सोमवार, 16 सितंबर 2013

राम आश्रय का कविता संग्रह - मेरी चाहत

               हिन्दी का भविष्य 
आज हिन्दी हमारे देश के करोड़ों लोगों की भाषा है लोग हमेशा अपने विचारों को एक दूसरे तक पहुँचाने के लिए हिन्दी का उपयोग करते हैं। देश के सभी प्रान्तों में लोग आम तौर  पर हिन्दी को उपयोग में लाते हैं यह देश की जन साधारण की भाषा होने के कारण  इसका उपयोग व्यापारी अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए , अभिनय कर्ता मेलों में लोगों का मनोरंजन करने के लिए उपयोग में लाते हैं । नाना प्रकार के उत्सवों में हिन्दी के माध्यम से अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाते हैं हिन्दी हमें आपस में फूलों की माला की तरह जोड़ती है । देश के किसी भी प्रांत में आप हिन्दी के माध्यम से अपने विचारों को रख सकते हो या दूसरे के विचारों को समझ सकते हो फिर चाहे वह दक्षिण के प्रांत केरल या पूरब के प्रांत असम अथवा उत्तर में कश्मीर या पश्चिम में गुजरात ही  क्यों न हो। आप अपने विचारों को लोगों तक बहुत ही सरलता के साथ रख सकते हैं आप अपनी रोजी रोटी अर्जित कर सकते हो।सभी प्रान्तों में हिन्दी निर्बाध रूप से प्रयोग में लायी जाती है अपनाई और समझी जाती है।किसी भी प्रदेश में इसका उपयोग करने में कोई आपत्ति नही है तो फिर आजादी के इतने दिनों के बाद भी हिन्दी की इतनी अनदेखी क्यों हो रही है । गहराई से सोचने पर एक ही उत्तर निकलता है और वह है अधिकारियों की अनदेखी, कर्मचारियों में हिन्दी के प्रति अरुचि, हाँ यहाँ पर एक बात असपष्ट करना  होगा कि कर्मचारी या अधिकारी तो केवल और केवल मोहरे होते हैं असली कर्णधार तो देश को चलाने वाले नेता ,मंत्री और देश के निर्णायक गण होते हैं।
   वे लोग यह जानते है कि हमें कहाँ कब और क्या करना है, अपनी भलाई वह भली भांति समझते हैं और कभी भी कोई गलती नहीं करते है। चुनाव के समय हिन्दी में लोगों से मीठी मीठी बातें कर उनको अपना कह उनके दिल को जीतने की असफल प्रयास करते हैं और यहाँ तक कि असंभव दिखने वाले वादे भी कर डालते हैं । इतनी उपयोगी और सरल भाषा जो सब को जोड़ने वाली भाषा होती हुई भी हर साल हमें हिन्दी सप्ताह ,हिन्दी दिवस मनाना पड़ता है फिर ऐसा क्यों ! इसका एक ही उत्तर हो सकता है वह है इच्छा शक्ति का अभाव ।

 

