सोमवार, 26 अगस्त 2013

शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - लोकतंत्र को खतरा

लोकतंत्र को खतरा

देवियों और सज्‍जनों ! आप सबको सूचित किया जाता है कि हमारे लोकतंत्र को भयानक खतरा उत्‍पन्‍न हो गया है। बेचारा अंतिम सांसें ले रहा है। आप सब इसके लिए दुआ करें। ये अचानक उत्‍पन्‍न खतरा है। आजादी के पैंसठ सालों में कभी ऐसा नहीं हुआ। लोकतंत्र खूब फल-फूल रहा था। खा-खा के मोटा हो रहा था। गैंडे की तरह सूरत हो गई थी। दूसरे देश वाले भी पूछते थे कि आपका लोकतंत्र क्‍या खाता है ? आखिर इतना मजबूत कैसे है ? हम उन्‍हें गर्व से बताते थे कि हमारी जड़ें काफी गहराई तक हैं, इसलिए लोकतंत्र मजबूत है। इतने आतंकवादी हमले हुये। इतने भ्रष्‍टाचार हुये। इतने नामी-गिरामी नेता जेल गये। कभी लोकतंत्र को नज़ला-ज़ुकाम तक नहीं हुआ। कामराज से लेकर कलमाडी तक इतने घपले हुये मगर क्‍या मजाल कि लोकतंत्र के सिर में दर्द भी हो। भय भूख , भ्रष्‍टाचार से लोग परेशान थे। किसान आत्‍महत्‍या कर रहे थे। संसद भवन में वोट खरीदे जा रहे थे। इतनी कठिनाइयों में भी लोकतंत्र मुस्‍करा रहा था। अजीब जीवट किस्‍म का था हमारा लोकतंत्र। पता नहीं किसकी नजर लग गई है। अब न हंसता है न मुस्‍कराता है। चुपचाप गुमसुम सा रहता है।

यह सब इसलिए हुआ क्‍योंकि लोगों ने सांसदों पर अंगुली उठानी शुरू कर दी। संसदीय लोकतंत्र में संासद पर सवाल खड़े किये जायें। यह बेचारे लोकतंत्र से सहन नहीं हो रहा है। सांसद सर्वोच्‍च हैं। उनकी कही गई हर बात वेदवाक्‍य है। उनके द्वारा किये गये कर्म देवकर्म हैं। समाज के लिए आदर्श हैं। उन पर प्रश्‍न खड़े करना अर्थात लोकतंत्र पर कुल्‍हाड़ी मारना। यह काम किया अन्‍ना हजारे साहब ने। उन्‍होंने आम आदमी को उसकी ताकत से रू-ब-रू करा दिया। उनकी समझ में आ गया कि संसद के बाहर से भी लोकतंत्र के लिए काम किया जा सकता है। बस तभी से लोकतंत्र बीमार चल रहा है। संसद का काम है -कानून बनाना। वह जब चाहे बनाये आप कौन होते हैं , उसे कुछ भी कहने वाले। आपने एक बार चुन कर भेज दिया। अब खामोश होकर तमाशा देखिये। ऐसा नहीं कि हमारे सांसद जागरूक नहीं हैं। विश्‍वास न हो तो आप संसद का सत्र टी वी पर देखिये। हर सांसद चौकन्‍ना नजर आता है। इतने सजग हैं कि सब अपनी बात कहना चाहते है। अब इसमें शोरगुल हो जाये तो सांसदों की क्‍या गलती ? सत्र का मतलब ही यही है। शांति से दूसरों की बात सुनने लगें। सार्थक बहस करने लगें। तब टी वी पर कैसे दिखेंगे ? चलो शोरगुल मच ही गया तो क्‍या ? लोकतंत्र तो सुरक्षित है। कभी-कभी हंगामा हो जाता है, तो क्‍या ? चार घड़े एक साथ रहते हैं तो टकराते ही हैं। हमारे सांसद क्‍या घड़ों से भी गये बीते हैं। टकरा गये तो टकरा गये। विपक्षी पार्टी चिल्‍लाई कि हमें खरीदने की कोशिश की गई । उन्‍होंने नोट हवा में लहराये। पता चला कि उसमें अमर सिंह साहब का नाम आ रहा है। भई हम तो नहीं मानते। सांसद कभी गलती नहींं करता। वह लोकतंत्र की नींव है। पुलिस वाले उन्‍हें जेल ले गये। चलों थोड़ी देर के लिए मान भी लेते हैं कि सांसदों को खरीदने की कोशिश की गई। तो क्‍या हुआ ? लोकतंत्र को खतरा तो नहीं पहुंचा न। लोकतंत्र के पेट में दर्द तो नहीं हुआ। मगर आप कहेंगे कि लोकपाल बिल लाओ तो मंत्री जी को गुस्‍सा आयेगा ही। मंत्री जी जो कहते हैं, वही सही होता है। चलो अड़तालीस साल से यह बिल संसद में पैंडिंग था तो क्‍या हुआ। रहता पचास साल और। हमारा पहला काम जरूरी बिल लाना नहीं हैं। पहला काम है लोकतंत्र को बचाना। मौसम बदल रहा है। कहीं कोई भयानक बीमारी लग गई तो ? आजादी के तुरंत बाद इसे कंबल में लपेट कर लॉकर में डाल दिया गया था। केवल इसके अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए। लोकतंत्र की जगह हम तंत्रलोक से काम चला रहे थे। तंत्र लोक अर्थात तंत्र जहां फले-फूले ऐसा लोक। जैसे- देवलोक देवताओंका। ब्रह्मलोक ब्रह्मा का उसी प्रकार तंत्रलोक तंत्र का अर्थात सरकार का। तंत्र जो चाहेगा वही होगा। कभी किसी नागरिक की हिम्‍मत नहीं हुई, आवाज उठाने की। जे पी ने उठाया तो क्‍या हुआ। वह तो राजनीति के रास्‍त आ रहे थे। उनके उठाने की बात और है। उससे कोई खतरा उत्‍पन्‍न नहीं हुआ। तंत्र के फैसले यदि लोक करने लगे तो खतरा उत्‍पन्‍न होगा ही। अब हो गया न बीमार , कौन संभालेगा इसे। दुआ कीजिए।

