बुधवार, 18 सितंबर 2013

....मैं खिन्न मन से बिदा ले रहा हूँ! (श्री गणेशजी का पत्र भक्तों के नाम)

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हाँ..... मैं खिन्न मन से बिदा ले रहा हूँ. बिदा लेना मेरी अपनी मजबूरी है और बिदा करना तुम्हारी. मैं क्यों अप्रसन्नता के साथ बिदा ले रहा हूँ, इसका कारण क्या तुम जानना नहीं चाहोगे? शायद यह तुम्हारी मजबूरी थी अथवा व्यस्तता, जिसके चलते शायद तुम्हें समय ही नहीं मिला कि मुझसे कुछ पूछते?. जब तुमने पूछना ही नहीं चाहा तो भला मैं बतलाता भी तो किससे.? तुमने तो मुझे केवल मिट्टी की मूरत समझा, जिसकी कोई जुबान नहीं होती. बस यहीं पर भूल हुई तुमसे. चलो मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि जब मेरी प्रतिमा पंडाल में लाई थी, तब उसमें जान नहीं थी लेकिन जब तुमने उसे स्थापित कर दिया और उसके बाद, उस विद्वान पंडित ने मंत्रों के द्वारा उस मूरत में प्राणप्रतिष्ठा की बस,उसी क्षण से मैं प्राणवान हो उठा था. अब मैं केवल एक मिट्टी का लोंदा भर नहीं रह गया था. अब मैं बोल भी सकता था, देख भी सकता था और सुन भी सकता था, लेकिन मेरे मन की व्यथा-कथा सुनने के लिए तुम्हारे पास न तो समय था और न ही पास बैठने का वक्त.!

अब तुम्हीं बताओ, मैं किससे बतियाता? मैं जो होता देख रहा था, वह देखना नहीं चाहता था और जो सुनना नहीं चाहता था,वह सुन रहा था. लगातार दस दिनों तक बैठे-बैठे मेरी देह दर्दों से भर गई थी. मैं एक क्षण भी वहाँ बैठना नहीं चाहता था,लेकिन मजबूरी में मुझे बैठना पड़ा था. लगातार दस दिन तक एक ही जगह पर अबोला बैठा-बैठा मैं उस दिन की प्रतीक्षा में था कि दसवें दिन तुम मुझे विसर्जित कर दोगे,लेकिन तुमने वैसा भी नहीं किया. मुझे अकारण ही दो दिन और बैठे रहना पड़ा, तब जाकर तुमने मुझे विसर्जित किया गया. मैं नदी की गहराई में तो जा समाया लेकिन मैं अपने मन की बात तुमसे कह नहीं पाया, बस इसी बात का संताप लिए मैं तुमसे बिदा ले रहा हूँ. मेरे विसर्जन के समय तुम बड़ॆ ऊँचे स्वर में चिल्ला रहे थे” पुढ्च्या वर्षी लौकर या”. मैं तो कभी दुबारा आना ही नहीं चाहता था लेकिन न आता तो कितने ही मूर्तिकार और कलाकारों को भूखे रहना पड़ता, .कितने ही परिवारों के घरों में चुल्हा नहीं जलता और न जाने कितने बच्चों को भूखा सो जाना पड़ता. बस उन्हीं के कारण मुझे दुबारा आने पर मजबूर होना पड़ा था.

तुम्हें याद है अथवा नहीं, यह तो मैं नहीं जानता, मुझे दुख तो उसी दिन हुआ था,जब तुम मूर्तिकार के पास मुझे लेने गए थे और तुम उससे मोलभाव करने लगे थे. मैं समझ नहीं पा रहा था कि एक गरीब कारीगर से तुम्हारा इस तरह व्यवहार करना क्या उचित था ? क्या तुम्हें इस बात का तनिक भी ध्यान नहीं आया कि उसने भूखा-प्यासा रहकर एक मूरत गढी थी. यह वह वक्त होता है जब उसे चार पैसे मिलते हैं. तुम्हें तो उसके श्रम के मूल्य को समझना चाहिए था और उसकी मांग से कुछ ज्यादा ही दे देना चाहिए था,लेकिन तुम यह जानते-बूझते कि तुमने चंदे के नाम पर ढेर सारी दौलत इकठ्ठी कर रखी थी, तुम आराम से उसे ज्यादा दे सकते थे और इसमें कोई हर्ज भी नही था,लेकिन तुम तो मोलभाव पर अड़ॆ हुए थे. इस बेचने और खरीदने के व्यापार को देखकर मुझे अपार पीड़ा हुई थी,क्योंकि मैं बिकने के लिए ही रखा गया था और तुम खरीदने के लिए एक खरीदार बने हुए थे. यह सब होता देख मुझे अपार पीड़ा हो रही थी लेकिन मैं खामोश था, शायद खामोश रहना मेरी अपनी मजबूरी थी और उस भोले-भाले मूर्तिकार की भी.

