सोमवार, 2 सितंबर 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - भवानी प्रसाद मिश्र : सामान्य से दिखने वाले असाधारण कवि

भवानी प्रसाद मिश्रः सामान्य से दिखने वाले असाधारण कवि

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

जीवन-वृत्त

जन्मः मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के टिगरिया गाँव में 29 मार्च, 1913

शिक्षाः सोहागपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, जबलपुर में प्राप्त की। बी. ए. की परिश्रा हिन्दी, अंग्रेजी तथा संस्कृत विषय लेकर उत्तीर्ण की।

स्वतंत्रा सेनानीः 1942 से स्वतंत्रा संग्राम में भाग लेने के कारण अनेक वर्ष जेल में व्यतीत किए।

निधनः 20 फरवरी, 1985

कृतित्वः कविताएँ, संस्मरण, निबंध, बाल साहित्य की 20 पुस्तकें। इसके अतिरिक्त संपादन।

काव्य कृतियाँ -

1. गीत फ़रोश 2. चकित है दुख 3. अँधेरी कविताएँ 4. गाँधी पंचशती 5. बुनी हुई रस्सी 6. व्यक्तिगत 7. खुशबू के शिलालेख 8. परिवर्तन जिए 9. त्रिकाल संध्या 10. अनाम तुम आते हो 11. इदम नमम 12. शरीर, कविता, फसलें और फूल 13. मानसरोवर 14. दिन 15. संप्रति 16. नीली रेखा तक 17. कालजयी

बालसाहित्य-

तुकों के खेल

संस्मरण -
जिन्होंने मुझे रचा

निबंध -
कुछ नीति कुछ राजनीति

संपादन -
संपूर्ण गांधी साहित्य, कल्पना (साहित्यिक पत्रिका)

सम्मानः

साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के संस्थान सम्मान तथा मध्य प्रदेश शासन के शिखर सम्मान से अलंकृत।

[दिनांक 05 जनवरी, 2013 को “शुभम साहित्य, कला एवं संस्कृति संस्थान, गुलावठी (बुलन्द शहर)” द्वारा आयोजित “कालजयी साहित्यकार भवानी प्रसाद मिश्र का जन्मशती समारोह” के मुख्य व्याख्यान का संशोधित रूप]

भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य संसार की विवेचना के पूर्व, नई कविता की पृष्ठभूमि से परिचय प्राप्त करना जरूरी है। नई कविता, प्रयोगवादी कविता तथा प्रगतिवादी कविता के अंतर्सम्बंधों को लेकर हिन्दी के रचनाकारों एवं आलोचकों में गहरा विवाद है। इनकी काल सीमा के सम्बंध में भी मतभेद हैं।

(1)नंद दुलारे वाजपेयी जैसे आलोचक एवं गिरिजा कुमार माथुर तथा बालकृष्ण राव जैसे रचनाकार सन् 1936 के बाद हिन्दी कविता में छायावादोत्तर नई प्रवृत्तियों से नई कविता की शुरुआत मानते हैं।

(2) लक्ष्मीकांत वर्मा जैसे रचनाकार सन् 1953 में “नए पत्ते” के प्रकाशन से इसकी शुरुआत मानते हैं।

(3) डॉ. जगदीश गुप्त, राम स्वरूप चतुर्वेदी तथा विजय देव नारायण साही आदि रचनाकार एवं आलोचक इलाहाबाद की साहित्यिक संस्था परिमल के तत्वावधान में सन् 1954 में “नई कविता” के प्रकाशन से तथा मार्क्सवादी आलोचक शिव कुमार मिश्र सन् 1955 के बाद से नई कविता के आन्दोलन का आरम्भ मानते हैं।

सत्य उपर्युक्त वर्णित मतों के बीच है। सम्पूर्ण छायावादोत्तर कविता को नई कविता नहीं माना जा सकता। सन् 1953 या सन् 1954 या सन् 1955 के पहले से नई कविता ने जन्म ग्रहण कर लिया था। नई कविता का बीजांकुर तो सन् 1943 में ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन से हो गया था। अज्ञेय के सम्पादकत्व में प्रकाशित “तार सप्तक” के सातों कवियों ( 1. गजानन माधव मुक्तिबोध 2. नेमिचन्द्र जैन 3. भारत भूषण अग्रवाल 4. गिरिजा कुमार माथुर 5. प्रभाकर माचवे 6. डा. राम विलास शर्मा 7. अज्ञेय ) की संकलित काव्य रचनाओं में नई कविता की प्रवृत्तियों के लक्षण पहचाने जा सकते हैं। इतना होते हुए भी इनको प्रयोगवादी कवि माना जाता है, इन्हें नई कविता के कवियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता। इसका कारण निम्न हैः

तार सप्तक के प्रकाशन के समय प्रयोग का भूत सवार होता हुआ नज़र आता है। इसका प्रमाण स्वयं अज्ञेय के संपादकीय का निम्न अंश है : “सातों कवियों के चयन का एक मात्र आधार यही था कि वे अभी राही हैं, राहों के अन्वेषी - - - काव्य के प्रति एक अन्वेषी का दृष्टिकोण उन्हें समानता के सूत्र में बाँधता है”। (तार सप्तक, द्वि. सं., पृ. 12)

“तार सप्तक” के प्रकाशन के 8 वर्षों के बाद जब सन् 1951 में अज्ञेय के सम्पादकत्व में “दूसरा सप्तक” का प्रकाशन हुआ तब तक प्रयोग के प्रति मोह समाप्त हो चुका था। अब प्रयोग की सबसे अधिक वकालत करने वाले अज्ञेय का भी प्रयोग के प्रति मोह भंग होता हुआ दिखाई देता है। वे “प्रयोग” के वाद से अपना पल्ला झाड़ते नज़र आते हैं।

“प्रयोग का कोई वाद नहीं है, हम वादी नहीं रहे, नहीं हैं, न प्रयोग अपने आप में इष्ट या साध्य है”।

(अज्ञेय द्वारा नेमि चन्द्र जैन को लिखे पत्र से उद्धृत, धर्मयुग, पृष्ट 19, 25 जून, 1967)

इस सप्तक के सातों कवियों ( 1. भवानी प्रसाद मिश्र 2. शकुंतला माथुर 3. हरि नारायण व्यास 4. शमशेर बहादुर सिंह 5. नरेश कुमार मेहता 6. रघुवीर सहाय 7. धर्मवीर भारती ) की कविताओं पर प्रयोग का मोह हावी नहीं है। इनमें गाँधीवादी भवानी प्रसाद मिश्र हैं तो मार्सवादी शमशेर भी हैं मगर ये सभी प्रयोगवादी अथवा प्रगतिवादी की आग्रहमूलक भूमिका को त्यागकर जीवन की प्रकृत भूमिका पर संचरण करते दिखाई देते हैं।

