रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - पीड़ा मेरी जिन्दगी

सिन्धी कहानी

पीड़ा मेरी ज़िन्दगी

clip_image002 मूल: जगदीश लच्छाणी

अनुवाद: देवी नागरानी

हमारी ज़िन्दगी हमेशा संपूर्णता की ओर बढ़ती है। जब हम संपूर्ण हो जाते हैं तब हमारा जीवन शांतमय हो जाता है।

पर ऐसा भी नहीं है कि शांति में ही कोई संपूर्णता समाई है। दर हक़ीकत यह अपूर्णता ही है जो हमारी ज़िन्दगी को सम्पूर्ण होने में मदद करती है, न कि शांति। ज़िन्दगी की हलचल से भरपूर घड़ियों की अगर हम लहरों से समानता करें तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी।

लहरें किनारे की तरफ दौड़ती ज़रूर है, लेकिन किनारा उनका मक़्सद नहीं है। उन्हें तो फ़क़त तड़पने में आनंद और मचलने में मज़ा आता है। हर पल उनमें नई और नई ज़िन्दगी अंगड़ाइयाँ लेती है और ये अलबेली कशमकश की शाइक लहरें आगे और आगे दौड़ती हैं!

आज मैं एक तरफ़ सम्पूर्ण हूँ तो दूसरी ओर अपूर्ण भी। इस संपूर्णता और अपूर्णता के मिलन की एवज़ मेरे जिगर की तहों में कुछ धड़क रहा है, यही मेरी ज़िन्दगी का मधुर संगीत है और मौत का हाहाकार भरा आलाप !

मेरे दिल की तहों में मेरी विशालता फैली है, जिसे भरपूर कोशिश के बावजूद भी समेट न पाऊँगा। हाँ ! बाकी उस विशालता के जिस जज़्बे का बयान कर पाऊँगा, वही करूँगा।

उस हिस्से का बयान, जो मैं करूँगा, वो मुकम्मिल होगा या नहीं, कैसे कहूँ ? क्योंकि सोच रहा हूँ, उस विशालता का ज़र्रा-ज़र्रा भी तो अनन्त है।

आज मेरी ज़िन्दगी मौत की चादर ओढ़कर लेटी हुई है, गोया रोशनी पर अंधेरा हावी हुआ हो और रोशनी घुटन से दम तोड़ रही हो। ये घड़ियाँ भी कितनी पीड़ा बख़्शती हैं, दिल करता है कहीं दूर-दूर जाकर भटकूँ, जहाँ न सुबह हो, न शाम... बस हरसूँ हलका प्रकाश हो और कुछ भी नहीं।

पर अंधेरे में प्रकाश की तमन्ना ! मैं भी कितना पागल हूँ। आज की रात काली है, मगर वह रात कितनी सुन्दर थी, कितनी सुहावनी, सितारों और मुस्कराते चंद्रमा के साए में हज़ार हसरतें पली थीं उस रात, कौन जानता था कि हम हसरतें पूरी न होने के लिये पाल रहे हैं। अरमानों का उदित होना, उभरकर बड़ा होना और परवरिश के सीमित समय में ही विधवस्त हो जाना, जीवन के साथ कितना बड़ा मज़ाक है।

उस रात जीवती ने सवाल किया था - ‘दीप, तक़दीर के बारे में तुम्हारा क्या विचार है?’ और कहते-कहते उसकी सवाली आँखें मेरे चेहरे पर आकर ठहर गईं।

‘तक़दीर, मेरी तक़दीर तो तुम हो जीवती...’ मैंने मुस्कराते हुए जवाब दिया था।

‘मैं तुम्हारी तक़दीर हूँ ! वो कैसे दीप ? मैं तो तक़दीर को बंधन मानती हूँ। तो क्या तुम मुझे बंधन मानते हो ? नहीं दीप, मैं तुम्हारे लिये बंधन कैसे बन सकती हूँ? मैं तो तुम्हारी विशालता में लुप्त होना चाहती हूँ, प्राण !’ और उसकी आँखें चमक उठीं, उनमें उसकी उन्मुक्त आत्मा की झलक ज़ाहिर हो रही थी।

चारों तरफ़ नदी की असीम लहरें फैली हुई थीं, जिनके सीने पर हमारी कश्ती इठलाती, बलखाती, एक और मंजिल की ओर बढ़ रही थी।