1

   कार्यालयों में काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों का इसमें कोई दोष नजर नहीं आता क्योकि अगर नेता और मंत्री उन्हे आदेश दें तो उन्हें तो करना ही होगा ।
अधिकारी गण किसी तरह की कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते और साथ ही वह यह भी नहीं चाहते कि कहीं कोई परेशानी उनके सामने आए। अगर वे कर्मचारियों को आदेश देगें  तो उससे पहले उन्हें कर्मचारियों को दक्षता के लिए प्रशिक्षण देना पड़ेगा । उसके लिए अधिकारियों को योजनाएँ बनानी होगी, साथ ही उन्हे अपने भविष्य को ध्यान खतरे से बचाना होगा । सरकारी खजाने से पैसे भी मंजूर होते हैं परंतु उसे कार्यान्वित नहीं किया जाता है । इस तरह से हमारे अधिकारी और कर्मचारी हिन्दी के नाम की परेशानी से बच
जाते है सरकार से पैसे भी मिल जाते हैं । इस प्रकार हिन्दी विकास के नाम पर हिन्दी के साथ मज़ाक का खेल चलता रहता है ।
  हिन्दी किसानों और मजदूरों की तरह ही उपेक्षित है जबकि देश की सरकार उन्हीं के द्वारा नियुक्त होती है उन्हीं के मेहनत और पशीने की कमाई से देश के करोड़ो लोगों को भोजन मिलता है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि वे या तो भूख से परेशान हैं या किसी न किसी बीमारी से दुखी है ।दिन भर काम करने के बाद भी भर पेट भोजन भी नसीब होता है तो क्या उनका दोष किसान ,मजदूर होना है या फिर तंत्र की विफलता है । चुनाव से पहले उनकी याद आती है उनकी सुविधा की बात की जाती है और चुनाव के बाद पाँच साल तक फिर कोई भी सुध लेने के लिए नहीं आता है और आता भी है नाम बदल जाता है लोग वही पुरानी जाति और धर्म के आधार पर किसी न किसी प्रत्यासी को अपना बहुमूल्य वोट देकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेता है और करता भी क्या ?
तुम्हारा विकास देश की भाषा से इस प्रकार जुड़ा है जिस प्रकार हमारी आत्मा हमारे शरीर से । हम उससे अलग उसके उत्थान की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं । शिक्षा को अपना औज़ार बनाओ और एक साथ मिलकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो तभी तुम्हारी उन्नति और देश की भाषा की उन्नति संभव है । मैंने अपनी कविताओं के माध्यम से आप लोगों को यह विश्वाश दिलाना चाहता हूँ कि आप वह सब कुछ कर सकते जो आज तक के इतिहास में कभी नहीं हुआ है। तुम्हारी समस्या का निदान भी तुम्हें ही खोजना पड़ेगा अब यहाँ कोई राम, रहीम,कृष्ण,ईसा मसीह ,पैगंबर नहीं करने के लिए आएगें । फिर किस सोच में हो कि ये नेता तुम्हारे लिए कुछ करेंगे । यदि आप यह सोच रहें हैं तो गलत है क्योकि अगर उन्हें कुछ करना होता तो अब तक क्यों नहीं । अब आप को यह निश्चित करना होगा कि आप को क्या करना है या इसी तरह दुख को भोगते भगवान से प्रार्थना करते रहोगे कि प्रभु आप हमारे दुख का नाश करो और प्रभु आकार तुम्हारे सारे कष्टों को एक क्षण में समाप्त कर और आप का घर खुशियों से भर जाएगा । तो फिर आप भूल जाओ ऐसा कुछ नहीं होने वाला है और कभी हुआ है आज जो आजादी का आनंद ले रहे हो उन शहीदों कि देन है जिसे आज के नेता भूलते जा रहें हैं उनके नाम पर अपना उल्लू सीधा करते हैं । इनकी करनी और कथनी पर ध्यान दो चुनाव में किए गए वादों को याद दिलाओ, भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाओ, भय और आतंक से ऊपर उठकर एक शश्क्त भारत के निर्माण में अपना योगदान दो । ऐसे लोगों पर विश्वाश मत करो जिन लोगों ने देश के साथ भद्दा मज़ाक किया हो ,मतलब साफ है
जो वादा करके वादे से मुकर गया हो ऐसे नेताओं को शासन सत्ता से दूर रखो ,उनसे हमेशा सावधान रहकर देश को बचा सकते हो ।  

 

अनुक्रमणिका :--
1.    चाँद की यात्रा
2.    पत्थर की दासता
3.     फूल की व्यथा
4.    मेरे आग्रह
5.    बादल
6.    उपवन
7.    मेरी बगिया
8.    हम तो कुलीन हैं
9.    नदी के रूप
10.    मानव जीवन
11.    मेरी अभिलाषा
12.    माँ गंगा
13.    सरिता
14.    सड़क और सफर
15.    हिन्द ज्योति
16.    हिन्दी के दोहे
17.    युग निर्माता हिन्दी
18.    हिन्दी का जादू
19.    प्रभु का आशीर्वाद
20.    माला की डोरी
21.    हिन्द में हिन्दी का स्थान
22.    हिन्दी विवाद
23.    सौभाग्य हिन्दी का लौटा दो
24.    बिंदी और हिन्दी
25.    चाँद की अंधेरे पर विजय
26.    ट्राफिक लाइट
27.    सुभाष चन्द्र बोस
28.    दीपावली की शुभ कामना
29.    बूंद की कहानी
30.    नर्मदा
31.    समुद्र पत्तन मर्मागोवा
32.    दोषी कौन ?
33.    लालच
34.    नदी के दर्प
35.    स्वागत गीत
36.    खुशियों के बीज
37.    प्रभु का स्वागत
38.    मैंने उन्हे देखा
39.    रक्षा बंधन 

