रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - कर्ज की दरख्वास्त

सिन्धी कहानी

कर्ज़ की दरख़्वास्त

clip_image002 मूल: लाल पुष्प अनुवाद: देवी नागरानी

अब तक शायद हेड क्लार्क की नज़र उस पर नहीं पड़ी थी। लगता है जैसे वह सारा वक़्त दीवारों से बात करता रहा हो।

‘प्लीज़ सर’, उसने फिर नए सिरे से अपनी बात कहनी चाही।

‘एक मिनट ठहरो’ हेडक्लार्क कहकर फिर फाइल्स में गुम हो गया।

‘ज़रूरी केस है।’

वह फैसला नहीं कर पाया कि कहे गये शब्द उसके लिए कहे गये थे या फ़क़त हवा में उछाले गए थे। ज़ाहिर है, और अगर उसे शक है तो वह बेवकूफ़ है। उसको अभी और इन्तज़ार करना पड़ेगा। उसने चारों ओर देखा, सबकी ओर देखा, हालाँकि उसे पूरा विश्वास था कि किसी का भी ध्यान उसकी ओर नहीं गया है, उसकी बात किये हुए लफ़्ज़ों को सुनना तो दूर की बात है, इसके बावजूद भी उसके वहाँ होने और अपनी कही बात अनसुनी हो जाने की बात खटकती रही।

उसे वक़्त का होश नहीं रहा, बस हेडक्लार्क के सामने अड़ा रहा।

‘आज मैं बहुत बिज़ी हूँ।’ उसने सुना और कहना चाहा कि - अगर यह सच है तो फिर सुबह पूरा एक घंटा कैफेटीरिया के एक कोने में मिसेज़ देशपांडे के साथ चाय की चुस्कियाँ कौन भर रहा था, और लबों के बीच में वह वाहियात मुस्कराहट किसकी थी?

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, उसे पता था कि उसका बोलना नाजायज़ है। कुछ बातें सिर्फ़ सुनने के लिये और सोचने के लिये होती है। वैसे भी भला वह हेडक्लार्क को कैसे बता सकता था कि उसमें और क्लार्क में कोई फ़र्क नहीं है। सवाल यह है कि वह खुद भी ऑनड्यूटी था और कैफ़ेटीरिया के सबसे दूर कोने में बैठकर हेडक्लार्क की वाहियात मुस्कुराहट को पूरा घंटा जाँचता रहा, इसमें से साफ़ ज़ाहिर है कि वह खुद हेडक्लार्क से पहले आया था और देर से निकला था।

‘तुम्हें कुछ कहना है ?’

‘मैं अपनी दरख़्वास्त के लिये आया हूँ।’

‘किस बात की दरख़्वास्त ?’

‘प्रविडेंट फंड - कर्ज़ की !’

‘दरख़्वास्त कब दी थी ?’

‘सर, आपको यह तो मालूम है, हफ़्ता पहले आपने कहा था कि सुपरिटेन्डेन्ट की सैंक्शन लेकर अकाउंट्स ऑफिस में भेजेंगे।’

‘तो क्या अभी तक नहीं भेजी ?’

‘सर, कल मैं अकाउंट्स ऑफ़िस गया था, इनचार्ज ने बताया कि ऐसे कोई दरख्वास्ट उनके हाथों में नहीं आई है।’

‘डिस्पैच क्लार्क से जांच कर लेते ?’

‘सर, वह मैटरनिटी-लीव पर है।’

‘तो उसकी जगह पर दूसरा क्लार्क होना चाहिए। क्या तुम यह कहने की कोशिश कर रहे हो कि डिस्पैच क्लार्क के बिना काम चलाना मुमकिन है।’

‘यह ठीक बात है सर, पर पता पड़ा कि वह आज से छुट्टी पर गई है और उसकी जगह पर किसी और क्लार्क को मुक़र्रर करने के अभी ऑर्डर नहीं निकाले गए हैं।’

‘तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ, कहो.... ?’

‘सर, आपने हफ़्ता पहले अंजाम किया था कि आप देखेंगे कि मुझे एक हफ़्ते के अन्दर कर्ज़ मिले। आपको पता है कि मेरी हालत, मेरा केस बिलकुल जेन्युन है।’

‘ऐड्मिनिसट्रेशन को इस बात से कोई वास्ता नहीं, कि तुम्हारा केस जेन्युन है कि नहीं। मुख्य बात है कि लागू फ़ार्म भरकर उसके साथ सर्टिफिकेट पेश किया गया है या नहीं, तुम्हारी हालत में.. !.’