जीवती की बातों ने मुझे विचारों की दुनिया में गहरे धंसने पर मजबूर किया, और मैंने सोचा ‘क्या तक़दीर सच में बंधन होती है ? क्या हमारी ज़िन्दगी तक़दीर के हाथों में सच में सिमट कर रह जाती है ? पर जीवती तो मुझसे भी विशाल है, मुझसे हर बात में पहल करती हुई, फिर मेरे लिये वह बंधन कैसे साबित होगी ? विशालता तो विशालता को पाकर और भी विशाल हो जाती है।’

... और ठीक उसी समय, मुझे दिल में अपूर्णता और सम्पूर्णता का मिला-जुला अहसास हुआ। पल को तो मैं धड़क उठा था यह कहकर - ‘जीवती तुम क्या कम विशाल हो, जो मेरी विशालता में लुप्त होना चाहती हो?’

‘दीप, मैं विशाल कहाँ ? जितने तुम विशाल हो, मैं तो उनकी हदें भी नहीं बना पाती, फिर मैं विशाल किस तरह हुई।’

‘किसी की विशालता को स्वीकारना क्या कम विशालता है, जीवती?’ मैंने बहस का सिलसिला जारी रखते हुए कहा था।

‘ऐसे मत कहो दीप, नहीं तो मैं यह समझूंगी कि तुम मुझको अपनाना नहीं चाहते। खुद में, और तुम में समा जाने के सिवा, समझते हो मेरी हालत कैसी होगी ?’ और वह ख़यालों की हलचल में कुछ लरज़ गई थी। उसकी बातों में बनावट बिलकुल भी न थी। फिर भी मुझे उसकी भावना का पूर्ण सच समझ में नहीं आया था। और जो कुछ समझा, वह था - ‘हमें एक दूसरे की विशालता की ज़रूरत है, न कि बंधन की, हम विशाल हैं, बंधन मुक्त हैं, हम कभी भी एक दूसरे में समावेश नहीं हो पाते, फ़कत अलग-अलग दायरों में और ज़्यादा वसीह होते जाएँगे।’

पूर्णिमा का चाँद अपनी ख़ुशनुमा किरणें फैलाकर शायद ख़ुशी में फूला नहीं समा रहा था। उसकी हर नूरे-नज़र मदमस्त होकर मुस्करा रही थी। ये उसकी जवानी का सालाना प्रदर्शन था। वो शरद पूर्णिमा का चाँद था।

मल्लाह धीरे-धीरे गुनगुना रहा था और उसका हाथ गुनगुनाहट के ताल पर नाव का टप्पू चला रहा था। नाव पानी की लहरों पर तैर रही थी, हम आनन्द की लहरों पर बहते चले जा रहे थे। उससे पहले भी कई बार नैया की सैर कर चुके थे। जाने कितनी चाँदनी रातों के आगोश में मदमस्त होकर घड़िया गुजारीं थीं। लेकिन इस चाँदनी में कुछ और ही जुंबिश थी, कुछ अलग-सी रंगत।

मैंने विचारधारा का रुख़ बदलते हुए कहा - ‘जीवती, यह चाँदनी बाक़ी कितना वक़्त?’

‘क्यों दीप, फ़ना का विचार आ रहा है क्या?’

‘यानि ?’

‘यानि तुम कहना चाहते हो कि यह चाँदनी हमेशा नहीं रहेगी, यही ना ?’

‘हाँ, पर क्या उसकी याद भी सदा नहीं रहेगी ?’

‘वैसे तो सब कुछ हमेशा ही रहता है, फ़क़त हमारे विश्वास ही पैदा होते हैं और मरते हैं और हमें यूँ महसूस होता है गोया दुनिया पहलू बदल रही है।’

‘तो कह सकते हैं कि हमारे विश्वास ही नश्वर हैं ?’

‘बेशक, पर यह हरगिज़ नहीं भुलाना चाहिये कि विश्वास के भाग्य-दाता भी हम ही हैं। जितने हम विशाल उतने ही हम विनाशी !’

‘तो जीवती हम सीमित क्यों होते हैं ?’

