सोमवार, 26 अगस्त 2013

सुजाता शुक्ला की कहानी - यायावर

यायावर

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वो यायावर था ।अलग अलग स्थान जाना न सिर्फ उसका शौक था, बल्कि उसकी प्रवृत्ति थी ।

उम्र के हिसाब से भी ज़्यादा जगह का भ्रमण कर चुका था वो ,इन दिनो वो एक पहाड़ी रास्ते से होकर चमोली पहुंचा था पहाड़ की खूबसूरत वादियाँ उसके मन को लुभा रही थी झरनों का निर्मल स्त्रोत उसके मन में शांति का अनुभव करा रहा था । वो एक चट्टान के किनारे बैठ गया और उसकी खूबसूरती को निहारने लगा ।सहसा उसके मन में आया ,बिलकुल इसी की तरह हूँ मैं। भला झरनों के निर्मल को कोई बांध पाया है । कहाँ से निकल के कहाँ बही चली जाती है अनवरत , क्या कभी ये कोई सोच पाया है ।मगर उसका लक्ष्य है बहना और निरंतर बहते रहना । किस तरफ बह के जाएगी उसे भी नहीं पता शायद मैं भी इसका अनुकरण कर रहा हूँ।

वो सोच ही रहा था कि किसी पहाड़ी धुन से उसकी तंद्रा भंग हुयी । कुछ पहाड़ी लड़कियां पहाड़ी गीत गाते उसी कि ओर चली आ रही थी वे समूह में थी देख कर लग रहा था मानो आज उनका कोई त्योहार है पहाड़ी कपड़ों में सुसस्सजित नख तक शिख तक शृंगार किए हुए ये लड़कियां खुशी से आल्हाड़ित हो रही थी कुछ  बच्चे भी उनके साथ तालियाँ बजाते हुए चले आ रहे थे अब मुझे जाना चाहिए उसने सोचा और उठकर खड़ा हो गया थोड़ी दूर आगे बढ़कर उसके कदम ठिठक गए प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य में कहीं कहीं वृक्षों कि डालियों में खिले फूल ईश्वर की अनुपम कृति का आभास दे रहे थे ऐसा लग रहा था मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो वो अकचका कर अपलक उधर निहारने लगा जीवन भी तो उस ईश्वर की ही सौगात है सुख और दुख के साये में पलते बढ़ते हम कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता और एक दिन इस नश्वर देह को त्याग कर चल पड़ते है उस अनंत यात्रा पर ।

उसने सामने देखा कुछ एक यात्री रह में चलते दिखाई पड़ रहे थे उसने देखा एक बुजुर्ग व्यक्ति पालकी में बैठकर पहाड़ के ऊपर चढ़ रहा है ।मन में जाने क्या क्या आस रहती है जिसे पूरा करने हर व्यक्ति अनवरत प्रयास करता रहता है वह बुदबुदाया । मगर यह आस किसी की पूरी हो पाती है किसी की अधूरी । वो आगे चल पड़ा कहाँ जा रहा था उसे खुद भी नहीं पता । रास्तों में बीच बीच में कुछ दुकान सजी थी जहां कुछ धार्मिक पुस्तकें रत्न भगवान की तस्वीरें इत्यादि बिक रही थी ।लोगो की भीड़ वहाँ पर दिखलाई पड़ रही थी कुछ एक लोग बगल के भोजनालय में आराम की दृष्टि से बैठे थे ।कुछ एक भोजन कर रहे थे । वो सोचने लगा जीवन एक आनंद है एक उत्सव है ।

थक तो वो भी चुका था मन हुआ की भोजनालय में जा कर कुछ खा ले अचानक ज़ोर की आवाज़ के साथ न जाने कहाँ से पानी का सैलाब आया । वो कुछ समझ पाता उससे पहले ही वो उस पानी में बह चला उसके कानों में चीख, पुकार, चित्कार , रुदन साफ सुनाई पड़ रहा था ।उसके बाद उसे याद नहीं कि क्या हुआ । जब उसने आँख खोली तो अपने आप को किसी दूसरे गाँव में पाया पूछने पर पता चला कि बचाव दल की मदद से वो बच पाया है ।चार दिन की कमजोरी के बाद आज वो बेहतर महसूस कर रहा था । उसने दूर तक दृष्टि घुमायी । चारों ओर तबाही ही तबाही का मंज़र नज़र आ रहा था । वह सोचने लगा कि थोडे वक्त पहले जिस कुदरत की करिश्माई सुंदरता की वह मिसाल दे रहा था वह आज उसी के हाथो नष्ट भी हो गयी । ठीक उसी तरह जिस तरह जीवन जीते जीते इंसान जाने कब इंसान मौत के आगोश में आ जाता है , उसे पता ही नहीं चलता । ये सब एक अनबूझ पहेली है जिसको समझना इंसान के बस में नहीं है । वो डगमगाते हुए धीरे धीरे आगे बढ्ने लगा । विचारों को विराम देकर उसने आगे की राह पकड़ी । आखिर वो यायावर था , रुकना उसकी प्रवृति नहीं थी । बढ़ चला वो एक नए अंजान राह की ओर ।

 

सुजाता शुक्ला,  ,रायपुर (छत्तीस गढ़ ),पिन 492007

परिचय := एम एस सी वनस्पति शास्त्र से करने के बाद कुछ महीने कॉलेज में अध्यापन

आकाशवाणी रायपुर से कविता कहानियाँ प्रसारित ,नवभारत पेपर सहित अन्य

पत्र पत्रिकाओं में कहानी कवितायें एवम लेख प्रकाशित ,वर्तमान में आकाशवाणी रायपुर में नैमित्तिक उद्घोषिका एवम दूरदर्शन में कार्यक्रमों का संचालन

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  1. बहुत ही सुन्दर कहानी...सरल और सौम्य शब्दो मे सुजाताजी.... आपकी लेखनी को नमन ... इन्सानी भावो को प्रक्रति से जोड्कर जो समां बांधा है आपने और फ़िर विचारो की गंगा को दर्शन की और मोड दिया.. ऐसा निराला कार्य आप जैसी सुलझी हुई कहानीकार ही कर सकती है....! शत-शत नमन...!

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  2. धन्यवाद आपका ----- सुनीत त्यागी जी

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