सोमवार, 16 सितंबर 2013

राम आश्रय का कविता संग्रह - नवीन पथ


                                    नवीन पथ
                                            रचयिता 
                       राम आश्रय  

                               
 
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................यह पुस्तक मैं अपने पूज्य माता -पिता को समर्पित करता हूँ । ----------
                                                भूमिका ---
कविता संग्रह का उद्देश्य आज की आने वाली पीढ़ी को समाज के प्रति उनके कर्तव्यों को एक नई दिशा देना तथा उनके अंदर नैतिक गुणों का विकाश करना है । कविताओं का विषय क्षेत्र समाज की बिगड़ती हुई परिस्थितियों को आधार मानकर आज के छात्र -छात्राओं में आत्म बल विकसित करना तथा उन्हें जागरूक नागरिक बनाना है ।ये कविताएं छात्र -छात्राओं की दुविधा को समाप्त करके उनके अंदर समाज के प्रति एक जिम्मेदार मानव बनाने में सहायक हैं । महापुरुषों पर आधारित कविताएं ,उनके जीवन के उन पहलुओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं जिससे हमें उनके प्रति अधिक श्रदावान बनती हैं । ये कविताएं बच्चों  के लिए सरल सुबोध और सरलता से समझने योग्य तथा उनके कोमल हृदि पर अपना प्रभाव छोड़ने में सक्षयम   हैं । चंद्र्शेखर , राणा प्रताप, भगत सिह , बाबा साहब भीम राव अंबेडकर पर लिखी कविताएं न केवल उनके जीवन की संघर्ष की गाथा कहती हैं बल्कि हमे यह प्रेरणा भीदेती हैं कि कठिन परिस्थियों में भी आशा और विश्वास का दामन नहीं छोड़ना चाहिए और बिना भविष्य की परवाह किए हमेशा प्रयास रत रहना चाहिए । सफलता या असफलता एक सिक्के के दो पहलू हैं वीएच तो सबके जीवन में आना ही है डाक्टर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के त्याग और अपने समाज के प्रति बलिदान की छवि को प्रस्तुत करने का प्रयास है । वह  महान विभूति आज अपने कर्तयों के बल पर उस चोटी पर विराज मान हैं झन साधारण लोगों के लिए करना तो क्या सोचना भी न मुमकिन सा लगता है । मैं अपनी रचनाओं के माध्यम से अगर मैं किसी एक छात्र या छात्रा को प्रेरणा दे सकूँ या उसकी उन्नति में सहायक बन सकूँ तो मैं अपने आप को धन्य मानूँगा । मेरा प्रयास षड सफल भी हो जाए । जीवन में किए गए सभी कार्यों में सभी को चोटी पर पहुंचने  कामयाबी नहीं मिलती है अभी असफलता भी हाथ लगती है इसका तात्पर्य यह नहीं कि हमे अपने प्रयास को समाप्त कर देना बल्कि हमें उनसे सीख लेनी चाहिए और  अगली बार पूरी सफलता  के लिए प्रयत्न करना चाहिए । प्रातेक पाठक से मेरा आग्रह है कि मेरे कविताओं को पढे और मेरे विचारों को समझने की कोशिश करें ।        


अनुक्रमणिका सूची :---
1॰  ज्ञान दीप
2.    पिता
3.    जीवन चक्र
4.    सरकारी राशन की दुकान
5.    मेरी  साइकिल
6.    कलम
7.    आंशु सदा बहाते क्यों !
8.    ज्ञान पथ
9.    दुनिया की नजर से
10.    आधुनिक शिक्षा
11.    वैकल्पित व्यवस्था
12.    प्रतिभा को पहचानो
13.    आँगन में
14.    इतिहास
15.    आज का विध्यार्थी
16.    शतरंज
17.    साहित्यकार 
18.    अनुमाला
19.    सांप्रदायिक सौहार्द
20.    भगत सिंह
21.    ओ मेरे बाबा
22.    मेरा वतन
23.    सोचो जरा
24.    होली
25.    क्या बादल तुमने देखा !
26.    हे ईश तू इतना कठोर क्यों !
27.    चींटी
28.    नीम का पेड़
29.    तिरंगा झण्डा
30.    श्वान और इंसान
31.    दूध और पानी
32.    गांधी जी के बंदर
33.    देश की प्रगति
34.    समस्या
35.    धरती माँ
36.    बसंत का स्वागत
37.    नवीन पथ
38.    प्रजातन्त्र पर चोट
39.    हे मानव कुछ ऐसा कर
40.    बाबा इतना तू कार
41.    आज की शिक्षा
42.    राणा प्रताप
43.    चन्द्रशेखर आजाद
44.    प्यार निर्झर बह गया ।   


1                   ज्ञान दीप
दीप ज्ञान का जब जले , करे तिमिर का नाश ।
दुख के एसबी बादल हटे ,मन में जागे आश ।।  
समस्या का समाधान है धीरज में ,
अंधेरे का सम्र्राज्य शाश्वत नही ।
धरती अम्बर या किसी समाज में ,
जीवन पथ पर चलना आसान नही ।
ऊंचे -नीचे पथरीले राहों में ,
संयम बना के रखना आसान नही ।
अम्बर में तारे फंस गए विपत्ती में ,
चाँद अभी मंजिल पर निकला नही ।
सूरज छोड़ा जगत को, साया छोड़ी साथ ।  
मिले नहीं  तब आपको, आफ्नो का भी साथ ।।
उस अज्ञानता के घोर अंधेरे में ,
किसी का भविस्य सुनिश्चित नहीं ।
भ्रष्टाचार ने लिया अपने गिरफ्त में ,
गाँव गली कोई सुरक्षित नहीं ।
जीते सब लोग भय और आतंक में ,
विश्वास का कहीं नामोनिशान नहीं ।
अब घुल गया जहर सबके जीवन में ,
हिन्दू ,मुस्लिम ,ईसाई में प्रेम नहीं ।
घनी अंधेरी रात  में, जहां न सूझे राह ।
ज्ञान की सच्ची ज्योति में ,मिल जाती है राह ।।
चुनौती बन गया सारे समाज में ,
शांति सद्भाव अब कहीं दिखता नहीं ।
ज्ञान की रोशनी फैली सारे संसार में ,
कुटिल अंधकार अब कहीं टिकता नहीं ।
ज्ञान का उपहास किया बाजार में ,
ज्योति दृश्य देख तिमिर की उलझन बढ़ी ।
सिर झुका चल पड़ा किसी अंजान गली में ,
ज्ञान शौर्य देख सब में उत्कंठा जगी ।
भव भय बाधा सब हटी , मिटा हृदय का क्लेश ।
ज्ञान का दीपक जब जला ,भूल गया सब द्वेष ।।
मिट गई सकल रूढ़ियाँ क्षण मात्र में ,
जो सत्य की कसौटी पर टिकी नहीं ।
मानवता फैली सम्पूर्ण समाज में ,
छल ,कपट राग ,द्वेष अब रहा नहीं ।
संविधान पहुँच गया अब सबके बीच में ,
मिले सबको अधिकार अब विवाद नहीं ।  
सहज़ सुलभ शिक्षा अब फैली जगत में ,
भ्रष्टाचार का किला आंधी में टिका नहीं ।
अभेद गढ़ भी ढह गया, एकता के वार से ।
दुख दरिद्र सब मिट गया, ज्ञान के प्रहार से ।।
अज्ञान घिर गया अपने ही जल में ,
मूर्ख को समाज में प्रतिष्ठा मिले नहीं ।
जय मिली ज्ञान को आज रण क्षेत्र में ,
प्रगति पथ खुल गया अब कहीं बाधा नहीं ।
दीपों की अवली सजीं हर गली में ,
झूठ पाखंड अब समाज में दिखता नहीं ।
दीपक की ज्योति रंग लायी देश में ,
अब यहाँ असहाय नर मिलता नहीं ।
ज्ञान सब हर लेत पीर ,जो मन रखता धीर ।
धन वैभव लाता सदा , कर्ता सब दुख दूर ॥
आओ हम सब दीप जलाएँ अपने घर में ,
निश्चित करें आज तम कहीं टिके नहीं ।
खुशी के दीप जलाए सभी  के जीवन में ,
लालच में मानव कभी फंसे नहीं ।
प्यार का संचार करें सारे जगत में ,
तीनों लोकों में दरिद्रता दिखे नहीं ।
हर मौसम में फूल खिले उपवन में ,
गुलशन में क्यारी सूखी मिले नहीं ।
बादल उमड़े अम्बर में , भर खुशियों के नीर ।
धरती डूबी प्रेम में , गद गद हुआ शरीर ॥

                          2     पिता
पिता और गिरिराज में , नाता भूत अटूट ।
हर दम रखते लाज ये , दोनों धरती के पूत ॥
सर्द रात में पहरा देता ,
हर  बैरी को रखता दूर ।
सीना खोल दुश्मन से लड़ता ,
करता उसकी हिम्मत चूर ।
गर्म हवा से हमें बचाता ,
हमको प्यार देता भरपूर ।
पिता जुड़े सत कर्म से, बढ़े कीर्त चहुं ओर ।
बैरी भागे रण क्षेत्र से ,मुख कर उल्टी ओर ॥
हर पल सोचे देश की उन्नति ,
कभी न भूले अपनी मंजिल ।
तन मन धन सब कर अर्पित ,
करें हमेशा जन -जन का मंगल ।
आज सकल समाज है विकसित ,
प्रगति देश की करते पल पल ।
त्याग और बलिदान से सिंचित ,
बागों में हैं लदे फूल फल ।
छलकी गागर प्रेम से , खींचे अपनी ओर ।
कष्ट बांटते खुशी से , बंध ममता की डोर ॥
नदी को जीवन देते पर्वत ,रोक बादलों की सुगम राह ।
नदियां करती कण - कण में सृजन,
भर खुशियों की मधुर  मिठास ।   
दिन रात मिटाते जग से नफरत ,
सदा सिखाते ममता का पाठ ।
कट जाती जन जन की मुसीबत ,
इनकी सेवा पर है हमको नाज ।
अब प्रगति का संसार में, खुल गया है रास्ता ।
भारत के इतिहास में, अमर इनकी दास्ता ।।