    

 

 


1.       चाँद की यात्रा
नभ मण्डल में चाँद चमकता ,बढ़ता धीरे धीरे ।
स्वच्छ चाँदनी जग में भरता,तम हरता धीरे धीरे।
बंधु जनों के कष्टों को हर्ता, बढ़ा हाथ कर धीरे धीरे ।
भूले भटकों को राह दिखाता, रूप बढ़ाकर धीरे धीरे ।  
कठिन समय में संयम रखता, चलता सदा अकेले ।
अंधकार से हर पल लड़ता, करता विजय अकेले ।
दुखों की परवाह न करता, मुड़ता कभी न पीछे ।
आगे बढ़ता कभी न रुकता, लेकर संकल्प घनेरे ।
प्रतिव्द्न्दी को घायल करता,निर्मल आभा मण्डल से।
मित्रों को सदा प्यार बांटता, भर ममता की झोली से ।
कभी नहीं वह दंगा करता ,रखता संबंध हर सज्जन से ।
दुष्टों से सदा नफरत करता ,दूरी रखता दुष्टों से।
सबके सपनों को पूरा करता, रखता न कभी अधूरी । 
रौद्र रूप में कभी न दिखता ,चाहे कितना हो जरूरी ।
सदा स्नेह से पीड़ा हरता, अपनी फितरत रख दूरी ।
पूरब से पश्चिम में जाता ,अपनी मंजिल करता पूरी ।

 

 


   2    पत्थर की  दासता 
      सदियों से पड़ा ठोकर खाता ,
           सहता सदा मैं हर मौसम को ।
दुख झेला किस्मत को कोसा ,
परवाह न कि उन दर्दों की ।
तन पर वस्त्र न सिर पर छाया ,
किस्मत में है दुख समाया । 
         सब ने मिल सरकार बनाया ,
           मन में सुख की आस  जगाया ।
         जड़ता की वह काली छाया ,
        मिट न सकी किसकी यह माया  । 
         एक शिकारी ने मुझे अपनाया ,
         अपना रक्षक मुझे बनाया ।
         मेरे बल से आधिपत्य जमाया ,
          सभी दिशा में ध्वज लहराया ।
         ज्ञान दीप ले एक शिल्पी आया ,
        जिसने अंधकार को दूर भगाया ।
        सुखद भविष्य की आस बँधाया ,
        विजय मंत्र का पाठ पढ़ाया ।
         शिक्षा की चोट दे हमें तराशा ,
          शिक्षित ,संगठित अब हमें बनाया ।
        मानवता के सुंदर स्वरूप का,
जीवन दर्शन हम सबको  कराया ।
        जग में बिखरे सब मानव को ,
संघ की शक्ती का आभास कराया ।
        अधिकारों की माँग श्रंखला ,
सब लोगों तक तुरंत पहुंचाया ।
     बाबा ने संघर्षों की राह बताया ,
जीवन का उद्देश्य बताया ।
      नेता ,मंत्री और देश के रक्षक ,
सबको उनका कर्तव्य बताया ।
        आज सभी हम उनके पथ गामी,
सुख समृधी के सच्चे स्वामी ।

 

 


3   फूल की व्यथा  
व्यर्थ ही सोचा आपने मेरी व्यथा को ,
जो पल रही थी हृदय में स्वप्न रूप में ।
आसान नहीं है देखना जीवन के रूप को,  
पढ़ सके जो वेदना मन के आइने में ।
सीप में छिपी मोती,जो खोज ले सच को
रुकता नहीं जो पल भर ,इस बदलते जग में ।
मैंने भी देखा था मन में एक स्वप्न को,
बिठा लिया एक मूर्ति हृदय के कोने में ।
मिटने न दिया स्वप्न के आकार को ,
सुंदर रूप दे सजा लिया मैंने विचारों में ।   
एक माला बनाऊँगा चुनकर कली को ,
अपने प्रेम को मिला दूंगा उस माला में । 
पहनाऊंगा बड़े स्नेह से आपने ईष्ट को ,
कली जब फूल बनी सुहाने बसंत में ।
उसकी खुशबू ने आकर्षित किया भवरों को ,
असफलता मेरे हाथ लगी उसे चुनने में ।
अपनी सारी व्यथा मैंने बताया फूल को ,
मैं समझ न सका उसे अपनी नादानी में ।
क्यों कोसा मैंने ! उस बेजान फूल को ,
उसे दूसरों से वास्ता नहीं अपने जीवन में ।
वह हर वक्त तैयार रखता है अपने मन को ,
वह उसी का हो जाता है जो भी मिलता जीवन में ।
छोटी नदी की धारा मिटा देती है जीवन को ,
जैसे ही कोई बड़ी नदी आती है उसके जीवन में ॥


