शनिवार, 28 सितंबर 2013

लता सुमन्त की कहानी - इस बार हो आती हूँ

खाना खाने के कुछ देर बाद अम्मा अपने कमरे में जाकर लेट गईं।

श्यामा रसोई में व्यस्त थी। खाने के पश्चात कुछ चीजें निकालकर रखने तथा बरतन खाली करने में लगी थी। वहीं अम्मा की आवाज सुनाई दी-श्यामा जी,अम्मा आई। श्यामा उनके कमरे की ओर चल दी। बेटी, इस बार मेरी जाने की इच्छा नहीं है। अपने आप को अस्वस्थ महसूस करती अम्माजी की ओर देखते हुए श्यामा ने कहा -कोई बात नहीं अम्मा , अगर आप जान नहीं चाहती तो मत जाइये । हम जीजाजी को फोन कर देंगे कि आप नहीं आना चाहती।

शिवांग आपसे कुछ नहीं कहेंगे। अम्माजी को चिन्ता थी कि कहीं शिवांग ऐसा न कह दे कि अब कुछ नहीं होगा और मना करना भी उचित नहीं है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ ही देर में अम्माजी आश्वस्त हो गईं और कब उनकी आँख खुद उन्हें भी पता नहीं चला। पन्दह मिनिट के बाद जब उनकी आँख खुली तो इतनी तरोताजा लग रही थीं जैसे कुछ हुआ ही न हो । कहने लगी -श्यामा , मैं सोच रही थी इस बार हो आती हूँ। दामादजी ने रिजवेशन कराया है तो उन्हें मना भी कैसे करुँ?एक तो वे मुझे लेने आए हैं और मैं ही मना कर दूँ। ठीक नहीं लगता।

अम्मा ने जाने की तैयारी तो पहले ही कर ली थी। बेटी के घर जो जाना था। अपनी बैग में उन्होंने सब कुछ रख लिया था। पूरे महीने की दवाइयाँ,घर में पहनने की दो साड़ियों के साथ एक साड़ी और खरीद ली थी। सफेद साड़ी पर मरून फूल जैसे रिवल उठे थे। रख लेती हूँ बहू, कब जरूरत पड़ जाए कह नहीं सकते। लेकिन इस बार तुम मुझे लेने जरूर आओ गी। तुम लेने आओगी तो ही मैं जाऊँगी? आओगी न?ज रूर अम्मा, कॉलेज परीक्षाएँ खत्म होते ही मैं आपको लेने आ जाऊँगी। तब तक आप वहँा आराम से रहना। मैं जरूर आऊँगी। बहू की बातों से आश्वस्त हो अम्माजी खुशी -खुशी अपनी बेटी के घर चली गई। जैसे बेटी के घर नहीं बहू के घर जा रही हों।

वहाँ पहँचने के कुछ दिनों पश्चात ही अम्मा के अस्वस्थ होने की खबर आई। फिर शुरु हुई डॉकटरी जाँच ,टेस्ट और हॉस्पीटल के चककर। रोगी के शरीर की थो़डी -सी भी विषम प्रक्रिया डॉकटरों को जैसे जागृत बना देती है और उसके अपनों को परेशान। अम्माजी की वृददावस्था तथा कुछ तकलीफों ने उन्हें जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिनने के लिये मजबूर कर दिया था । बेटों से दूर चले जाने के बावजूद उनके भाग्य ने अंतिम घड़ी में भी बेटों-बहुओं और नाती-पोतों से मिला दिया था।

अम्मा के जीवन की तरह ही उनकी मृत्यु भी शांत और संतुष्ट थी। एक तरह से वे बिल्कुल संतुष्ट जीव थीं । न ही खुद के मन में किसी प्रकार की हाय- हाय थी और न ही इस वजह से उन्होंने कभी किसी को दुखी और परेशान किया था।

अम्मा के पार्थिव शरीर को स्नान कराते समय श्यामा के आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । यादों का तूफान भी शांत नहीं हो रहा था ।

अम्मा के कहे एक-एक शब्द जैसे उसके स्मृतिपट से सरकने का नाम ही नहीं ले रहे थे । उनके अंतिम समय में उन्हें वही साड़ी पहनाई जो उन्होंने अतिरिक्त खरीदी थी । अपने अंतिम सफर का जैसे सारा इंतजाम उन्होंने कर लिया था जिससे किसी को किसी भी प्रकार की दौड़ -धूप न करनी पड़े। इस तरह वे अपने आगामी सफर के लिये निकल गई थीं । जाते वक्त कह गई थीं -इस बार हो आती हूँ

डॉ. लता सुमन्त

वरिष्ठ व्याख्याता ,पादरा कॉलेज

म. स. विश्वविद्यालय बड़ौदा।

1 blogger-facebook:

  1. लताजी, मुझे मानूम नहीं था कि आप कहनियाँ लिखती हैं। बधायी। आपकी कहानी का ट्विस्ट यही है कि इसमें जीवन बड़ा सहज और बिना किसी अनपेक्षित घटना के घट जाता है। आज कल ऐसा होता नहीं है.... आपकी कहानी में हुआ , यही खटास बात है। फिर एक बार बधायी।
    रंजना अरगडे

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