मंगलवार, 10 सितंबर 2013

फ़िल्म समीक्षा - सत्याग्रह

सत्याग्रह का वास्तविक अर्थ क्या है- गीतिका वेदिका

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बहुत समय बाद एक ऐसी मूवी का आना हुआ है, जिसे देखने में वाकई समय का सदुपयोग होगा और देखने के बाद आपको जेब भी घात का अनुभव नहीं होगा।

सत्याग्रह फिल्म की शुरुआत एक ऐसे वाकये से होती है जो पूरी फिल्म का आधार बन जाता है। फिल्म में प्रस्तावना के लिए प्रकाश झा ने ज्यादा समय खराब न करके सीधे मुद्दे को फिल्म में प्रस्तुत किया है। फिल्म में वर्तमान में सरकारी दफ्तरों के हालात को दर्शाया गया है, जिनसे हमे अमूमन रोज ही किसी न किसी वजह से गुजरना पड़ जाता है। सरकारी कर्मचारियों का पैसे के लिए बेजाँ मोह और इसकी एक और वजह, उस पैसे से उनके ऊपर की श्रंखला का दबाव होना एक दुर्दांत का कारण बन जाता है। और जब उस श्रंखला की एक कड़ी खोली जाती है तो पूरा का पूरा सिस्टम ही पैसाखोर निकलता है। आदमी सत्ता के लिए क्या कुछ नहीं कर जाता, इसकी हद का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता।

फिल्म में मुख्य भूमिका में अमिताभ बच्चन है, जिन्होंने एक मृत पुत्र के पिता के किरदार को जीवंत किया है, जो की एक रिटायर प्रिन्सिपल हैं। उनके अभिनय नें पर्दे पर निगाहें स्थिर रखीं। उनके सिवा कोई और इस भूमिका के लिए दावेदार हो ही नहीं सकता था। अपने पुत्र की मृत्यु के बाद अपने आप को संयत रखना और अपनी युवा बहू के दुख दर्द से विचलित हो जाना, अधिकांश दर्शकों की आंखे नम कर देता है। उन्होंने पूरे दृश्य ही दिल को छूने वाले किए है, किन्तु कुछ दृश्य तो उनके अभिनय की पराकाष्ठा को भी पार कर गए।

एक दृश्य: जहां उनकी बेटे की मृत देह पायी गयी, वहाँ सड़क पर पितृत्व भरा हाथ फेरना।

दृश्य दो: शहर के घूसखोर कलेक्टर को एक जोरदार थप्पड़ के रूप में उसके कर्मों का प्रतिसाद देना।

दृश्य तीन: सत्याग्रह के आखिरी क्षणों में उनका संघर्षशील चेहरा इसी बात का आभास देता है की सचमुच एक इंसान अनशन के बाद कैसे प्रस्तुत होता है। जेल में जाने के बाद, अनैतिक रूप से सहयोग के लिए मना कर देना, और आखिर में कमजोरी के हालत में मिल्ट्री फोर्स के सामने निवेदन करना एक सच्चे नागरिक के कर्तव्य को परिलक्षित करता है। उनके किरदार ने इस पूर्वाग्रह को तोड़ा है कि एक युवा ही क्रांति का जन्मदाता होता है।

अजय देवगन हमेशा की तरह एक सशक्त और गंभीर अभिनय लेके प्रस्तुत हुये। उनके अभिनय में वे बारीकियाँ और भी उभर के आयीं जिनको हमने आज तक देखा। एक दोस्त के सम्मान के लिए लड़ाई करना और उसके लिए अपने लाखों करोड़ों के कारोबार को अनदेखा करना, केवल एक व्यवसायी के अंदर भावना का उदय ही नहीं दिखाता बल्कि जब उसे पता चलता है की उसका देश पूरा गर्त में है तो वह सिस्टम सुधारने के लिए सबका सहयोग लेकर दादुजी के सत्याग्रह में अपनी दिलो-दिमाग दम-खम लगा देता है।

“अब तक धीरज मांगा था, प्रभु अब धीरज मत देना

सहते जाएँ सहते जाएँ, ऐसा बल भी मत देना

ये पंक्तियाँ सत्याग्रह के अर्थ को स्पष्ट करती है, कि अन्याय होता है तो उसके विरुद्ध खड़ा होना ही पड़ता है। अन्यथा सहते जाने से अन्याय सबल हो जाता है।”

अर्जुन रामपाल ऐसे युवा किरदार को निभा रहे है, जो आमतौर पर भारत के गाँव के स्कूल मे देखा जाता है। एक भटका हुआ, बिगड़ैल लेकिन मन से साफ सुथरा इंसान, जो घटना विशेष के प्रभाव से अच्छे उद्देश्य के लिए अपने अंदर का अच्छापन मुखरित करता है। अर्जुन रामपाल ने इस भूमिका को जीवंत किया है।

करीना एक पत्रकार के रूप में है, जो भावनाओं को अपने पेशे पर हावी नहीं होने देती। और सच्चाई के लिए डट के खड़ी होती है, जो कि एक सच्चे पत्रकार का धर्म है। और अभिनय के पक्ष में क्या कहना, उनकी अदायगी की तो दुनिया दीवानी है।

