बुधवार, 11 सितंबर 2013

कुमार गौरव अजीतेन्दु के 100 शेर

मेरे सौ शेर

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चाहता तो हूँ बहुत लिखना ग़ज़ल तुझपे सनम,
देश के हालात से लेकिन नजर हटती नहीं। (1)

शौक से बिछवाइए काँटे हमारी राह में,
मुश्किलों के बिन मिली मंजिल मजा देती नहीं। (2)

हारने की ले नहीं पाये कभी तालीम हम,
जीतना भर सीख के शिक्षा ही लेनी छोड़ दी। (3)

रोज ही दिखला रहे जो आप हमको आइने,
एक दिन फुरसत से उनमें खुद को भी तो देखिए। (4)

तारीफें करते नहीं थकते थे कलतक आप तो,
ये अचानक क्या हुआ, सबसे बुरे हम हो गये। (5)

तन ढके इसके लिये पहले कमाते थे सभी,
अब कमाने के लिये तन को उघारा जा रहा। (6)

जा रहे हो दूर लेकिन याद रखना जानेमन,
गर्दिशों में लौटकर वापस यहीं तुम आओगे। (7)

लाख तूफां भी जिसे मिलकर डिगा पाये नहीं,
वो गिरे कैसे भला तुम पिद्दियों के जोर से। (8)

आपका ईमान बाजारू था सो वो बिक गया,
हमसे ऐसी कोई भी उम्मीद रखिएगा नहीं। (9)

यूँ हमारे सब्र को मत आजमाओ जालिमों,
खाक हो मिट जाओगे नक्शे से ही संसार के। (10)

हाँ बहुत हथियार होंगे पास में तेरे मगर,
जंग लड़ने के लिए हमसे तो जिगरा चाहिए। (11)

दे रहा पहरा खड़ा मुस्तैद कुत्ता क्या करे,
चोरियाँ मालिक ही मर्जी से अगर करवाए तो। (12)

चीथड़े तनपर पड़े "मैडम" के भी "फुलवा" के भी,
फर्क केवल शौक औ' मजबूरियों का है यहाँ। (13)

हाथ से तलवार गिरने की नहीं परवाह कर,
हिम्मतों की डोर को बस छूटने देना न तू। (14)

कहाँ है शुद्धता बाकी बाजारों से नजारों तक,
सभी चीजों में "गौरव" अब मिलावट का जमाना है। (15)

आनेवाले कल की जाने ये कैसी तैयारी है,
देसी रोटीपर बाहर का पिज्जा-बर्गर भारी है। (16)

बारूदी उन थैलों की भारी बेशर्मी तो देखो,
खुद को भाईचारे का संदूक बताते फिरते हैं। (17)

घर के कुछ गद्दारों की जहरीली कारस्तानी है,
जुर्म किया अंगारों ने, कहलाया दोषी पानी है। (18)

शर्म होती दुश्मनों में दोस्तों से सौ गुना,
वो निभाते धर्म अपनी जानपर भी खेलकर। (19)

चार पन्ने क्या किये काले कि शायर बन गये,
घूमते हैं महफिलों में खूब गरदन तानकर। (20)

हमने बसाया देश को अपने जिगर में इस कदर,
बच ही नहीं पाई जगह महबूब अब तेरे लिये। (21)

सुना है भेड़ियों के घास खाने के अभी दिन हैं,
पिएंगे खून फिर आराम से वो बाद में आकर। (22)

वतन के काम से इक पल की फुरसत ही नहीं मिलती,
कहाँ है वक्त महबूबा की खातिर सोच पाने का। (23)

कहें कुछ पर करें कुछ और, काफी लोग हैं ऐसे,
तभी तो आज दुनिया में जहन्नुम का नजारा है। (24)

सुना अब तक सिखाती ठोकरें इंसान को सबकुछ,
जो ठोकर खा के भी सीखें नहीं उनको कहें क्या हम। (25)

लगता है युग बीत गया अब कोयल-मैना-तोते का,
तब ही सुर-सरगम के नगरों मे गदहे चिल्लाते हैं। (26)

सुखाये थे कुएं, तालाब, दरिया आपने कितने,
लगी जब आग तो कीमत हुई मालूम पानी की। (27)

नजर का कीजिए उतना यकीं जितना जरूरी हो,
नजर से खा चुके धोखा मिले हमको कई अब तक। (28)

वो आये थे लगाने के लिए कालिख हमें लेकिन,
पुता अपने ही चेहरों पर बड़े मायूस हो लौटे। (29)

वहाँ बारूद बरसों से जमा था,
गिरी तो आज बस चिनगारियाँ हैं। (30)

शीशे का घर ही बनाना चाहता है वो तभी,
पत्थरों को दूर दरिया में कहीं फिंकवा रहा। (31)

