रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - जियो और जीने दो

सिन्धी कहानी

जियो और जीने दो

clip_image002-देवी नागरानी

मैंने चाय की दूसरी बार प्याली भर ली, और उसके खत्म होते ही ग़लीचे पर अपने पेट के बल लेट गई। सिलसिलेवार आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे, कितने तो मैं चाय की पहली प्याली के साथ पी गई थी। इस तन्हाई के आलम में यही सोचती रही कि शायद साथ पाना मेरे हिस्से में न था या मैं खुद को उसके लिये तैयार ही न कर पाई थी।

‘ये अपने पास निशानी के तौर पर रख लो कभी याद की वादी से गुज़रो तो इस भाई को ज़रूर याद करना’, छोटे भाई सुरेन के ये शब्द मुझे आज भी याद हैं।

जब बाबा गुज़र गए तो हम दोनों भाई-बहन अपने-अपने शहरों से हवाई जहाज़ से उनके आख़िरी दर्शन करना आ पहुँचे, पर क्या हम बाबा को देख पाए ? न उन्हें छू पाए? अपने दर्द को सहलाते हुए जब हम वहाँ पहुँचे तो देखने को मिली उनके शरीर की गर्म राख जो शोलों के होम से इक मुट्ठी भर ढेर बनकर रह गई थी। क्या देखने की तमन्ना थी और क्या देखने को मिला। बाबा की उँगली से निकाली ली गई अंगूठी, जो बाद में सुरेन को दी गई, वही मोती की अंगूठी, जुदा होने के पहले सुरेन ने मुझे दी थी। आज उसे देखकर मुझे भाई की बहुत याद आई। जाने क्यों लगा कि उड़कर भाई के पास जाऊँ उसके सीने से लगकर रोऊँ। बाबा की कोठी की चाबियाँ भी उसने मुझे दे दी थीं। सिसकियाँ लेकर रोते हुए मुझे अहसास हुआ कि कोई मेरे पीछे खड़ा है।

‘अम्मा’, मैंने आवाज दी। अम्मा अधेड़ उम्र की बेवा थीं, जिसका इस जहान में अपना कोई न था। काम की तलाश में एक दिन वह मेरी चौखट पर आई और मैंने उन्हें घर के अन्दर ले लिया। आज तक वह जी जान से मेरी ख़िदमत करती आ रही हैं, कभी उस चौखट के बाहर न जा पाई। इस घर की वीरान चारदीवारी में उसने जैसे जान फूँक दी, जहाँ वीराना बसता था वहाँ बहारों की ताज़गी ले आई। सुन्दर फूलों को लाकर गुलदान सजातीं, भारी भरकम पर्दे उतारकर जालीदार पर्दे चढ़ा देतीं, जहाँ से बाहर की पारदर्शी सुन्दरता भी अन्दर झाँकने लगती। कभी बालों में तेल डालकर अपनी उँगलियों से मस्तिष्क को सहलाती, कभी अपनी गोद में सर रखकर बालों को सहलाती और यही अहसास मुझे मेरा बचपन लौटा देता। व्यंजन बनाकर खिलाने में भी उसका जवाब न था। पाँच दिन तो काम पर जाने की आपाधापी में कुछ कर न पाती थी, पर शनिवार, रविवार को ख़ूब पकाती और गर्म-गर्म पकवान सामने रखकर खाने का आग्रह इतने प्यार से करती कि नकार न पाती। कभी दाल-पकवान, तो कभी बेसन की भाजी, कभी जवारी की रोटी, ऊपर से मक्खन धरा हुआ, तो कभी शीरा-पटाटा-पूरी ! वो ख़ासकर उस दिन बनाती जिस दिन उमेश आने वाला होता। उसे हर एक की पसंद-नापसंद का ख्याल रहता था।

‘कहो उर्मी, मैं यहीं तुम्हारे पीछे खड़ी हूँ। देख रही हूँ कि तुम्हारी चाय ठंडी हो गई। उठो, मैं एक गर्म कप चाय बनाकर लाती हूँ।’

‘अच्छा, पर एक नहीं दो बना लाओ, मेरे और अपने लिये भी।’