जब एक बार कपिल सिब्‍बल साहब ने कह दिया कि 2 जी घोटाला नाम की कोई चीज नहीं है। तो नहीं है। उनकी बात पत्‍थर की लकीर होती है। उनके कहते ही सी बी आई को वापस पवेलियन में लौट जाना चाहिए था। सर्वोच्‍च न्‍यायालय को लक्ष्‍मण-रेखा के अंदर जाकर दुबक जाना चाहिए था। मगर नहीं, जाकर राजा भैया को पकड़ लाये। बिना घोटाले के ,उस बेचारे गरीब आदमी को जेल में डाल रखा है। बेल नहीं दे रहे। मंत्री जी कहते हैं कि एक पैसे का गबन नहीं है। पुलिस जेल में डाल रही है। हद हो गई। वो तो अच्‍छा हुआ कि इस बात से लोकतंत्र को खतरा नहीं हुआ। ये आपस की बात है इससे लोकतंत्र नहीं टूटता। लोकतंत्र टूटता है जब आम आदमी अपनी बात कहने की कोशिश करता है। आप क्‍यों सड़कों पर उतरे? क्‍यों तिरंगा लहराया ? क्‍यों अन्‍ना साहब अनशन पर बैठे ? हमारे संासद हैं न, सब कुछ के लिए। अब मोदी जी बैठे कि नहीं , उपवास पर। माना कि करेाड़ों रुपये पानी में गये। ए सी हाॅल में सी सी टी वी कैमरे के सामने। नौकर-चाकर , अमला-फौज, खुशामदी, चापलुश इन सबके बीच में जब मुख्‍यमंत्री उपवास करेगा तो करोड़ों खर्च होंगे ही। करोड़ कौन सी बड़ी रकम है जिसके लिए हो हल्‍ला किया जाये। अब मोदी जी विदर्भ के किसान तो हैं नहीं कि उपवास उनका रोज का काम है। कभी-कभी तो इतना लंबा उपवास हो जाता है कि जीवन का अंत ही हो जाता है। वहंा न तो काई कैमरा लगा होता न ही मीडिया वाले होते हैं। मगर साहब आदमी से बड़ी है लोकतंत्र इसको पहले बचाना है। मोदी जी दरअसल में आत्‍म-शुद्धि कर रहे थे। सदभावना के लिए उन्‍होंने उपवास किया था। यह काम बहुत जरूरी था। आत्‍म-शुद्धि न होने से कितना भयानक परिणाम हुआ यह देश देख चुका है। सदभावना के लिए अगर मोदी जी उपवास करें तब सचमुच इस देश में सदभावना आ जायेगी ं। लोकतंत्र मजबूत होगा। इधर मोदी जी बैठे उधर शेखावत भी जा बैठे, उपवास पर। मामला जम गया। बेचारी मीडिया को अन्‍ना साहब के आंदोलन के बाद कोई मसाला नहीं मिल रहा था। मिल गया। लोकतंत्र क्‍या खाक बचेगा इस देश का ! इतने बड़े-बड़े नेता उपवास कर रहे थे, मगर जनता सड़क पर नहीं आई। किसी ने तिरंगा नहीं लहरासया। न ही किसी ने कहा ' मैं मोदी हूँ ' न कहा 'मैं शेखावत हूं '। ये तो हद हो गई। इन्‍हीं लापरवाहियेां से टूटता है लोकतंत्र। एक साधारण सा आदमी टोपी लगाकर बैठ गया तो आप लोग सड़कों पर उतर आये। सारे देश में हलचल मच गई। आंदोलन होने लगे। इतनी बड़ी हस्‍तियां बैठी तो चंद तमाशबीनों के अलावा कोई नहीं गया। तभी से लोकतंत्र के पेट में मरोड़ आ रहे हैं। पतली दस्‍त हो रही है।