'दूसरा सप्तक' की भूमिका तथा उसमें शामिल कुछ कवियों के वक्तव्यों में अपनी कविताओं के लिये 'नयी कविता' शब्द की स्वीकृति है। निष्कर्ष रूप में यह माना जा सकता है कि प्रयोगवाद के बाद हिंदी कविता की नवीन धारा नई कविता के नाम से पहचानी गई।

नई कविता के कवि अपने को किसी सिद्धांत, मतवाद, संप्रदाय या दृष्टि के कठघरे में कैद नहीं करते। नई कविता परम्परा को नकारती है। उसका वैशिष्ट्य कथ्य की व्यापकता और दृष्टि की उन्मुक्तता है। मनुष्यों में वैयक्तिक भिन्नताएँ होती हैं। उनको देवता और राक्षस जैसे दो वर्गों में नहीं बाँटा जा सकता। उनमें अच्छाइयाँ भी होती हैं और बुराइयाँ भी। नई कविता का कवि मनुष्यों के इन्हीं रूपों को स्वीकारता है। नई कविता का उद्देश्य मनुष्य की समग्रता का चित्रण है। नई कविता में जीवन को उसके समग्र रूप में स्वीकार करके उसे भोगने की लालसा है। नई कविता में विविध पृष्ठभूमियों से आए हुए रचनाकार हैं। नई कविता में शहरी जीवन और ग्रामीण जीवन दोनों परिवेशों से आए हुए कवि हैं। अज्ञेय, बालकृष्ण राव, शमशेर बहादुर सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, कुँवरनारायण सिंह, धर्मवीर भारती, प्रभाकर माचवे, विजयदेव नारायण साही, रघुवीर सहाय आदि कवियों की संवेदनाएँ और अनुभूतियाँ शहरी परिवेश की हैं तो भवानीप्रसाद मिश्र, केदारनाथ सिंह, शंभुनाथ सिंह, ठाकुरप्रसाद सिंह, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि कवि मूलतः ग्रामीण जीवन की अनुभूतियों और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। विविध भावभूमियों के इन कवियों का नई कविता की धारा में समान रूप से अवगाहन करने का कारण यह है कि सभी ने नए भावबोध को व्यक्त करने के लिए नए रूप प्रकारों, नए शिल्प एवं नए लय विधानों तथा नए भाषा प्रयोगों के महत्व को स्वीकारा है।

मैं हिन्दी की नई कविता की इस पृष्ठभूमि में भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं को विश्लेषित, विवेचित, व्याख्यायित करने की अनुशंसा करता हूँ।

काव्य रचना की समकालीन परिस्थितियों की दृष्टि से द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति, राष्ट्रीय स्तर पर गुलामी की जंजीरों का टूटना तथा स्वतंत्रता की प्राप्ति, देश के सामान्य व्यक्ति को सर्वप्रभुता सम्पन्न गणतंत्र का नागरिक होने का गौरव, सन् 1952 में पहले आम चुनाव का सम्पन्न होना, देश के द्वारा संसार के विशालतम प्रजातंत्र एवं लोकतंत्र शासन पद्धति का वरण करना, प्रथम पंचवर्षीय योजना का आरम्भ होना, सन् 1952 के कांग्रेस के अधिवेशन में समाजवादी समाज की रचना का प्रस्ताव पारित होना, जमींदारी प्रथा का उन्मूलन आदि घटना चक्रों से उज्जवल भविष्य की सम्भावनाओं के द्वार खुले। एक नई आशा, नए विश्वास, नई आस्था ने अपने पंख पसारने आरम्भ किए।

भवानी भाई “दूसरा सप्तक “ के पहले कवि हैं। ऐसा कवि, जो वादों, काव्य आन्दोलनों, कवियों की गुटबाज़ी से असंपृक्त प्रकृति, जंगल और सामान्य जनजीवन के बीच रहकर आम आदमी के नारे का झंडा तो नहीं उठाता मगर आम जन जीवन की सहज संवेदनाओं को जन भाषा के द्वारा प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करता है। अपनी काव्य भाषा की सादगी, ताज़गी और अनायासता तथा अपनी अभिव्यक्ति की ईमानदारी और अनौपचारिकता के प्रति वे सजग एवं सचेष्ट हैं। इसका प्रमाण यह है कि वे अपने को खुद ऐसा करने का आदेश देते हैं : “ जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख। और उसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख” । (दूसरा सप्तक, पृष्ठ 6)

भवानी भाई से पहली मुलाकातः

मेरी नियुक्ति सन् 1964 में जबलपुर के विश्वविद्यालय में हुई। भवानी प्रसाद मिश्र हमारे विश्वविद्यालय के उस समय राजनीति विभाग के रीडर एवं संसद-सदस्य महेश दत्त मिश्र के मित्र थे तथा वे जब भी जबलपुर आते थे तो महेश भाई के घर पर ठहरते थे। भवानी प्रसाद मिश्र से मेरी पहली मुलाकात सन् 1964 में महेश भाई के घर पर हुई। उनके सम्मान में महेश भाई ने अंतरंग मित्रों को अपने घर आमंत्रित किया। हमारे आग्रह पर भवानी भाई ने उस समय के बहुचर्चित एवं प्रसिद्ध संग्रह “गीत फ़रोश” की अपनी काव्य रचना “जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ” सुनाई। एक अलग प्रकार का अनुभव था। ऐसा लग रहा था मानों मार्केटिंग का कोई उस्ताद ग्राहक को लुभाने के लिए तरह तरह के अचूक नुस्खों का ब्रह्मास्त्र छोड़ रहा है। “ यह गीत, सख़्त सरदर्द भुलायेगा; यह गीत पिया को पास बुलायेगा “, “ यह गीत भूख और प्यास भगाता है जी, यह मसान में भूख जगाता है; यह गीत भुवाली की है हवा हुज़ूर ,यह गीत तपेदिक की है दवा हुज़ूर” आदि आदि। उनके काव्य पाठ का तरीका इतना प्रभावी था कि हम सब थोड़ी देर के लिए भूल गए कि हम महेश भाई के घर पर एक कवि का काव्य पाठ सुन रहे हैं।

(परिशिष्ट - 1 )

बाद को जब मैंने इस अनुभव की चर्चा जबलपुर में अपने को जयशंकर प्रसाद से कम न समझने वाले कवि से की तो उनकी टिप्पणी तिरस्कारमूलक थीः “वो कवि नहीं, सौदागर है जो गीत बेचने का धंधा करता है”। मैं भवानी भाई के मुख से पूरा गीत सुन चुका था। मैने उत्तर दियाः “अपना ईमान बेचने की अपेक्षा परिश्रम एवं हुनर से गीत लिखकर उन्हें बेचने का धंधा करना अधिक श्रेयस्कर है”। कह नहीं सकता, उन्हें मेरा व्यंग प्रीतिकर लगा या नहीं मगर इसके बाद उन्होंने मौन धारण कर लिया।

