शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

राजीव आनंद की लघुकथा - दर्शन का द्वंद्व

दर्शन का द्वंद्व

रोहण उच्‍च शिक्षा हासिल कर दर्शनशास्‍त्र का तत्‍वज्ञानी बन गया था․ उसने समाज में फैले बुराई का कारण काम, क्रोध और लोभ को माना और बुराई की इस त्रयी से दूर रहने की ठान ली․

सर्वप्रथम रोहण ने यह निर्णय लिया कि युवतियों से दूर रहेगा यानी ब्रहमचर्य का पालन करेगा․ उसका तर्क था कि मनुष्‍य अच्‍छाई और बुराई दोनों ही प्रवृतियों को साथ लेकर पैदा होता है․ स्‍त्री के संदर्भ में ही कोई पुरूष अच्‍छा हो सकता है․ स्‍त्री के कारण ही ब्रहमचर्य का महत्‍व है, सभी नदियां टेढ़ी होती है इसलिए अवसर मिलने पर सभी स्‍त्रियां पाप कर्म करती है․ रोहण बौद्ध दर्शन में पढ़े बातों को याद करते हुए मन ही मन खूद को यह तर्क दे रहा था․ गौतम ब्रहमचर्य का पालन कर के ही बुद्ध बने थे․

रोहण ने किसी स्‍त्री से प्रेम नहीं करने का निर्णय ले लिया․ अपने बॉलकनी में बैठा तत्‍व-मीमांसा की पुस्‍तक को अपने गोद में रख रोहण चाय पी रहा था और पुस्‍तक का अध्‍ययन कर रहा था․ तभी उसने अपने घर के सामने वाले घर की छत पर दो युवतियों को देखा, जो रोहण के तरफ ही देख रहीं थी और आपस में कुछ बोल-बोल कर हंस भी रहीं थी․ उनमें से एक तकरीबन चौबीस-पच्‍चीस वर्षीया युवती हल्‍का गेंहूआ रंग की, श्‍वेत बस्‍त्र पहने हुई थी․ उसके काले घने केश उसके कंधों के चारों तरफ बिखरे हुए थे․ काले केशों के बीच लाल रंग के फीते से उसने हेयर बैंड़ की तरह बालों में लगा रखा था, केशों के गुच्‍छे में से एक लट उसके खूबसूरत बांये गाल पर झूल रहा था, जो हवा के मंद-मंद झोंके से उसके सांवले गाल पर चुंबन लेता प्रतीत हो रहा था․ बड़ी-बड़ी काली आंखों में काजल की बस एक पंक्‍ति सी खींची थी, दोनों बाहें नग्‍न थी, जिससे उस लड़की ने छत के रेलींग को पकड़ रखा था․

रोहण कुछ समय तक तत्‍व-मीमांसा को भूल कर अवाक्‌ होकर चुपचाप उसे देखता रहा․ उसे लगा निश्‍चय ही वह स्‍वर्ग से उतर कर आई हो क्‍योंकि उसके सौंन्‍दर्य में लौकिक युवती सा कुछ भी नहीं था․

रोहण का हदय घबरा उठा, उस युवती के सौन्‍दर्य देखकर नहीं बल्‍कि प्रेम नहीं करने का दृढ़ संकल्‍प, जो रोहण थोड़ी देर पहले किया था, के डगमगाने के कारण․ उसने तुरंत बॉलकनी से खूद को हटा लिया और तत्‍व-मीमांसा की पुस्‍तक में असातमन्‍त जातक में बर्णित बुद्ध दर्शन के उस अध्‍याय को पढ़ने लगा जिसमें लिखा था ‘स्‍त्रियां असाध्‍वी, असती, पापी, निकृष्‍ट होती है, तू इस प्रकार की पापी स्‍त्री जाति के प्रति क्‍यों आसक्‍त हुआ है ?

रोहण का हदय अब शांत होने लगा था․ उसने मन ही मन दूसरा संकल्‍प किया कि वह क्रोध नहीं करेगा, संयमी बनेगा․ अपने सभी मित्रों से सदैव मित्रता बनाए रखेगा तथा मित्रों के किसी भी बात पर वह क्रोधित नहीं होगा․ उसने आगे सोचते हुए संकल्‍प लेना जारी रखा कि भोजन उतना ही करेगा जितना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए आवश्‍यक होगा, शराब तो कभी पीयेगा ही नहीं और तभी उसका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहेगा तथा जीवन हमेशा पवित्र और उज्‍जवल बना रहेगा․

