शनिवार, 28 सितंबर 2013

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 3 - आर्जव

3. आर्जव

मार्दव से आर्जव का परिपाक होता है। विनम्रता से सरलता आती है तथा सरलता से निष्कपटता की वृत्ति विकसित होती है। सरलता से अपने दोषों की आलोचना करनेवाला व्यक्ति माया एवं मद से मुक्त हो जाता है।

आर्जव के विरोधी भाव माया, छल, कपट एवं कुटिलता हैं। जिस व्यक्ति के हृदय में कपट एवं कुटिलता होती है उसकी दृष्टि आविष्ट, आविल एवं मलिन होती है। उसका जीवन कृत्रिम एवं असामाजिक बन जाता है।

माया के कारण वह यह नहीं समझ पाता कि ऋजु क्या है और कृत्रिम क्या है; कपट क्या है और निष्कपट क्या है? इस कारण माया से सौभाग्य का प्रतिघात होता है। छल एवं कपट से दुर्गुणों को प्रश्रय मिलता है। हमारा व्यक्तित्व कुंठाग्रस्त हो जाता है। छल एवं कपट का जिस व्यक्ति के जीवन में जितना प्राबल्य होगा उसके चेतन एवं अचेतन मन की भावना का अन्तर उतना ही अधिक होगा। ऐसे व्यक्ति की स्मरण-शक्ति, कल्पना, चित्त की एकाग्रता एवं इच्छाशक्ति दुर्बल होती जाती हैं। मानसिक ग्रन्थियाँ दृढ़तर होती जाती हैं। उसमें न तो चरित्र बल रह जाता है और न व्यक्तित्व की पवित्रता। कपट के कारण व्यक्ति खुल नहीं पाता, अचेतन मन की खोज करके प्रत्येक प्रकार के द्वन्द्व को चेतना की सतह पर नहीं ला पाता। उसके अचेतन मन में जो भाव एवं विचार एकत्र होते हैं वे उसके व्यक्तित्व को विभाजित कर देते हैं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दुःखों की जड़ हमारे ही मन में है। ग्रन्थियों के कारण हम अन्तर्मन की खोज नहीं कर पाते तथा दुःख का कारण सदा बाह्य वातावरण में खोजते रहते है। सत्य जानने का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। अंधेरी कोठरी में बन्द व्यक्ति अपने से ही लड़ता रहता है। मानसिक संघर्ष के कारण बाहरी जगत में संघर्षात्मक स्थितियाँ उत्पन्न कर लेता है। अहंकार मन के कपट को बढ़ा देता है। ऐसी स्थिति में मानसिक बेचैनी, अकारण चिन्ता, भय, कल्पित शारीरिक रोग आदि उत्पन्न हो जाते हैं।

इन मानसिक रोगों से बचने के लिए निष्कपट होना होता है। निष्कपटता से मनुष्य का आन्तरिक संघर्ष चेतना की सतह पर आ जाता है। जो वासना, स्मृति एवं विचार दमित अवस्था में अचेतन मन में रहते हैं, वे चेतन मन के धरातल पर आ जाते हैं। इस प्रकार के प्रकाशन से अचेतन मन की ग्रंथियाँ ऋजु होकर शक्तिहीन हो जाती हैं। मन की गाँठें खुल जाती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति चेतन मन के धरातल पर स्वतः के प्रयत्न द्वारा सप्रयास आत्मनियन्त्रण कर सकता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति कपट के कारण अपना प्रकृत स्वभाव भूल जाता है। राग-द्वेष तथा इन्द्रियों के वशीभूत होकर जीव मन, वचन एवं शरीर से कर्म संचय करता है। मिथ्यात्व, अविरति प्रमाद एवं कषायों के कारण कर्मो का आस्रव होता है। इनका सामान्य परिचय इस प्रकार है: (1) मिथ्यात्व - अनादि से मिथ्या दर्शन कर्म के उदय से सभी संसारी जीवों को पर में मेरेपन की अनुभूति हो रही है। यही मिथ्यात्व है।

(2) अविरति - इन्द्रियों के विषय भूत बाह्य पदार्थों में प्रवृत्त होना अविरति है।

(3) प्रमाद - आत्म कल्याण तथा सत्कर्म में उत्साह न होना, आलस्य करना प्रमाद है।

(4) कषाय – आत्म-परिणामों में उत्पन्न हुई मलिनता का नाम कषाय है।

संक्षेप में कषाय के दो भेद हैं - (1) राग (2) द्वेष। विस्तार में इसके चार भेद हैं - (1) क्रोध (2) मान (3) माया (4) लोभ

(5) योग - काय, वचन और मन - इन तीनों के द्वारा आत्म-प्रदेशों में कम्पन के फलस्वरूप कर्म-वर्गणा की तरंगों का आत्म प्रदेशों की ओर आने को योग कहते हैं।