यह वह समय था जब तक नंददुलारे वाजपेयी जैसे आलोचक नई कविता को हेय दृष्टि से देखते थे। मुझे उनकी उक्त टिप्पणी अच्छी नहीं लगी। इसका कारण यह था कि मैं सन् 1958 से सन् 1962 तक इलाहाबाद में जहाँ एक ओर सूर्य कांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा जैसे छायावादी कवियों की कविताओं का रसास्वाद ले चुका था तो दूसरी ओर परिमल के नई कविता के पुरोधा रचनाकारों से उनकी रचनाएँ भी सुन सका था तथा नई कविता के भावबोध एवं शिल्प के नए तेवरों के वैशिष्ट्य की दलीलों को भी पचा सका था।

भवानी भाई की कवितों में प्रकृति चित्रणः

पाश्चात्य दृष्टि ब्रह्माण्ड की परिकल्पना मशीन के रूप में करती है और उसकी नज़र में मनुष्य मशीन का एक पुर्जा मात्र है। भारतीय दृष्टि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना पर अवलम्बित है। पूरी वसुधा एक परिवार है। वसुधा के मनुष्य ही नहीं अपितु समस्त पशु, पक्षी, पर्वत, सागर, नदी, नाले, झरने, संध्या, प्रभात, चाँदनी, जंगल, वृक्ष, पुष्प आदि सभी परिवार के सदस्य हैं। इस रागात्मक सम्बंध के कारण प्रकृति मनुष्य की चिरसहचरी है। यही कारण है कि भारतीय साहित्य की प्रत्येक भाषा के काव्य में प्रकृति चित्रण सुलभ हैं। प्रकृति चित्रण के स्वरूप, शैली, अनुपात आदि में अवश्य अंतर विद्यमान हैं। ये अंतर कालगत, साहित्य की धारागत और रचनाकारगत सभी स्तरों पर विद्यमान हैं। कवियों ने प्रकृति का आलम्बन, उद्दीपन, उपदेशक, प्रेरक, निर्देशक आदि विविध रूपों में चित्रांकन किया है। चित्रांकन की शैलियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं। उदाहरण के रूप में हिन्दी के छायावादी, प्रगतिवादी एवं नई कविता के कवियों के काव्य में प्रकृति चित्रण के स्वरूप, दृष्टि एवं शैली का भेद देखा जा सकता है। छायावादी कवियों ने प्रकृति में रहस्यात्मक संकेत अधिक ढूढ़े हैं, प्रकृति के व्यक्त सौन्दर्य में अव्यक्त असीम चेतन सत्ता को अधिक देखा है तथा प्रकृति का मानवीयकरण अधिक किया है। प्रगतिवादी कवियों ने ग्रामीण जीवन के अभावग्रस्त एवं मटमैले स्वरूप को सपाट रूप में दिखाने की कोशिश ज्यादा की है। नई कविता के कवियों के प्रकृति के चित्रणों में नवीन जीवन-बोध की संश्लिष्टता अधिक है। नई कविता के कवियों के प्रकृति चित्रणों में सामान्यतः सहज रागात्मकता तथा सौन्दर्य-बोध के स्थान पर बौद्धिकता एवं वैज्ञानिकता अधिक हावी है। यह सामान्य प्रवृत्तियों का विवेचन है। अपवाद हर काल में, हर वाद में उपलब्ध हैं। नई कविता के कवियों में भवानी प्रसाद मिश्र एवं केदान नाथ अग्रवाल अन्य कवियों की अपेक्षा प्रकृति के सहज चितेरे अधिक हैं। जिस प्रकार केदारनाथ अग्रवाल के “फूल नहीं रंग बोलते हैं” शीर्षक काव्य-संग्रह में बांदा जनपद के आसपास के प्रकृति-परिवेश का सजीव चित्रण है उसी प्रकार भवानी भाई के प्राकृतिक चित्रणों में लोक प्रकृति के साथ जाना पहचाना रिश्ता मूर्तिमान है। भवानी भाई की प्रकृति से गहरी आत्मीयता है। इसका प्रमाण है कि संसार में सब कुछ जो बड़ा और सुन्दर है उसे कवि अपना समझता है और इस अहसास से सम्पन्न होने का अनुभव करता है। सुबह का सूरज उसे मित्र की तरह दस्तक देकर जगाता है। सूरज के साथ हाथ में हाथ डालकर वह घूमता है। घूमता है – वृक्षों भरे हरे मैदानों में, ऊँचे पहाड़ों पर, खिली अधखिली कलियों के बीच। उन सबसे वह मिलता है। वे सब उससे मिलते हैं। अपनत्व और आत्मीयता का ऐसा गहरा अहसास कि उसे लगता है कि सारी ऋतुएँ उसके लिए ही आती हैं, हवाएँ जो कुछ गाती हैं, उसके लिए ही गाती हैं, उसका मन जब गुमसुम होता है तो उसका मन बहलाने के लिए हिरण चौकड़ी भरते हैं, आधी रात को कोई बंसी की टेर से उसे बुलावा भेजता है। सूरज की किरणें, पेड़ के पत्ते, पक्षियों के गीत सब मिलकर जिस सम्पन्नता से उसे आपूरित कर देते हैं वह किसी चक्रवर्ती के ऐश्वर्य से कम नहीं है। किसी वैज्ञानिक को यह प्रतीति नहीं हो सकती, महानगरों के लोहे एवं सीमेंट से बने माचिस के डिब्बों में रहने वाले किसी भी अभागे को यह अनुभव नहीं हो सकता भले ही वह कितना ही बड़ा रचनाकार क्यों न हो।

(परिशिष्ट - 2 )

मध्य प्रदेश के नर्मदा एवं ताप्ती नदियों के मध्य होशंगाबाद से लेकर सुरम्य पर्यटक पर्वत पचमढ़ी तक के सतपुड़ा के भूभाग में स्थित घने एवं सँकरे सागौन के बहुमूल्य पेड़ों से आच्छादित जंगलों से तथा नर्मदी नदी के घाटों से भवानी भाई का रिश्ता किताबी नहीं है; सहज और आत्मीय है। भारत के सर्वश्रेष्ठ प्रकृति चित्रण की काव्य-रचनाओं का यदि कोई संग्रह करेगा तो उसे उसमें भवानी भाई की “सतपुड़ा के जंगल” शीर्षक कविता को सम्मिलित करना ही पड़ेगा। “नवगीत” की जिन विशिष्टताओं को विद्वान लोग परिगणित करते हैं, उन सबकी धड़कनें मुझे इस कविता में सुनाई पड़ती हैं। (परिशिष्ट - 3 )