                        3      जीवन चक्र
समय छिपा सूर्य चक्र में ,जहां दुनिया  सारी डोले
धरती से लेकर आसमान में ,नित नये रहस्य को खोले !
कली के अंदर छिपे फूल  में, अपना नाना रूप छिपाये
घूम- घूम कर मधुकर उपवन में, सुंदर राग सुनाये !
फूल के अंदर छिपे सुगंध में , अमृत के कण घोले
चंद दिनो के अपने जीवन में, दुनिया में नव जीवन डाले !
फूल के अंदर छिपे बीज में , अपना सुंदर भविस्य सँजोये
एक प्यारा पौधा छिपा बीज में, दुनिया को नजर न आए !
खुली आँख जब वर्षा ऋतु में , अमित प्यार जग में बरसाए
जड़ चेतन को जोड़ कड़ी में,पूरे जग में खुशी लुटाये !  
गर्मी सर्दी कठिन समय में ,धरती पर जीवन चक्र सँवारे ।
पशु पक्षी और मानव जीवन में खुशियाँ ले हर रोज पधारे ।
सबका दुख हर एक पल में ,अदृश्य डोर से सबको जोड़े ।
आदि-अंत के सारे बंधन में,जीवन चक्र का नाता जोड़े ॥


,

  4                सरकारी राशन की दुकान
सरकारी राशन की दुकान पर ,
बट रहा था गरीबों को अनाज ।
मुझे शंका हुई टामी, लुषी के नाम पर ,
दुकानदार ने बताया मैं आया हूँ आज ।
मैं तो नौकर हूँ इस दुकान पर ,
मेरा कम है ग्राहक को  देना अनाज ।
फिर राशन कार्ड हो किसी के नाम पर ,
कुछ लोग ले गये राशन का अनाज ।
दूसरे दिन जब ग्राहक आए दुकान पर ,
बोरी से निकला सड़ा हुआ अनाज ।
कुछ जागरूक लोगों की कोशिश पर ,
बाटा गया  लोगों को राशन का अनाज ।
तीसरे दिन लटक गया ताला दुकान पर ,
साफ लिख दिया  खत्म हो गया अनाज ।
अनाज तो आया था हमारे नाम पर ,
खत्म कैसे हुआ स्टाक से अनाज ।
दुकानदार ने रख दिया रजिस्टर निकालकर ,
हमें सब पता है तुम हो बड़े धोखेबाज ।
मुझे विश्वाश नहीं तुम्हारे रजिस्टर पर ,
तुम कहते कुछ करते कुछ ,तुम हो सौदेबाज ।
यह कोरी कल्पना नहीं  राशन की दुकान पर ,
आज सब लूट लिया गरीबों का अनाज ।

 

      5     मेरी साइकिल
ये दो पहिये की गाड़ी ,सदा चलती अगाड़ी ,
न चलती पिछाड़ी, ये गरीब की सवारी ।
नगर की गलियों में, शहर की सड़कों पे ,
गाँव की पगडंडी पे ,सरपट चलती ये सवारी ।
ये वक्त की पाबंद ,सभी लोगों की पसंद ,
कभी पड़ती नहीं बंद , सूनी राहों में होती नहीं मंद ।
नदी ,नाले खण्डे में , चढ़ जाए कंधे में ,
पार करे क्षण में , तैयार सदा रण में ।
स्वथ्य को संवारती ,प्रदूषण को निवारती ,
धन को सदा संचय करती , धोखा कभी न करती ।
वायु प्रतिकूल में, कभी रुके न सवारी ,
वायु अनुकूल में , सरपट दौड़ी ये सवारी ।
ढाल में क्या चाल दिखाये ये सवारी ,
ये चलती अगाड़ी , न चलती पछाड़ी ।
ये कितनी सुंदर है , ये मेरी सवारी ।।  


    6    कलम
मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
नन्ही सी आकृत ले ,मैंने कदम रखा ।
चल पड़ी मई आशा के जीवन पथ पर ,
जहां मुझे खुद को कुछ नहीं था पता ।
हंस रहे थे लोग मेरे परिणित  पर,
समय ने मुझको दिया सुनहरा मौका ।
मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
मैं ने सजने सँवारने का नहीं छोड़ा मौका ।
देखते ही देखते मैं छा गयी बाजार पर ,
हर तरफ संसार में होने लगी चर्चा ।
बच्चे ,बड़े हर किसी के जेब पर,
मैंने आसानी से कर लिया कब्जा ।
मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
मेरे रूप सौंदर्य का बट गया पर्चा ।
मैं सदा रहने लगी मानव के मुख पर ,
मुझे साथ रखने के लिए लोग करने लगे खर्चा ।
बाजार में बिकने लगी नाना रूप धारण कर ,
सुंदरता के साथ मैं ने बढ़ायी अपनी क्षमता ।
दो घड़ी से बड़ अब मैं चलने लगी सप्ताह भर ,
धरती से लेकर अम्बर की ऊंचाई को छुआ ।
मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
दिखा दिया मानव को वह अजेय लम्हा ।
मैं नन्ही सी कलम ,मुझे विश्वाश  है अपने ऊपर ,
मैं दे सकूँ सबको सुख का लम्हा ।
मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर ।

 

7    आंशू  सदा बहाते क्यों !
जब वर्षा रानी रूठ गयी, तो आंशू क्यों बहाते हो ।
जड़ जंगल रह सावधान, सब  अपना धर्म निभाते ।
मीठे-मीठे सुमधुर फल देकर , सबकी भूख मिटाते ।
पशु पक्षी को परम प्यार दे , सदा उनकी रक्षा करते ।
हर प्राणी को शरण में रखकर ,धरती की शान बढ़ाते । 
जड़ चेतन का सुंदर रिश्ता , जीवन में  सदा निभाते ।
बदले में कुछ आश न रखकर , मानव को पाठ पढ़ाते ।
पर मूर्ख इंशान !इनकी प्यार की भाषा कहाँ समझते  ।
प्यार के बदले नस्तर देकर , सब जड़ से इन्हे मिटाते ।
वर्षा लाने वाले उपवन की ,रक्षा मन से कभी न करते ।
नभ में छाए घन  देखकर ,इन्द्र की  पूजा हैं नित करते ।
जीवन देने वाले वन को , सच्चा प्यार कभी न करते ।
जब वर्षा रानी रूठ गयी, तो आंशू सदा  बहाते ।
  नदियां सारी सूख गयी, तो आंशू सदा बहाते ।
लालच के वशीभूत होकर , जंगल से पेड़ को काटते ।
नदियों पर फिर बांध बनाकर , पानी को एसे बांटे ।
नदी किनारे उद्दयोग लगाकर , जल में जहर मिलाते ।
नदी का पानी शहरों में लेकर, अपनी प्यास बुझाते ।
जंगल पर अधिकार जमाकर, पशु पक्षी से बसेरा छीने ।
नदी के जीवन चक्र तोड़कर , ये झूठी शान दिखाते ।  
नदियां बहना भूल गयी तों  अब आंशू क्यों हो बहाते ।

 


  8     ज्ञान पथ
ज्ञान की रोशनी लेकर शिक्षक चला ,अज्ञानता हटा,
सबको सत पथ पर लाने ।
पूरे धरा से तिमिर को मिटाने ।
प्रेम की डोर लेकर शिक्षक चला ,
दिग जन को सत पथ पर लाने ।
बिखरी हुई मोतियों से माला बनाने ।
ममता का पैगाम लेकर शिक्षक चला ,
मज़लूमों और गरीबों न्याय दिलाने ।
अपने रूठे स्वजन को घर वापस लाने ।
संस्कारों की सौगात लेकर शिक्षक चला ,
समाज की खोई हुई गरिमा को लाने ।
घृणा को त्याग सबको सही रह दिखलाने ।
आशा के दीप लेकर शिक्षक चला ,
आतीत को पीछे छोड़, सबको नई राह बतलाने ।
निराशा को जड़ से धरा से मिटाने ।
अपने दृण इरादों को लेकर शिक्षक चला ,
साहस को साथ रख , नई चेतना जगाने ।
भ्रष्टाचार मुक्त अपने सारे देश को बनाने ।
हाथ में कुदाल लेकर शिक्षक चला ,
बंजर धरा पर नई पौध को लगाने ।
देश में हरित क्रांति को सफल बनाने ।
वाणी में अमृत लेकर शिक्षक चला ,
ओजमयी वाणी से अमरता दिलाने ।
साक्षात धरा पर स्वर्ग को उतारने ।
साहिल को हाथ लेकर शिक्षक चला ,
भंवर में फंसी नाव को किनारे लगाने ।
मुश्किल में फंसे इंसान को राहत दिलाने ।
लेखनी को पकड़ हाथ शिक्षक चला ,
अपनी ओज मयी रचना से सबको हंसाने ।
देश और दुनिया को एक साथ मिलाने ।