गर्मी इतनी ज्यादा सबके सिरपर चढ़के बोल रही,
जाड़े के मौसम में भी सारे नंगे हो जाते है। (32)

चाहते हैं वो तो आ जायें बनाकर टोलियाँ,
हम अकेले ही बराबर हैं समूची फौज के। (33)

जवानी की खता का भार आया सिर बुढ़ापे के,
बेअक्लों, बेलगामों का यही अंजाम होता है। (34)

तारीफों की तलाश में भटके वो इस कदर,
शिकवों-शिकायतों की ही खाई में जा गिरे। (35)

आग से डर उसे क्या लगे,
जो समंदर सा विकराल है। (36)

बदनामियों के डर से जो करते गुनाह हैं,
ऐसे शरीफ कोढ़ लगाते समाज को। (37)

बदसूरतों के शह्र में मिलता न आइना,
बेकार कोशिशें न करो लौट जाओ घर। (38)

फन चार पैसे को तरस जाता मगर,
मुँहमाँगी कीमत पा जाती हैं बोटियाँ। (39)

अकेला चना भाड़ क्या फोड़ लेगा,
यही सोचना तो पड़ा उनको भारी। (40)

कठपुतलियों के नाच में रक्खा ही क्या होता भला,
उनको नचाते हाथ की बाजीगरी ही देखिये। (41)

बड़ी बातें किया करते थे अंधेरे से लड़ने की,
जरा सा तेल तो दीपक में तुम भर ही नहीं पाए। (42)

गलतियाँ आवाम से चाहे हुई जितनी भी हों,
गालियाँ देती सियासत को हमारी पीढियाँ। (43)

फर्शपर हम थे तो वो हमसे बचाते थे नजर,
अर्शपर आते ही कितने पास देखो आ गये। (44)

रातभर आपने था रुलाया उसे,
माफ कैसे करे वो सुबह आपको। (45)

दुख के आँसू पोंछनेवाला मिला कोई नहीं,
सुख के आँसू बाँटनेवाले हजारों आ गये। (46)

मत अँधेरे में कभी देखा करो तुम आइना,
डूब जाओगे गलतफहमी के इक तालाब में। (47)

आइना जो झूठ बोले मिल नहीं पाया कहीं,
लौट आया आज भी वो घूम के बाजार से। (48)

ऊँची उड़ां की चाह मे नादानियाँ होती रहीं,
सैयाद खुश था जाल बिन उसको परिंदे मिल गये। (49)

मासूमियत क्यों दिख नहीं पाई परिंदों की तुझे,
जो छातियों का मांस बिन देरी नजर में आ गया। (50)

कोई पा गया है जरूरत से ज्यादा,
किसी को जरूरत का आधा मिला है। (51)

थूकने पे भी बज उठती हैं तालियाँ,
चापलूसी का आलम जरा देखिये। (52)

डूबती कैसे भला कश्ती किसी तूफान में,
भाग्य में उसके लिखा था सागरों को जीतना। (53)

सूरमा उनके सभी तो मात खा के भाग निकले,
बेबसी में अब गड़े मुर्दे वो बाहर ला रहे हैं। (54)

दूसरों का खून पी के जी रहे जो फक्र से,
फिक्र उनको ही जियादा है अमन औ' चैन की। (55)

फिक्र क्या थोड़ी नहीं कल की तुम्हें बेगैरतों,
हाथ में बच्चों के जो हथियार पकड़ाने लगे। (56)

दूध, काजू, किशमिशों, बादामवाली खीर वो,
बेमजा, बेकार बस कुछ कंकड़ों से हो गई। (57)

चूक आँखों से ही होती जल्दबाजी में सदा,
आइना वर्ना कभी गलती किया करता नहीं। (58)

जिंदगी जो नहीं कर सकी,
मौत ने काम वो कर दिया। (59)

धुंध ही धुंध है इस जगह,
राह आगे की दिखती नहीं। (60)

बुद्धिजीवी आज का मैं हूँ नहीं,
जो फरिश्ता मान लूँ हैवान को। (61)

जब लगा पाये नहीं इक दाग भी वो सब मुझे तो,
खीज में कीचड़ मेरी परछाईं पर अब फेंकते हैं। (62)

मोमबत्ती से सही में इंकलाब आता अगर,
तो भगत सिंह की जरूरत ही नहीं पड़ती हमें। (63)

मुफलिसी का हाल हमको क्या बताना साथियों,
हमने भी रातें गुजारी झोंपड़ों में खूब है। (64)

किसी का घर जला इससे तनिक मतलब कहाँ उनको,
वो तो मशगूल हैं इस मामले को बस भुनाने में। (65)

धमाका हो गया बाजार में, काफी गिरी लाशें,
खबरिया चैनलों के भाग्य से टूटा पुनः छींका। (66)