‘हम सीमित कहाँ, दीप ? हम तो अनन्त हैं ! हमारी नज़र ही कभी-कभी महदूद हो जाती है और हम समझते है हम महदूद हैं, अधीन हैं... पर हक़ीक़त में यह सब हमारी कमज़ोरी का ही सबब होता है।’

मैं कुछ देर तक दूर आकाश को तकता रहा, बिलकुल निशब्द !

ऐसे में जीवती ने कहा - ‘दीप, आज दिल करता है कुछ स्वार्थ की बात करूँ !’

‘तुम स्वार्थी कब से हुई हो जीवती?’

‘मैं तो हूँ ही स्वार्थी। जब से तुम मेरे जीवन में आए हो, बस एक ही स्वार्थ लेकर फिर रही हूँ, काश, तुमको पा सकती! तुमने ही तो मुझे स्वार्थी बना दिया है, मेरे प्राण !’

‘पर मैंने तो सब कुछ तुम्हें समर्पित कर दिया है प्यारी !’

‘यही तो मेरी कमज़ोरी है, तुमने जो कुछ मुझे अर्पण किया है, मैं वह कुछ भी नहीं पा सकी हूँ।’

‘अच्छा, तुम्हारे दिल का स्वार्थ भी तो सुनूँ’, मैंने कुछ मुस्कराते हुए कहा।

‘अतृप्ति। ’

मेरे होठों से मुस्कान जाने कहाँ गायब हो गई, ऐसे महसूस हुआ जैसे किसी ने मुझसे मेरे जीवन भर की पूँजी की माँग की हो।

मैंने बात को बदलते हुए कहा - ‘आज कोई गीत सुनाओ जीवती।’

लेकिन मेरी कोशिश नाकाम रही। उसने पूछा - ‘कौन-सा गीत दीप, तृप्ति का या अतृप्ति का।’

मैं उसकी झुकी हुई पलकों की ओर तकता रहा, कहा - ‘तृप्ति का।’

‘तो, तुम्हें तृप्ति ही चाहिये ?’

‘तो क्या तुम हमेशा अतृप्त ही रहना चाहती हो, जीवती?’

‘क्या सदा अतृप्त रहा नहीं जा सकता ?’

‘पर स्वार्थ तो हमेशा तृप्ति माँगता है।’

‘पर मेरा स्वार्थ तो अतृप्ति का शाइक है, दीप !’

‘अजीब शौक़ है तुम्हारे स्वार्थ का’ मैंने उसे चिढ़ाने के लिए लिहाज़ से कहा।

‘अजीब स्वार्थ कैसे दीप ? अजीब तो ज़िन्दगी है, तृप्त रहते हुए भी अतृप्त, अतृप्त रहते हुए भी तृप्त !’

मैं कुछ उलझ गया, तृप्त रहते भी अतृप्त, अतृप्त रहते भी तृप्त ! मेरे कानों में शब्द गूँजे और शांत हो गए। लेकिन जाने क्यों मैं उन्हें फिर-फिर सुन पाने का इच्छुक बन गया, बार-बार दिल में वही शब्द दोहराने की कोशिश की और दोहराकर उन्हें समझने की भी कोशिश की।

‘क्यों दीप ख़ामोश हो गए ?’ जीवती ने कहा।

‘तुम्हारी बात में उलझ गया हूँ जीवती, कुछ समझ में नहीं आ रहा है।’ और मैं फिर से सोचने लगा।

कुछ पल रुककर उसने कहा - ‘देखो दीप, आज हम एक दूसरे के बहुत नज़दीक हैं, फिर भी जाने क्यों मैं यह सोच रही हूँ, हम दोनों अलग-अलग शक्तियाँ हैं, जिनका आपस में मिलना और जुदा होना दोनों ही रूप से भयानक है, यानि हम दोनों एक दूसरे को पाकर तृप्त भी हैं और अतृप्त भी। तृप्त इसलिये क्योंकि तुमने मुझमें और मैंने तुम में अपनी मंज़िल मिलने की सांत्वना पाई है और अतृप्त इसलिये कि हमारी जरूरतें समाप्त नहीं हुईं हैं। कोई भी मंज़िल हमारी आख़िरी मंज़िल नहीं है। जो मंज़िल आज है वही कल शायद दूसरी मंज़िल के लिए पहली सीढ़ी बन जाए और हम उसी नई मंज़िल के पथिक!’