‘हाँ, सर, मैंने ज़रूरी फ़ार्म भरे, उसके साथ अपने फ़ैमिली डॉक्टर का सर्टिफिकेट भी पेश किया है कि मेरी पत्नी को इस ज़हीन इलाज की ज़रूरत है और उसके लिये दवाओं वगैरह का बिल हमको भरना है।’

हेडक्लार्क ने कहा - ‘अच्छा तो तुम थोड़ी देर ठहरकर आ जाओ, तब तक मैं इस फाइल से फारिग़ हो जाऊँ।’

उसने कहना चाहा - ‘सर, हफ़्ता पहले भी आपने...’

लेकिन उसने कुछ न कहा, उसे पता था कि उसे कुछ भी नहीं कहना है। कुछ बातें सिर्फ़ सुनने के लिए होती हैं और सोचने के लिये। जबकि कुछ घड़ियाँ ऐसी भी आती हैं जब वह सोचता है। आखिर बात भी ग़ैर ज़रूरी है, सोचना ग़ैर ज़रूरी-बेमानी !

वह वहाँ से उठकर बाहर निकला, वक़्त जो गुज़ारना था। कितना ? थोड़ा ! लेकिन वह थोड़ा न जाने कितना होता है। कहने वाला अपने हिसाब से वक़्त को माप लेता है, मज़े की बात यह है कि ख़ुद उसे अपनी ‘माप’ पूरी तरह से पता नहीं होती।

और फिर भी हम हर लफ़्ज़ की माइने समझने में मात खा जाते हैं ! ‘माइने’ कौन से लफ़्ज़ की होती है ? ग़ौर करने पर यह बात बेकार लगी। रोज़मर्रा के गर्दिशी जीवन की तरफ़ हम इतने ईमानदार हैं कि उस धुआँधार सच की तरफ़ बेईमान बन गए हैं।

‘वह’, जहाँ नहीं जाना था, वहाँ भी गया कि हेडक्लार्क का कहा वह ‘थोड़ा’ पूरा हो जाए। वहीं खड़े सभी ताज़ी अख़बारों की हेडलाइन्स पढ़ ली। हालाँकि यह बात उसे बिलकुल अच्छी नहीं लगती थी। उन ख़बरों में और ऑफ़िस के फाईलों में न जाने कहाँ और कैसी समानता महसूस होती रहीं। वह हर जगह गया, और हर कहीं खड़ा रहा। जितनी जगहों पर वह गया, जितना वक़्त खड़ा रहा, उससे उसे यक़ीन होने लगा कि काफ़ी वक़्त गुज़र गया होगा और हेडक्लार्क का वह ‘थोड़ा’ कब का पूरा हो गया होगा। यक़ीन करने के लिये जब उसने प्लैटफार्म पर लगे राक्षसी घड़ियाल की तरफ़ देखा तो वह भीतर से बिलकुल खाली हो गया, सिर्फ़ और सिर्फ़ दस मिनट गुज़रे थे।

वक़्त सिर्फ़ कैफ़िटीरिया में गुज़रता है, यही सोचकर वह भीड़ के होते हुए भी एक कोने में बैठने का स्थान पा गया। उसने जान-बूझकर कॉफ़ी का ऑर्डर देर से दिया। जब दिया, और कॉफ़ी आई तो वह जान-बूझकर छोटी-छोटी चुस्कियाँ बहुत ही धीरे-धीरे लेने लगा। यह सारा वक़्त वह खुद को इस सोच से अलग न कर सका कि दरख़्वास्त के साथ डॉक्टर का सर्टीफ़िकेट उसने अच्छी तरह से लगाया था या नहीं, कहीं पिन, हालाँकि उसने अच्छी तरह से टाँकी थी, कहीं गिर तो नहीं गई... क्योंकि उस हालत में उसे फिर नए सिरे से उसी कर्ज़ के लिए उन्हीं हालातों से गुज़रना होगा। वैसे भी यह बात अनहोनी नहीं है, कितनी ही बार कितनों को उस छोटी-सी पिन ने ऊपर नीचे करवाया है। ताज़ा मिसाल कपूर का है, बिचारे ने अपनी शादी के लिये कर्ज़ की दरख़्वास्त की थी, महीने के बाद उसे ऑफिशियल लेटर मिला, तब जब शादी में सिर्फ़ छः दिन बाक़ी बचे थे, यह कहते हुए कि - ‘तुम्हारी दरख़्वास्त वापस भेज रहे हैं। माँगे हुए सर्टीफ़िकेट के साथ फिर से पेश करो।’

