रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - जीने की कला

सिन्धी कहानी

जीने की कला

clip_image002-देवी नागरानी

पाँव में पायल पहने छम छम करती हिरनी जैसी चाल से थिरकती, वह संगीत की लय और ताल पर हाथ, पाँव और नयनों के हाव-भाव से ताल मेल रखते हुए नृत्य करती रही और जब नृत्य समाप्त हुआ तो देर तक हॉल में तालियों की गूँज सुनाई देती रही और सा

थ-साथ उसके एक और आवाज़ जो सुनाई दे रही थी वह थी ‘वन्स मोर, वन्स मोर’ और यह आवाज़ यका-यक बंद हो गई, जैसे स्पीड में चलती हुई गाड़ी को अचानक ब्रेक लग गया हो।

स्टेज का पर्दा जो डान्स के बाद नीचे गिरा था, फिर उठा और दर्शकों की आँखें स्टेज पर जाकर ठहरीं। उनकी मन पसंद कलाकार हज़ारों दिलों की धड़कन, नृत्य जगत की मयूरी पूर्णिमा, उनके सामने खड़ी थी। पर यह क्या ? उसका रंग रूप क्यों उजड़ा हुआ है, चेहरे पर पसीने की बूँदें, आँखों में बुझती हुई रोशनी की लौ क्यों है? होंठों की लाली की जगह गहरे साए, और गालों की रंगत ऐसे उड़ी हुई, जैसे किसी ने उनपर सफेदी पोत दी हो। दो साथी कलाकारों का सहारा लेकर खड़ी थी, खड़ी भी नहीं, यूँ कहे कि जैसे उन दो बैसाखियों के आधार पर लड़खड़ाने से बची हुई थी पूर्णिमा, जिसकी चाल कुछ पल पहले हिरणी की तरह थिरक रही थी। वह इस वक़्त सहारे की मोहताज थी, क्यों ? चेहरे पर खिले हुए सुमन की लाली की जगह सफ़ेदी छाई हुई है, क्यों ? मुस्कान मुरझाई हुई क्यों ? हर एक मन में सवाल पर सवाल उठा, जिसका उत्तर सभी हॉल में बैठे दर्शक पाना चाहते थे। पर सब चुप थे जैसे उन्हें साँप सूँघ गया हो। ‘वन्स मोर, वन्स मोर’ बोलने वाली ज़ुबानों पर जैसे ताले लग गये थे... और... शांति के इस सन्नाटे को तोड़ा एक जानी-पहचानी लर्ज़िश भरी आवाज़ ने। यह आवाज़ किसी और की नहीं पर प्रिय पूर्णिमा की माँ निर्मला देवी की थी, जो बेटी के साथ, उसका सहारा बन कर आँखों में नमी लिए हाथ जोड़े खड़ी थी !

‘प्यारे दोस्तों मैं अपनी ओर से और आपकी महबूब कलाकार पूर्णिमा की ओर से माफ़ी माँगती हूँ। आज पहली बार आपकी फरमाइश पूरी न करने का दुख है और दुगना और दुख इस बात का है कि आज मेरी बेटी का दुख आपके दुख का कारण बना है। पूर्णिमा दिल की मरीज़ है, दिल के दौरे ने अभी-अभी दस्तक देकर फिर उसे हमारे सामने इस हाल में खड़ा कर दिया है। इसमें शायद आप सब की दुआएँ और शुभकामनाएँ शामिल है जो वह आपके सामने नृत्य कर पाई। अब आप हमें इजाज़त दें। पुर्णिमा की डॉक्टर भी अब आ गई है’ ऐसा कहते हुए निर्मला देवी ने बेटी को सहारा देकर स्ट्रेचर पर लिटाया, जो उसी वक़्त स्टेज पर लाया गया था। डॉ. ममता ने वहीं पर जांच करने की करवाई शुरू कर दी और देखते ही देखते भागमभाग का तहलका मच गया। स्ट्रेचर अस्पताल की गाड़ी में रखा गया और गाड़ी चली गई आगे और आगे, जब तक आँखों से ओझल नहीं हुई। और पीछे रह गया चाहने वालों का काफ़िला, जिनके हाथ दुआ के लिये उठे हुए थे। बिना होंठ हिलाए की गई प्रार्थना हारे हुए इन्सान का एक मात्र आधार होती है, दिल की गहराइयों से निकली यह निशब्द बंदगी हर खाली दामन को भरने का एक मात्र सचा और सशक्त साधन है, जहाँ दिल की बात कहने के पहले सुन ली जाती है, हर अनकहे सवाल का जवाब दिल के किसी कोने में राहत बख़्शता है, दवा से पहले दुआ की दौलत से ऐसी बन्दगी मालामाल कर देती है !