हद तो तब हो गई जब एक इतने बड़े नेता का नाम भी 2 जी घोटाले में घसीटा जा रहा है। पी चिदंबरम जी का नाम तो सच्‍चाई और इर्मानदारी का प्रतीक है। उनके ऊपर शक अर्थात ंलोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार। चलो मान लिया कि वित्‍त मंत्रालय ने एक खत भेज दिया तो क्‍या हो गया ? मित्रों में खतों-खुतबात तो चलते ही रहते है। इसमें इतना हल्‍ला मचाने की क्‍या जरूरत ? वो तो अच्‍छा हुआ कि विपक्षी पार्टी वालों को अपना काम याद आ गया और वे इस्‍तीफा मांगने लगे। लोकतंत्र बच गया। कहीं यह इस्‍तीफा किसी आम आदमी ने मांग लिया होता तब लोकतंत्र की ख्‍ौर नहीं थीं। अन्‍ना या उनके किसी साथी ने यदि इस तरह की हरकत की होती तो मनीष तिवारी साहब अब तक तू-तड़ाक कर चुके होते। कांग्रेस के प्रवक्‍ता हैं, मजाक नहीं हैं। ज्‍यादा से ज्‍याद बाद में माफी मांग लेते हिंदी में। कितने पुराने केस निकाल-निकाल कर जांच हो रही होती। लोकतंत्र की तबियत भी खराब हो जाती। लेकिन बी जे पी के द्वारा इस्‍तीफा मांगना तो एक किस्‍म को दोस्‍ताना मैच है। इससे किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता न लोकतंत्रपर न आम आदमी पर। सबको पता है कि परंपरा का निर्वाह हो रहा है।