भवानी प्रसाद मिश्र और गाँधीवादः

भवानी प्रसाद मिश्र विचारों, संस्कारों और अपने कार्यों से पूर्णत : गांधीवादी हैं और गाँधीवादी होने का उन्हें स्वाभिमान है। उनके लिए गाँधी ओढ़ने और बिछाने की चीज़ नहीं थे। वे वर्धा में रहे थे, गाँधी जी के साहचर्य में रहे थे, उन्होंने गाँधी जी के आचरण को अपनी आँखों से देखा ही नहीं अपितु जाना था। उनके उपदेशों के शब्दों को केवल सुना ही नहीं अपितु उनके मर्म को अपने जीवन में उतारा था। गाँधी दर्शन को माना नहीं था, जाना था ; आत्मसात् किया थाः

“लाखों करोड़ों गूँगों के हृदयों में जो ईश्वर विराजमान है, मैं उसके सिवा अन्य किसी ईश्वर को नहीं मानता। वे उसकी सत्ता को नहीं जानते, मैं जानता हूँ। मैं इन लाखों - करोड़ों की सेवा द्वारा उस ईश्वर की पूजा करता हूँ जो सत्य है अथवा उस सत्य की जो ईश्वर है”।

मेरे उक्त कथन का प्रमाण उनकी गाँधी जी पर लिखी हुई कविता है जिसमें गाँधी जी की दिन चर्या की डायरी ही नहीं है अपितु उसमें उनके जीवन दर्शन का निचोड़ अभिव्यंजित हैः

“तुम काग़ज़ पर लिखते हो। वह सड़क झाड़ता है। तुम व्यापारी। वह धरती में बीज गाड़ता है। एक आदमी घड़ी बनाता। एक बनाता चप्पल। इसीलिए यह बड़ा और वह छोटा इसमें क्या बल । सूत कातते थे गाँधी जी।कपड़ा बुनते थे, और कपास जुलाहों के जैसा ही धुनते थे। चुनते थे अनाज के कंकर, चक्की पीसते थे, आश्रम के अनाज याने आश्रम में पिसते थे, जिल्द बाँध लेना पुस्तक की, उनको आता था, भंगी-काम सफाई से नित करना भाता था । ऐसे थे गाँधी जी, ऐसा था उनका आश्रम। गाँधी जी के लेखे, पूजा के समान था श्रम” ।

यह कविता आगे बढ़ती है। एक वकील साहब उनसे मिलने आते हैं। गाँधी जी उस समय हाथ की चक्की पर आटा पीस रहे थे। गाँधी जी उनसे साथसाथ मिलकर आटा पीसने को कहते हैं। गाँधी जी का प्रस्ताव सुनकर वकील साहब झिझकते हैं। गाँधी जी उनका मनोभाव पहचान लेते हैं मगर बुरा नहीं मानते, हँसकर उनसे

कहते हैं: “ सेवा का हर काम, हमारा ईश्वर है भाई”।

(परिशिष्ट - 4 )

स्वातंत्र्य-चेतना एवं स्वाधीनता-प्राप्ति की जन आकांक्षाः

गाँधीवादी होने तथा अहिंसा, सत्य, शान्ति, विश्व-बंधुत्व आदि जीवन मूल्यों के प्रति समर्पित होने के साथ साथ भवानी भाई स्वातंत्र्य-चेतना एवं स्वाधीनता-प्राप्ति के महत्व के प्रति भी सजग तथा सचेष्ट रहे। तत्कालीन जन आकांक्षा को उन्होंने प्रतीकात्मक ढंग से व्यक्त किया है। उदाहरण के लिए कठपुतलियों के माध्यम से उन्होंने जो अभिव्यंजित किया है, वह एक कवि की भावयित्री प्रतिभा के द्वारा ही सम्भव है। निर्जीव एक कठपुतली धागों के बंधनों को तोड़ना चाहती है। वह कठपुतली गुस्से से उबलकर बोलती है कि ये धागे उसके आगे-पीछे क्यों हैं। बंधनों में जकड़ने वाले धागों को तोड़ने तथा अपने पैरों पर खड़े होने की कामना व्यक्त करती है। एक कठपुतली की वाणी सुनकर अन्य सभी कठपुतलियों के मन की परतंत्रता की वेदना मुखर हो उठती है। कठपुतली के मन की जागृत इच्छा सम्पूर्ण भारतीय मानस की जन आकांक्षा है।

(परिशिष्ट - 5 )

आस्था के कविः

भवानी भाई के समय के कुछ रचनाकार अवसाद, टूटन, घुटन, निराशा, भग्नाशा, हताशा, संत्रास के चित्रणों में ही रचना-कर्म की सार्थकता समझते थे। उनका तर्क था कि साहित्य समाज का दर्पण है और चूँकि हमारे समाज में ये स्थितियाँ वर्तमान हैं, इसलिए रचनाओं में यथार्थ चित्रांकन के लिए उपर्युक्त हताशामूलक भावों की अभिव्यक्ति में ही रचना की प्रासंगिकता, चरितार्थता एवं समीचीनता

निहित है। भवानी भाई इस विचारधारा को सामाजिक विकास के लिए उपयुक्त नहीं समझते थे। वे अपनी कविता में स्पष्ट, असंदिग्ध एवं बेबाक घोषणा करते हैं :

“बुरी बात है । चुप मसान में बैठे बैठे दुःख सोचना , दर्द सोचना !” , “सपने बुरे देखना !” , “टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से , राग उदासी के अलापना !”

(परिशिष्ट - 6 )

हिन्दी की नई कविता पर सबसे बड़ा आक्षेप यह है कि उसमें अतिरिक्त अनास्था, निराशा, विशाद, हताशा, कुंठा और मरणधर्मिता है। उसको पढ़ने के बाद जीने की ललक समाप्त हो जाती है, व्यक्ति हतोत्साहित हो जाता है, मन निराशावादी और मरणासन्न हो जाता है। यह कि नई कविता ने पीड़ा, वेदना, शोक और निराशा को ही जीवन का सत्य मान लिया है। नई कविता भारत की जमीन से प्रेरणा प्राप्त नहीं करती। इसके विपरीत यह पश्चिम की नकल से पैदा हुई है। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इन सारे आरोपों को ध्वस्त कर देती हैं। हम प्रतिपादित कर चुके हैं कि मिश्र जी गाँधीवादी है। “गाँधी दर्शन की प्रासंगिकता” शीर्षक अपने लेख में मैंने स्पष्ट किया है कि गाँधी की देश-भक्ति मंजिल नहीं है। गाँधी जी की देश-भक्ति विश्व के जीव मात्र के प्रति प्रेम और उसकी सेवा करने के लिए उनकी जीवन यात्रा का एक पड़ाव है। उनके विचार में कहीं भी लेश मात्र भी निराशा का भाव नहीं है। उसमें आशा, विश्वास और आस्था की ज्योति आलोकित है। इसी आलोक के कारण गाँधी जी ने दक्षिण-अफ्रीका और भारत में जो जन-आन्दोलन चलाए उन्होंने सम्पूर्ण समाज में नई जागृति, नई चेतना और नया संकल्प भर दिया। उनके जीवन दर्शन से विशाद, निराशा और मरण-धर्मिता नहीं अपितु इसके सर्वथा विपरीत नई आशा, नई आस्था और नई उमंग पैदा होती है। उससे सत्य, अहिंसा एवं प्रेम की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। (देखें – प्रोफेसर महावीर सरन जैन : गाँधी दर्शन की प्रासंगिकता