थोड़ी देर में हॉल खाली हो गया, न आवाज़ था, न शोर, बस ख़ामोशी रही, यूँ लगा जैसे कोई मंदिर से, तो कोई गिरजा घर से और कोई मस्जिद से मालिक की रहमत की दुआ माँगकर निकला हो, उस कलाकार के लिए जो दिलों की धड़कनों का संचार करती रही और आज उसका दिल अपनी बहकी-बहकी चाल के साथ अस्पताल की ओर जा रहा था।

निर्मला देवी आय.सी.यू के बाहर लगातार अपनी बेचैनियों के साथ टहल रही थी। बेटी के दर्द और उसकी असहनीय पीड़ा का भरपूर अहसास था उसे। यह कोई पहला अवसर नहीं था, जो ऐसा हुआ हो, पहले भी दो बार नृत्य करते हुए ऐसा हो चुका है। पहली बार तब जब पूर्णिमा सात साल की थी और दूसरी बार जब वह मैट्रिक में पढ़ा करती थी। पहली बार ही डॉक्टर ने जाँच करके ज़ाहिर किया था कि उसके दिल में सुराख़ है जो उसकी बढ़ती हुई उम्र के साथ-साथ बढ़ता रहेगा। जब-जब दिल की धड़कन तेज़ होगी, उस पर दबाव का डर बना रहेगा। डॉक्टरों ने तो यहाँ तक कहा और निर्मला देवी को आगाह भी किया कि नृत्य कला का यह शौक पूर्णिमा के लिए ख़तरे से खाली नहीं होगा। नृत्य के दौरान दिल की धड़कन की रफ़्तार इतनी तेज़ हो जाती है कि आम इन्सान को भी ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ती है। पूर्णिमा तो... ! इस हक़ीक़त को निर्मला देवी ने माँ होकर जाना, भोगा और पल-पल जिया। हर सच्चाई के दौर से गुज़रते हुए वह इस बात से बहुत अच्छी तरह से वाक़िफ़ थी और उससे ज़्यादा दर्दनाक बात यह है कि वह अपनी बेटी के लिए कुछ न कर पाने बेबेसी महसूस कर रह थी।

पाँच साल की उम्र से ही पूर्णिमा ने इस कला की शिक्षा पानी शुरू की। गाना और नाचना दोनों साथ-साथ चलते रहे, पर जल्द ही उसे गाने की इच्छा को त्यागना पड़ा क्योंकि गाते समय साँस रोककर सुर लगाने में दुशवारी पैदा हो रही थी और संगीत बिना रियाज़ के कहाँ पूर्ण होता है ? पूर्णिमा नृत्य को कभी भी ख़ुद से अलग न कर पाई। माँ के हर तर्क का जवाब था उसके पास ‘अगर मैं शरीर हूँ तो नृत्यकला मेरी आत्मा है, अगर आत्मा शरीर से जुदा कर दी जाए तो शरीर मुर्दा हो जाएगा। अगर नृत्य मुझसे छुड़ाया जाएगा तो मैं भी मर जाऊँगी।’ बस यहीं आकर इस तर्क के सामने माँ तो नहीं, लेकिन माँ की ममता निश्चित ही हार जाती थी।

जब पूर्णिमा मैट्रिक में थी तो अलविदा पार्टी में नृत्य संगीत का भी आयोजन किया गया था। पूर्णिमा ने माँ और अपनी डॉक्टर की सलाह को नज़र अंदाज़ करके नृत्य में भागीदारी ली। रियाज़ करते-करते वह थक कर हताश हो जाती, पर जैसे प्यार और जंग में सब उचित होता है, उसी प्रकार पूर्णिमा को भी लगा कि जीवन के साथ जुड़ी यह मौत की छाया भी उसके साथ-साथ रहेगी जब तक उसके जीवन की साँसें सलामत है, उनके साथ जूझना भी जंग के बराबर है। कोशिश करना अगर करम है तो फिर करम कैसे नावाजिब हो सकता है ? उसी तर्क से वह खुद को, माँ को तसल्ली दिया करती थी। इस संघर्ष की राह पर कभी पैदल चलकर, कभी दौड़ते, कभी हँसते-नाचते, कभी स्ट्रेचर पर लेटे, वह अपने इस इकलौते शौक़ को संघर्ष का एक हिस्सा मानकर बड़े साहस के साथ आगे बढ़ती। इस जुनून की बेइंतिहाई पर, इलाज करने वाले डॉक्टर भी हैरत में पड़ जाते थे। डॉक्टर ममता अक्सर पूर्णिमा और उसकी माँ निर्मला देवी के साथ प्रोग्राम के दौरे में भी शामिल रहती थी, कब जाने किस दुविधाजनक स्थिति में उसकी ज़रूरत पड़ जाए। कभी तो उसे लगता था कि शायद अभी, हाँ बस अभी, दिल धड़कते-धड़कते थम जाएगी, रुक जाएगी, पर ऐसा होता नहीं था। पूर्णिमा का शरीर रूपी तन, मन मयूर रूपी आत्मा एक लय, एक ताल पर ज़िंदगी के सुर ताल पर नृत्य करते साँसों का साथ निभाते। आत्मा भी कभी मरती है ? अगर नहीं तो उसका आवरण बना शरीर कैसे कुम्हला सकता है जिसमें ऐसी अमर आत्मा वास करती है, जो साँसों के साज़ पर रक्स करती है, हर पल, हर क्षण, दिन-रात, आद जुगाद से...!