कपूर भी इरादे का पक्का था, पढ़े हुए जासूसी नॉवल मददगार साबित हुए। बड़े अफ़सर की ऑफिस के बाहर उधम मचाया - ‘अगर मैंने सर्टीफिकेट अटैच नहीं किया तो फिर दरख़्वास्त-फार्म के कोने पर टाचनी (पिन) के निशान कहाँ से आए ?’

नतीजे में हेडक्लार्क का हुक्म मिला, तुरंत जाँच करो, सर्टीफ़िकेट ट्रेस करो, फिर मेरी टेबल पर सबमिट करो, सिग्नेचर लेकर ख़ुद अकाउंट्स ऑफ़िस में जाओ, रू-ब-रू कर्ज़ पास कराओ। मुख्तसर में मतलब यह है कि मिस्टर कपूर को चौबीस घंटों में क़र्ज़ के पैसे मिलने चाहिये। ऑफ़िसर ने यह भी जोड़ा, इस राट्न कंट्री में शादी फिर नहीं होती, कि किसी की शादी के कर्ज़ की दरख़्वास्त ऐसे ...।

उसने ख़ुद को फटकारा कि वह कपूर के जैसा स्मार्ट क्यों नहीं हो पाया। अच्छे साहित्य और गंभीर किताबों की बजाए जासूसी नॉवल उसने क्यों नहीं पढ़े। अगर वो ऐसे करता तो आज इतना हौसला और इतनी दहशत समेट पाता ! हो न हो, फ़र्ज़ करो अब यहाँ से उठने के बाद, ऑफ़िस में हे्डक्लार्क के सामने खड़ा होकर वही हालात पैदा करे तो भी कपूर की तरह शायद ही हौसला और दहशत दिखा पाए।

शायद

शक है

नहीं

यक़ीन है

नहीं

अगर, उस हालत में, वह चिल्लाना चाहेगा तो उसकी आवाज़ नहीं निकलेगी, हाथ हिलाकर रह जाएगा वह। बहुत बोलना चाहेगा पर ख़ामोश रह जाएगा। दूसरी हालत में अंट-शंट बोल देगा बहुत ही तेज़ रफ़्तार के साथ फिर अचानक रुक जाएगा, राह गंवाँ बैठेगा जैसे स्पीड में दौड़ती ट्रेन अचानक पटरियों से उतरकर ढेर हो जाए... या फुग्गे में गैस जल्दी-जल्दी भर दी जाए और फुग्गा फूलता फूलते अचानक ही फुस करके फट जाए... या... !

हेड क्लार्क उसे देखकर मुस्कराया और कहा - ‘क्यों बहुत देर लगा दी ?’ तो उसका चेहरा चमक उठा। चेहरे पर तनी हुए रेखाएँ ढीली पड़ गईं।

‘तुम्हारी दरख़्वास्त मिल गई है।’

‘ओह ! थैंक यू सर !’

‘अब एक काम करो !’

‘यस सर !’

‘तुम तुरंत मिस्टर गुजराल से मिलो।’

‘गुजराल से क्यों सर’

‘जैसे मैं कह रहा हूँ, करो !’

‘ओ.के. सर !’

‘हाँ यह लो, अपनी दरख्वास्त उसके पास ले जाओ’

‘सर...’

‘जैसे कह रहा हूँ वैसे करो, तुम्हारी भलाई के लिये है’

‘दरख़्वास्त में कोई ग़लती हुई है ?’