प्रेम मेरी दिल की सतह पर उभर आया। मैं उसका हाथ होठों तक ले आया। जीवती का हाथ बर्फ़ जैसा, लगा जैसे वह एक पत्थर की देवी का हाथ है, ऐसी देवी जिसमें न गुण है न दोष, न जज़्बात है, न होश। उसकी निगाहें लहरों की तरह विचलित थीं और वह थिर पुतली की तरह बैठी रही। मेरी हरक़त उसकी मुद्रा में कोई तब्दीली नहीं ला पाई। जाने क्यों मेरा मन बस के बाहर हो गया। मैंने उसकी कलाई थामकर उसे अपनी ओर खींचने की कोशिश की। अचानक ही खिंचाव पर वह थोड़ा झुकी, पर आभास होते ही दूर हट गई, कहने लगी - ‘छी, छी ! शास्त्रों के अनुसार स्पर्श गुनाह है, पाप है। हम शास्त्रीय ढंग से प्यार करेंगे और उस पाप से दूर रहेंगे !’ और वह हँसने लगी।

मेरे दिल में बसे मेरे मुहब्बत के जज़्बे को ठोकर लगी। मैं यूँ महसूस करने लगा जैसे जीवती के हाथों मेरा घोर अपमान हुआ हो।

उसे भी इस बात का बहुत जल्द ही अहसास हुआ, उसने अपना तन मेरे सीने पर लिटा दिया। मैं ख़ामोश गुमसुम बैठा रहा। उसकी जुल्फों की महक मेरे दिमाग़ पर छाने लगी। मैंने उसके बालों की एक लट को उँगलियों पर लपेटने लगा।

‘तुम्हारे चौड़े सीने पर लेटने में कितना आनंद मिलता है, दीप !’

‘बना तो नहीं रही हो जीवती?’ मैंने कुछ अविश्वास ज़ाहिर करते हुए कहा।

‘मैंऽऽ, नहीं, बिलकुल नहीं, यह नज़ारा तुम्हें बना रहा है, दीप ! हम जितने थिर हैं, उतने ही चंचल भी हैं।’

‘तुम्हार कोई क़सूर नहीं है, क्योंकि तुम चंचल होते हुए भी कमज़ोर नहीं हो...।’

उस रात मेरी विचारधारा में काफ़ी हलचल रही। सैर से लौटते ही मैं जीवती के पास ही रह गया।

जीवती अपने कमरे में जाकर सोई, लेकिन मैं एक पल के लिये भी न सो सका। सोचते-सोचते मेरे सामने गोपी की सूरत उभर आई। गोपी, एक कॉलेज गर्ल, एक ऐसी कॉलेज गर्ल जिसकी आँखों के आगे लाल, हरे नोट सदा तैरते रहते थे। एक ऐसी कॉलेज गर्ल, जिसके दिल में नर्म गद्दों पर सोने की ख़्वाहिश रहती, जिसके दिल में मोटरकार में सैर करने की तमन्ना रहती थी।

ऐसी कॉलेज गर्ल गोपी, उसके साथ रहकर अपने ढोंग भरी मुहब्बत के एवज़ पैसे और मदहोशी का सामान न पाकर उससे दूर हो गई। एक ग़रीब कला प्रेमी और ढोंग भरी मालदार कॉलेज गर्ल का भला क्या मेल?

मैं दिल को तसल्ली देता रहा, सोचता रहा, सोचते-सोचते मेरा ध्यान जीवती की ओर मुड़ा, उसकी शख़्सियत की ओर मुड़ा, उसकी मुहब्बत की ओर मुड़ा और मुझे महसूस हुआ जैसे मैंने कुछ भी न गँवाकर, बहुत कुछ पाया हो।

एक दिन मैंने उससे कहा - ‘जीवती, कविता से शुरू हुई यह घटना, अब तो कहानी बनने लगी है।’

वह मंद-मंद मुस्कराने लगी - ‘ऊँ... हूँ.... कहानी छोटी होती है, दो चार दिनों की, या ज़्यादा से ज़्यादा कुछ महीनों की। मैं तो इसे पूरा उपन्यास बनाना चाहती हूँ।’

मैं उदास हो गया। यह सुनकर और कोई जवाब न दे सका। मुझे उदास देखकर उसके चेहरे पर भी उदासी के आसार फैल गए। उसने ग़मगीन लहज़े में कहा- ‘चुप क्यों हो गए, दीप ?’