मनोज वाजपेयी का अभिनय वास्तव में देखने योग्य है। किस तरह से राजनेता, राजनीति की आग में अपनी रोटी सेंकते है, मनोज वाजपेयी ने उसी बारीकी में डूब-डूब के अभिनय किया है।

हर फिल्म की तरह इस फिल्म में भी कुछ कमजोरियाँ रह गईं। अजय देवगन और करीना की प्रेमकथा को स्थान देने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। अलबत्ता इसके स्थान पर अमृता के दुखद भाव को दर्शा दिया जाता तो फिल्म और भी पकड़ रख सक्ति थी।

फिल्म के आखिरी में जब अमिताभ बच्चन अमृता और करीना के कंधों का सहारा लेकर जनता को संबोधित करते है, वह दृश्य बापू की याद दिला जाता है। फिल्म की कथावस्तु यही संकेत देती है कि आज का हर आदमी तंत्र की भ्रष्ट व्यवस्था से परेशान है। चाहे वह सरकार का नौकर हो, अमीर व्यवसायी हो, दूसरों के अधिकार के लिए लड़ने वाला वकील हो, जनता का सेवक पत्रकार हो, अपना भविष्य बनाने नवयुवक हो, गृहणी हो, या गाँव शहर के आम जन हों। उनको अपने अधिकारों को हासिल करने में ही आधी उम्र गुज़र देनी पड़ जाती है, और कितनों के अधिकार मिलते मिलते मृत्यु हो जाती है।

कई परतों को बेबाक उजागर करती हुयी यह फिल्म सशक्त पृष्ठभूमि पर बनी है। अपने उद्देश्य में सफल है, और अपने नाम “सत्याग्रह” को परिभाषित करती है।

फिल्म- सत्याग्रह

सितारे- अमिताभ बच्चन, अजयदेवगन, करीना कपूर, मनोज वाजपेयी, अमृता राव, अर्जुन रामपाल,

निर्देशन- प्रकाश झा

-गीतिका वेदिका

15 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - बुधवार - 11/09/2013 को
    आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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    1. हर्षित करती हुयी सूचना देने हेतु आपका आभार व्यक्त करती हूँ
      आदरणीय दर्शन जी!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - बुधवार - 11/09/2013 को
    आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति गीतिका जी, आपने तो जीवनद दृश्य उपस्थित का कर दिए .. मैं समझता चेन्नई एक्सप्रेस देखने वालों और चेन्नई एक्प्रेस नहीं देखने वालों को भी यह फिल देखनी चाहिए और एक बार मंथन करना चाहिए ... प्रकाश झा ऐसी फिल्मे बनाने में माहिर हैं और उन्हें समर्थन भी मिलता है. साधुवाद!

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    1. आदरणीय जवाहर जी!
      आपकी उन्मुक्त प्रशंसा ने उत्साह दोगुना कर दिया !!
      आभार आपका !!

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  4. बहुत अच्छे गीतिका जी , अब फिल्म समीक्षा की विधा मे आपका आगमन हुआ !
    पर उपरोक्त फिल्म अनेक समसमायिक घटनायो का वर्तचित्र सा लगा ...अन्ना जी की टीम . केजरीवाल . किरण बेदी ,सारांश के अनुपम खेर का चरित्र ,बकील संतोष हेगड़े की हु बहु नक़ल थी .बरखा दत्त से पत्रकार .. अब लगता है प्रकाश झा जी को विषय और कथानक का चयन न्य लेना अच्छा है !

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  5. बहुत अच्छे गीतिका जी , अब फिल्म समीक्षा की विधा मे आपका आगमन हुआ !
    पर उपरोक्त फिल्म अनेक समसमायिक घटनायो का वर्तचित्र सा लगा ...अन्ना जी की टीम . केजरीवाल . किरण बेदी ,सारांश के अनुपम खेर का चरित्र ,बकील संतोष हेगड़े की हु बहु नक़ल थी .बरखा दत्त से पत्रकार .. अब लगता है प्रकाश झा जी को विषय और कथानक का चयन न्य लेना अच्छा है !

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    1. आदरणीय अमन जी!
      आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमत हूँ|
      आपके स्वागत से समीक्षा विधा मे आना सुफल हुआ| आशीष बनाए रखिए !!

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  6. सुन्दर समीक्षा, फिल्म मैंने भी देखी कुछ दिन पहले, समीक्षा पढ़ कर और बढियां लगी ...!!

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    1. आदरणीया वसुंधरा जी!
      आपकी प्रतिक्रिया से लेखनी को मानिबल प्राप्त हुआ!!
      स्नेह बनाये रखिए !!

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  7. akhilesh Chandra Srivastava6:36 am

    Film. to. bahut log dekhten hain par us par sunder sameeksha ke liye badhaiee

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    1. आदरनीय अखिलेश जी!
      रचना पर अपनी प्रतिक्रिया देकर मनोबल बढ़ाने हेतु आभार करती हूँ !!

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