कर्म या माया के कारण आत्मा का शुद्व स्वभाव आच्छादित हो जाता है। इस तथ्य को प्रायः सभी दर्शन स्वीकार करते हैं। आत्मा (जीव) के साथ जैन दर्शन में पौद्गलिक कर्मों का, बौद्व दर्शन में तृष्णा का, वेदान्त दर्शन में माया का, कपिल-पतंजलि के सांख्य-योग दर्शन में प्रकृति का संयोग माना गया है। कपट एवं कुटिलता के कारण बन्धन की ग्रन्थियाँ जुड़ती जाती हैं। ‘आर्जव’ का पालन करने पर इन ग्रंथियों की जकड़न दूर हो जाती है, गाँठे ऋजु हो जाती हैं। हृदय सरल, स्पष्ट, निष्कपट हो जाता है। इसी के पश्चात् हृदय शुद्ध होता है। आत्म-संशोधन होता है, जहाँ धर्म ठहर सकता है। इसी कारण भगवान् महावीर से जब प्रश्न किया गया कि हृदय को पवित्र एवं शुद्ध किस प्रकार बनाया जा सकता है तो उन्होंने उत्तर दिया कि ऋजुता से हृदय को पवित्र किया जा सकता है- ‘माया विजएणं अज्जवं जणयइ (माया को जीत लेने से ऋजुता प्राप्त होती है)। (उत्तराध्ययन, 29/ 69)

गीता में भी आर्जव को साधना का एक प्रधान अंग माना गया है तथा इस शब्द का प्रयोग ‘मन वाणी की सरलता’ के अर्थ में किया गया है। अर्जुन को ज्ञान के साधनों के बारे में बताते हुए भगवान कृष्ण ने श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, अहिंसा तथा क्षमा के बाद ‘आर्जव’ को स्थान दिया है।

‘अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्’।। (गीता, 13/7)

कपट का परित्याग करके ही व्यक्ति सत्य की साधना कर सकता है तथा अन्तःकरण की शुद्धि कर सकता है। इस कारण ‘सत्य’ एवं ‘शौच’ के पालन के लिए ‘आर्जव’ भूमिका का निर्माण करता है।

स्वस्थ शरीर, शुद्ध मन तथा आत्मानुसंधान के अतिरिक्त सामाजिक विश्वास का वातावरण बनाने की दृष्टि से भी आर्जव का महत्व है।

कुटिलता के कारण पारिवारिक जीवन में अविश्वास उत्पन्न हेाता है। सामाजिक जीवन में छल, छद्म एवं विश्वासघात की वृत्तियाँ पनपती हैं। राजनैतिक जीवन कुटिलता का पर्याय बन जाता है। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के विकास के लिए तथा परस्पर मैत्री भाव के लिए जिस प्रकार मार्दव गुण आवश्यक है, उसी प्रकार आर्जव गुण भी आवश्यक है। मार्दव गुण के कारण अहंकार समाप्त होता है तथा मन, वचन एवं क्रिया की दुष्टता दूर होती है। आर्जव गुण के कारण छल, कपट, कुटिलता दूर होती है तथा मन, वचन एवं क्रिया की एकरूपता स्थापित होती है। मार्दव गुण के कारण व्यक्ति परिवार और समाज के अन्य सदस्यों के अस्तित्व की स्वीकृति प्रदान करता है। आर्जव गुण के कारण मैत्री भाव की आधारभूमि बनती है। मित्रता का आधार है- परस्पर निष्कपटता, स्पष्टवादिता तथा ईमानदारी। मित्रों के बीच कोई दुराव-छिपाव नहीं होता। माया के विषय में भगवान महावीर ने कहा है कि माया मित्रता को नष्ट कर देती है (माया मित्ताणि नासेइ)। (दशवैकालिक, 8/ 38)

पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में परस्पर मैत्रीभाव के लिए आर्जव गुण के सतत अभ्यास की आवश्यकता असंदिग्ध है। मार्दव के कारण हम दूसरों को अपनी विनम्रता से अपनी ओर आकर्षित करते हैं तथा आर्जव गुण के कारण सच्चे एवं सरल हृदय से मैत्री सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इसी कारण गौतम बुद्ध ने कहा कि जिस प्रकार कुशल बढ़ई लकड़ी को सीधा करके उससे सुन्दर खिलौने और विशाल भवन तैयार करता है, वैसे ही साधक अपने आपको सरल एवं सीधा बनाता है।

राजनीति के क्षेत्र में छल और कपट बढ़ रहा है। राजनीति को तात्कालिक स्वार्थसिद्धि एवं सत्ता प्राप्ति के कौशल के रूप में परिभाषित किया जा रहा है। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि राजनीतिज्ञों के जीवन में परस्पर अविश्वास, अपवित्रता एवं कुटिलता बढ़ती जा रही है। उनके प्रति आस्था की भावना घट रही है। राजनैतिक जीवन की सफलता एवं स्थायित्व के लिए जनता के मन में यह विश्वास होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि जो कह रहा है वही करेगा। जो राजनीतिज्ञ जनता का विश्वास खो देता है, उसका राजनैतिक जीवन समाप्त हो जाता है। वह अपने त्याग एवं जनसेवा के संकल्प की लाख दुहाई देता है किन्तु फिर भी जनता का बहुमत उसके कथन पर या तो विश्वास नहीं करता अथवा उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को संशय एवं सन्देह की दृष्टि से देखता है। इसके विपरीत जो राजनीतिज्ञ अपनी निष्कपटता एवं ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं, वे यदि एक शब्द भी बोलते हैं तो उसका जनमानस पर प्रभाव पड़ता है। उनकी बात पर विश्वास किया जाता है। राजनैतिक जीवन में भी स्थायी सफलता तथा लोक-विश्वास प्राप्त करने के लिए आर्जव गुण का महत्व है।