अम्मा रसोई की तरफ मुड़ी और मैं अपने ही कहे पर हैरान होती रही, सदा एकान्त में अपनी तन्हाइयों को ओढ़कर बैठी रहती हूँ, गुमसुम ! आज तक कभी अपने आप को किसी के साथ बाँटने की कोशिश नहीं की, पर आज...? बीते दिनों की यादें मेरी सोचों का हिस्सा बन चुकी हैं, और उनके साथ जीना मेरी फ़ितरत। पर बीते कुछ दिनों से एक घुटन का अहसास मेरे मन को मथता रहा। उमेश ने मेरा बहुत समय अपने नाम कर लिया था। इसमें कोई शक़ नहीं कि उसमें मेरी भी चाहत शामिल रही। ऑफ़िस के काम के बाद लौटकर घर आते ही मैं शाम के सात बजने का इन्तज़ार करती। हर शाम वह इसी समय मुझे लेने आता, कभी कार में तो कभी मोटर बाईक पर और हम दोनों घंटों तक हवाओं की लय-ताल पर कभी समन्दर के किनारे, कभी रेस्टोरेंट में कॉफ़ी पीते। मुझे लगने लगा कि उमेश मेरे साथ ख़ुश है, बहुत खुश और वह भी मुझे भाने लगा था। आज भी उसका मुस्कुराता हसीन चेहरा मेरी आँखों के आगे बिन बुलाये आ जाता है। विश्वास कहूँ या अंधविश्वास पर उन दिनों मुझे कभी यह ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई कि मैं उसके बारे में कुछ ज़्यादा जानूँ। वो कहता रहता था - ‘उर्मी तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, शायद तुम मेरे लिये ही इस ऑफ़िस में आई हो, मैं तुम्हारा बॉस ही नहीं तुम्हारा दोस्त भी बनकर रहना चाहता हूँ, उसी दायरे में जिसकी नींव पर हमने दोस्ती की शुरुआत की।’ इस प्रकार की गुफ़्तगू की ओर मैं ज़्यादा ध्यान न देते हुए, उसके साथ की ख़ुमारी में खो जाया करती थी।

उमेश की शख़्सियत का यह पहलू मुझे मुतासिर किया करता था कि उसने कभी भी मेरे साथ कोई बदसलूकी नहीं की। मेरे काम को सराहते हुए मेरी हिम्मत अफ़ज़ाई की। शामें साथ गुज़ारते हुए जो हसीन यादें बीते पलों की धरोहर आज मेरी अपनी है। फिर भी जाने क्यों आज मेरे दिल में उमेश के लिये कोई भाव नहीं उभरता। उससे नफ़रत कर पाऊँ यह तो मुमकिन ही नहीं। वह अच्छा साफ़ दिल और अच्छी नीयत रखने वाला इन्सान है, जिसने आज़ादी का सही अर्थ समझा। ‘जियो और जीने दो’ उसके निजी क़िरदार की पहचान रही और शायद इसी कारण मुझे पहले-पहल उसकी नज़दीकी भाई। उसके साथ प्रेम का नाता जोड़ा जो अरसे तक क़ायम रहा, पर आज यह भी मेरा फ़ैसला है कि मैं उसके साथ की मोहताज कम और एकांत की शाइक बनी हुई हूँ। सालों तक साथ रहा पर सुविधा के आधार पर कोई भी किसी की रुकावट नहीं बना और न ही किसी ने चाहा कि कोई बंधन उन्हें बाँधे !

‘‘तुम बात का ग़लत मतलब निकाल रही हो उर्मी ! मुझे दायरे में क़ैद करने की कोशिश कर रही हो। मैं खुद आज़ादी का कायल हूँ, तुम्हें मैंने पहले भी कहा था कि हम कभी भी एक दूसरे की रुकावट नहीं बनेंगे।’’

एक दिन मैंने उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा और वह तुरंत ‘हाँ’ न कर सका। कारण जानने की कोशिश में मैंने क्या उधेड़ दिया पता नहीं ? पर उमेश की नाराज़गी ने हम दोनों को सवालों-जवाबों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया।

‘उर्मी हम अच्छे दोस्त हैं, और मैं वादा करता हूँ कि हमेशा ही तुम्हारा दोस्त रहूँगा, इससे ज्यादा मैं तुमसे कुछ नहीं कह सकता।’