http://www.hindi.mkgandhi.org/article/GandhiDarshanKeePraasangikataa.pdf

भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ इसी कारण समाज में जो विपन्न हैं, लाचार हैं, थके हुए हैं, धराशायी हैं उन सबको सहारा देने के लिए प्रेरित करती हैं, उनको उठाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इसके लिए भवानी भाई शपथ भी दिलाते हैं –

“हैं शपथ तुम्हारे करूणाकर की। है शपथ तुम्हें उस नंगे की। जो भीख स्नेह की माँग माँग मर गया। - - - - सख्त बात से नहीं, स्नेह से काम जरा लेकर देखो, अपने अन्तर का नेह अरे, देकर देखो”।

(परिशिष्ट - 7 )

भारतीय संस्कृति के प्रसार का वैशिष्ट्यः

प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति का प्रसार सुमात्रा, जावा, बाली, बोर्नियो, म्यांमार, मलाया, मध्य एशिया के काशगर, कूचा, तुर्कान, खेतान तथा एशिया के दूरस्थ देशों – चीन, मंगोलिया, कोरिया और जापान आदि सभी देशों में था। मिश्र जी ने इस प्रसार के सम्बंध में इस तथ्य को रेखंकित किया है कि भारतीयों ने कभी भी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया, वे “सेना लेकर न गए”, वे संस्कृति की धरोहर लेकर गए, उन्होंने भारतीय संस्कृति की विजय पताका फहराई, उन्होंने “प्रेम के पौधे” रोपे। उनकी विजय शस्त्रों से नहीं अपितु शास्त्रों के बल पर थी। भारतीय जिन जिन देशों में गए उन देशों के तटों को “शिव-निमित्त-संस्कृति-धारा” से पखारा जिसके कारण उन देशों का परिवेश “जाज्वल्यमान” हो गया। भारत की सांस्कृतिक परम्परा निरंतर, अविराम, अविरल प्रवाहमान है जिसमें कभी शंकराचार्य, कभी नानक और कबीर, कभी विवेकानन्द और कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर आते हैं और यही धारा गाँधी के गौरव-स्वर में गूँजती है।

(परिशिष्ट - 8 )

वर्तमान को कोसना छोड़ोः

भवानी प्रसाद मिश्र ने अपने युगीन समाज के अनुभव-खंडों को ही जीवंत नहीं किया है; अपने समय को कोसने, धिक्कारने एवं अपने समय की हर बात की शिकायत करने तथा अपने से पहले की हर बात की तारीफ करने के मिजाज़ और स्वभाव पर व्यंग भी किया है और वह भी बेलाग। मान लिया इस साल हर साल से बहुत ज्यादा पानी गिरा। यह एक प्राकृतिक घटना है। इसको कोसने की क्या तार्किकता है, क्या प्रयोजनशीलता है। मगर यह भारतीय समाज का स्वभाव है। वर्तमान खराब, पुराना जमाना अच्छा। वर्तमान की प्रगति को नकारना। पुराने समय की आदतों के राग अलापना। मिश्र जी की सहज अभिव्यक्ति की बानगी द्रष्टव्य हैः

“और फिर लोग कहते हैं । जिंदगी पहले के दिनों की बड़ी प्यारी थी। सपने हो गये वे दिन जो रंगीनियों में आते थे। रंगीनियों में जाते थे। जब लोग महफिलों में बैठे बैठे ।रात भर पक्के गाने गाते थे। कम्बख़्त हैं अब के लोग, और अब के दिन वाले
क्योंकि अब पहले से ज्यादा पानी गिरता है। और कम गाये जाते हैं पक्के गाने” ।

(परिशिष्ट –9 )

आपातकाल का विरोधः

सन् 1975 में आपात्काल की घोषणा होने पर तमाम तथाकथित प्रगतिशील होने का दम्भ भरने वाले तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करने वाले चिंतक, साहित्यकार एवं विद्वानों ने मौनव्रत धारण कर लिया था तथा कुछ ने तो कायरता, अवसरवादिता एवं सत्ता के प्रति चाटुकारिता की हद करके आपात्काल के समर्थन में फतवे भी जारी किए। आपात्काल लोकतंत्र पर हमला था, फासीवाद का नया संस्करण था तथा अधिनायकवादी राजनीति का बीजारोपण था। ऐसे समय जब चारों ओर भय का वातावरण था; समाज में ख़ौफ, आतंक तथा डर व्याप्त था; कोई बोलने के भी परहेज़ करता था; जेल में बंद हजारों मीसाबंदी माफीनामा माँगकर जेल से छूटने में ही अपनी और अपने परिवार की कुशलता समझ रहे थे; ऐसे समय में भवानी प्रसाद मिश्र ने जिस साहस, दमखम, दिलेरी, सरफरोशी की भावना का परिचय दिया वह उनके आत्मविश्वास, मनोबल, धैर्य एवं संकल्पशक्ति का जीता जागता सबूत है।

(परिशिष्ट – 10 )

शैली विज्ञान की स्थापनाएँ एवं भवानी प्रसाद मिश्र की रचनात्मक प्रतिक्रियाः

भवानी भाई ने एक बार मुझसे भाषिक काव्य आलोचना के बारे में जानना चाहा। मैंने उन्हें विस्तार से “शैली विज्ञान “ की सैद्धांतिक स्थापनाओं की जानकारी दी। किस प्रकार शैली विज्ञान की मान्यता है कि कविता भाषा के माध्यम से नहीं अपितु भाषा में जन्मती है। किस प्रकार हम भाषिक उपादानों के आधार पर विवेच्य काव्य कृति का चयन, विचलन और समानंतरता के जरिए अध्ययन करते हैं। चयन, विचलन एवं समानंतरता – प्रत्येक अध्ययन सोपानों पर स्वन, ध्वनि, वर्ण, स्वनिम, शब्द, रूप, रूपिम, वाक्यांश, उपवाक्य, वाक्य, अर्थ आदि का विश्लेषण करते हैं। भवानी भाई ने मेरी बातें बहुत ध्यानपूर्वक सुनीं मगर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। बाद में जब मैंने उनकी “बुनी हुई रस्सी “ शीर्षक कविता पढ़ी तो लगा किसी काव्य रचना की शैली वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति की इससे बढ़कर कोई दूसरी गहन, तार्किक एवं मर्मांतक आलोचना नहीं हो सकती।