9       दुनिया की नजर से ।
निर्माण छिपा है शांति में ,
दर्शन छिपा है साहित्य में ,
कौतूहल छिपा है क्रीडा में ,
असमंजस्य छिपा है परिणाम में ,
दुनिया की नजर से ।
आनंद छिपा है संगीत में ,
मनोरंजन छिपा है नृत्य में ,
सुंदरता छिपी है स्थापत्य में ,
शैतान छिपा है इंसान में ,
दुनिया की नजर से ।
पूर्णिमा की स्वच्छ चाँदनी में ,
दिन के फैले प्रकाश में ,
हर भीड़ भरी सड़कों में,
मौत छिपी है हर साँस में ,
दुनिया की नजर से ।
मकरंद छिपा है फूलों में ,
मिठास भरा है फलों में ,
वृक्ष छिपा है बीज में ,
खुशियाँ भारी हैं जीवन में ,
दुनिया की नजर से ।
हर मानव की दृष्टि में ,
श्रेष्ठ सकल सब श्रीस्टी में ,
अतल सागर की गोद में ,
मोती छिपी है सीप में ,
दुनिया की नजर से ।
ज्योति छिपी है नैनों में ,
शक्ति छिपी है बाजू में ,
ज्ञान छिपा है मस्तिस्क में ,
प्राण छिपा है शरीर में ,
दुनिया की नजर से ।
पर्वत की उत्तुंग शिखरों में,
सागर की अतल गहराई में ,
गर्मी से तपते मरुस्थल में ,
जीवन रहस्य छिपा है कण -कण में,
दुनिया की नजर से ।
सागर की उठती लहरों में ,
प्रचंड वायु के झोंकों में ,
विकराल आग शोलों में ,
जीवन छिपा हर हाल में ,
दुनिया की नजर से ।


10         आधुनिक शिक्षा
विद्यालयों में विद्यार्थियों का,
भविस्य  आज सुरक्षित नहीं ,
शिक्षक और शिक्षार्थियों का,
सम्बंध आज कुछ अच्छा नहीं ।
मंजिल से विमुख विद्यार्थी को ,
राह दिखलाना आसान नहीं ,
हर विद्यार्थी संस्कारित हो ,
केवल शिक्षक जिम्मेदार नहीं  ।
शिक्षा को प्रोत्साहित करने का ,
अधिकारियों  को वक्त नहीं ,
शिक्षा में  गिरते मानव मूल्यों का,
निराकरन करना आसान नहीं ।
व्यवसाय से विमुख शिक्षा का ,
हमारे जीवन में कोई अस्तित्व नहीं ,
टुकड़ों से बनी इस सरकार का ,
भ्रष्टाचार पर कहीं अंकुश नहीं ।
शिक्षाविद ,कर्मठ अधिकारियों का,
आज मनोबल शेष बचा नहीं ,
आज छात्रों की बढ़ती आकांक्षाए,
पूरी होती खीं दिखती नहीं ।
भयंकर हिंसक प्रवितियों के ,
कुचक्र से अपना समाज बचा नहीं ,
सड़क पर खून निर्दोषों का ,
अब बहने से कहीं रुका नहीं ।
व्यवसाय और दिशाहीन शिक्षा में ,
सरकारी तंत्र निर्दोष नहीं ,
शिक्षा और शिक्षार्थी को बचाने का ,
वक्त बिलकुल गया नहीं ।
बदल दो खराब शिक्षा नीति को ,
आज समय की सच्ची जरूरत यही ॥

            11   वैकल्पित व्यवस्था
                  
विकास के नाम पर भविस्य को बिगाड़ते,
जड़ जंगलों को काट  पक्षियों का घर छीनते ,
उनके भोजन शृंखला को यहाँ वहाँ तोड़ते ,
विलुप्त होती प्रजाति को संरक्षित घोषित करते ,
कुदरत से हट उनके लिए वैकल्पित व्यवस्था करते ।
मैंने उन्हें देखा वैकल्पित व्यवस्था करते ।।
नाना कल कारखानों को स्थापित करते ,
जैविक संसाधनों का खुलेआम दुरुपयोग करते ,
प्राणी मात्र के जीवन को सदा संकट मेन डालते ,
संविधान में वर्णित नियमों का उंलघन करते ,
अपने कुकृत्यों पर सदा झूठ का पर्दा डालते ,
प्राण दायिनी वायु के लिए वैकल्पित व्यवस्था करते ।
मैंने उन्हें देखा वैकल्पित व्यवस्था करते ।।
वनों को काटकर  सड़कें और पुल बनाते,
सुविधायों के नाम पर रेलें  और बसें चलाते ,
समाज में फैली दूरियों को जड़ से मिटाते ,
आवास के नाम पर बड़े -बड़े महल बनाते ,
कृषि सिंचाई के नाम पर नदियों को रोकते ,
पशु को असहाय कर उनके लिए अभयारन बनाते,
मैंने उन्हें देखा वैकल्पित व्यवस्था करते ।।
विज्ञान प्रगति के नाम पर लिंग परीक्षण करते ,
स्व सम्मान के लिए लड़कियों की ह्त्या करते ,
बेटे के लिए योग्य बहू मिले दर -दर भटकते ,
यहाँ वहाँ कहीं  से एक  लड्की खरीद लाते ,
अपनी बुद्धि और ज्ञान का गलत इस्तेमाल करते ,
सभी की सदी हो सके वैकल्पित व्यवस्था करते ,
मैंने उन्हें देखा वैकल्पित व्यवस्था करते ।।


12                          प्रतिभा को पहचानों
अपनी प्रतिभा को पहचानों ,सकल देश के वीर जवानों,
भीड़ से हटकर मंजिल देखो ,पथ पर आगे बढ़ना सीखो ,
अपने अंदर प्यास जगा लो , अपना अटल तुम लक्ष्य बनालो,
इधर उधर बिलकुल मत भटको,बनकर सूरज नभ में चमको ,
मन में रख कर पूरा विश्वाश , मत कर किसी से कोई आश ,
अब तुम बनोगे सबके खास , सब  कुछ दिया प्रभु तेरे पास ,
असंभव कार्य संभव कर डाला , दूध में छिपे मक्खन को निकाला ,
दुनिया को संगठित कर डाला , पर्वत का सीना चीर डाला ,
बहती नदी को मोड़ डाला , मरुभूमि में जीवन रच डाला ,
तेरा पौरुष जग से निराला, सारे जगत को नाप डाला ,
जब एक अज्ञानी भेड़पालक, बन सकता है उनका नायक ,
उनके संग फिरता जंगल -जंगल , कभी न होता उनका अमंगल ,
कठिन समय में उन्हें बचाता , रोज शाम घर वापस लाता ,
बजती सदा घरों में पायल , बैरी कर्ता कभी न घायल ,
हम ज्ञान और विज्ञान से सज्जित, आतंकी करते हैं लज्जित ,
हर ओर नजर तुम रख सकते, शैतान की बातें सुन सकते ,
जहां कहीं वह देश में रुकते , वह घर गाँव जहां वे बसते ,
खत्म करो सब उनके रास्ते , खुशियाँ हो जग में सबके वास्ते ,
ये मेरे वीर ,मजदूर, किसानों, अपनी प्रतिभा को पहचानों ।
देश में सुदृद शासन तुम ल दो , जन -जन को खुश हाल बना दो ॥

 


                       13    आँगन में
नए वर्ष की स्वर्ण किरण,पहले आए तेरे आँगन में ,
अंधकार की काली छाया, टिक न पाये तेरे आँगन में । 
प्रीत,स्नेह और धन वैभव ,लाये कुबेर तेरे आँगन में ,
दुनियाँ की सारी सुख सुविधा ,भर जाएँ तेरे आँगन में ।
फूल कली से महके उपवन , भँवरे गायें तेरे आँगन में ,
प्यारी चिड़ियों की मधुर गूंज , हर क्षण गूँजे तेरे आँगन में ।
सौरभ सुगंध बन तेरा गौरव ,छा जाये जग के आँगन में ,
दुख दरिद्र और हीन भावना , कभी न आए तेरे जीवन में ।
काम क्रोध और मन में लालच , कभी न टिके तेरे दामन में ,
चन्दा ले चमके धवल चाँदनी , हर शाम तुम्हारे आँगन में  ।
तारों की झिल मिल ज्योति , हर रात सजे तेरे आँगन में ,
रतनाकर की हर उठती तरंग , रत्न भरे तेरे आँगन में ।
कारे कजरारे सांवन के बादल , मोती बरसाएँ तेरे आँगन में ,
सबकी उन्नति और प्रेम भावना, हो लक्ष्य तुम्हारे जीवन में ।
शांति और सदभाव की कामना , फैले सबके जीवन में ,
नए वर्ष की स्वर्ण किरण,पहले आए तेरे आँगन में ॥

                14   इतिहास
इतिहास का उपहास मत  कर,
यह  तेरे आतीत का दर्पण है ।  
ये जीवन के सभी मोड़ों पर ,
ये ज्ञान ज्योति का प्रकाश पुंज है ।
स्वर्ग से सुदर राज महल पर ,
सारी दुनिया आज फिदा है ।
मानव सभ्यता के विकास पथ पर ,
चलता फिरता एक कथा चित्र है ।
पर्वत का सीना आज फाड़कर ,
तूने जो विजय  पथ बनाया है । 
गिरिवर की उतुंग चोटी पर ,
पद चिन्ह तुम्हारे जो अंकित हैं ।
नदी की बहती धारा को मोड़कर ,
बिजली जो आज तुमने बनाई है ।
बंजर धरती पर बीज रोपकर ,
जो फसल आज तूने उपजाई है ।
सागर की लहरों से लड़कर ,
कनिष्क ,विराट को तैराया है ।
वारिध को रण मेन परास्त कर ,
मोती चुन गर्त से बाहर लाये हो ।
अम्बर मेन उड़ते वायुयान पर ,
नजर सभी की टिकी हुई है ।
अब चंदा से लेकर मंगल पर ,
तेरी शोर्य पताका फैली है ।
यह जीवन की उन्नति अवनति पर,
एक वृसितित लेखा जोखा है ।
अपने इतिहास का उपहास मत  कर,
यह  तेरे आतीत का सच्चा  दर्पण है ।  