यह सच है कि उमेश की मेरे साथ इस सिलसिले में कभी कोई भी बात हुई न थी। फ़र्म में मुलाज़िम जैसा और बाहर एक अच्छे दोस्त जैसा व्यवहार रहा। वह उस दिन से मेरा खैरख़्वाह रहा, जिस दिन मेरा इन्टरव्यू लेकर मुझे अपनी सेक्रेटरी की जगह दी। इसे मैं उसकी ख़ासियत कहूँ या सद्गुण कि वह ऑफिस में सबको इज़्ज़त देता और अपने मुलाज़िमों से इज़्ज़त और वफ़ादारी की उम्मीद भी रखता। वह मुझसे बहुत ख़ुश था पर इन लक्ष्मण रेखाओं में मैं भी शामिल थी। ऑफ़िस में वह जितना सोबर और सीरियस रहता था, बाहर मेरे साथ उतना ही ख़ुश, बच्चों की तरह मुस्कुराता, खिलखिलाता, गुनगुनाता हुआ, कभी-कभी मेरे ज़ोर देने पर वह यह ग़ज़ल गाता....

‘सीने में सुलगते हैं अरमाँ आँखों में उदासी छाई है।’ और उस दौरान उसकी उदास आँखों में नमी तैर आती।

दरवाज़े पर आहट के साथ आवाज़ आई ‘उठो चाय लाई हूँ, गर्म-गर्म पी लो’ कमरे की बत्ती जलाते हुए अम्मा ने कहा। शाम ढलकर रात होना चाह रही थी, साढ़े पांच बजे ऑफिस से आकर गुमगुम-सी खोई रही, अब साढ़े सात बजे थे। दो घंटे समय कैसे सोचते हुए गुज़र गया पता ही न चला।

‘तुम भी मेरे पास ही बैठ जाओ चाय लेकर।’ वह ज़मीन पर वहीं बैठ गई। चाय की चुस्की भरते हुए सोचती रही कि यह तन्हाई भी कितनी नीरस है जो इन्सान को यादों की गहरी वादी की अंधेरी गुफ़ाओं में ले जाती है। अगर घर में अम्मा न होती तो न जाने और कितने घंटे इन्हीं सोचों में खोई रहती।

‘अम्मा तुम शाम को इसी तरह मेरे साथ चाय पिया करो।’

‘उर्मी, आज उमेश तुझे लेने नहीं आया?’ घड़ियाल की ओर देखते हुए अम्मा ने पूछा।

‘नहीं, अब वह कभी नहीं आएगा।’ मैंने भीगी-सी आवाज़ में कहा ‘क्यों उर्मी क्या हुआ है ?’ अम्मा ने अपनाइत से अपना हाथ मेरे घुटनों पर रखते हुए फिर सवाल किया।

‘‘यही तो मुझे नहीं मालूम और न मैं जानना चाहती हूँ। आज २८ तारीख़ है, परसों तीस तारीख़ से मैं ऑफ़िस का काम छोड़ दूँगी। फिर हम यहाँ नहीं रहेंगे, बाबा की कोठी में चलेंगे, तुम मेरे साथ चलोगी न अम्मा ?’’ ऐसा कहते हुए मेरा गला भर आया। मैंने अपनी रुलाई को विराम देने के लिये चाय की प्याली को होठों तक लाई। पर दुख ने कुछ यूँ घेरा कि न चाय पी सकी, न आँसू। प्याली वापस रखते हुए अम्मा का हाथ अपने हाथ में लेकर चूमते हुए कहा-

‘‘अम्मा तू मुझे अकेली छोड़कर न जाना, अब मेरा यहाँ कोई नहीं है, बाबा भी चले गये, भाई.. !’’ कहकर मैं बच्चों की तरह रोने लगी और उन आँसुओं के अक्स में मैंने उमेश को फिर-फिर कहते सुना, ‘‘पर मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता, उर्मी मुझसे बार-बार उसका कारण न पूछो। हम दोस्त हैं, दोस्त रहेंगे, प्लीज़ समझने की कोशिश करो।’’

‘‘क्या समझूँ ? तुम कुछ कहो तो समझूँ। अभी तो मुझे यही समझ में आ रहा है जैसे मैं तुम्हारे लिये सिर्फ़ एक साधन हूँ शाम का वक़्त गुज़ारने का। जिसके साथ तुम दो- तीन घंटे मन बहलाते रहते हो...।’’

‘‘यह गलत है उर्मी, न मेरी नीयत में कुछ है, न तुम्हारी... बस हमारी समझ अब मेल नहीं खाती।’’ ऐसा कहकर उमेश ने अपना सर दोनों हाथों के बीच जैसे नोचना चाहा।

‘पर मुझमें क्या कमी है कि...?’