इसी शीर्षक से उनका काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ और उस पर उन्हें सन् 1972 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ।

इस कविता में उन्होंने लिखाः

“बुनी हुई रस्सी को उल्टा घुमाने पर वह खुल जाती है। उसके सारे रेशे अलग अलग देखे जा सकते हैं। मगर यदि कोई कविता को इस प्रकार उल्टा खोले तो क्या होगा। कविता को बिखरा कर देखने के सिवा रेशों (भाषिक उपादानों) के और कुछ नहीं दिखता। इसका कारण यह है कि कविता का सर्जक भाषिक उपादानों के अलावा अपने अनुभव (संवेदना) को समेट कर लिखता है”।

(परिशिष्ट –11)

उनकी इस कविता को पढ़ने के बाद मैंने इस बात पर जोर देना शुरु किया कि काव्य कृति की शैली वैज्ञानिक आलोचना या विवेचना के नाम पर कृति में प्रयुक्त भाषिक तत्वों का मात्र विश्लेषण ही पर्याप्त नहीं है; तदनंतर उसके आधार पर कृति की सौन्दर्यमूलक व्याख्या करना अभीष्ट होना चाहिए। आलोचक को उस रचनात्मक वैशिष्ट्य की खोज करनी चाहिए जिसको कवि अपनी काव्य कृति में, अनायास ही सही, अभिज्ञापित करता है।

भवानी प्रसाद मिश्र की रचना प्रक्रियाः

भारतीय दृष्टि कवि कर्म की रचना प्रक्रिया को “समाधिस्थ भूमिका” के रूप में ग्रहण करती है। भवानी भाई शायद ऐसा ही अनुभव करते होंगे। इसी कारण वह लिख सके कि मैं कोई पचास पचास वर्षों से कविताएँ लिखता आ रहा हूँ । अब कोई पूछे मुझसे कि क्या मिलता है तुम्हें कविताएँ लिखने से । जैसे अभी दो मिनट पहले जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था। तब काग़ज़ काग़ज़ था। मैं मैं था । और कलम कलम । मगर जब लिखने बैठा तो तीन नहीं रहे हम। एक हो गए ।

(परिशिष्ट – 12 )

बौद्धिकता के घटाटोप के कारण कुछ आलोचक नई कविता को काव्य की चौहद्दी के बाहर की वस्तु मानते हैं। उनका यह मत संगत है या नहीं – इसकी विवेचना का सम्प्रति अवकाश नहीं है मगर हम जोर देकर यह कहना चाहते हैं कि भवानी भाई की कविताओं पर यह आरोप किंचित भी नहीं मढ़ा जा सकता। उनकी कविताएँ आधुनिकता के नाम पर महानगरों के आधारहीन एवं टूटते हुए जीवन-मूल्यों के खोखले जीवन की पश्चिमी शैली के प्रतिरूप नहीं हैं; भारतीय गाँवों के समाज के सहज अनुभव-खंडों की अपनी समग्रता में बेलाग एवं जीवंत अभिव्यक्ति हैं। उनकी भाषा में अलंकार योजना की प्रयत्न साध्य सजावट नहीं है, संश्लिष्ट, सूक्ष्म और जटिल बिम्ब बहुलता नहीं है मगर उनकी भाषा में अनुभूति एवं विचार और उनकी अभिव्यक्ति का ऐसा सहज, स्वाभाविक और नैसर्गिक सा अद्वैत स्थापित है जो साधारण से दिखने वाले कवि को असाधारण बना देता है।

   

परिशिष्ट – 1.

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ ।

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ ।

मैं तरह-तरह के

गीत बेचता हूँ ;

मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत

बेचता हूँ ।

जी, माल देखिए दाम बताऊँगा,

बेकाम नहीं है, काम बताऊंगा;

कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,

कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने;

यह गीत, सख़्त सरदर्द भुलायेगा;

यह गीत पिया को पास बुलायेगा ।

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझ को

पर पीछे-पीछे अक़्ल जगी मुझ को ;

जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान ।

जी, आप न हों सुन कर ज़्यादा हैरान ।

मैं सोच-समझकर आखिर

अपने गीत बेचता हूँ;

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ ।

यह गीत सुबह का है, गा कर देखें,

यह गीत ग़ज़ब का है, ढा कर देखे;

यह गीत ज़रा सूने में लिखा था,

यह गीत वहाँ पूने में लिखा था ।

यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है

यह गीत बढ़ाये से बढ़ जाता है

यह गीत भूख और प्यास भगाता है

जी, यह मसान में भूख जगाता है;

यह गीत भुवाली की है हवा हुज़ूर

यह गीत तपेदिक की है दवा हुज़ूर ।

मैं सीधे-साधे और अटपटे

गीत बेचता हूँ;

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ ।

जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूँ

जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ ;

जी, छंद और बे-छंद पसंद करें –

जी, अमर गीत और वे जो तुरत मरें ।

ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,

मैं पास रखे हूँ क़लम और दावात

इनमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ ?

इन दिनों की दुहरा है कवि-धंधा,

हैं दोनों चीज़े व्यस्त, कलम, कंधा ।

कुछ घंटे लिखने के, कुछ फेरी के

जी, दाम नहीं लूँगा इस देरी के ।

मैं नये पुराने सभी तरह के

गीत बेचता हूँ ।

जी हाँ, हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ ।

जी गीत जनम का लिखूँ, मरन का लिखूँ;

जी, गीत जीत का लिखूँ, शरन का लिखूँ ;

यह गीत रेशमी है, यह खादी का,

यह गीत पित्त का है, यह बादी का

कुछ और डिजायन भी हैं, ये इल्मी –

यह लीजे चलती चीज़ नयी, फ़िल्मी ।

यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत,

यह दुकान से घर जाने का गीत,

जी नहीं दिल्लगी की इस में क्या बात

मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात ।

तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,

जी रूठ-रुठ कर मन जाते है गीत ।

जी बहुत ढेर लग गया हटाता हूँ

गाहक की मर्ज़ी – अच्छा, जाता हूँ ।

मैं बिलकुल अंतिम और दिखाता हूँ –

या भीतर जा कर पूछ आइये, आप ।

है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप

क्या करूँ मगर लाचार हार कर

गीत बेचता हूँ ।

जी हाँ, हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ ।

परिशिष्ट – 2. व्यक्तिगत

मैं कुछ दिनों से
एक विचित्र
सम्पन्नता में पड़ा हूँ
संसार का सब कुछ
जो बड़ा है
और सुन्दर है
व्यक्तिगत रूप से
मेरा हो गया है
सुबह सूरज आता है तो
मित्र की तरह
मुझे दस्तक देकर
जगाता है
और मैं
उठकर घूमता हूँ
उसके साथ
लगभग
डालकर हाथ में हाथ
हरे मैदानों भरे वृक्षों ,ऊँचे पहा़ड़ों
खिली अधखिली
कलियों के बीच

