़े हैं जो समय काल के चक्र को पार करते हुए बरसों बरस अपना सिक्का चलाते हुए लोगों के दिल और दिमाग पर राज किया है ,और भौतिक शरीर त्याग करने के बाद भी अपनी सुगंध फिज़ाओं में बिखेरे हर सांस के साथ रूह को एक ताजगी प्रदान करता है। ऐसी ही एक अदद फनकारा , बेमिसाल गायिका नूरजहां अखंड भारत के संगीतज्ञों के घराने में 21 सितंबर 1926 को दस भाई बहनों वाले घर में पैदा हुई जो बचपन में अल्लावसाइ या नूरी के नाम से पुकारी गई थी ।

उस अभाव से भरे मिट्टी और कच्ची पक्की ईटों वाले घर में अल्ला ने दो चीजें उसे छप्पर फाड़ कर दी थी ,एक बेपनाह हुस्न , और दूसरी अत्यंत सुरीली आवाज। मदादअली और फतह अली की आखिरी बेटी किसी बात पर जिद करके रोती तो भी एक दिलकश आवाज में रोती। माँ ने पाँच छ बरस की अवस्था में ही उस की अनुपम कला को परख कर उस्ताद के पास रियाज करने के लिए भेजना शुरू कर दिया था। नौ बरस की उम्र में उस समय के प्रख्यात संगीतज्ञ गुलाम अहमद चिश्ती साहब का ध्यान उस बेहतरीन आवाज की ओर आकर्षित हुआ ,जिन्होंने उन्हें बाद में लाहौर रंगमंच से जोड़ा। उनकी दो और बड़ी बहने भी गाती थीं बचपन से उनको सुर की शिक्षा मिली थी ,एहशान मंद इतनी कि अपने मुर्शिद को उन्होंने ताउम्र याद रखा और इज्जत बक्शी। अक सुंदर और बेहतरीन भविष्य के लिए वे अपने परिजनों के साथ कलकत्ता चली आई थीं जो उस समय ,कला, कलाकारों की जन्नत हुआ करती थी

यहाँ उन्हें हाथों हाथ लिया गया और उन्हें ख्याति मिलनी शुरू हो गई। रंग मंच पर उन्हें बेबी नूरजहां के नाम से पुकारा गया। 1942 में प्राण के साथ बतौर नायिका उनकी फिल्म खानदान काफी हिट हुई थी। इस के बाद वे बंबई चली आई थी और अपने से काफी बड़े डाइरेक्टर शौकत रिजवी के साथ बाद में शादी भी कर लिया। 1945 में बड़ी माँ फिल्म में उन्होंने बेबी लता मंगेशकर और बेबी आशा मंगेशकर के साथ काम किया था। फुरसत के लम्हों में वह लताजी से ,जो की उस वक्त गुमनाम सी थी ,गाने सुनती और लोगों से कहती “देखना एक दिन यह लड़की बहुत ही प्रसिद्ध गायिका बनेगी’। उन दिनों उन्हें काफी शोहरत हासिल हो गई थी , हर जगह अभिनय की ,उनके गाने की चर्चा होती रहती। अखंड भारत में उन्होंने तकरीबन 127 गाने गाए,69 सावाक और 12 मूक फिल्मों में काम किया।

1947 में पाकिस्तान बनने के बाद वे अपने शौहर के साथ लाहौर चली गई। वहाँ उन्हें ‘शौरी स्टुडियो दे दिया गया। बतौर पहली महिला डाइरेक्टर ,तीन वर्ष बाद पाकिस्तान में 1951 में चान वे’ फिल्म बनाई। कुछ ही अरसे बाद 1953-54 में रिजवी साहब से उनका तलाक हो गया था ,बच्चों से उन्हें इतना लगाव था कि अपने तीनों बच्चों ,दो बेटे और एक बेटी को उन्होंने अपने पास ही रखा। बाद में उन्होंने अपने से नौ साल छोटे उभरते हुए अभिनेता एजाज दुर्रानी से निकाह कर ली इस विवाह से उनकी तीन बेटियाँ हुई ,उन्हीं के दबाव में आकार 1960 उन्होंने अपना फलता फूलता 33 बरस का फिल्मी कैरियर छोड़कर सिर्फ गायन पर ध्यान केन्द्रित किया था। { बाद में यह विवाह भी नाकामयाब रहा। }

चूंकि उनको बचपन से गायकी की शिक्षा मिली थी ,इस लिए इस क्षेत्र में भी वे बेमिसाल कायम हुई। उस समय के महान संगीतज्ञ गुलाम मोहम्मद खान उन्हें चंद पैसे का लालच देकर रियाज करवाते थे उन पैसे का वो रेवड़ियां खरीद कर खा जाती थी। एक इंटरव्यू में बताया था उन्होंने कि’कुछ लोग कहते हैं कि तुम गाना गाना क्यों नहीं छोड़ देती ,मैं उनसे कहती हूँ कि आप ये क्यों नहीं कहते कि नूरजहां तुम जीना क्यों नहीं छोड़ देती , संगीत तो मेरे रग रग में है’।