   15     आज का विद्यार्थी
हमारी प्रगति में गुरुजनों का योगदान ,
सभा में बैठे गुरुजन हैं महिमा से मंडित ।
सदा हमको दिया विद्या का श्रेष्ठ दान ,
ज्ञान विज्ञान से आज हम हैं सुशोभित ।
अजी ! छोटे में हमने वादा किया था ,
बड़ों का सम्मान गुरुजनों  का आदर ।
हर सुबह हमने प्रतिज्ञा किया था ,
कभी भी न किसी का करेंगे निरादर ।
मान सम्मान का पूरा ध्यान रखा था ।
छोटी -छोटी गलतियों ध्यान हटाकर ,
कभी काम न किया तो निकम्मा कहा था ।
बुरी आदतों से हमें रखा  बचा कर,
जो बचपन हमने उनसे  वादा किया था ।
पूरा करेंगे सारे कसमें निभा कर ,
पाँच सितंबर उन्हें दे देंगे सम्मान ।
उनकी सारी  शिकायत को दूर कर, 
पढ़ देगें व्याख्यान निभा देंगे वादा ।
आशा की ज्योति फिर से जलाकर ,
अपने गुरुजन के मन में है आश जगाना ।

         16    शतरंज
शतरंज के एचआर मोहरे , चलते अपनी चाल ।
बैरी को सब मिल मारते , रखते सबका ख्याल ॥
शतरंज समाज का सच्चा है आइना ,
हर खिलाड़ी सदा जीत की करता कामना ।
वर्तमान में भविष्य का दिखलाता रास्ता ,
बैरी से डटकर सदा करता है सामना ।
अपने प्रतिद्व्दी को कम नही आँकता ,
युद्ध के मैदान से पीछे नहीं भागता ।
खतरों की प्रवाह न करता सिपाही , 
राजा की शान हैं ये सच्चे सिपाही ।
अपने राजा की राह करते आसान ,
राजा की जीत में सदा पाते सम्मान ।
शतरंज में प्रजातन्त्र का , झलकता है सही रूप ।
समाज के हर क्षेत्र का , रखता समग्र प्रारूप ॥
फैला जगत में आज सर्वत्र एक रूप ,
शासन में जनता का दिखता स्वरूप ।
सूरज सादृश्य सबको देता है धूप ,
भेद भाव छोड़ बना सबके अनुरूप ।
नाना जाति धर्म बंटा अपना समाज ,
प्रगति पथ है खुला सबके लिए आज ।
गरीब मजदूर सब मिलकर रहते आज ,
बढ़ रहा आगे प्रतिदिन अपना समाज ।
मंत्री अधिकारी सब हैं एक दूजे के साथ ,
जन नायक आज मांग रहे जंता से साथ ।
प्रखर बुद्धी का परिचय दे , शतरंज जीते प्रवीण ।
दुश्मन से बाजी छीने , कर सबको पराधीन ॥
शतरंज बुद्धि जीवियों का उत्तम खेल ,
समाज के हर वर्ग का दिखलाता मेल ।
समय का इस खेल में नही कोई मोल ,
दुश्मन पर विजय की देता राह खोल ।
संकट में धैर्य रखकर लेता उत्तर खोज ,
आलस्य को त्याग सतर्क रहता हर रोज ।
बाजी हर चाल की चलता है  नाप तोल ,
हर किसी से रखता आपस में मेल जोल ।
उसके यश की पताका जग में फैले चहु ओर ,
सूरज की तरह अम्बर में चमके चारों ओर ।
दिखा रहा शतरंज आज , शासक की योग्यता ।
साम्राज्य में आपूर्व तेज , सूर्य सादृश्य चमकता ॥


     17   साहित्यकार
साहित्यकार है एक सफल मालाकार ,
जो नाना फूलों से बना देता सुंदर माला ।
रचता है कविता लिखता, कहानी का सार ,
जो सबके दिल को प्रभावित केआर डाला ।
भाषा के शब्दों को चुनकर देता आकार ,
अपनी कल्पनाओं को देता सुंदर आकार ।
समाज में फैली विसंगति को मिटाकर ,
देता है अपने देश के गौरव को संवार । 
त्याग बलिदान की सच्ची इबारत रचकर ,
भर देता है जन जन के मन में प्यार ।
अपनी सहज मनोवृतियों से सृजन कर ,
लाता है पुरानी परम्परायों में सुधार ।
राग ,द्वेष ,ईष्या को मानव हृदय से मिटाकर ,
भविष्य की न्यी पौध करता है तैयार ।
जो विपत्ति के तेज धूप में गहन छाया बनकर ,
जोड़ दे सबको, बनकर माला की एक डोर ।
समता ,ममता सबके मन में जगाकर ,
नफरत को दे सबके मन से निकाल ।
प्रेम,सद्भाव की मजबूत बुनियाद रखकर ,
विश्व के समक्ष रख दो एक अनोखी मिशाल ।
गहन अंधकार में जीवन ज्योति बनकर ,
फैला दो जगत में अमन और शांति का पैगाम ।
सभी समाज में एकता की कड़ी बनकर ,
कर दो अब देश और धर्म का उत्थान ।। 

             18   अनुमाला
अपनी अनुमाला चमक रही ,ज्यों माथे की बिंदिया ।
शोभा हर दिन बढ़ा रही, कण-कण में भर्ती खुशियाँ ।
बादल में चंदा चमक रही , करती नाना अठखेलियाँ ।
घन बीच दामिनी चमक रही ,ज्यों दातों की लड़ियाँ ।
अंधकार से संघर्ष कर रही, सड़कों पर लगी बत्तियाँ ।
भटके राही को दिखा रही,सच्ची और अनुपम गलियाँ । 
गुलशन में क्यारी महक रही, यहाँ खिली हुई सब कलियाँ ।
माली बगिया को सींच रहा , प्रेम नीर भर अपनी आखियाँ । 
अनुमाला के बीच बह रही , शुद्ध ज्ञान की अनुपम दरिया ।
जीवन की गति विधि सीख रहीं,यहाँ की लड़के लड़कियां ।
आज सभी दिशा में गूंज रही, हंसीं खुशी की फुलझड़ियाँ । 
हर डाली पर चिड़ियाँ चहक रही,मिलकर करती मीठी बतियां ।
निर्मल तापी का जल छलक रहा ,जहां तैर रहीं जल परियाँ ।
खेतों में फसलें लहर रहीं, कहती किसान की सब खुशियाँ ।
हर आँगन में गूंज रही, नन्हे मुन्नों की प्यारी किलकारियाँ ।
दुख और पीड़ा का यहाँ नाम नहीं , समय पर मिलती औषधियाँ ।
जन -जन का जीवन सुधर रहा, हर गाँव में पक्की हैं गलियाँ ।
है धरा स्वर्ग में बदल रही , दिखती सबके मुख पर खुशियाँ ।
यहाँ वन उपवन सब हरे भरे , फल- फूलों से लदी हैं डालियाँ ।
श्री एल॰ के॰ जैन के संरक्षण में , हो रही पल्लवित अपनी बगिया ॥  

     19     संप्रदायिक सदभाव
यह सुंदर स्वप्न हमारा ,यह संदेश हमारा ।
दुनिया में  सबसे न्यारा , हो भारत देश हमारा ॥
प्रेम और सदभाव दिखे, जन मानस की भाषा में ,
सबको सुख समृद्धि मिले, आगे आने वाले वर्षो में ,
ममता की प्यारी छांव फैले, घर-घर के हर आँगन में ,
समता के पेड़ हर ओर उगे , बागों की हर क्यारी में ,
यह सुंदर स्वप्न हमारा ,यह संदेश हमारा ।
दुनिया में  सबसे न्यारा , हो भारत देश हमारा ॥
सृजन का सुंदर संयोग दिखे , हर गाँव की छोटी गलियों में ,
सौभाग्य की अनुपम ज्योति जले,भयंकर आंधी और तूफानों में ,
ज्वलंत समस्या तत्काल मिटे, करुणा जगे हर मानव में ,
हर मन से द्वेष और नफरत मिटे , छलके मधुरता वाणी में ,
यह सुंदर स्वप्न हमारा ,यह संदेश हमारा ।
दुनिया में  सबसे न्यारा , हो भारत देश हमारा ॥
राग द्वेष का बीज हटे , ईर्ष्या मिटे हर द्वार से ,
भ्रष्टाचार के सूल कटे , हर आफिस के दीवार से ,
भय और आतंक तत्काल मिटे,देश के कोने-कोने से,
घृणा की कलुषित सोच मिटे,हर मानव के अंतस्थल से ,              
यह सुंदर स्वप्न हमारा ,यह संदेश हमारा ।
दुनिया में  सबसे न्यारा , हो भारत देश हमारा ॥
जाति धर्म के सब बंधन टूटे, नर नारी मिले प्यार से ,
झूठ फरेब के आड्म्बर टूटे , सच्चाई के दृढ़ प्रहार से ,
उन्नति के सब राह खुले , सच्चे त्याग और बलिदान से ,
भाईचारा और सौहार्द्य बढ़े,आपसी प्रेम और सहयोग से ,
यह सुंदर स्वप्न हमारा ,यह संदेश हमारा ।
दुनिया में  सबसे न्यारा , हो भारत देश हमारा ॥