4   मेरी आग्रह
आज हम स्वतंत्र हैं अपने वतन में,
सारे बंधन तोड़ दिये दमन चक्र के ।
सभी को जोड़ दिया आज एक सूत्र में,
मिटा दिया वो अंधकार सबके नसीब से ।
सैनिक बनू रक्षा करू आज अपने वतन की,
शत्रु को मिटा सकूँ,अपनी प्रगति की राह से ।
मोड़ दूँ हर विघ्न को अपने वतन की ओर से।
जोड़ दूँ कुछ प्रांत को अपने वतन की सीमा से ।
लेखक बनूँ लिखता रहूँ अपने वतन के शौर्य को ।
प्रहार कर अनीति पर अपनी लेखनी के वार से ।
मिटा सकूँ सारे कलंक , आज अपने देश से ।
शांति का पैगाम फैले आज हर ,गली शहर से ।
माली बनूँ सेवा करूँ, आज अपने चमन की ।
मेरी बगिया में फूल खिलें नाना रंग रूप के।
खुशियों में सब झूम उठें,गाँव गली शहर में । 
चमक जाए सबका जीवन प्रेम के बहार से ।
सेवक बनूँ सेवा करूँ सदा सभी वर्ग की ।
ऊंच नीच मिटा सकूँ देश के हर छोर से ।
तोड़ दूँ दीवार सारी आज सभी धर्म जाति की।
जोड़ दूँ सभी को आज मानवता की डोर से ।
कृषक बनूँ खेती करूँ, अपने पूरे लगन से 
अन्न से भंडार भरूँ, आज अपने देश की ।  
उन्नति की लहर पहुंचे आज हर घर में ।  
हर्ष की उन्माद निकले आज हर गली से ।
दूर करो सारी दुराग्रह अपील मेरी सबसे ।
प्रेम के गीत गाओ आज सभी मिल के ।
अपने कल को मत बिगाड़ो लालच में फस के ।
आज को अच्छे से जियो, एक साथ मिलके । 
    5    बादल
इन बादलों ने इनायत किया है
सदा हमको मीठा पानी दिया है
हरी प्यास सबकी झरने दिया है
ये ही बहारों को जीवन दिया है
भयंकर तपन में सहारा दिया है
रिमझिम फुहारों से स्वागत किया है
मरुभूमि में भी प्यारा जीवन दिया है
चारों तरफ जग में खुशहाली दिया है
पहाड़ों में जीवन को सहारा दिया है
बादलों ने भी भूलों की माला रचा है,
कहीं पानी कम कहीं ज्यादा दिया है
कहीं किसी ने जब नियमों को तोड़ा है,
प्रलय का भयंकर वो जादू किया है
गलती का प्रतिफल सबको दिया है,
फसलों को बिलकुल नष्ट कर दिया है
उनके आशियानों को जड़ से मिटाया है,
छोड़ा न कुछ भी सफाया किया है
मानव ने भी कभी साहस न खोया है,
धरा पर सदा अपने जीवन को खोजा है
मानव भी तुम से प्यार दिखया है,
जन जीवन सब मिल स्वागत किया है
नदियों को तुमने जो जीवन दिया है,
अपने प्यार की सच्ची सौगात दिया है
शीतऋतु को तुम्ही ने तो दावत दिया,
हैसजल नैनों से सबने विदाई दिया है
आने का फिर सबने आग्रह किया है ,
इन बादलों ने इनायत किया है