और इनमें से
हरे मैदान वृक्ष
पहाड़ गली
और कली
और फूल
व्यक्तिगत रूप से
जैसे मेरे होते हैं
मैं सबसे मिलता हूँ
सब मुझसे मिलते हैं
रितुएँ
लगता है
मेरे लिए आती हैं
हवाएँ जब
जो कुछ गाती हैं
जैसे मेरे लिए गाती हैं
हिरन
जो चौकड़ी भरकर
निकल जाता है मेरे सामने से
सो शायद इसलिए
कि गुमसुम था मेरा मन
थोड़ी देर से, शायद देखकर

क्षिप्रगति हिरन की
हिले-डुले वह थोड़ा-सा
खुले
झूठे उन बन्धनों से
बँधकर जिनमे वह गुम था
आधी रात को
बंसी की टेर से
कभी बुलावा जो आता है
व्यक्तिगत होता है
मैं एक विचित्र सम्पन्नता में
पड़ा हूँ कुछ दिनों से
और यह सम्पन्नता
न मुझे दबाती है
न मुझे घेरती है
हलका छोड़े है मुझे
लगभग सूरज की किरन
पेड़ के पत्ते
पंछी के गीत की तरह
रितुओं की

व्यक्तिगत रीत की तरह
सोने से सोने तक
उठता-बैठता नहीं लगता
मैं अपने आपको
एक ऐश्वर्य से
दूसरे ऐश्वर्य में
पहुँचता हूँ जैसे
कभी उनको तेज
कभी सम
कभी गहरी धाराओं में
सम्पन्नता से
ऐसा अवभृथ स्नान
चलता है रातों-दिन
लगता है
एक नये ढंग का
चक्रवर्ती बनाया जा रहा हूँ

परिशिष्ट – 3

सतपुड़ा के जंगल

सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।
झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।
सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढँक रहे-से
पंक-दल मे पले पत्ते।
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनोने, घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताऐं,

डालियों को खींच खाऐं,

पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाऐं।
सांप सी काली लताऐं
बला की पाली लताऐं
लताओं के बने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।
मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सर के बाल मुँह पर
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात- झन्झा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|
अजगरों से भरे जंगल।
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े छोटे झाड़ वाले,

शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कम्प से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर
पाल कर निश्चिन्त बैठे,
विजनवन के बीच बैठे,
झोंपडी पर फ़ूंस डाले
गोंड तगड़े और काले।
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूंज उठते ढोल इनके,
गीत इनके, बोल इनके
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
उँघते अनमने जंगल।

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,

घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,

लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।
क्षितिज तक फ़ैला हुआ सा,
मृत्यु तक मैला हुआ सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|।

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले।
लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बन-फ़ूल, फ़लियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,                 पूत, पावन, पूर्ण रसमय
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल।

परिशिष्ट – 4

तुम कागज़ पर लिखते हो

तुम काग़ज़ पर लिखते हो
वह सड़क झाड़ता है
तुम व्यापारी
वह धरती में बीज गाड़ता है ।
एक आदमी घड़ी बनाता
एक बनाता चप्पल
इसीलिए यह बड़ा और वह छोटा
इसमें क्या बल ।
सूत कातते थे गाँधी जी
कपड़ा बुनते थे ,
और कपास जुलाहों के जैसा ही
धुनते थे
चुनते थे अनाज के कंकर
चक्की पीसते थे
आश्रम के अनाज याने
आश्रम में पिसते थे

जिल्द बाँध लेना पुस्तक की
उनको आता था

भंगी काम सफाई से -

नित करना भाता था ।

ऐसे थे गाँधी जी
ऐसा था उनका आश्रम
गाँधी जी के लेखे
पूजा के समान था श्रम ।
एक बार उत्साह-ग्रस्त
कोई वकील साहब
जब पहुँचे मिलने
बापूजी पीस रहे थे तब ।
बापूजी ने कहा - बैठिये
पीसेंगे मिलकर
जब वे झिझके
गाँधीजी ने कहा
और खिलकर

सेवा का हर काम
हमारा ईश्वर है भाई

बैठ गये वे दबसट में

पर अक्ल नहीं आई ।

   

परिशिष्ट – 5

कठपुतली (त्रिकाल संध्या संकलन से)

कठपुतली
गुस्से से उबली
बोली - ये धागे
क्यों हैं मेरे पीछे आगे ?
तब तक दूसरी कठपुतलियां
बोलीं कि हां हां हां
क्यों हैं ये धागे
हमारे पीछे-आगे ?
हमें अपने पांवों पर छोड़ दो,
इन सारे धागों को तोड़ दो !

बेचारा बाज़ीगर

हक्का-बक्का रह गया सुन कर

फिर सोचा अगर डर गया
तो ये भी मर गयीं

मैं भी मर गया
और उसने बिना कुछ परवाह किए
जोर जोर धागे खींचे
उन्हें नचाया !
कठपुतलियों की भी समझ में आया
कि हम तो कोरे काठ की हैं
जब तक धागे हैं,बाजीगर है
तब तक ठाट की हैं
और हमें ठाट में रहना है
याने कोरे काठ की रहना है

   

परिशिष्ट – 6

ऊठो

बुरी बात है

चुप मसान में बैठे-बैठे

दुःख सोचना , दर्द सोचना !

शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को

हाज़िर नाज़िर रखकर

सपने बुरे देखना !

टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से

राग उदासी के अलापना !

बुरी बात है !

उठो , पांव रक्खो रकाब पर

जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर

धरती रौंदो !

जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे ,

ऐसे कौंधो ।

परिशिष्ट – 7

स्नेह-पथ

हो दोस्त या कि वह दुश्मन हो,
हो परिचित या परिचय विहीन

तुम जिसे समझते रहे बड़ा
या जिसे मानते रहे दीन

यदि कभी किसी कारण से
उसके यश पर उड़ती दिखे धूल,
तो सख्त बात कह उठने की
रे, तेरे हाथों हो न भूल।
मत कहो कि वह ऐसा ही था,
मत कहो कि इसके सौ गवाह,
यदि सचमुच ही वह फिसल गया
या पकड़ी उसने गलत राह-
तो सख्त बात से नहीं, स्नेह से
काम जरा लेकर देखो;
अपने अन्तर का नेह अरे,
देकर देखो।
कितने भी गहरे रहे गत',
हर जगह प्यार जा सकता है,
कितना भी भ्रष्ट जमाना हो,
हर समय प्यार भा सकता है,
जो गिरे हुए को उठा सके
इससे प्यारा कुछ जतन नहीं,
दे प्यार उठा पाये न जिसे
इतना गहरा कुछ पतन नहीं।
देखे से प्यार भरी आँखें
दुस्साहस पीले होते हैं
हर एक धृष्टता के कपोल
आँसू से गीले होते हैं।

तो सख्त बात से नहीं
स्नेह से काम जरा लेकर देखो,
अपने अन्तर का नेह
अरे, देकर देखो।
तुमको शपथों से बड़ा प्यार,
तुमको शपथों की आदत है;
है शपथ गलत, है शपथ कठिन,
हर शपथ कि लगभग आफ़त है,
ली शपथ किसी ने और किसी के
आफत पास सरक आयी,
तुमको शपथों से प्यार मगर
तुम पर शपथें छायीं-छायीं।
तो तुम पर शपथ चढ़ाता हूँ
तुम इसे उतारो स्नेह-स्नेह,
मैं तुम पर इसको मढ़ता हूँ
तुम इसे बिखेरो गेह-गेह।
हैं शपथ तुम्हारे करूणाकर की
है शपथ तुम्हें उस नंगे की
जो भीख स्नेह की माँग-माँग
मर गया कि उस भिखमंगे की।
है सख्त बात से नहीं
स्नेह से काम जरा लेकर देखो,
अपने अन्तर का नेह
अरे, देकर देखो।

परिशिष्ट – 8

कालजयी खण्ड काव्य के बीज सर्ग का एक अंश

भारत के लोग
गए बाहर
लेकिन सेना लेकर न गए;
वे जहाँ गये इसलिए
प्रेम के पौधे
पनपें नये-नये !

वे शस्त्र नहीं
ले बढ़े स्नेह
सागर को लाँघा आर-पार
ना; घुड़सवार या
रथी नहीं
पादातिक थे उनके विचार !

वे चले बचाकर चींटी को
पशु-बल को सदा
नगण्य गिना;
इसलिए
निपट अन्यों ने उनको
अपना और अनन्य गिना !

तब भारतीय संस्कृति-धारा बनकर ललिता
हो गयी मेखलाकार, स्वर्ण-सागर, वलिता;

जिस शिव-निमित्त-संस्कृति-धारा ने
तट धोये इन देशों के
जिसके कारण हो गए रूप
जाज्वल्यमान परिवेशों के;

उच्छल फेनिल होकर भी थी
जो धारा
गर्जन से विहीन,
जो पहुँची थी
अंजुलि में भर
वाणी निर्मल स्नेहिल अदीन,

वह धारा अब तक
बरस सहस्रों बीत गए
आँखों के आगे आती है
धर रूप नए !

है कभी शंकराचार्य
कभी नानक कबीर
वह आती-जाती है हम तक
होकर अधीर !

वह कभी
विवेकानन्द

 
 

कभी है रवि ठाकुर

फिर कभी गूंजने लगती है

बनकर
गांधी का गौरव-स्वर !

निःशब्द निभृत में बहती है
यह धारा
भरकर कल-कल स्वर
रूखे-सूखे
ऊँचे-नीचे
पृथ्वी के अंचल अपनाकर !

परिशिष्ट – 9

भारतीय समाज

कहते हैं
इस साल हर साल से पानी बहुत ज्यादा गिरा
पिछ्ले पचास वर्षों में किसी को
इतनी ज्यादा बारिश की याद नहीं है ।
कहते हैं हमारे घर के सामने की नालियां

इससे पहले इतनी कभी नहीं बहीं
न तुम्हारे गांव की बावली का स्तर
कभी इतना ऊंचा उठा

न खाइयां कभी ऐसी भरीं , न खन्दक
न नरबदा कभी इतनी बढ़ी, न गन्डक ।

पंचवर्षीय योजनाओं के बांध पहले नहीं थे
मगर वर्षा में तब लोग एक गांव से दूर

दूर के गांवों तक

सिर पर सामान रख कर यों टहलते नहीं थे
और फिर लोग कहते हैं
जिंदगी पहले के दिनों की बड़ी प्यारी थी
सपने हो गये वे दिन जो रंगीनियों में आते थे
रंगीनियों में जाते थे
जब लोग महफिलों में बैठे बैठे
रात भर पक्के गाने गाते थे
कम्बख़्त हैं अब के लोग, और अब के दिन वाले

क्योंकि अब पहले से ज्यादा पानी गिरता है
और कम गाये जाते हैं पक्के गाने ।
और मैं सोचता हूँ, ये सब कहने वाले
हैं शहरों के रहने वाले
इन्हें न पचास साल पहले खबर थी गांव की
न आज है
ये शहरों का रहने वाला ही
जैसे भारतीय समाज है ।

परिशिष्ट – 10

चार कौए उर्फ चार हौए

बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें। कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये

इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो

गये ।

आगे क्या कुछ हुआ

सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहींचार कौओं का दिन है
हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
हाथ बांधकर खडे़ हो गए सब विनती में

हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गायॆं ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले ।

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ।

परिशिष्ट – 11 बुनी हुई रस्सी

बुनी हुई रस्सी को घुमायें उल्टा
तो वह खुल जाती हैं
और अलग अलग देखे जा सकते हैं
उसके सारे रेशे
मगर कविता को कोई
खोले ऐसा उल्टा
तो साफ नहीं होंगे हमारे अनुभव
इस तरह
क्योंकि अनुभव तो हमें

जितने इसके माध्यम से हुए हैं

उससे ज्यादा हुए हैं दूसरे माध्यमों से
व्यक्त वे जरूर हुए हैं यहाँ

कविता को
बिखरा कर देखने से
सिवा रेशों के क्या दिखता है
लिखने वाला तो
हर बिखरे अनुभव के रेशे को
समेट कर लिखता है !

परिशिष्ट – 12

मैं क्यों लिखता हूँ

मैं कोई पचास-पचास बरसों से
कविताएँ लिखता आ रहा हूँ
अब कोई पूछे मुझसे
कि क्या मिलता है तुम्हें ऐसा
कविताएँ लिखने से
जैसे अभी दो मिनट पहले
जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था

तब काग़ज़ काग़ज़ था
मैं मैं था
और कलम कलम
मगर जब लिखने बैठा
तो तीन नहीं रहे हम
एक हो गए

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव, चाँदपुर रोड

बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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