                  20   भगत सिंह
वय किशोर सुकुमार बालकों ,मैं गाथा आज सुनता हूँ ।
आजादी कैसे मिली देश को , फरमान आज मैं कहता हूँ ।
आजाद ,भगत सिंह ,बटुकेश्वर, जग में खुदीराम अलबेला ।
राम प्रसाद ,बिस्मिल सावरकर,सबने मौत से डटकर खेला ।
फिरंगियों की जुल्मी छाया,दारुण दुख लेकर आयी थी । 
देश की भोली जनता पर ,हर तरफ मुसीबत छायी थी ।
परवाह न किया अपने जीवन की , पहरे को क्षण में तोड़ा ।
भेद दिया दुश्मन की चौकसी , भारी सभा में बम फोड़ा ।
अपने देश के नीच गद्दारों की,हरकत नई मुसीबत लाई ।
आज़ादी के मतवालों की , खबर फिरंगी तक पहुचाई ।
चंद चांदी के टुकड़ों की लालच में,उनकी नीयत बदल गई ।
देश भक्तों के विरुद्ध गवाही, दिला दिया था उनको फांसी ।
भारत माँ की स्वतन्त्रता में , अपने प्राणों की आहुति दे डाली ।
मरते दम तक संघर्ष किया,आज़ादी की बुनियाद थी डाली ।  
वय किशोर सुकुमार बालकों ,मैं गाथा आज सुनता हूँ ।
आजादी कैसे मिली देश को , फरमान आज मैं कहता हूँ ।


  21    ओ मेरे बाबा
तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे ।
तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥
सूरज से तुम हो न्यारे ,चन्दा से हो तुम प्यारे ।
लाखों गरीब जन के ,आँखों के तुम हो तारे ।
तुम इंसान नहीं भगवन मेरे,हर कम तुम सँवारे ।
आरती करू मैं हर दिन , आरती शाम और सवेरे ।
तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे ।
तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥
गंगा से तुम हो पावन ,तुमने पतित को तारे ।
शिक्षा का अमृत घर-घर , तुम आज ले पधारे ।
समझा हमारे दुख को , संविधान ले पधारे ।
वंदन करू मैं निसि दिन ,नित शाम और सवेरे ।
तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे ।
तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥
मुसीबतों में तुम प्ले ,सदा अन्याय से लड़े ।
कभी भूल से भी आप,अपनी मंजिल से न डिगे ।
किश्ती निकली मझधार से ,लहरों से न डरे ।
नमन करू मैं हर दिन , नित शाम और सवेरे ।
तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे ।
तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥
अज्ञानता से सब लड़ सकें , वह ज्ञान दे दिए ।
प्रभु मांगे बिना ही आपने , सब कुछ हमें दिए ।
घाव भरे हमारे मन के , सब कष्ट हर लिए ।
पूजा करू मैं हर दिन , नित शाम और सवेरे ।
तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे ।
तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥


        22    मेरा वतन
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
कल बागों में कोयल कूक रही ,
बैठी पेड़ों पर चिड़ियां चाहक रहीं ,
कलियाँ मंद पवन में झूम रहीं ,
अपनी भीनीं सुगंध को बिखेर रहीं ,
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
कल झरनों का पानी जीवन देता रहा ,
पशुओं की प्यास को हरता रहा ,
कण कण में नव जीवन भरता रहा ,
जग सुख और वैभव लुटाता रहा ,
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
  कल हिन्दू ,मुस्लिम ईसाई में एकता रही ,
सच्चे प्रेम की सरिता बहती रही ,
धर्म के नाम पर कोई शिकायत नहीं ,
सभी आपस में करते थे प्यार सभी ,
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
देश प्रगति पथ पर आगे बदता रहा ,
गली गाँव शहरों में प्रेम बीज बोता रहा ,
दुखों पर स्नेह का मलहम लगाता रहा ,
अपने दुश्मन पर सदा जीत पता रहा ,
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
कल वैज्ञानिक नए शोध करते रहे ,
अपने गौरव को जगत में फैलते रहे ,
नित नए रोज अस्त्र बनाते रहे ,
अपने वतन की सुरक्षा को बढ़ाते रहे ,
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
नदियां कलुषित हुईं, प्रगति बाधित हुई ,
कलियाँ मुरझा गयीं ,खुशबू खंडित हुई ,
सारे झरने सुख गए , वैज्ञानिक गुम हो गए ,
धर्म चक्र रुक सा गया , जीवन थम सा गया ।
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
आज नेता बुद्धिजीवी कर लो विचार मंथन ,
नयी पीड़ी के लिए अब कर लो थोड़ा चिंतन,
मानव की कुरुरता पशु झेल रहे हर दिन ,
अब पक्षियों के सामने आ खड़ा है दुर्दिन ,
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।

23                     सोचो जरा !
सूरज रोज सवेरे आता ,
चंदा चाँदनी है बिखराती ।
विराम दायिनी रजनी आती,
सबको सुख दे जाती ।
अम्बर में तारे गतिशील ,
हैं ये सड़कें आती जाती ।
आयु हमारी बदती रोज ,
मणि से शोभित है नागराज ।
मंदिर में हैं परमपिता ,
सबके आँखों में है ज्योति ।
सूरज में बस्ती है लाली ,
हाथी के मस्तक में मोती ।
स्वर्ग में फैला इंद्रासन,
सबके तन में है जीवन ।
कानों से उत्पन्न कर्ण ,
उत्तानपाद से जन्मे ध्रुव तारा ।
विष्णु सोते शेष नाग पर ,
राम के डर से हिला संन्दर ।
हनुमान जी निगले थे सूर्य, 
रावण था दशकंदर ।
अहिल्या पाषाण बनी थी ,
राम चरण रज से इंसान बनी थीं ।
गज आनन थे देव गणेश ,
तीन नेत्र से प्रसिद्ध महेश । 
ये दोस्तों छोड़ दो सारे भ्रम ,
टूट जायेगे सब फैले मर्म ।
जब होगा ज्ञान का संसर्ग ,
हम सब का मन होगा निर्मल ॥ 


         24         होली
आओ होली का त्योहार मनाएं ,
हम सब मिलकर खुशी मनाएँ ।
बच्चे बूढ़े सब मिलकर गाएँ ,
प्यार का मौसम सब पर छाए ,
ढ़ोल नगाढ़ा और मृदंग बजाएँ,
एक दूजे को प्यार का रंग लगाएं,
दोश्त, दुश्मन को गले लगाएं ,
गिले शिकवे हम आज मिटाएँ ,
एक रंग में हम सब रंग जाएं
दुनिया को यह आज बताएं ।
आओ होली का त्योहार मनाएं ,
हम सब मिलकर खुशी मनाएँ ।। 
हर क्यारी में एक फूल लगाएँ ,
अपने उपवन को खूब सजाएँ ,
जग में इसकी खुशबू फैलाएँ ,
सारी नफरत को हम दूर भगाएँ ,
प्रेम से आपस में मिल जाएँ ,
हर समाज में भाईचारा लाएँ ,
अपने सपनों का देश बनाएँ ,
उन्नति की चोटी चढ़ जाएं ,
आओ होली का त्योहार मनाएं ,
आओ हम सब खुशी मनाएँ ।। 
हम भ्रष्टाचार को दूर भगाएँ,
हम गद्दारों को सजा दिलाएँ ,
हम आपस में विश्वास जगाएँ , 
घर-घर में हम खुशियाँ लाएँ ,
राग द्वेष हमें छू भी न पाये ,
ऐसा हम सब उपक्रम चलाएं ,
देश से भूख ,गरीबी दूर भगाएँ ,
सबको हम खुशहाल बनाएँ ।


   25       क्या बादल तुमने देखा !
भीमकाय भूधराकाय काले नीले कजरारे ,
कभी-कभी पर्वत समान अंबर में छायी घटाएँ ,
सभी दिशाओं रहे उमड़,  क्या बादल तुमने देखा !
यही हमारे जीवन दाता और सवारते आशा ,
क्षण-क्षण में यह रूप बदलते भरते जग में आशा ,
जन-जन की ये प्यास बुझते, क्या बादल तुमने देखा !
वन की रक्षा हैं ये करते और नदी को जीवन देते ,
कभी-कभी ये प्रलय मचाते मानव धड़कन को बढ़ाते ,
जल मग्न धरती को करते,क्या बादल को तुमने देखा !
सूरज बादल का रूप निखारे चुन चुन कर काया डाले ,
फिर सूरज पर ऐसे छाए जैसे पूरा ग्रहण चाँद पर छाए ,
ढकते सूरज को छट से ,क्या बादल तुमने देखा !
बादल समान उदद्योगपति  आज देश पर छाए ,
जो गरीब को जीवन देते और देश में समृधी लाये,
शांति और सद्भाव फैलाते,क्या बादल तुमने देखा !
अपने पौरुष के बल पर देश की उन्नति करते ,
भू संपदा का उपयोग कर जन जन में खुशियाँ भरते ,
सबका जीवन सरल बनाते ,क्या बादल तुमने देखा !
उत्तर में गिरिराज हिमालय बादल से कुछ कहता ,
जाने वाले राही रुककर यह मेरा संदेशा ले जा ,  
पर्वत की ऊँची चोटी पर,क्या बादल तुमने देखा !
गर्मी में सूरज जब चढ़ता व्याकुल होता सकल जहान ,
पेड़ों की पत्ती गिर जाती प्यास सताती सबको दिन रात ,
नभ मण्डल से प्यास बुझाते ,क्या बादल तुमने देखा !