   
            6       उपवन

मेरा देश एक सुंदर उपवन
हम उपवन के न्यारे फूल ।
अनुपम इसे बनाएगेंह्म
विपरीत स्थितिको कर अनुकूल ।
फूलोंसे आच्छादित गुलशन
शोभा इसकी जग से न्यारी ।
परम अलौकिक अपना मधुबन
मन हरती हर छटानिराली ।
सूर्यरश्मियांकरती नव सृजन
जीवन से भर देती क्यारी ।
हरे भरे सब खेत बाग बन
जगमें  फैलाते खुशहाली ।
तितली उड़ती कली कली पर
अमृत रस पीकर इठलाती ।
कोयल फिरती डाल डाल पर
प्रेम के सुन्दर गीत सुनाती ।
चलते पथिक निज कष्ट भुलाकर
जन जीवन में  वैभव दर्शाती ।
बहती यहाँ  हजारों  नदियाँ
कन-कन मेंखुशियाँ  फैलाती ।
मन मोहक है सुंदर वादियां
धरती पर स्वर्ग  ये कहलातीं ।
मेरा देश एक सुंदर उपवन
माली बन इसे सजाएँगें ।  
तन मन धन अर्पित कर जीवन
शत्रु से देश को बचाएँगें ।
 

 

   


7        मेरी बगिया
मेरा देश एक सुंदर बगिया
माली बन इसे सजाएँगें ।
जल जमीन नैसगिक ससाधन
हम सबको अक्षुण बनाएगगें ॥
झूठे मक्कारों का कर पतन ।
उंनको कड़ी सजा दिलाएगें 
भ्रस्ताचार को आज कुचल कर
जन जन को खुशी दिलाएगें
क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर
हम सबको गले लगाएगगें
जाति,धर्म से ऊपर उठकर
एक धागे में बंध जायेंगे
नफरत पर हम विजय प्राप्त कर
प्रेम की मुरली बजायेगे
धरती सागर और गगन पर
अपना आधिपत्य जमाएंगे
जग की सबसे श्रेष्ठ सिखर पर
अपना परचम लहराएँगे
नित नव नूतन आविष्कार कर
हम उन्नत शील कहलाएंगे
फैली जड़ता का विनाश कर
ज्ञान की ज्योति फैलाएँगे
अपने संबिधान की रक्षा कर
सबको अधिकार दिलाएँगे
प्रजा तंत्र का साक्षात कर \
सच्ची अनुभूति करवाएँगे
मेरा देश एक सुंदर उपवन
माली बन इसे सजाएँगे
तन मन धन अर्पित कर जीवन


8    हम तो कुलीन हैं !
   
हम श्रेष्ठ हैं हम उच्च हैं हम तो कुलीन हैं ,
गरीबों से करते नहीं प्रेम हम तो कुलीन हैं ।
करते हैं हम प्रेम सब श्रेष्ठ जनों से ,
रखते हैं हम व्यवहार श्रेष्ठ जनों से,
मैंने उनसे पूछ लिया एक प्रश्न प्यार से,
सुनकर मुझे हैरत हुई उनके इस जवाब से,
भौंहें उनकी चढ़ गई इंसान के नाम से ।
हृदय विदीर्ण हो गया प्रश्न के जवाब से ।
हम श्रेष्ठ हैं हम उच्च हैं हम तो कुलीन हैं ,
गरीबों से करते नहीं प्रेम हम तो कुलीन हैं ।
गर्व है अभिमान है माता–पिता के वंश से ,
मुझे स्वाभिमान है अपने पूर्वजों के प्यार से ,
आदर्श हैं विज्ञान के विख्यात अपने नाम से ,
देते हैं सौगात जग को नित नए आविष्कार से ,
दुनिया लाभान्वित होती उनके नए खोज से ,
मिलता उनको सम्मान हर किसी समाज से ,
अगला प्रश्न पूछ लिया मैंने उसी अंदाज से ,
माता पिता के अलावा वास्ता तुम्हारा है किससे ,
गर्व से सिर उठाया बता दिया फिर शान से ,
प्यार का रिश्ता हमारा आया और डागी से ,
सुन कर मुझे हैरत हुई उंगली दबाया दांत से ,
डागी भी श्रेष्ठ हैं आज के सभ्य समाज से ,
अब मुझे मालूम हुआ मामला कुछ संगीन है ,
आज कल इंसान नहीं कुत्ते यहाँ कुलीन हैं ,
रहते हैं यहाँ महलों में उनकी ज़िंदगी हसीन है ,
बट गए मानव जो यहाँ इंसानियत से दूर हैं ।
आज मेरे समाज में यह बहता हुआ नासूर है ।
देखकर यह सब नजारा मानवता गमगीन है ।
जमाना बदल गया उनमें से कुछ गरीब हो गए ।
दशा देख कुलीन समाज की सब हैरान हो गए । 
पहन कर झूठी नकाब सब समाज में मिल गए ।
सभी को एक पहचान से सब साथ बंध गए ।
तंत्र का सहारा ले सब किश्ती में सवार हो गए ।
देश की संपदा के लूट वृशितित उपाय कर लिए।
शासन सत्ता की डोर जब हाथ से फिसल गई ।
हाथ आई मछली ज्यों पानी में फिर चली गई ।
सारी चलाकी अब इनकी दुनिया समझ गई ।
घोटालों की किश्ती में बस एक कील चुभ गई ।
अब कुलीनों की मनोदशा सारी दुनिया समझ गई ।
एक आह मुंह से निकली और सारे ब्रह्मांड छा गई ॥    