डॉक्टर भी हैरान हो जाते थे पूर्णिमा की ऐसी बातें सुनकर, जो वह दलीलों के तौर पर अपनी चाहत को ज़िंदा रखने के लिए पेश करती। वे ऐसे मौकों पर मुस्कराते हुए बाहर आते, निर्मला देवी को आश्वासन देकर, उसे पूर्णिमा के होश में आने का इंतज़ार करने को कहते। माँ ही तो थी, वह माँ जो अपनी ममता के आगे कमज़ोर थी, कुछ और नहीं सिर्फ़ पूर्णिमा के होश में आने का इंतज़ार करती। वह जानती थी कि बेटी जब-जब ज़्यादा वक़्त नाचेगी उसे फिर-फिर इस दौर से गुज़रना होगा, पीड़ा को भोगना पड़ेगा, उन पलों को जीना होगा, यही नियति है।

‘मैडम आप मरीज़ से मिल सकती हैं’ यह नर्स की आवाज़ थी। निर्मला देवी ने कमरे में भीतर आकर बेटी के चेहरे पर एक नूर देखा, लगा जैसे किसी ने अजंता एलोरा की मूर्ति में जान फूँक दी हो। पूर्णिमा का माथा दमक रहा था, आँखें विनम्रता की नमी से उजली, होंठों की मुस्कान जीवन के विश्वास के साथ भरपूर, जैसे अनन्त से आती हुई धुन पर थिरकती हुई उसकी धड़कन विलीनता में डूबी हो, जहाँ शरीर शरीर नहीं रहता, वह आत्मा में घुल-मिल गया हो।

निर्मला ने थोड़ा आगे झुककर उसका माथा चूमते हुए कहा ‘दूसरे महीने में पूर्णमासी की रात’ के लिए इन्सिट्यूट वाले तारीख़ माँग रहे है, क्या कहूँ उनसे?’

‘वही जो हमेशा कहती हो, तुम्हारी आशीष से ही मैं तुम्हारे हर डर को झूठा साबित करके, तुम्हारी हर नाराज़गी से बच जाती हूँ। इसलिए तुम खुशी-खुशी हाँ कर दो माँ। दो-तीन दिन यहाँ आराम, दो तीन दिन घर में आराम, फिर वही सिलसिलेवार थकान! हर पड़ाव पर रुकना, सांस लेना और फिर आगे बढ़ना और मंजिल को नज़र में रखते हुए आगे और चलते रहना ही तो जीवन है। माँ, मेरी प्यारी माँ ! चलने दो, यूँ ही चलने दो इस सिलसिले को। हाँ, एक शर्त है, मेरे सफ़र में तुम ही मेरी हमसफ़र रहो, तुम्हारे कदमों के नक़्शे-पा पर चलते हुए मैं ज़िन्दगी का सफ़र तय करूँ। तुम मेरी कश्ती और तुम ही खिवैया हो, तुम्हें ही इसे पार लगाना है !’ कहते हुए पूर्णिमा ने आँखें बंद कर ली जैसे वह सच में ही आराम की तलबगार हो।

‘चल पगली, चल अब बस कर। जानती हूँ कि तू गुणी और ज्ञानी है। इस में कोई शक नहीं, मैं ही तेरी नाव और तेरा खिवैया, चल अब थोड़ी देर आराम कर ले’ कहते हुए निर्मला देवी ने उसके सर पर स्नेह भरा हाथ फेरते हुए उसके माथे को चूम लिया। उसे यक़ीन-सा होता जा रहा था कि पूर्णिमा ने अपने जीने के मक़सद को पहचाना है, और साथ में जीने की कला पर भी महारत पा ली है!

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