लोकतंत्र है तभी तक आम आदमी सुरक्षित है। वह अपनी मर्जी की सरकार चुन सकता है । हां उसके बाद चुनी हुई सरकार अपनी मर्जी का कर सकती है। उस पर कोई प्रश्‍न नहीं उठा सकता। अब योजना आयोग ने गरीबी की नई परिभाषा दी । शहरों में जो एक दिन में कम से कम 32 रुपये और गांवों में 26 रुपये कमाता हो वही गरीबी रेखा के नीचे होगा। बाकी सब ऊपर होंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि उनके मन में गरीबों के प्रति दया नहीं है। पूछ कर देखिये आहलुवालिया साहब से, दया का सागर उनके दिल में लहराता मिल जायेगा। उन्‍होंने कहा है कि शहरी गरीब वह है जो रोज 32 रुपये भी नहीं कमा पाता। अर्थात यदि वह 32 रुपये कमा लेता है तो उसकी गिनती अमीरों में की जायेगी। यह क्‍या कम है कि उसे एक समय का भोजन नसीब हो जायेगा। गरीब का मतलब कि आप बिना खाये पिये जिंदा रह रहे है। केवल सांस की आस में जिंदा हैं। उससे अधिक कुछ भी किये तो आपकी गिनती बड़े लोगों में की जायेगी। महंगाई बढ़ गई तो उससे क्‍या आपको अगर एक छटांक दाल भी मिल जाता है तो आप शहर के रइर्सों में शामिल हैं। पढ़ाई-लिखाई की बात गरीब कैसे करेगा ? इसलिए सरदार साहब ने 32 रुपये रखा। उसे केवल खाना है। उसके बच्‍च्‍ो क्‍येां होंगे ? और यदि होंगे तो पढ़ेगें क्‍यों ? उसे इलाज की क्‍या जरूरत है ? डाॅक्‍टर और दवाइयां उसे क्‍यों चाहिए ? घर की जरूरत उसे किस बात के लिए होनी चाहिए ? सरकार का नजरिया बिल्‍कुल दुरूस्‍त है। आप यदि गरीब हैं तो केवल किसी तरह खाना जुटाइये। नहीं तो आप को अमीरों की श्रेणी में डाल दिया जायेगा। गांवों में तो सरकार की कृपा से 26 रुपये ही चाहिये प्रतिदिन एक आदमी को अमीर कहलााने के लिए। उससे कम कमायेगा तभी गरीब कहलायेगा। वह इससे कम कमायेाग नहीं क्‍योंकि उसे अपने परिवार का पेट भी भरना है। अपने आप वह लाल कार्ड , राशन कार्ड और हेल्‍थ कार्ड जैसे सुविधाओं से वंचित हो जायेगा। दरअसल सरकार चाहती है कि देश से गरीबी मिटे। इंदिरा जी के जमाने से लेकर आजतक कितनी कोशिशें की गईं, गरीबी मिटाने की। गरीबी इतनी जिद्दी है कि नहीं मिटी। डॉ  सिंह अर्थशास्‍त्री हैं। उन्‍हें पता है कि बड़ी से बड़ी समस्‍याएं भी आंकड़ों से दूर हो जाती हैं। आंकड़ें दुरूस्‍त कर देना ही इस समस्‍या का समाधान हैं। अब देखिये इन नये मापदंडों से कैसे भागती है गरीबी। गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत पाँच तक आ जायेगा। मिट गई न गरीबी। जिस रेखा के नीचे रहने वाले 30 प्रतिशत के आसपास है , वह एक ही झटके में पाँच तक आ जायेगी। यह सरकार की सफलता नहीं तो और क्‍या है। हो सकता है इन कदमों से लोकतंत्र की सेहत में सुधार आये।

विदेशी पूंजी वालों को जब पता चलेगा कि भारत की गरीबी मिट गई तो और तेजी से अपनी पूंजी लगायेंगे। देश का विकास होगा। मान लीजिये सरकार ने देखा कि इससे भी गरीबी नहीं मिट रही। तो गरीबा रेखा के मापदंडों को और नीचे लायेगी। शहर में रहने वाला अगर दस रुपये कमाता है और गांवों में रहने वाला पाँच रुपये कमाता है तो वह गरीबी रेखा के नीचे आयेगा । तब तो सुसुरी गरीबी निश्‍चित ही मिट जायेगी। देश विकसित हो जायेगा। अमीरों की संख्‍या बढ़ जायेगी। इसे कहते हैं देश को विकसित बनाने का नुस्‍खा। इन कदमों से निश्‍चित ही लोकतंत्र का सिर दर्द दूर होगा। डर इस बात का है कि कहीं किसी अराजक तत्‍व ने आंदोलन छेड़ दिया तो ? कहीं कोई सरकार से यह ने पूछ बैठे कि आपके मंत्रियों के पास करोड़ों की दौलत है। लगातार बढ़ रही है। सबसे गरीब मंत्री के पास भी एक करोड़ की दौलत है और देश का आम आदमी के पास होना चाहिए 32 और 26 रुपये। उसका इसमें ही गुजारा होना चाहिए अगर उसे गरीबी रेखा वाले फायदे लेने हैं तो। यदि कोई गैर-राजनीतिक व्‍यक्‍ति इस बात को उठाकर आंदालन करने लगे तो लोकतंत्र का टूटना तय है। लोकतंत्र कभी भी एक गैर-राजनीतिक आदमी की बात नहीं सुनना चाहता। उसकी तबीयत खराब हो जाती है। सांसदों से यदि किसी ने पूछ लिया कि आपने पिछले साठ वर्षों में एक भी दिन 26 रुपये पर गुजारा किया क्‍या ? तो हो गया लोकतंत्र को खतरा। आप कोई भी प्रश्‍न सांसद से नहीं पूछ सकते। कहते है कि संसद खुद तय करेगी कि उसे क्‍या करना है। महिला बिल की हालत देखिये। पता नहीं किस बस्‍ते में रखी दीमक के भेट चढ़ रही होगी। सांसदों की जब इच्‍छा होगी तब पास करेंगे। महंगाई पर इतना हल्‍ला हो रहा है लेकिन सांसदों की इच्‍छा नहीं हो रही कि कुछ करें तो नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारे पास जादू की छड़ी नहीं है। यह जुमला कभी माननीय लालू यादव बोला करते थे। वह तो शुक्र है कि नीतिश कुमार के पास कहीं से जादू की छड़ी आई और बिहार विकास के रास्‍त्‍ो पर चल पड़ा। अब यह बात अगर लालू जी से पूछ ली जाये तो लोकतंत्र पर खतरा आ जायेगा।

