मंगलवार, 10 सितंबर 2013

शकुन्तला यादव का आलेख - ऋषिपंचमी

 

आज ऋषिपंचमी है. भाद्रपक्ष की शुक्लपक्ष की पंचमी “ऋषीपंचमी” कहलाती है. इस व्रत के करने से ज्ञात-अज्ञात पापों का शमन हो जाता है, अतः स्त्री-पुरुष इस व्रत को करते हैं. इस व्रत मे सप्तर्षियों सहित अरुन्धती का पूजन होता है, इसीलिए इसे “ऋषिपंचमी” कहते है. सदियों से चली आ रही कथा को इस दिन बडी ही भक्ति-भाव से श्रवण किया जाता है. कथा इस प्रकार है.

कथा:- सतयुग में श्येनजित नामक एक राजा राज्य करता था. उसके राज्य में सुमित्र नाम का एक ब्राह्मण रहता था जो वेदों का ज्ञाता था. उसकी पत्नि जयश्री बडी साधवी और पतिव्रता स्त्री थी. वह खेतों में अपने पति को सहयोग देती थी. एक बार उसने अपने रजस्वला अवस्था में,अनजाने में उसने घर का सारा कार्य किया और पति का स्पर्ष कर लिया. दैवयोग से पति-पत्नि का शरीरान्त एक साथ हुआ. रजस्वला अवस्था में स्पर्षास्पर्श का विचार न रखने के कारण स्त्री को कुतिया की योनि में तथा पति को बैल के रुप में जन्म मिला, परन्तु पूर्व जन्म में किए गए धार्मिक कृत्यों के कारण उन्हें ज्ञान बना रहा. संयोग से इस जन्म में भी वे साथ-साथ, अपने ही घर में, अपने पुत्र और पुत्रवधू के साथ रह रहे थे.

ब्राह्मण के पुत्र का नाम सुमति था और वह भी अपने पिता की भांति विद्वान था. पितृपक्ष में उसने अपने माता-पिता का श्राद्ध करने के उद्देश्य से खीर बनवायी और ब्राह्मणॊं कॊ निमंत्रण दिया. उधर एक सर्प ने आकर खीर को विषाक्त कर दिया. कुतिया बनी ब्राह्मणी यह सब होता देख रही थी. उसने सोचा कि यदि इस खीर को ब्राह्मण खाएंगे तो विष के प्रभाव से मर जाएंगे और सुमति को पाप लगेगा. ऎसा विचार कर उसने खीर कॊ छू दिया. इस पर सुमति की पत्नि बहुत क्रोधित हुई और उसने चूल्हे से जलती लकडी से उसकी पिटाई कर दी और उस दिन उसे भोजन भी नहीं दिया.

रात्रि में कुतिया ने बैल से सारी घटना कह सुनायी. बैल ने कहा कि आज मुझे भी खाने को कुछ नहीं दिया गया, जबकि मैंने दिन भर खेतों में काम किया है. सुमति हम दोनों के ही उद्देश्य से यह श्राद्ध कर रहा है और हमें ही भूखों मार रहा है. इस तरह हम दोनों के भूखे रह जाने से उसका श्राद्ध करना व्यर्थ हुआ.

सुमति द्वार पर लेटा बैल और कुतिया की वार्ता सुन रहा था. वह पशुओं की बोली भलीभांति समझता था. उसे यह जानकर बडा दुख हुआ कि मेरे माता-पिता इस निकृष्ट योनियों में पडॆ दुख भोग रहे हैं. वह दौडता हुआ एक ऋषि के आश्रम में गया और अपने माता-पिता के पशुयोनि में पडने का कारण और मुक्ति का उपाय पूछा. ऋषि ने ध्यान और योगबल से सारा वृतान्त जान लिया. उसने सुमति से कहा तुम पति-पत्नि भाद्रपद शुक्ल की पंचमी को “ऋषिपंचमी” का व्रत करो और उस दिन बैल के जोतने से उत्पन्न कोई भी अन्न न खाओ. इस ब्रत के प्रभाव से तुम्हारे माता-पिता की मुक्ति हो जाएगी. उसने उस व्रत को किया और इस तरह उन दोनो को पशुयोनि से मुक्ति मिली. यह तो मात्र एक कथा है. इसमें कितनी सच्चाई है, यह हम नहीं जानते लेकिन भारत की धर्मप्राण जनता इस पर अपना विश्वास कायम रखते हुए बडी ही भक्तिभाव से इस व्रत को करते चले आ रहे हैं.

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  1. शकुंतलाजी, इसी तरह अन्य धार्मिक पर्वों की जानकारी देती रहें..प्रमोद यादव

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  2. आपकी यह रचना कल बुधवार (11-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 113 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    सादर

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  3. EK DIN APNA UPJAYA ANN KHANE KE LIYE UPJANA TO PADEGA. iSI SE BAIL KE SHRAM KA AHSAS BHEE HOTA RAHEGA.
    DHNYAWAD YAH KATHA SUNANE KA

    उत्तर देंहटाएं

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