मैंने उसके सवाल का जवाब न देते हुए उससे पूछा - ‘एक सवाल पूछूँ, जीवती ?

यह सुनकर वह और भी उदास हो गई, बोली - ‘क्या तुम और भी कुछ पूछना चाहते हो दीप ?’ मैंने कहा - ‘पूछना नहीं, बहुत कुछ सुनना चाहता हूँ’ और आँखों में भरपूर उदासी लिये उसकी ओर देखने लगा। यह सुनकर वह और सहम गई। मेरी छाती में चेहरा छुपाते हुए कहा - ‘कहो।’

मैंने कहा - ‘यह तुम्हारा पहला प्यार है न ?’

‘हाँ’, उसने आहिस्ता से जवाब दिया।

‘पहले प्यार की तड़प और समर्पण को तुमने समझा है, इसलिये तुम्हें सुना रहा हूँ जीवती ज़िंदगी में मैंने भी एक बार ऐसा प्यार किया था। पर उस प्यार ने मुझे धोखा दिया। मेरी ज़िन्दगी वीरान हो गई। मैं सोचने लगा, मेरे इस पीड़ित जीवन का अंत क्यों नहीं होता? मगर एक और विचार फिर करवट लेता कि एक ही तो ज़िन्दगी मिली है, उससे भी इतनी नफ़रत क्यों ? उसके बाद कोई भी मुझे अपनी ओर खींच नहीं पाया। बहुत सालों बाद जब फिर तुम्हें अपनी ओर आते देखा, तब वह पीड़ा साकार रूप से मुझे परेशान करने लगी, वही पीड़ा जो नाकाम मुहब्बत का अंजाम होती है, इसलिये चाहते हुए भी तुम्हें ‘ना’ नही कर सका। सोचा मुझ जैसी पीड़ा तुम्हें न मिले। जीवती उसके लिये मैंने कोशिश भी की, कोशिश ही नहीं, बेहद कोशिश की, पर मुझे यह मुमकिन ही नहीं लगता। टूटा हुआ पत्थर शायद फिर जुड़ जाए पर टूटा हुआ दिल जुड़ नहीं सकता!’

मैंने कुछ देर रुककर फिर कहा - ‘उस वक़्त मैं जीवन से तंग आ चुका था। एक दिन घर बार को तिलांजली देकर हिमालय पहाड़ की ओर चल पड़ा, तद्पश्चात् काशी, हरिद्वार, नाशिक, अम्बरनाथ, बद्रीनाथ न जाने कहाँ-कहाँ भटका। मैंने अपने भीतर उठती आँधी को शांत करना चाहा।’

मैंने जीवती की ओर देखा, उसकी आँखों से दो आँसू बहे, नीचे न गिरकर, वहीं उसकी पलकों पर ठहर गए। मैंने फिर धीमे-धीमे कहना शुरू किया - ‘बीते हुए जीवन ने मेरी प्यास को बढ़ा दिया है। मैं बख़ूबी यह जानने का प्रयास कर रहा हूँ कि पुरुष क्या है ? स्त्री क्या है ? और दोनों के होने का महत्व क्या है ? इसलिये भी मैं शादी नहीं करना चाहता। शादी से सुख मिलता है और सुख के उजाले में ज्ञान घट जाता है। मैं उसे अभाव के अँधेरे से सदा सुजाग रखना चाहता हूँ। प्रिय, क्या तुम मुझे इस काम में मदद नहीं करोगी ?’

वह सिसकने लगी। जब वह शांत हुई तो कहने लगी - ‘क्या तुम्हें ज़िंदगी में कभी भी स्त्री की ज़रूरत नहीं पड़ेगी ? स्त्री न सही, एक मित्र के नाते ही मुझे अपने पास रहने दो, मेरे दीप !’

‘हाँ, ज़रूरत तो सबको होती है। जानती हो, मैं रात को देर-देर तक भटकता रहता हूँ। अपनी हो, इसीलिये तुम्हें सबकुछ बता रहा हूँ। इस तरह क्या तुम्हारा अपमान नहीं होगा ?’

‘पर क्या तुम्हारे इस रवैये में मेरा अपमान नहीं?’