आदमीयत की बड़ी बातें वो करते थे सदा,
वक्त आनेपर मगर हैवान पहले बन गये। (67)

कंटकों को पुष्प कहने का चलन ऐसा हुआ,
जख्म खाना बन गई चाहत सभी की आजकल। (68)

कल बिना छतरी चले तो बारिशों में घिर गये,
आज लेकर आये हैं तो बूँद भी टपकी नहीं। (69)

अपनी सूरत ही बदलने का जतन अब कीजिये,
लाभ कुछ होना नहीं है आइनों को तोड़कर। (70)

बादलों छँट जाओ भी काफी समय से हो घिरे,
देखना दिल चाहता अब साफ-सुथरा आसमां। (71)

शहद में डूबे अल्फाजों के कुछ दाने खिलाकर वो,
हिकारत की बड़ी कड़वी कई घूँटें पिलाते हैं। (72)

बहुत दिन से न फूटे बम न ही इज्जत लुटी कोई,
जरा सोचो खबरिया चैनलों का हाल क्या होगा। (73)

करती शिकायत टूटी सड़कों की चमकती जूतियाँ,
घिसती-लटकती चप्पलों को कुछ नजर आता नहीं। (74)

बड़ा काफी वो खुद को मान के बैठा,
चलो थोड़ा उसे सागर दिखाते हैं। (75)

अब नजर का दोष या अंधी मुहब्बत जो कहें,
पर समझने में उन्हें गलती तो हमसे हो गई। (76)

अगर थूका भी उसने तो बड़ी क्या बात है इसमें,
हमेशा की तरह वो बाद में तो चाट ही लेगा। (77)

दीया जलाने के लिये आया नहीं था वो यहाँ,
अपनी विदेशी ब्रांड की माचिस दिखानी थी उसे। (78)

आसमां को ही न सबकुछ मानना पंछी कभी,
इस जमींपर ही उगे पेड़ों पे तेरा नीड़ है। (79)

दूरतक जाती महकपर नाज है उनको मगर,
इत्र की खुशबू भला टिकती ही कितनी देर है। (80)

अनछुई चीजें नहीं मिलती कहीं भी आजकल,
हर बड़ी-छोटी दुकानों में ही "ट्रायल रूम" है। (81)

रूढ़ियों का फेर भारी है बुरा,
फेंक देता अंधता के कूप में। (82)

गरीबी के ही दमपर तो पनपती ये अमीरी है,
गरीबी मिट गई तो हाल उस दिन जाने क्या होगा। (83)

उन्हें क्या फिक्र है जो खाक गुलशन हो गया भी तो,
परिंदे हैं कहीं जा के नया घर फिर बना लेंगे। (84)

अब जमाना नकलियों का हो गया,
असलियों की खैर लेता कौन है। (85)

दूसरों की जात जो हैं पूछते,
नीच सबसे तो उन्हीं की जात है। (86)

जीत मिल गई तो समझ लो दिन हुआ,
हारने का नाम ही तो रात है। (87)

हमने तो करवट ही बदली थी जरा,
क्या पता था जलजला आ जाएगा। (88)

किसी की मौत की चर्चा नहीं होती,
किसी का छींकना खबरों में आता है। (89)

आपने फेंका हमें गढ्ढे में कहके कोयला,
हम दबे मिट्टी के अंदर और हीरा बन गये। (90)

खिड़कियों को खोलिये पर जाँच के,
संग क्या लेकर हवाएं आ रहीं। (91)

पूर्णिमा हो या अमावस,
रात आखिर रात ही है। (92)

नये कल की कहानी आज स्याही लिख नहीं सकती,
लगाना खून अब होगा हमें हालात हैं ऐसे। (93)

पनपती पौधपर पानी किसी ने भी नहीं डाला,
लगे फल तो चले आये सभी अब हक जताने को। (94)

याद करने के नहीं काबिल किया कुछ आपका,
हाँ बहुत बातें पड़ीं दिल में भुलाने के लिये। (95)

इश्क पहले से बहुत बदनाम है,
तू तो अब कोई न ऐसा कामकर। (96)

जिंदगी ने इस कदर तोड़ा उसे,
मौत को लगने लगा बेकार वो। (97)

कीमतों की देखकर ऊँची उड़ां,
रो पड़ी फिर मुफलिसी बाजार में। (98)

तोड़कर ताले चुरा लो लाख सिक्के तुम भले,
इक भरोसा तोड़ के सूई भी ले जाना नहीं। (99)

करें किससे शिकायत हम यहाँ "गौरव",
सभी तो आये हैं फरियाद ही ले के। (100)

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रचयिता - कुमार गौरव अजीतेन्दु

शाहपुर, पटना - ८०१५०२ (बिहार)

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