शनिवार, 28 सितंबर 2013

श्याम गुप्त का आलेख : अगीत साहित्य के अलख-निरंजन –डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’

अगीत साहित्य के अलख-निरंजनडा रंगनाथ मिश्र सत्य

                   ( डा श्याम गुप्त )

हिन्दी साहित्य-जगत में अगीत-विधा, संतुलित कहानी एवं संघीय समीक्षा पद्धति आदि विधाओं के प्रवर्तन द्वारा अपनी अलग से एक विशिष्ट पहचान बनाने वाले डा.रंगनाथ मिश्र जी ‘सत्य-पथ के पाथेय’ हैं आपने अपना उपनाम ही सत्य रख लिया है। अपने नामानुसार ही वे बहुरंगी व्यक्तित्व व बहु-विधायी साहित्यकार तो हैं ही, बहु-नामी शख्शियत भी हैं। भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीरप्रसाद द्वेदी व निराला जी की भांति युगप्रवर्तकअज्ञेय की भांति प्रयोगवादी डा.सत्य के आज तक जितने नामाकरण व नामोपाधिकरण हुए हैं उतने नामों से साहित्य-जगत में शायद ही किसी को पुकारा गया हो हो सकता है कि कभी स्कूलों कालेजों में मानी अगीत’ के साथ-साथ डा रंगनाथ के पर्यायवाची भी पढाए-पूछे जाने लगें।

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(रंगनाथ मिश्र सत्य)

जहां पूर्व न्यायाधीश–साहित्यकार श्री रामचंद्र शुक्ल जी सत्यजी को ‘साधना का व्रती.... ‘अदम्य संगठन कर्ता’...अनुष्ठानधर्मायोग्यतम संचालक ..का नाम देते हैं तो गीतकार डा चक्रधर नलिन जी उन्हें ‘युग-प्रवर्तक’ व प्रयोगधर्मी’ का और जंग बहादुर सक्सेना ..’काव्य का दिशा वाहक। प्रोफ.उषा सिन्हा उन्हें अगीत विधा का बट-बृक्ष’ नामित करती हैं तो रूसी भाषाविद संगमलाल मालवीय- ‘लखनऊ साहित्यिक व्यायामशाला का अखाडेबाज़ चौधरी’ और प्रोफ. नेत्रपाल सिंह साहित्यकार दिवस के प्रेरणा स्रोत’ के नाम से पुकारते हैं। उनके योग्य शिष्य सूर्य प्रसाद मिश्र ‘हरिजन’ उन्हें सत्य का सूर्य’ का नाम देते हैं तो श्रीमती स्नेहलता व देवेश द्विवेदी ‘साहित्यिक संत का। गुरुवर, गुरूजी, गुरुदेव नाम से तो वे अपनी अगीत मंडली, शिष्य मंडली, अगीत पाठशाला व अगीत कार्यशाला, अगीत साहित्य-जगत एवं सारे युवा-साहित्यकार जगत में जाने ही जाते हैं; जो उनके शिष्य-शिष्याओं, प्रशंसकों, साथियों की लंबी संख्या व उनकी लोकप्रियता की व्याख्या करता है। सृजन संस्था के अध्यक्ष डा.योगेश गुप्ता उन्हें ‘कर्म-योद्धा’ का नाम देते हैं

उनके अभिन्न साथी व शिष्य श्री पार्थोसेन उन्हें ’आंदोलनकारी व्यक्तित्व कहते हैं वरिष्ठ वयोवृद्ध सुकवि शारदा प्रसाद मिश्र के वे विलक्षण साहित्य सेवी हैं। कवयित्री डा मंजू शुक्ला ने उन्हें ‘हिन्दी के सच्चे सिपाही’ का नाम दिया है और विजय कुमारी मौर्या के लिए वे ‘सत्य का आईना‘ हैं। पट्ट-शिष्य तेज नारायण राही के लिए ‘साहित्य धाम का काव्य संत’ हैं तो स्नेहप्रभा (दिल्ली) ने उनका लिए एक तपस्वी का नाम उद्घोषित किया है। वैदिक विद्वान श्री धुरेन्द्र बिसरिया जी उन्हें सत्य का साधक’...’संकल्प का धनी...अरुंधती तारा...’कर्म-रथी व ‘उद्गीथ का प्रणेता” आदि नामों से नवाज़ते हैं। और भी जाने कितने नाम हैं सत्य जी के। ‘हिन्दी का सूर्य’...’साहित्य उपवन का अनोखा सुमन”...और कवि अनिल किशोर ‘निडर’ उन्हें इस 'युग का चतुरानन पुकारते हैं ...

खिले अगीत-गीत हर आँगन,

तुम हो इस युग के चतुरानन।

और मैं स्वयं डा श्याम गुप्त उन्हें अगीत का कवि-कुल-गुरु कहता हूँ तथा आज अगीत का अलख निरंजन

सतत परिवर्तनशीलता ही प्रकृति-नटी का स्थिर नियम है, चिर-सत्य है, यही प्रकृति है, प्राकृतिक बंधन भी है, रूढिवादिता भी, प्रगतिशीलता भी। इसी प्रकार सतत नवीन चिंतन शैली, कुछ न कुछ सोचते रहना, नया करते रहना, रूढ़िवादी कवि की भांति झोला कंधे पर डाले परन्तु परिवर्तन के चितेरे की भांति चरैवेति-चरैवेति ...चलते रहना ...आते-जाते रहना, सारे नगर में ..देश में... सत्य जी का नियम है। अपने बहुमुखी कृतित्वों, सर्वाधिक साहित्यिक कृत्यों, असंख्य शिष्य-शिष्याओं व युवा कवियों को एवं तमाम साहित्यिक संस्थाओं को अगीत-परिषद के सह-संयोजकत्व में गतिमान, प्रगतिमान रखने वाला बहुयामी व्यक्तित्व समाये वे साहित्यिक जगत के विलक्षण व्यक्तित्व ही हैं साथ ही वे ऐसे व्यक्ति व साहित्यकार भी हैं जिनकी सबसे अधिक आलोचना भी होती है परन्तु वे अपने स्वभावानुसार, नामानुसार अपनी ही धुन में चलते जारहे हैं सतत, अनथक, अविराम, अविचलित, अनासक्त-भाव व सत्य-भाव से। अगति में भी गतिमयता लिए हुए ...अगीत.. गुनुगुनाते हुए .....

“‘सत्य और संयम

मन में उत्साह भरें,

जीवन आशान्वित हो

शान्ति के सहारे,

हिंसा का त्याग करें ;

सबको सुख देकरके

हम गरल पियें।

                                                    ---- डा श्याम गुप्त

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