   26     हे ईश तू इतना कठोर क्यों !
बना खिलौना भर कर चाभी इस भूतल पर छोड़ दिया ,
इस धरती के सारे प्राणी को अदृश्य सूत्र में जोड़ दिया ,
सुख दुख के सारे बंधन से सबके जीवन को सजा दिया,
आँखों में दी प्यार की ज्योति या फिर सूरज में छिपा दिया,
हे ईश तू इतना कठोर क्यों !जो ममता को छिपा लिया ।
क्षित, जल, पावक, गगन,वायु को जीव चक्र में छिपा दिया ,
परम अलौकिक अपनी रचना का रहस्य सभी से छिपा लिया ,
हिम पर्वत और नदी घाटी को एक जीवन धारा से जोड़ दिया , 
सूर्य तेज से बनते बादल के रहस्य को संसार से छिपा लिया,
हे ईश तू इतना कठोर क्यों !जो ममता को छिपा लिया ।
फूल, कली ,बीज बनाकर एक समय चक्र से बांध दिया ,
फूलों में मकरंद छिपाकर सबकी उत्कंठा को बढ़ा दिया ,
बीजों में वृक्ष संरक्षित कर दुनिया की आँख से छिपा लिया ,
आहार प्रक्रिया में सब को रख कर सहज कड़ी से जोड़ दिया,
हे ईश तू इतना कठोर क्यों !जो ममता को छिपा लिया ।
पानी हर रूपों में मिलता सबने सदा यह स्वीकार किया,
बिन पानी के पेड़ न उगता,फिर जंगल जीव आबाद किया,
पानी से है जीवन संभव ,यह तुमने उपकार किया ,
मैं मूर्ख यह कभी न समझा तेरी चाभी की गतिविधियां ।
हे ईश तू इतना कठोर क्यों !जो ममता को छिपा लिया ।


27     चींटी
हम सबने देखी है चींटी,चलती फिरती काले रेखा ।
खाना लेकर पथ पर चलती,सदा काम करते देखा ।
ऊंचे-नीचे पथ पर बढ़ती,हर पल गिरते सबने देखा ।
सभी हमेशा मिलकर रहती,ऐसा प्यार कहीं न देखा ।
ऊंची पर्वत की चोटी पर ,निर्विघ्न राह में चलते देखा ।
वह काम समय से करती,नियम विरुद्ध कभी न देखा ।
नव जात की सेवा करती,ऐसा समर्पण कहीं न देखा ।
हर मौसम पर हैं दृष्टी रखती, ऐसा ज्ञानी कहीं न देखा ।
वर्षा का अनुमान लगती ,भोजन भंडारण करते देखा ।
सूझ-बुझ से विचरण करती,अनुशासन पर चलते देखा ।
हर ऋतुओं का ज्ञान हैं रखती, सदा सुरक्षित रहते देखा ।
सदा प्रकृति से  मिलकर रहती,परम स्वस्थ जीवन देखा ।
उन्नति पथ पर लड़ती सबसे, सूरज कभी न सोते देखा ।
बढ़ा विघ्नों कभी न डरती, चलती फिरती काली रेखा ॥

28    नीम का पेड़
मेरे घर के आँगन में, नीम का है एक सुंदर पेड़ ।
सुन्दरता का अनुपम जोड़,मेरे घर की सच्ची शान ।
छोटे बच्चों का क्रीडा स्थल,जहां बढ़ाते अपनी शान ।
बड़ों की लगती थी चौपाल,जहां बैठ सब करते बात ।
बुजुर्गों की थी शांतिस्थली ,जहां बैठ भजते हरि नाम ।
मेरे घर के आँगन में, नीम का है एक सुंदर पेड़ ।
आगंतुकों का स्वागत करता, अपनी बाहें खोलकर ,
सबको आनंद देता, सूर्य की प्रचंड किरण रोककर ,
शुद्ध हवा से सबको नहलाता,अशुद्धियों को दूर कर ,
बीमारियों से हमें बचाता, अपना सर्वस्य निछावर कर ,
मेरे घर के आँगन में, नीम का है एक सुंदर पेड़ ।
पशु पक्षियों को आश्रय देता अपना सीना खोलकर , 
उनको सदा मधुर फल देता, सब भेद भाव भूल कर ,
कठिन समय में सदा बचाता सारी कटुता भूलकर ,
अडिग रह वेदना सह लेता,अपने तन पीड़ा की भूलकर,
मेरे घर के आँगन में, नीम का है एक सुंदर पेड़  ।
चिड़ियाँ नित कलरव करती आनंद में डूबकर ,
बच्चों को गाना सुनती नित नया राग छेड़ कर ,
भोर में हम सबको जगाती अपने प्रेम प्रसंग छेड़ कर ,
जन जन में उल्लास लाती जीवन जीने की राह बताकर ,
मेरे घर के आँगन में, नीम का है एक सुंदर पेड़ ।

        29    तिरंगा झण्डा
भारत  के केतन को देखो जरा क्या निराला है गौरव सारे जहां में ।
त्रिदेव तीन रंग  में समाये अंग अंग में ,
त्रिसिंधु तेरे चरण में शोभित हैं शरण में ,
त्रिकाल सिद्ध रूप में प्रदर्सित है चक्र में,
अवलोकन कर हर जवां प्रफुल्लित मन में ,
भारत के  केतन को देखो जरा क्या निराला है गौरव सारे जहां में ।
त्याग बलिदान दिखे केसरिया रंग में ,
रक्षा की सौगंध लेकर वीर लड़े रन में,
कर में कमान लेकर अरि मारे क्षण में ,
अपने देश का गौरव बढ़ाएँ सारे जगत में ,
भारत के केतन को देखो जरा क्या निराला है गौरव सारे जहां में ।
हरा रंग हरियाली का मन भरे सावन में ,
फसलों से भूमि सजे किसान झूमें सावन में,
नाचे मोर,गाए कोयल भरे उमंग पावस में,
मन में खुशी लाये प्यास बुझाए सावन में,
भारत के केतन को देखो जरा क्या निराला है गौरव सारे जहां में ।
श्वेत रंग शांति प्रतीक सबके मन में ,
बुद्ध ,महावीर का संदेश पहुंचे जगत में ,
बहुभाषा धर्म में समंजस्य लाए देश में,
जीवन के हर रूप का प्रतिबिंब दिखे ध्वज में,
भारत के केतन को देखो जरा क्या निराला है गौरव सारे जहां में ।
केंद्र में समय चक्र गति लाए पल में,
प्रगति का शोर्य चक्र अबाध चले पथ में ,
देश का भाग्य चक्र चमक उठे गगन में,
कृष्ण का सुदर्शन चक्र चमके रण क्षेत्र में ,
भारत  के केतन को देखो जरा क्या निराला है गौरव सारे जहां में ।

30  श्वान और इंशान
मानव का सच्चा साथी, जो सेवा करे हर वक्त ,
यह दोनों आपस में मिले, नहीं सच्चा शिनाक्त,
जो काल दृष्टा,कष्ट हर्ता, बड़ा ही स्वामिभक्त ,
अपने स्वामी की सेवा में ,तन मन से उनमुक्त ,
मौत से संघर्ष कर मालिक को रखता मुक्त,
घर द्वार की पहरेदारी में रहे हमेशा सबसे उपयुक्त,
रात में जागकर हमको खतरों से कराता अवगत ,
चोरों की पहचान में आज भी है सबसे विश्वस्त ,
जो लाखों की भीड़ में भी खोज निकाले अभियुक्त ,
जानी अनजानी हर राहों में साथ निभाए हर वक्त ,
छाया की तरह आगे पीछे साथ निभाए हर वक्त,
आधुनिक विज्ञान भी नहीं दे सका उसको शिकस्त,
विस्फोटकों की खोज में विज्ञान को करता परास्त,
अपने दुश्मन की हर चल को पल में करता ध्वस्त,
मानव का सच्चा साथी, जो सेवा करे हर वक्त ,


31   दूध और पानी
दूध और पानी का गहरा है  रिश्ता,
कठिन परिस्थियों दूध मिलता रहेगा । 
जो देता है अपनी दोस्ती का वास्ता,
गिंदगी भर साथ निभाता रहेगा ।
कष्टों में भी कभी न छोड़ता है रास्ता,
सदा साथ यूं ही चलता रहेगा ।
गरीबों का जग में यही है फरिश्ता ,
दूध की जगह थोड़ा पानी मिलेगा ।
आप पानी से चिंतित न होना कभी,
दूध भी थोड़ा सस्ता मिलेगा ।
ज़िंदगी से ज्यादा कोई चीज प्यारी नहीं, 
ज़िंदगी गर रही तो सब कुछ मिलेगा । 
पानी से ही है सबका जीवन सही,
दूधिया को भी थोड़ा पैसा मिलेगा ।
पानी से ही दूध देर तक टिकता सही,
दूध की जगह थोड़ा पानी मिलेगा ।
सस्ते दूध को घटिया न कहना कभी ,
दूधिया की सच्ची सेवा मिलेगी ।
किसी कम कभी रुकेगा नहीं ,
ज़िंदगी की सारी समस्या मिटेगी ।
ज्वलंत समस्याओं से कभी घबराना नहीं,
समस्या गर मिती तो सब कुछ मिटेगा । 
दूध की जगह थोड़ा पानी मिलेगा ।।

 
32    गांधी जी के बंदर 
गांधी जी के बंदर तीन ,शासन सत्ता में नित लीन ।
पहला कहता आँख भींचकर,भेद छिपाए दिल के अंदर ।
कोई यहाँ न दुखी मलीन,आज हो गए सब स्वाधीन ।
सभी सुखों पर हो आसीन ,प्रजातन्त्र से हो उदासीन ।
दूसरा कहता कान मूंदकर,दुख दरिद्र हैं मीलों दूर,
,प्रभु चरणों में होकर लीन ।अपने में ही हो  तल्लीन । 
व्यापारी, मजदूर किसान ,रहते सदा काम में लीन । 
तीसरा बैठा मौन साध कर,सबके दुख अनदेखी कर ।
मंत्री, नेता और अधिकारी,सदा बढ़ाते देश की शान ।
भूले मंत्री कहे जो उर तंत्री,शासन सत्ता पर हो आशीन ।
भ्रष्टाचार किया दिल खोल कर,संसाधन को लूट कर ।
लोगों के मन जागी शंका,अनुशासन की दे दी सीख । 
कहीं धर्म का पीटा डंका, अपनी जीत की मांगी भीख ।
बेवकूफ बनाया लोगों को सभी समाज को बांटकर ।
क्षेत्रवाद पर किया सियासत,गंगा यमुनी तहजीब बताया ।
राजनीति उन्हें मिली विरासत,यह कह कर सबको समझाया ।
आज गाँव,गाँव गली और शहर, सब ओर चली है एक लहर ।
देश की जनता आज बेहाल,नेता मंत्री सब हैं मालामाल ।
जीत कठिन है अब इस साल, जागे लोग अब करें सवाल ।
लूट पर पर्दा लगा लोगों को बता रहे उपलब्धि गिनाकर,   
संविधान के पालक मंत्री,शासन सत्ता पर हो आशीन ।  
गांधी जी के बंदर तीन ,शासन सत्ता में नित लीन 