अपने रूप , एक्टिंग ,और गायकी से नूरजहां ने अभूतपूर्व ख्याति प्राप्त किया था। झोंपड़ी से महलों तक ,आम आदमी से जेनेरलों ,प्रधान मंत्रियों ,राजनीतिज्ञों ,उद्योगपतियों तक उनके कदरदान भरे पड़े थे। उनकी जादुई मुस्कान ,बेहतरीन चमकीले वस्त्राभूषण ,और मोहक अदाएं,वे रूप ,सुर और ताल की अघोषित मल्लिका थी।

उन्होंने कई पंजाबी गाने भी गाए जो भारत में भी उतना ही लोकप्रिय हुआ,जितना पाकिस्तान में। ‘अँखियों नि बदनाम न करना” “मेरी अंख बादामी हे मइया’ “साणु नेर वाले पुल पे बुलाए के देखो रे माई किते रह गया” आदि गाने तो सीमावर्ती इलाकों में भी बहुत मशहूर रही। तकरीबन छह हजार उरदु,पंजाबी ,और सिंधी गानों में एक ‘मैं तेरे संग कैसे चलूँ साजना ,तू समंदर है मैं साहिलों की हवा” भी बेहद कर्ण प्रिय है। उन्होंने लोरिया भी गाई ‘चंदा की नगरी से आजा रे नींदिया ,तारों की नगरी से आ”। ‘

उन्होंने फिल्मों के अलावे गैर फिल्मी गीतों को भी काफी तवज्जो दिया उनके गाए गजल तो आज भी बेमिसाल है ‘हर लहजा ए मोमिन नई आन ,नई शान ,” “नियते शौक भर न जाए कहीं ,

ना मिला कर उदास लोगों से ,

हुस्न तेरा बिखर न जाए कहीं”। उनके बड़े ही चर्चित गजल रहे हैं।

1959 में जब नूरजहां ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के सामने उन्हीं का यह नज्म ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग” पेश किया तो वे इतने भावुक हो उठे कि उन्होंने इसे नूरजहां को ही समर्पित कर दिया ,और फिर कभी किसी मुशायरे में उन्होंने इसे प्रस्तुत नहीं किया था

। वाकई यह नज्म तो उनके जिगर का टुकड़ा सा लगता है।

अपने सभी गाने उन्होंने बड़े मुस्तैदी और शिद्दत के साथ गाए। वे तब तक रियाज करती रहती थी जब तक खुद अपने गायन से संतुष्ट न हो जाए। अपने असंख्य गानों में सबसे पसंदीदा कौन है ऐसा पूछने पर वे जवाब देती ‘सभी हमारे औलाद की तरह है ,हम इनमें भेद भाव कैसे कर सकते हैं ‘। लेकिन बड़े मान मनुहार के बाद विभाजन से पहले की कुछ गाने बताती। हिंदुस्तान में उनके गाए गीत आज तक लोगों के दिल में जिंदा है। अनमोल घड़ी में उनके गाए गीत “आजा मेरी बर्बाद मोहब्बत के सहारे’ “क्या मिल गया भगवान तुझे दिल को दुखा के ,अरमान की नगरी में मेरी आग लगा के’ ‘1945 में फिल्म किस्मत में गाए गीत ‘बुलबुलों मत रो यहाँ ,के लिए ही उन्हें मल्लिका ए तरन्नुम के नाम से नवाजा गया था। नौशाद साहब के गीत “आवाज दे कहाँ है” और ‘जवाँ है मोहब्बत” ‘मेरे बचपन के साथी मुझे भूल न जाना’ उनके शख्शियत को भूलने नहीं देती। ताउम्र वे भी भारत को नहीं भुला सकी होंगी। अपने एक मुलाक़ात के दौरान उन्होंने स्वीकार किया था कि भारत में उनका बचपन बीता, परवरिश हुआ ,जहां बचपन और जवानी के सुनहरे दिन बीते वहाँ जाने का दिल क्यों नहीं करेगा। वे एक जन्म जात अदाकारा थी और भारत से उन्हें जरूर प्यार था। मगर इंसानी मजबूरी , वे कोई कूटनीतिज्ञ तो थी नहीं ,एक भावुक इंसान और ऊपर से उस युग की स्त्री जो महिलाओं के लिए कदापि स्वर्णयुग नहीं कही जा सकती थी। एक औरत को अपना परिवार भी पालना था।