मेरी बात को काटते हुए उमेश ने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और आँखों में आँखे डालते हुए कहा - ‘‘उर्मी फिर कभी यह लफ़्ज इस्तेमाल न करना, कमी तुममें नहीं मुझमें है, बस !’’ इतना कहकर वह बच्चों की तरह रोने लगा।

मैं हैरान और परेशान उसे देखती रही, उसके मासूम चेहरे को जिसको उसके ही आँसुओं ने अभी अभी धोया था, किसी गहरे घात से हल्दी की तरह ज़र्द हुआ चेहरा।

दूसरे दिन ऑफ़िस में उसने मुझसे और मैंने उससे आँखें चुराईं, बिना ज़्यादा बातचीत के दिन गुज़रा और शाम को घर आई। उमेश के बहुत समझाने के बावजूद उसके साथ बाहर घूमने सैर करने न जा सकी। दिल को कोई तो चोट पहुँची है, कहीं तो दरार आई है जो दिल जुड़ने का नाम ही नहीं लेता।

‘सर में थोड़ा गर्म तेल डालती हूँ राहत मिलेगी। ’ कहते हुए अम्मा एक तसरी में गरम तेल ले आई। मेरा सर अपने घुटनों पर रखते हुए अपनी उँगलियों के पोरों से मेरे खुले बालों में तेल डालती रही फिर काफ़ी वक़्त कंघी से मेरे बालों को सहलाती रही। मुझे बहुत आराम मिला। शायद तेल का असर था या अम्मा के सामीप्य का था जो मुझे राहत देता रहा।

मुझे अपनी नौकरी व उस अधूरे प्यार को खोने का ज़्यादा अफ़सोस न था जितना अपने आप को उस गहरे आघात से बचाने पर संतोष था। बाबा के बारह दिन के बाद जब सुरेन वापस जा रहा था तो कोठी की चाबियाँ मुझे देते हुए बोला - ‘उर्मी ज़िन्दगी में छोटे-बड़े हादसे दरपेश आएँगे। कभी तुम्हें ज़रूरत पड़े तो बाबा की यह कोठी आकर बसाना, मुझे ख़ुशी होगी।’

चाबी लेते मुझे बहुत हैरानी इस बात पर हुई कि छोटा होते हुए भी वह बड़ी गहरी बात कह पाया। भविष्य के गर्भ से इन्सान को क्या हासिल होता है यह आज जानना मुश्किल है। हाथों में वही चाबियों का छल्ला, सामने बंधा हुआ सामान और नीचे टैक्सी लेने गई हुई अम्मा। ‘जियो और जीने दो’ कितना सही कहा था उमेश ने। उसने वाक़ई मुझे जीने दिया पर शायद मैं ऐसा न कर पाई। औरत की फ़ितरत ही शायद ऐसी है: वह पूर्णता चाहती है। जिसे अपना समझती है उसे बंटा हुआ नहीं देख सकती, चाहे वह प्यार ही क्यों न हो। उसे पूर्णरूप में पाने के लिये वह जीना तो क्या मरने तक को तैयार हो जाती है। मगर एक अपूर्ण, अधूरी ज़िन्दगी को गुज़ारना ‘जीना’ तो नहीं ! ‘जीने दो’ तो बहुत दूर की बात है कौन किसको जीने दे यह एक अनसुलझी गुत्थी है।

मैं फिर सोच के जाल में उलझ गई। इन्सान कितना मतलबी होता है, अपनी सुविधा से अक्षरों का जाल बुनकर एक आज़ाद ज़िंदगी को क़ैद बख़्शता है।

‘उर्मी चलो, नीचे टैक्सी खड़ी है।’ सामान के पीछे-पीछे मैं भी उसी राह पर चली जहाँ बाबा की कोठी, उनका आँगन मेरी बिखरी जवानी को आगोश में लेने के लिये आतुर था।

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