                33    देश की प्रगति
देश की चहु ओर प्रगति, हो  यह पहला सोपान ,
लोगों का हो कर्तव्य,शिक्षित बने सब  इंशान ।
शिक्षा से आधिपत्य हटे,सबका हो पूरा कल्याण,
शिक्षा सम्यक एक मिले, मानव मानव हो समान ।
परीक्षा का भय मिटे, हर बच्चे को मिले सच्चा ज्ञान,
उन्नति के पथ पर आगे बढ़े,सबका हो उत्थान ।
शिक्षा और व्यवसाय जुड़े, देश में ऐसा हो प्रावधान,
हर विद्यार्थी उद्यमी बने ,जग में लेकर सच्चा ज्ञान ।
जाति धर्म का बंधन मिटे,सभी को मिले सम्मान,
देश से भ्रष्टाचार मिटे, कथनी  करनी हो सामान ।
मंहगाई पर अंकुश लगे, भूखा न रहे अब इंशान,
समाज से आतंक मिटे, सुख से रहें सभी इंशान ।
बेरोजगारी लाचारी मिटे,जन-जन को मिले अब काम,
देश की चहु ओर प्रगति, हो  यह पहला सोपान ।।

         34     समस्या
जीवन जीने की एक सरल कला ,
जो मानव को देती है एक नई दिशा,
सिखलाती है मानव को संघर्ष करना ,
हर मोड़ पर दिखलाती है नया रास्ता ।
विसम परिस्थितियों को अनुकूल बना ,
सिखलाती है सबको ये सच्ची कला ,
जो देती है सबके जीवन में ज्योति जला  ,   
हर समस्या का उत्तर है देती दिला ।
सभी के जीवन में चार चंद है लाती ,
जीवन को खुशियों भर सुहाना बनाती,
उत्तम भविष्य का है सही आधार बनाती,
सदा धैर्य और साहस की दरिया बहाती ,
अर्श की श्रेष्ठ चोटी पर मानव को बैठाती ।
चुनौतियों से लड़ कर आगे बढ़ना सिखाती ,
अटूट विश्वास हमारे तन  मन में जगाती,
विजय का रसास्वादन सबको कराती,
सबके जीवन को है यह सफल बनाती ।
आज देश को है  प्रगति पथ दिखलाती ,
नए नए यंत्रों का आविष्कार करवाती ,
हार और निराशा को सदा दूर भगाती ,
नए नए लक्ष्यों का हमेशा बोध कराती ॥     

           35    धरती माँ
हे माँ धरती तेरी करुणा पर ,
फैला जीवन तेरे वच्छ स्थल पर ।
जलचर थलचर और गगनचर ,
उड़ते फिरते सकल धरा पर ।
करती सब पर प्रेम निछावर ,
करकमलों से सबका पेट भर ।
अपनी आँचल की छाया में रखकर ,
भोजन देती हृदय खोलकर ।
सागर की गहराई में जाकर ,
कण कण में नव ज्योति जलाकर ।
सबकी कुशल क्षेम जानकर ,
सहज सुलभ आनंद बांटकर ।
जीवन सबका खुशियों से भरकर ,
सकल मनोरथ क्षण में देकर ।
करुणा की छाया में रखकर ,
जीवन देती हृदय खोल कर ।
पर्वत के उत्तुंग शिखर पर जाकर ,
खुशियों के बादल बिखेर कर ।
गर्म हवा का एक झोंका लेकर ,
निष्ठुर सर्दी से सबकी रक्षा कर ।
विसम परिस्थित में आश जगा कर ,
नव जीवन की सौगात दिखाकर ।
स्वप्नों का सुंदर बाग दिखाकर ,
मरुस्थल को जीवन से भरकर ।
सुबह शाम अनुकूल बनाकर ,
करती है तू  उपकार सभी पर ।
हे माँ धरती तेरी करुणा पर ,
फैला जीवन तेरे वच्छ स्थल पर ।।

 
36    बसंत का स्वागत

ऋतु राज बसंत के स्वागत में ,सूरज ने स्वर्णिम ताज सजाया ।
फूल और कलियों ने मिलकर ,अपने आँगन को खूब सजाया ।
शिशिर दृश्य यह देख कर,अपना रौद्र रूप सबको दिखलाया ।
नाना अस्त्रों का प्रयोग कर ,जन जीवन को पीड़ा पहुंचाया ।
शिशिर का तांडव सूर्य देखकर,अपनी भृकुटी तुरंत चढ़ाया ।
हुआ शशंकित बोला काँपकर,घाटी से अपना कदम हटाया ।
सारे उपवन आनंदित होकर,जग को खुशियों से महकाया ।
गुलशन की सब कलियाँ मिलकर,नाना रंग के फूल खिलाया ।
कोयल मोर ने तान छेड़कर,सबके मन को खूब लुभाया ।
सबने प्रीत का बिगुल बजाकर,नन्हे मुन्नों को खूब हँसाया ।
नर नारी सब प्यार से मिलकर,एक दूसरे को रंग लगाया । 
नवजवान सब प्रेम रंग लेकर, एक दूजे पर खूब बरसाया ।
ऋतु राज बसंत के स्वागत में, सारे जग में खुशी मचाया ॥


  37    नवीन पथ 
मैं अदना अंजान मुशाफिर ,खुशियों के कुछ दीप जलाकर ।
मन मंदिर में स्वप्न सजाकर,लक्ष्य को अपना इष्ट मानकर ।
घर के आँगन से आगे बढ़कर ,बाधाओं की चिंता से हटकर ।
दृण प्रतिज्ञ सब शक्ति सँजोकर,निकल पड़ा अपनी मंजिल पर ।
मैं अदना अंजान मुशाफिर ,खुशियों के कुछ दीप जलाकर ।।
उन्नति की आश को मन में लेकर,पहुँच गया मैं दो राहों पर ।
थोड़ा रुक राही को देखकर,असमंजस्य के पल को तोड़कर ।
सरल राह को इतर छोड़ कर, चुन ली राह मैं सोच समझकर ।
मैं निकल पड़ा फिर नयी राह पर,अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाकर ।
मैं अदना अंजान मुशाफिर ,खुशियों के कुछ दीप जलाकर ।।
आगे बढ़ा मैं प्रभु का ध्यान कर,अपनी पीड़ा को थोड़ा भूलकर ।
कदम बढ़ाया शक्ति सँजोकर,साथ दिया सबने दिल खोल कर ।
सुगम बनाया ऋतुओं को बनाकर, राह सजाया फूल बिछाकर ।
अभिवादन किया पत्ते डालकर,राह दिखाया नव जीवन देकर ।
मन बहलाया संगीत सुनाकर,हौसला बढ़ाया मंजिल दिखाकर ।
भूख मिटाया फल-फूल देकर,अमर बनाया नई राह दिखाकर ।
मैं अदना अंजान मुशाफिर ,खुशियों के कुछ दीप जलाकर ।

38     प्रजातन्त्र पर चोट
गली-गली में घूम कर, नेता मांगे वोट । 
लूट रहे सब देश को,रख जन तंत्र की ओट ॥
आँख पर पट्टी बांध कर, घूमें नेता आज ।
वादों की प्रवाह न कर, करते काम न काज ।।
जीत जाएँ जिस क्षेत्र से , मुड़कर आते नहीं ।
कह रहे कुछ लोग आज , सच्चे मंत्री अब नहीं ।।
बीत जाते पाँच साल, कुछ वहाँ करते नहीं ।
उड़ाते प्रजा का माल ,कभी बताते नहीं ॥
हर गाँव गली में शोर, खुली भ्रष्टों की पोल ।
अब चले न तुम पर ज़ोर ,ज्ञान नेत्र तुम खोल ।।
लूट लिया सब खनिज बन, अब तो जागो लोग ।
अधिकार किया नीर पर, काँप उठे सब लोग ॥
भूखे दुखी सभी लोग, भ्रष्ट तंत्र पर करो चोट ।
अपने अधिकार जानो,  मत बेंचों तुम वोट ॥  
 

39     हे मानव कुछ ऐसा कर ।
हे मानव कुछ ऐसा कर, जग में नाम को रोशन कर ।
अज्ञानता के अंधकार में ,ज्ञान की एक ज्योति बन ॥
भेद सारे अब तू मिटा दे, प्यार की एक किश्ती बन ।
शक्ति का परचम लहरा दे,दुश्मन के लिए तूफान बन ।।
मझधार में डूबती नांव की एक छोटी सी पतवार बन ।
सावन की काली रात में,आ सूरज की एक किरण बन ।।
दीन दुखियों के दर्द में ,बस तू एक ऐसी दवा बन ।
सृष्टि सृजन के विस्तार में, तू सच्चा भागीदार बन ॥  
झूठ पाखंड को मिटा दे तीक्ष्ण किरण से प्रहार कर ।  
डूबने से सबको बचा ले,आज तू एक मिशाल बनकर ।।   
नफरत की खाई गिरा दे,अपने देश का कल्याण कर ।
टूटी मोतियों को साथ मिला दे, प्यार की डोर बनकर ।।
दुष्टों को जग से मिटा दे, सारी बाधाओं को तोड़ कर ।
देश द्रोही को मिटा दे, उनके सारे घोटालों को खोल कर ।।
ईश की तू सुंदर कृति है, उसका सदा सम्मान कर ।
हे मानव कुछ ऐसा कर, जग में नाम को रोशन कर ।।