भारतीय सिनेमा के गोल्डेन जुबली के मौके पर वह हिंदुस्तान आई थी उस समय पूरे अवाम के सामने वो जी भर के वो रोई थी, शायद ये उनके भारत छोड़ने के पश्चाताप के आँसू थे। उन्होंने दिलीप कुमार साहब ,लता जी और उस वक्त की प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी से भी मुलाक़ात की थी। उस वक्त मुंबई में वह अपने अतीत को याद करने अपना पुराना फ्लैट भी देखने गई। उन्हें यह देखकर इतना ताज्जुब हुआ की इतने बरस बाद भी उस घर के नए मालिक ने घर का रख रखाव तकरीबन वैसा ही रखा था ,जैसे वह खुद रखती थी। उन लोगों का बेपनाह प्यार देखकर उनका हृदय असीम आह्वलाद से ओतप्रोत हो गया था।

अपने सुंदर साड़ियों,हेयर स्टाईल,और आभूषणों के चलते भी वह हमेशा चर्चा में रहीं। यह पूछने पर कि उनकी खूबसूरती का राज क्या है ,पाकिस्तान के एक रेडियो प्रोग्राम में उन्होंने कहा था “मैं दिल की बहुत अच्छी हूँ ,कभी किसी का बुरा नहीं चाहती ”। उनकी ज़िंदादिली इस बात से भी छलकती थी ,कि वह सब कुछ बेबाक बोल जाती थी ॥ पाकिस्तान के ही एक रेडियो इंटरव्यू में उन्होंने अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कहा था ‘कि मैं कोई बड़े जमींदार घर की बेटी नहीं ,साधारण से घर में मेरा जनम हुआ था। माता पिता बूढ़े थे ,दस भाई बहनों में वे सबसे छोटी थीं ,चार पाँच भैंसे थी ,वालिदा कहती थी जा नुरी भैंस के धार निकाल ला”। चूंकि उनका घर संगीत प्रेमी का घर था ,इसलिए खुदा ने उनको एक विलक्षण हृदय और तीव्र मस्तिष्क दिया था। बचपन में कई बार गाते गाते बेहोश हो जाती थी। छै सात बरस कि उम्र में जब वह अपने उस्ताद के कहने पर खचाखच भरे मैदान में पहली दफा गई थी तब किसी ने कहा था ‘अल्लाह ने जिस दिन इसे पैदा किया ,फिर किसी और को नहीं पैदा किया होगा”। अपने संघर्षों को याद करते हुए उन्होंने कहा था “जिंदगी में अब तक मुक़ाबले ही चलते रहे हैं। दुनिया में अच्छे लोग भी हैं बुरे लोग भी हैं। मैं बहुत पुरसकुन हूँ”। जिस दुनिया ने उन्हें सिर आँखों पर बैठाया था ,उसी ने कुछ पत्थर भी फेंके जिसे खुदा की रहमत समझ उन्होंने जिंदगी से समझौता कर लिया था।

इमरान खान ने जब अपना कैंसर हास्पिटल का उदघाटन रखा था ,मैडम नूरजहान उस वक्त बहुत बीमार चल रही थी। मगर बड़ी उत्साह के साथ उन्होंने उनके समारोह में आने की स्वीकृति दी थी। उनकी तमन्ना भी कभी एक हॉस्पिटल बनाने की थी जो पूरी न हो सकी थी। वे आईं ,और आँय गानों के साथ सूफी गीत ‘दमादम मस्त कलंदर इस अंदाज में गाईं कि मेहमान अपने कुर्सियों से उठ कर थिरकने लगे थे। उम्र ढलने के साथ भी उनके चेहरे पर बसी रूहानी मुस्कुराहट ने साथ नहीं छोड़ा था।

जीवन का अंतिम समय उनका काफी कष्टप्रद बीता ,।उत्तरी अमेरिका में जब वे एक संगीत के दौरे पर गई थी ,वहीं उन्हें हृदय संबंधी बीमारी का पता चला था, बाद में वे काफी बीमार रहने लगी थी ,और 23दिसंबर 2000को हृदय गति रुक जाने से उनका देहावसान हो गया। कराची में सऊदी दूतावास के पास गिजरी ग्रेवयार्ड में उनको दफ्न कर दिया गया। वह सख्स जो पैदा होते ही गाने लगी होगी , सत्तर सालों तक धर्म, संप्रदाय ,सरहदों की सीमा से परे ,गीत गाते गाते सो गई थी। उनके भौतिक काया से जुड़ी तमाम बातें ,अफवाहें ,कठिनाइयां ,उलझने उनके साथ ही ज़मींदोज़ हो गई थी ,हुस्न भी फना हो गया था ,मगर उनकी सुरीली गायकी को आज भी जो एक बार ,विज्ञान और तकनीकी के माध्यम से सुन लेता है ,ठहर कर पूछ बैठता है ’ये कौन है , और जान लेने पर इतिहास का कब्र खोदने पर मजबूर हो जाता है कि आसमान से उतरी, धरती पर भटकती रूप और गायन की परी आखिर वह कौन थी। बड़े बड़े रेकार्ड में कैद उनकी आवाज आज भी उतना ही दिलकश और मासूम है जितना उनकी उपस्थिति में थी।

॥ कामिनी कामायनी ॥

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