तो देवियों और सज्‍जनों लोकतंत्र बेचारा बहुत बीमार है। देश की जनता जब से सांसदों से सवाल पूछने लगी हैं। सबसे पहले तो हमें यह एहतियात बरतनी है कि हमें किसी भी सांसद से प्रश्‍न नहीं पूछना है। यह भी नहीं कि रेड्डी बंधु जेल क्‍यों गये। क्‍या केंन्‍द्र सरकार को इसके बारे में बिल्‍कुल ही जानकारी नहीं थी ? अवैध खनन हुआ और माल भी कमाया गया। वह पैसा अब देश को कौन देगा ? लूट का धन वापस कैसे लाया जाये। इसके बारे में संसद कानून क्‍यों नहीं बनाती ? हमें इस तरह के प्रश्‍नों से बचना है। नहीं तो लोकतंत्र टूट जायेगा। टूट गया तो हमें ही क्षति होगी। उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। उनके पास ताकत है। धन है। जन है। निरीह तो आम आदमी है। उसे कुछ नहीं पूछना। दूसरा एहतियात हमें यह बरतना है कि बूथ पर जाकर किसी न किसी के पक्ष में बटन दबाना है। देखने की जरूरत इसलिए नहीं है क्‍योंकि सब एक ही हम्‍माम में खडे हैं। तन का रंग अलग हो सकता है मन एक ही हैं। हमारे कर्त्‍तव्‍य हैं कि हम बटन दबाते जायें। यदि हमारे प्रतिनिधि क्ष्‍ोत्र में आते हैं तो उनके चरणों पर बिछ जायें। उनका स्‍वागत करें। अपना दर्द न बतायें। बिना बिजली, पानी , सड़क के रहना जारी रखें। हमें 32 रुपये में ही गुजारा करना है। हम सजग रहें कि परिवार का कोई सदस्‍य दिन में दो टाइम खाना न खाये। कपड़ों से यथा संभव बचें। एक छोटी सी जगह में रहकर भी हमारे अंदर देश सेवा का जज्‍बा हो। जब भी किसी राजनीतिक दल का रथ आये हम जाकर लाखों लाख की संख्‍या में वहां शोभा बढ़ायें। सीजन रथ यात्राओं का ही चल रहा है। अन्‍ना जैसे लोगों की बातें न सुनें क्‍योंकि वे लोग ऐसी बात बताते हैं जिससे लोकतंत्र टूटता है। अन्‍याय के विरूद्ध अहिंसात्‍मक लड़ाई लड़ना सीखकर हम लोकतंत्र का नुकसान करेंगें । आखिर इस देश को जन की नहीं प्रजा की जरूरत है। देश में प्रजातंत्र है। जनतंत्र नहीं। लोकतंत्र बीमार है। प्रजा की तरह रहना है। जन बनने की कोशिश की तो लोकतंत्र को खतरा पहुंचेगा।

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर, नांदेड़ 7387311701

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