शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

राजीव आनंद की लघुकथाएं

कैद और रिहाई

बिना जुर्म के कैद तोते को पिंजरे में देखकर रामदीन को महसूस होने लगा था कि वह तोते के साथ जुर्म कर रहा है. ईश्‍वर के बनाए इस दुनिया में सभी जीव को स्‍वतंत्र रहने का जन्‍मसिद्ध अधिकार है.

रामदीन को कैद और रिहाई का भेद उन दिनों ज्‍यादा स्‍पष्‍ट हो गया था जब वह रास्‍ते में एक लड़की को छेड़ते हुए कुछ युवकों से उलझ गया तथा गश्‍ती पुलिस युवकों के साथ रामदीन को भी हवालात में डाल दिया था. पूरे चौबीस घंटे हवालात में रह कर निकलने के बाद रामदीन समझ गया था कि कैद क्‍या होता है और रिहाई किसे कहते है. घर पहुंच कर रामदीन ने सबसे पहला कार्य यह किया कि तोते को भर पेट चना और हरी मिर्च खिलाया, पानी भी पिला दिया और बड़े प्‍यार से पिंजरे का दरवाजा खोल दिया. तोता पल भर में हवा से बातें करने लगा, रामदीन पिंजरे को दूर फेंक कर खुश हो रहा था.

सत्‍य ही तोते की जगह बागों में है, आसमान के बादलों के बीच है, रामदीन आंखों से ओझल होते तोते को देखते हुए सोच रहा था.

बेकार धन

नाजायज तरीके से धीरज बाबू ने कोर्ट के किरानी रहते अकूत धन इकट्‌ठा कर लिया था. नाजायज धन रखना उनके तनाव का कारण बनता जा रहा था. पहले तो तनाव से उन्‍हें मधुमेह की बीमारी हुई, कई पाबंदियों के घेरे में आ गयी थी उनकी जिंदगी. नाजायज धन गलत आदतों को बढ़ावा देता है लिहाजा धीरज बाबू भी अपनी शराब और सिगरेट की लत को पूरी तरह छोड़ नहीं पा रहे थे जबकि चिकित्‍सकों ने शराब और सिगरेट को उनके लिए जानलेवा बताया था. शराब और सिगरेट का सेवन करने से उनकी बीमारी में इजाफा होता गया.

चिकित्‍सकों ने धीरज बाबू को खाना से ज्‍यादा दवाईयां खाने को दे दिया था. उनका अकूत धन उनके कोई काम नहीं आ रहा था. उनके धन का उपभोग चिकित्‍सक, कम्‍पाउंडर, दवाई दूकानदार कर रहे थे.

एक दिन कुछ रिश्‍तेदार धीरज बाबू के यहां आए. धीरज बाबू ने धन का धौंस जमाने के लिए शराब और कबाब के पार्टी का आयोजन कर डाला. रिश्‍तेदारों का साथ निभाने के नाम पर धीरज बाबू शराब और कबाब का बिना सेवन किए नहीं रह सके. दूसरे दिन रिश्‍तेदार सभी अपने-अपने घर चले गए और धीरज बाबू अस्‍पताल पहुंच गए. लाखों रूपए खर्च करने के बाद भी खून का उच्‍च और निम्‍न दबाव का संतुलन न बन पाया, रक्‍त में चीनी मीठा जहर घोल दिया था. धन पानी की तरह बहाया फिर भी होश में न आ सके धन धीरज बाबू के लिए बेकार साबित हुआ.

वापसी

राजधानी दिल्‍ली में रहने का रोहन को गर्व था. रोहन अपने गांव बेकारबांध जाता था तो वहां प्रायः अपने मित्रों से कहा करता था कि तुम सब काफी आलसी हो गए हो, दिल्‍ली में तो मैं अब तक अपने दिनचर्या से फारिग होकर चालीस-पचास मील दूर अपने कार्यालय पहुंच चुका होता हॅूं. तुम लोगों का क्‍या है अपने बाप के कमाई पर जिंदगी बसर कर रहे हो और बेकार हो.

राजू ताश के पत्‍ते बांटता हुआ रोहन को कहा कि यार रोहन, माना की हम यहां बेकार है परंतु दस वर्षों से दिल्‍ली में रहते हुए तुमने कौन सी उपलब्‍धि हासिल कर लिया है ? बल्‍कि तुम तो बसों और कारों का धुंआ पीते-पीते द‍मे के रोगी हो चले हो, हमलोगों के साथ अब तुम खेतों में भाग भी नहीं सकते, तालाबों में नहा भी नहीं सकते, मडुआ और कुर्थी खा भी नहीं सकते, पचा भी नहीं सकते. बस का इंतजार सुबह और शाम करते-करते तुमने जिंदगी के दस वर्ष खपा दिए, तुम्‍हारे दिल्‍ली में रहने से न तो तुम्‍हारे मॉ-बाप खुश है और न ही तुम खुश हो.

यहां बेकारबांध में हम सब बेकार सही पर खुश तो है. राजधानी में रहने का गर्व रोहन का काफूर हो चुका था. रोहन ने राजधानी से बेकारबांध के वापसी का मन बना चुका था.

फैसला

रूपेश नामक वकील अपने एक अन्‍य वकील मित्र संजय को कह रहा था कि यार अविश्‍वासी मोवक्‍किल, विरक्‍त वकील, निराश न्‍यायाधीश के बीच आकर मैंने कोई गलती तो नहीं कर दिया ?

संजय ने कहा कि मैं पिछले पांच वर्षों से यही देख रहा हॅूं कि हमारी कमाई प्रतिदिन उतनी भी नहीं जितना फुटपाथ पर चाय बेचने वाला कमा लेता है. अभी भी देर नहीं हुई है रूपेश अगर रोजगार का कोई और जरिया अपना सकते हो तो अपना लो क्‍योंकि मैंने तो यही पाया है कि विधि शिक्षा को उपयोगी बनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है, अंग्रेज जैसा कानून छोड़ गए थे हमलोगों उसे अक्षरशः पालन कर रहे है, प्रैक्‍टिसरत वकीलों का कोई मूल्‍यांकन नहीं, प्रशिक्षण की कोई अनिवार्यता नहीं और नियम का उल्‍लंघन करने वालों के लिए कोई दंड़ नहीं.

रूपेश सोचने लगा कि संजय सच कह रहा है. आयरलैंड़ पैनल कोड और इंडियन पैनल कोड में काई अंतर नहीं सिवाए आयरलैंड की जगह इंडियन लगा होने के, इसके बावजूद हमलोग उसी पैनल कोड का पालन करते आ रहे है. अंग्रेजों ने ठंड़े प्रदेश से आकर हमलोगों को काला कोट पहना दिया और हमलोग गर्मी में भी कोट पहन कर बड़े शान से चिलचिलाती धूप में अंग्रेजों की धरोहर समझ कर पहने जा रहे है. अंग्रेज चले गए तो कोट को भी कम से कम गर्मी में तो छोड़ देना चाहिए. निगरानी तंत्र ही उदासीन है तो ये सब कौन करेगा.

वकील को चाय की दुकानों में मोवक्‍किल फंसाते देख कर रूपेश का मन छोटा हो चुका था. उसने फैसला कर लिया कि कोई भी धंधा करेगा पर वकालत नहीं करेगा.

राजीव आनंद

सेल फोन - 9471765417

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