‘जीवती, तुम्हारा अपमान हो, यह मैं कभी नही चाहूँगा। तुम्हारा क्या किसी भी नारी का मेरे हाथों अपमान हो, यह न मैंने कभी चाहा है, न कभी चाहूँगा। जिसके बिना मेरा जीवन ही अधूरा है, उसका अपमान मैं कैसे कर सकता हूँ ? ख़ुद एक नारी के हाथों अपमानित होकर भी मैं यह सब कह रहा हूँ।’

उसने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा - ‘यह पीड़ा मैं कैसे सह सकूँगी, दीप ?’

‘असह्य अपमान होता है, पीड़ा नहीं, और पीड़ा सही नहीं, भोगी जाती है।’

‘प्रिये, तुम्हें देने के लिये मेरे पास पीड़ा के सिवाय और है ही क्या ?’

वह जैसे पत्थर की बुत बन गई। मैंने उसे बाहों में लेते हुए कहा ‘सोचता हूँ, तुम मेरी ज़िन्दगी में पहले क्यों न आई, क्यों न आई जीवती ?’

उसने उदास लहज़े में कहा - ‘क्या यह कहानी, कहानी ही रह जाएगी, उपन्यास न हो सकेगी ?’

मैंने उत्तर दिया - ‘ज़िन्दगी को एक कहानी ही रहने दो जीवती। उसको ज़बरदस्ती नॉवेल बनाने से वह कहानी भी न बन पाएगी।’

और फिर हमने एक दूसरे से विदा ली।

एक दिन, दो दिन, दो महीने, दो साल बीत गए हैं। उस दिन की बिदाई के बाद हमारा मिलना बंद हो गया, बंद ही नहीं बिलकुल ही बंद हो गया।

एक दिन अचानक जीवती आकर हा़ज़िर हुई, मैं उसकी तरफ़ देखता ही रहा। वह मेरे पास आकर बैठ गई। मेरे मुँह से निकल गया - ‘जीवती इतने दिनों के बाद तुम ?’

वो शरमाई नहीं, सिर्फ़ उदासी भरी हँसी हँसते हुए बोली - ‘तुम तो अभी महापुरुष हो गए हो। तुमको मैं पूरी तरह समझ ही न पाई।’ ‘देवी, मैं महापुरुष नहीं, प्रोफेसर बन गया हूँ ?’

‘खैर, छोड़ो इन बातों को, अभी मैं शादी कर रही हूँ, और यही तुम्हें सुनाने आई हूँ।’

मैं गंभीर हो गया। बोला - ‘जीवती तुम सदा सुहागन रहो और भगवान करे तीनों लोकों का सुख पाओ।’

वह शांत खड़ी रही।

मैं ख़ामोशी में गुम, उसकी ओर देखता ही रहा।

अचानक उसने कहा - ‘दीप, हमारी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। तुमने एक दिन कहा था कि - सतपुरुषों के सिवा पूर्णता नहीं होती।’

मेरे ऊपर जैसे बिजली गिरी।

वह बिलकुल मेरी क़रीब आई, कहने लगी - ‘सोचा था, दुनिया में अतृप्त और अपूर्ण रहकर भी जिया जा सकता है, लेकिन लगता है जीवन की कथा को यह अंत नहीं दिया जा सकता। यह सच मेरी ज़िंदगी में बहुत पहले प्रकट हुआ था, पर फिर भी मन की आन की वजह से मैं उसे ज़ाहिर न कर सकी। मुद्दत से मेरी एक तमन्ना थी दीप, सोचती थी ज़िंदगी में भले एक ही कहानी हो, लेकिन वह पूरी तरह से संपूर्ण हो। किसी भी पहलू से वह अपूर्ण और अधूरी न हो। यह चाहत थी कि मैं तुम्हारे बच्चों की माँ बनूँ, तुम्हारे बहुत सारे बच्चों की माँ !’

वह कुछ रुकी और फिर कहने लगी ‘आज मैं अपनी इस कहानी को पूरा करने आई हूँ, मेरी कहानी तुम्हारे छुहाव के बिना अधूरी ही रहेगी, कभी भी पूरी न होगी। मुझे अपना लो मेरे दीप, मुझे क़बूल कर लो।’

जीवती की कहानी पूरी हो गई है और मेरी कहानी जैसे नए सिरे से शुरू हुई है। जीवती संपूर्ण हो गई है, मैं अपूर्ण रह गया हूँ, उफ़ मंज़िल किसकी, मिल किसको गई !

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