आधुनिक जीवन में आर्जव गुण की कमी के कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दुराव-छिपाव का वातावरण पनप रहा है। परस्पर अविश्वास एवं अनास्था से जीवन में विश्वासहीनता, उद्वेग, उत्पीड़न तथा भटकन बढ़ रही है। भरी-भीड़ में व्यक्ति अकेला होता जा रहा है। जीवन में संत्रास और निराशा की भावना बढ़ रही है। भौतिक साधनों की दृष्टि से आज व्यक्ति अधिक सम्पन्न हैं। सुख के साधन प्रचुर हैं। मन की कुटिलता के कारण ही अनावश्यक मानसिक तनाव तथा परस्पर अविश्वास से उत्पन्न विश्वासघात की भावना बढ़ रही है। व्यक्ति अपने ऊपर, अनेक प्रकार के मिथ्या आडम्बर लाद रहा है। प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। वह मानसिक विकारों का शिकार तथा उत्तरोत्तर ‘एबनार्मल’ बनता जा रहा है। अपने मन की परतों को न खोल सकने के कारण वह मानसिक तनावों में जी रहा है। कपटता के कारण परस्पर के मैत्री सम्बन्ध नष्ट होते जा रहे हैं। दूसरों को धोखा देने की, ठगने की, ऊपर से मित्र एवं हितेषी बनकर अन्दर विरोध एवं घात करने की समाजिक वृत्तियों के कारण हमारा जीवन भयावह हो उठा है। इनके समाधान का जो रास्ता पाश्चात्य विचारकों ने निकाला है, वह व्यक्ति को और अधिक भटका रहा है। साम्यवादी विचारधारा के कारण वर्ग संघर्ष की प्रेरणा तो मिली किन्तु मानव जाति में परस्पर अनुराग की भावना का पोषण नहीं हुआ। इसी प्रकार अस्तित्ववादी-दर्शन चेतनाओं में पारस्परिक सम्बन्धों की आधार-भूमि सामंजस्य को नहीं अपितु विरोध को मानता है। वह यह स्वीकार करता है कि एक व्यक्ति के अस्तित्व वृत्त तथा अन्य व्यक्तियों के अस्तित्व-वृत्तों के मध्य संघर्ष है।

बिना सामाजिक प्रेम, विश्वास एवं बन्धुत्व के व्यक्ति का जीवन सुखी नहीं बन सकता। इस कारण समाज में परस्पर मैत्रीभाव का होना आवश्यक है।

भोगवादी विचारधारा इन्द्रियों की तृप्ति में ही सुख मानती है। इन्द्रियों के सुख को ही जीवन का लक्ष्य मानती है। जैन दर्शन इस मान्यता को स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है। कामनाएँ तो आकाश के समान अनन्त हैं। मिथ्या आवरणों को हटाने पर ही प्रकृत स्वभाव का दर्शन सम्भव है। इसलिए हमारा सारा प्रयास यह होना चाहिए कि हमारी चेतना के ऊपर कपट, बेईमानी एवं मिथ्या आडम्बरों की जो अनेक तहें जम गयी हैं, उनको आर्जव के द्वारा हटा सकें। ऐसा करने पर हमारा जीवन सरल बन सकेगा। हम तनावों से मुक्त हो सकेंगे।

आर्जव का अर्थ प्रज्ञा-सम्पन्न व्यक्ति के द्वारा आन्तरिक सद्गुणों का विकास करना है, अचेतन मन की अनजानी दमित वासनाओं को चेतन मन के धरातल पर लाना है। ‘आर्जव’ आत्म-संशोधन की भूमिका का निर्माण करता है, व्यक्ति के चरित्र एवं व्यवहार को निष्कपट बनाता है, कषायों के बन्धनों को ऋजु कर विवेक की भूमिका प्रदान करता है तथा मिथ्या माया का आवरण हटा आत्मानुसंधान के रहस्य-द्वार के कपाट को थपथपाता है।

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माया विजएणं अज्जवं जणयइ।

माया को जीतने से आर्जव की प्राप्ति होती है।

जो चिंतेइ ण वंकं, ण कुणदि वंकं ण जंपदे वंकं।

ण य गोवदि णिय दोसं, अज्जव-धम्मो हवे तस्स।।

जो वक्र (कुटिल) विचार नहीं करता, वक्र (कुटिल) कार्य नहीं करता, वक्र(कुटिल) वचन नहीं बोलता और अपने दोषों को नहीं छिपाता, उसको आर्जव धर्म होता है।

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