किसी तरह मैं इस पीड़ा को सह तो गया,लेकिन मुझे अब दूसरी पीड़ाएं भोगने के तैयार होना था. दूसरी पीड़ा तब हुई,जब तुम उस पंडित से भी दक्षिणा के लिए मोलभाव तय करने लगे थे. तुम अच्छी तरह जानते थे कि तुम अपनी जेब से कुछ नहीं दे रहे हो,लेकिन तुम उसे दो पैसे ज्यादा देने के पक्ष में ही नहीं थे. तीसरी पीड़ा उस समय हुई ती जब तुम उस पेंटर से भी पैसों के लेनदेन में अपनी बात में अड़ॆ रहे थे. मैं यह मानता हूँ कि तुम्हें पैसों के लेन-देन में सतर्कता बरतनी चाहिए, लेकिन तुमने उन पैसों को किस निर्दयता के साथ अन्य मदों में खर्च किया, जिसकी जरुरत ही नहीं थी. तेज-तेज ड़ीजे बजाते समय तुम्हें क्या इस बात का भी ध्यान नहीं आया कि तुम जाने अनजाने में ध्वनि-प्रदूषण बढा रहे थे. उस तीखी और कर्कश आवाज से कितने ही लोग रात की नींद चैन से सो नहीं पाए थे. बात यहीं आकर रुकती तो ठीक था लेकिन तुम्हारी रुह उस समय भी नहीं कांपी,जब तुमने स्ट्रीट लाईट से कनेक्शन जोड़्ते हुये, बिजली की चोरी की. दुख तो मुझे उस दिन भी हुआ था जब मेरे विसर्जन को जाते हुए दो गुट आपसे में भीड़ गए थे और जमकर खून-खराबा हुआ था. समझ में नहीं आता कि मेरे भक्त इस तरह एक दूसरे के प्रति इतने हिंसक हो उठेंगे और खून-खराबा करने पर उतारु हो जाएंगे? ऎसा तो बिलकुल भी नहीं होना चाहिए था, लेकिन हुआ?

जाते-जाते मैं एक बात कह देना चाहता हूँ और वह यह कि तुमने मुझे दस दिनों तक बिठाए रखा लेकिन मुझसे कोई सीख लेने की जरुरत महसूस तक नहीं की. यदि कोई सीख ले लिए होते तो शायद मुझे इतनी पीड़ा सहन नहीं करनी पड़ती. चलो...मैं अपनी ओर से अपने बारे में बताता चलूं कि मेरी इस विशाल देह में अनेकों रहस्य छिपे हुए हैं. मेरे बड़ॆ-बड़ॆ कान हैं. वह इसलिए कि मैं अपने भक्तों के दुख-दर्दों को तथा अन्य बातों को ज्यादा से ज्यादा सुन सकूं.. मुँह छोटा इसलिए है कि कम से कम बोलकर अपनी शक्ति को अपव्यय होने से बचा सकूं. बड़ा पॆट है जिसमें मैं अच्छा और बुरा आसानी से पचा सकूं. सिर बड़ा है क्योंकि मेरी सोच भी बड़ी है. आँखे महज इसलिए छॊटी है कि मैं हर चीज को सुक्ष्मता से देख सकता हूँ.. मेरी सूंड़ उच्च दक्षता का प्रतीक है. एक दंत इसलिए है कि मैं अच्छाइयों को अपने जीवन में उतार सकूं और बुराइयां दूर कर सकूं. मेरे एक हाथ में फ़रसा है ताकि मैं मोह के बंधनों को काट सकूं और रस्सी से उन उच्च और महान लक्ष्यों को बांध सकूं. मेरा एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा हुआ है ताकि मैं अपने भक्तों को उनके आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होता देख सकूं. इन सब सदगुणॊं के चलते, और मेरी कठोर साधना को देखते हुए मेरी ममतामयी माता ने मुझे पुरस्कार में मोदक दिए थे. अब यह मत पूछना कि मोदक क्या होता है? मोदक का सीधा सा अर्थ है कि जिसे खाने से मन प्रसन्नता से भर उठता है, रोम-रोम खिल उठता है. इसलिए मुझे मोदक अत्यन्त ही प्रिय है.

मुझे विश्वास है कि तुमने मेरी व्यथा-कथा को गंभीरता से सुना-गुना होगा. मुझे यह भी विश्वास है कि तुम मेरे गुणॊं को अपने जीवन में उतारोगे और वह सब करोगे जिससे मानवता शर्मसार न होने पाए. मुझे सादगी पसन्द है और उस सादगी के साथ तुम मुझे जब भी बुलाओगे, मैं दौड़ा चला आऊँगा.

एक बात और....कि तुम किसी नदी अथवा तालाब में मुझे विसर्जित न करते हुए, घर के किसी बड़ॆ पात्र को पानी से भरकर उसमें विसर्जन करें और बाद में उसे अपने बागीचे में ड़ाल दें. मैं वहाँ सदैव बना रहूँगा और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूँगा. यदि तुम ऎसा कर पाए तो मुझे ज्यादा प्रसन्नता का अनुभव होगा.

तुम्हारा श्री गणेश.

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(प्रस्तुति - गोवर्धन यादव)

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाड़ा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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  1. बेहद सार्थक लेख....

    आभार
    अनु

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  2. लेकिन उत्सव मनाना बंद कर दें और भी बेकारी फैलेगी।

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  3. बहुत अच्छा लेख पर दुर्भाग्य है देश का कि ऐसी बातों को अब कोई गंभीरता से नहीं लेता| बधाई

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  4. बहुत अच्छा लेख पर दुर्भाग्य है देश का कि ऐसी बातों को अब कोई गंभीरता से नहीं लेता| बधाई

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  5. अच्छा आलेख है...आखिर इतने बड़े गणेश की आवश्यकता ही क्या जो विसर्जन में परेशानी हो....वह तो अणो अणीयान ..महतो महीयान है....
    ------उत्सव, बेकारी, कलाकार का पेट सब बकवास है उनका अन्य उपाय करें ....फिर तो चोरी भी व्यवसाय है उनके पेट पर लात मारने की बात भी उठेगी.....रिश्वतखोरी की भी...

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लागर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शनिवार हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल :007 लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर ..

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  7. ek bahut achcha evam sarthak alekh...
    badhai..

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