40             बाबा इतना तू कर !
बाबा इतना तू कर, बस तू एक प्रेम डोर बन ।
बेला, चमेली, जूही, चम्पा की कलियों की सुन ,
गेंदा, गुड़हल ,गुलाब,फूल सारी बगिया से चुन,
अनेकों फूलों को जोड़ ,बस एक माला तू बन ॥
बाबा इतना तू कर, सारे जगत में मधुर रस घोल ।
बागों में , बहारों में ,हर गली और कूँचों में ,
खेत खलिहान और हर शहर की सड़कों में ,  
सभी जगहों को मिला, एक मंजिल तू बन ॥
बाबा इतना तू कर,बस एक धारा तू बन ।
गंगा, यमुना ,महानदी ,कृष्णा, कावेरी ,
ब्रह्मपुत्र ,नर्मदा , सोन गंडक और कोसी ,
सारी नदियों को जोड़, एक धारा तू बन ॥
बाबा इतना तू कर, बस एक भारत तू बन ।
हिन्दू, मुस्लिम ,सिक्ख ,जैन और ईसाई ,
बौद्ध, पारसी यहाँ आज मिलकर रहें भाई ,
सारे मजहब को जोड़, एक मानव तू बन ॥

41    आज की शिक्षा

युग बदला, शिक्षा बदली, बदले नियम विचार ।
गुरुकुल सारे बंद हुए , निकली निर्मल धार ॥
गाँव गाँव में खुल गए , शिक्षा भवन अनेक ।
गहन अधेरा हट गया, सबका खुला विवेक ॥
ईर्ष्या के बंधन टूटे , रच दिया एक विधान ।
भाईचारा बढ़ गया , सबको मिला सम्मान ॥
गुरुकुल की महिमा घटी , टूटी रूढ़ी चाल ।
कठिन कसौटी हट गयी ,बालक हुए खुशहाल ॥
एडीसन ने दिखा दिया , सच्ची दिशा एक रोज ।
संशय सबका मिटा दिया , किया अनेकों खोज ॥
निश दिन कठिन अभ्यास कर,मन को रखा समेट ।
नित नूतन आविष्कार कर ,दिया जगत को भेंट ॥
अब सच्ची शिक्षा आ गयी, आज हमारे द्वार ।
हटी कसौटी राह से ,सुलझ गए सब तार ।।
विद्यालय से वंचित नहीं , शिक्षा बनी अब शान ।
सह  शिक्षा अब फैल गयी ,जीवन हुआ अशान ॥
गुरु विद्यार्थी मिल चले, पकड़ प्रगति की राह ।
पंख लगे सभी गाँव को, बहने लगा प्रवाह ॥
समता जग में छ गयी, मिटा द्वेष का मूल ।
सब आपस में जब मिले , गए शिकायत भूल ॥ 

 


42    राणा प्रताप 


हिन्द का कीर्ति स्तम्भ , मेवाड़ की अनुपम शान ।
स्वाभिमान का रक्षक ,झुकने न दिया कभी सम्मान ।
दया धर्म का पुजारी , सदा रखता था सबका मान ।
चित्तौड़ का स्वामी ,था दुनियाँ में उसका  मान ।
उदीयमान हुआ था कभी , नक्षत्रों की श्रेणी में ।
झुकाया था कभी शौर्य से,दुश्मन को रण भूमि में ।
मोड़ा था नदी की धार को, सरे आम बरसात में ।
बस छोड़ा था दुर्ग को , भाई मान ,के सम्मान में ।
चाहता तो शेर की तरह ,मर या मार सकता था ।
ऐसा नहीं किया , वह मान सम्मान देना चाहता था ।
जान की बाजी लगाकर, मान को बचाना चाहता था ।
दुश्मन को ह्ररा मैदान में जग को दिखाना चाहता था ।
वक्त ने साथ न दिया राणा की नीतियाँ विफल हुई ।
अपने स्वार्थ को त्याग , राणा को मेवाड़ की चिंता हुई।
मान के सम्मान में अकबर की नीतियां सफल हुई ।
मान सिंह का अपमान मेवाड़ के पतन की शुरुवात हुई ।
जा मिला मान मुगलों से ,छोड़ अपनों का साथ ।
किया राणा से विश्वासघात , मिलाया दुश्मन से हाथ ।
राणा हार नहीं माना, लड़ता रहा सदा दुश्मन के साथ ।
हिन्द का नक्षत्र चमकता रहा, अजेय पताके के साथ ।
दुश्मन को हल्दी घाटी में घेरा, अपनी रण नीति के साथ ।
पहले उसके रसद को लूटा , अपने दृढ़ विश्वास के साथ ।
बैरी का रास्ता रोका, अपने योग्य और अनुभवी के साथ ।
हल्दी घाटी में चुन चुन कर मारा , मिल अपने वीरों के साथ ।
संकट में धैर्य रख कर अपनी वीरता का परिचय दिया ।
अपनी वीरता का जौहर दिखाकर रणथंभोर को छीन लिया ।
अपनी सेना संगठित कर ,मेवाड़ को फिर से जीत लिया ।
मुगलों को रण में हराकर , जग में सम्मान को अर्जित किया ।।


43     चंद्रशेखर आजाद
आज सुनाता हूँ मैं तुमको गाथा वीर सपूत की  ।
हर दम चिंता उसे सताती माँ के बंधन जालों की  ।।
आजड़ी का रहा दीवाना प्राण लिए था हाथ में ।
तन मन धन से लगा हुआ था संगठन निर्माण में ।
पैसे की थी कमी खटकती साधन के अभाव में ।
दल की संख्या बाढ़ रही थी ज्यों पानी बरसात में ।
आज सुनाता हूँ मैं तुमको गाथा वीर सपूत की  ।
हर दम चिंता उसे सताती माँ के बंधन जालों की  ।।
बनी योजना दल के अंदर गाड़ी को लूटी आन में ।
चंद्रशेखर अब चंपत होकर आ गए बम्बई धाम में ।  
वर्ष बिताया वहाँ शेखर ने बनकर कुली जहान में ।
वेष बदल कर चंद्रशेखर जी आ गए काशी धाम में ।
आज सुनाता हूँ मैं तुमको गाथा वीर सपूत की  ।
हर दम चिंता उसे सताती माँ के बंधन जालों की  ।।
बैरी की हर चाल समझकर दिया शिकस्त हर क्षेत्र में ।
आजाद,भगत,बटुकेश्वर आकर मिले एक जगह में ।
गाँव गली और शहर में मुश्किल किया जीना  देश में ।
सांडर्शन को गोली मारी जाकर उसके धाम में ।
आज सुनाता हूँ मैं तुमको गाथा वीर सपूत की  ।
हर दम चिंता उसे सताती माँ के बंधन जालों की  ।।
पलक झपकते निकल गए वे जा पहुंचे लाहौर में ।
हुई घोषणा दस सहश्र की पूरे हिंदुस्तान में ।
संगठन का संचालन था वीर पुत्र के हाथों में ।
काँप रही अँग्रेज की टुकड़ी सेना पूरे हिंदुस्तान में ।
आज सुनाता हूँ मैं तुमको गाथा वीर सपूत की  ।
हर दम चिंता उसे सताती माँ के बंधन जालों की  ।।

     44    प्यार  निर्झर बह गया ॥
प्यार  निर्झर बह गया, मैं अकेला रह गया ।
देखते बोझिल दृगों से, वक्त के परिहास को ।
कह उठा दुखी हृदय से, मन की अपनी बात को । 
व्याकुल मन था पीड़ा से,सूझे नहीं कर काम को ।
भटका नहीं मैं राह से,मैं निविर्घ्न आगे बढ़ता गया । 
प्यार  निर्झर बह गया, मैं अकेला रह गया ।
फैली थी उत्तुंग शिखर, राह थी दुर्गम दुरूह ।
लगती थी पग में ठोकरें,मुंह से निकलती आह ।
मंजिल को पाने के लिए खतरों से था बेपरवाह ।
मैं राह पर बढ़ता रहा मन में रखकर उत्साह ।
प्यार  निर्झर बह गया, मैं अकेला रह गया ।
जीवन में सफलता के लिए सबको शिक्षा चाहिए ।
दरिया पार करने के लिए किश्ती पतवार चाहिए ।
चोटी पर पहुँचने के लिए सबको पथ प्रदर्शक चाहिए ।
ऐसी कठिन परिस्थित में ,राव गायकवाड़ मिल गए ।
प्यार  निर्झर बह गया, मैं अकेला रह गया ।
गीता, वेद, पुराण, उपनिषद,मनुसंहिता को बतलाए ।
रामायण में वर्णित कुछ पात्रों को विस्तार से समझाये ।
सदियों से चली आ रही जीर्ण क्षीर्ण व्यवस्था बतलाए ।  
मैं अपने समाज की दुर्दशा देख ,मैं तटस्थ हो गया ।
  प्यार  निर्झर बह गया, मैं अकेला रह गया ।
गोलमेज़ सम्मेलन में विजय मुझको मिल गयी ।
मेरी विजय से गांधी के मन में खलबली मच गयी ।
इसके विरोध में पूना में आमरण अनशन कर दिया ।
मैं विवश गांधी की बात मानने के लिए बाध्य हो गया ।
यह मेरे देश के इतिहास में यह पूना पैक्ट बन गया ।
प्यार  निर्झर बह गया, मैं अकेला रह गया ।। 

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