‘नहीं, तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।’

‘सर, मुझे खुलासा करके बताएँ कि दरख़्वास्त में किसकी ग़लती है और कौन-सी ग़लती है। अगर किसी और की ग़लती है तो, दूसरी किसी की इसलिये कह रहा हूँ कि आपने ख़ुद कहा कि ग़लती है, पर मेरी नहीं है। पर अब तो यह ज़ाहिर है कि कहीं न कहीं किसी की कोई न कोई ग़लती अवश्य है, मुख्य बात यही है, मेरा मतलब है कि ग़लती है फिर चाहे वह किसी से भी हुई हो। पर मैं खुद पर दोष लेने को तैयार हूँ, चाहे उसमें मेरा कोई भी दोष न हो, मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत है। मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ, मेरी पत्नी का इलाज और ज़ारी रखना चाहिए, यह डॉक्टर का कहना है। उसे और सुइयाँ लगवानी है... सुइयाँ, दवाइयाँ, गोलियाँ, टॉनिक... आपने हफ़्ता पहले कहाथा!’

वह चुप हो गया, और उसे यह लगा कि पहले वह समझ तो जाता कि हेडक्लार्क या उसका गुजराल क्या कहता है। इस बार उसे लगा कि सबकी, या सबमें से किन की नज़रें उसकी तरफ़ उठीं। इतनी बकवास करते वक़्त, ख़ुद को बेवकूफ़ समझते हुए ख़ुद को कोसा उसने।

मिस्टर गुजराल। गोरे बदन वाला पंजाबी पान चबा रहा था।

‘मिस्टर गुजराल... ’

‘यस मिस्टर, आओ बैठो।’

‘मुझे मिस्टर सेठ ने भेजा है’

‘इन वॉट कनेक्शन ?’

‘मेरी इस दरख़्वास्त के बारे...’

उसने दरख़्वास्त मिस्टर गुजराल के आगे रखते हुए कहा - ‘मिस्टर सेठ ने शायद आपसे इस बारे में पहले ही बात की है।’

‘मुझे कुछ याद नहीं आ रहा है, पर तुम कहो मैं तुम्हारे लिये क्या कर सकता हूँ।’

‘मेहरबानी करके गाइड कीजिये कि इस दरख़्वास्त में क्या ग़लती है?’

फिर कुछ रुककर - ‘ग़लती है ज़रूर, मिस्टर सेठ ने मुझे बताया है। हालाँकि मेरी कोई ग़लती नहीं है, पर फिर भी ग़लती है ज़रूर, सिर्फ़ यह पता नहीं पड़ रहा है कि इसमें क्या ग़लती है और किसकी ग़लती है ?’

वह फिर लंबी सांसे लेने लगा, उसे लगा कि वह अपनी बात अच्छी तरह से समझा नहीं पा रहा है। हालाँकि समझाने जैसी उसमें कोई बात भी नहीं थी। पर उसे यह जरूर लगा कि उसे बताने के लिये मनचाहे शब्द नहीं मिल पा रहे हैं।

गुजराल ने दरख़्वास्त देते हुए कहा - ‘बराबर इसमें ग़लती है, उसे जाइज़ा लेते हुए कहा।’

‘मिस्टर सेठ ठीक ही कह रहे थे।’

‘यह दरख़्वास्त नहीं चलेगी।’

‘मिस्टर गुजराल...’

‘यह फ़ार्म रद कर दिया गया है।’

‘मुझे मालूम न था।’

‘ऐडमिनिस्ट्रेशन ने इस कर्ज़ को पाने के लिये नया फ़ार्म बनवाया है।’

‘कौन-सा !’

‘भाई, उसका तो मुझे भी पता नहीं है।’

उसने बस उठकर वहाँ से चले जाना चाहा।

गुजराल ने फिर कहा - ‘मैंने सच में वह नया फ़ार्म देखा तक नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि किसी ने भी देखा है क्या? फिर भी मुझे विश्वास है कि इस फ़ार्म पर तो दरख़्वास्त नहीं चलेगी। अभी कल ही भेजी हुई सब अर्ज़ियाँ अकाउंट्स ऑफ़िस से लौट आई हैं। हर एक अर्ज़ी के नीचे ‘फुट नोट’ लगा हुआ है - ‘मेहरबानी करके नये फ़ार्म पर अर्ज़ियाँ भेजी जाएँ।’

कोई फ़ायदा नहीं था, उसने सोचा - कोई भी सवाल उठाने से... और वह तत्पर उठकर वहाँ से जाना चाहता था।

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