दूसरे दिन रोहण पुनः बॉलकनी में चाय पीने के लिए बैठा ही था कि उसे सामने वाले घर पर गत दिन दिखी अपूर्व सुंदरी का ख्‍याल हो आया, उसने अनायास उस छत की ओर देखने लगा जहां कल शाम उसे वह अलौकिक सौन्‍दर्य का दर्शन हुआ था․ लेकिन छत पर आज वो नहीं थी․ उस लड़की को छत पर न पाकर रोहण का हदय आज फिर घबरा रहा था, यह सोच कर कि वह बॉलकनी से कल अचानक उठ कर चला गया था तो कहीं उसने बूरा तो नहीं माना, इसी तरह के ख्‍याल उसके मन में आ-जा रहे थे कि देखता है कि सौन्‍दर्य की मल्‍लिका आज अकेली छत पर आ गयी है․ रोहण न चाहते हुए भी उसे एक टक निहार रहा था कि पीछे से एक अधेड़ स्‍त्री आयी और काफी उंचे आवाज में लड़की को यह कहते हुए डांटने लगी कि छिप-छिप कर आंखें लड़ा रही है, लड़की इतना सुनने के बाद वहां से चली गयी परंतु वह अधेड़ स्‍त्री रोहण को मुखातिब होकर काफी भला-बूरा कहने लगी कि वह उसकी लड़की को बदनाम करना चाहता है आदि-आदि․ अब रोहण उस स्‍त्री को कैसे समझाता कि वह तो प्रेम करना ही नहीं चाहता, वह तो ब्रहमचर्य धारण किए हुए एक तत्‍वज्ञानी बनना चाहता है․

खैर सौन्‍दर्य के अवलोकन से अपमानित होकर रोहण से सौन्‍दर्य के रसपान का भूत उतर चुका था․ शरम और घबराहट से रोहण बॉलकनी से उठकर अंदर चला गया था․

रोहण का मन उस अधेड़ स्‍त्री के अनापशनाप बातों को सुनकर खिन्‍न हो गया था, उसे अब अपने मित्रों की याद आने लगी तथा उसने अपने घनिष्‍ठ मित्रों से मिलने का फैसला किया․ सोचा अगर मित्रों से नहीं मिलेगा तो उस अधेड़ स्‍त्री के शब्‍दों के वाण से छुटकारा नहीं मिलेगा․ मित्रों से रोहण ने संपर्क साधा, मित्रों ने उसे ब्‍लूहील रेस्‍तरां में आने को कहा․ रोहण ब्‍लूहील रेस्‍तरां पहुंच गया वहां उसने अपने चारों मित्रों को शराब और कबाब के साथ हंसी-मजाक में मशरूफ पाया․ रोहण मन ही मन शराब नहीं पीने का फैसला कर ही रहा था कि उसके सभी मित्रों ने उसे शराब पीने की जिद करने लगे․ एक चिकित्‍सक मित्र ने रोहण को अपना थेसीस दिया कि यार अगर टू स्‍माल पैग्‍स, टू लेग्‍स और टू एग्‍स ली जाए तो स्‍वास्‍थ्‍य और मन दोनों के लिए बहुत लाभदायक होता है․ रोहण अपने मित्रों के जिद के आगे झूक गया और पहले तो दो पैग्‍स ही पीया, फिर एक आखरी पैग कहकर तीसरी, फिर चौथी और अंतत मतवाला होकर डगमगाने लगा․ शराब चढ़ने के बाद रोहण अपने शादीशुदा मित्रों को ब्रहमचर्य का पाठ पढ़ाने की कोशिश में अपने एक मित्र से वाद-विवाद में उलझ गया, दोनों पी कर मतवाले हो रहे थे, रोहण के मित्र ने कुर्सी सहित रोहण को धकेल दिया, रोहण गिर पड़ा, उसे कमर में काफी चोट आयी․ नशे की हालत में कमर पकड़ कर तत्‍वज्ञानी रोहण किसी तरह अपने घर लौटा और दर्द से कराहते हुए औंधे मुंह विस्‍तर पर लेट गया, उसे नशे की वजह से नींद आ गयी․

रोहण कल यह निश्‍चय किया था कि वह स्‍त्री से प्रेम नहीं करेगा, शराब नहीं पीएगा, मित्रों से मित्रता बनाए रखेगा परंतु एक दिन में ही एक युवती के मोहपाश में फंस गया, शराब पीया, मित्रों से लड़ाई-झगड़ा कर बैठा अर्थात तत्‍वज्ञानी बनने के वजाए मूर्ख बना और बेइज्‍जत हुआ․

दूसरे दिन अपनी दयनीय स्‍थिति को रोहण अपने पिता से छूपा न सका․ रोहण के पिता दर्शनशास्‍त्र के प्रोफेसर थे, सारा वृतांत सूनने के बाद उन्‍होंने रोहण को बतलाया कि बेटे, तुम तत्‍वज्ञानी बनने का विचार छोड़ दो तो फिर काफी सूखी रहोगे․

रोहण को आश्‍चर्य हुआ, उसने अपने पिता से पूछा कि ‘क्‍या तत्‍वज्ञानी होना असंभव है ?'

रोहण के पिता ने कहा, ऐसा ही समझो․

रोहण ने पुनः प्रश्‍न किया, तो फिर क्‍या बुद्ध, आदि शंकराचार्य तत्‍वज्ञानी नहीं थे ?

रोहण के पिता ने कहा, थे, परंतु क्‍या तुम्‍हें यह पता है कि ‘कथनी और करनी का भेद द्विज चिन्‍तन की दार्शनिक नियति है, चाहे बौद्ध दर्शन हो या शंकराचार्य का अद्धैतवाद का दर्शन․' इसलिए बेटे रोहण आदर्श तत्‍वज्ञानी बनना उतना ही असंभव है जितना कि आदर्श बुद्धिमान या आदर्श सूखी․

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राजीव आनंद

सेल फोन - 9471765417

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