 

 

 

 

 

9     नदी के रूप
    
हे नदी ! मैंने तुझे देखा ग्रीष्म में ,
नागिन सी लहराती, बलखाती
अपने प्रिय जन पर प्यार लुटाती ,
तेरा सौम्य रूप और प्यार अनोखा,
नव जीवन देती, हाथों से सहलाती,
आगे बढ़ती मंजिल पर मैंने देखा ।
बाधाओं को तोड़ती एक क्षण में ,
सारी विषमताओं को प्यार से मिटाती
जड़ और चेतन को नया रूप देती ,
सागर से तेरा मिलन सभी ने देखा।
तड़पती, ग्रीष्म की भयंकर गर्मी में,
विरानों में खुद को खोजती
पूछती हर राही से अपनी मंजिल,
दिखती, कमजोर एक पतली सी रेखा ।
बेबश,लाचार बहती कल की आशा में,
किया तेरा शोषण, हृदय में हुई पीड़ा
लोगों ने तेरा कठिन किया जीना ,
तेरी इस दुर्दशा को किसी ने नहीं देखा ।
तेरा रास्ता रोका फँसकर लालच में,
कर दिया जीवन की सबसे बड़ी नादानी
तेरी ताकत उन्हें हुई हैरानी ,
तेरे अनुपम प्यार से किया धोखा ।
जब तूने किनारों को काटा बरसात में,
खेत खलिहान और घरों में घुसती
पड़ोसी को अपनी ताकत दिखाती,
अपने अपमान का लिया लेखा जोखा ।
अपने पड़ोसी के अरमानों को खाक करती,
उनको गलती का परिणाम दिखाती,
पड़ोसी को गलती पर आंशू बहाते ,
हे नदी ! मैंने तुझे देखा बरसात में ॥

 

 

 

 


10        मानव जीवन
मानव का यह नश्वर जीवन ,
नदी सादृश्य कल कल करके बहता ,
जीवन की नाना बाधाओं में ,
दिन और रात, संघर्ष शील रहता ।
सुख की मनो कामना लेकर,
हँसते हँसते विपदाओं को सहता ।
प्रकृति से कुछ सबक सीख कर ,
नित आगे ही बढ़ता रहता । 
अपने कल को समृद्ध बनाने में ,
अपना सर्वश्य निछावर करता ।
नियमों की प्राचीर तोड़कर ,
प्रभु रचना में बाधक बनता ।
नश्वर को सब शाश्वत मानकर ,
भौतिक सुख में व्यस्त रहता ।
हे नर महान ! कुछ अनर्थ मतकर ,
कल के लिए आज को व्यर्थ करता ।
तुम्हारा कल, तेरा काल बनकर,
है तुम्हारे आज का सत्यानाश करता ।
मानवता की राह पर चलकर,
संसार में अपने नाम को अमर करता ।
इस छोटी सी ज़िंदगी में उपकार कर ,
भविष्य के लिए वर्तमान बिगाड्ता ।
कल के लिए थोड़ा त्याग कर,
सृष्टि के संचार में हाथ बटा ।
अभी भी वक्त है समय की पहचान कर,
कर ले दीन दुखिओं की सेवा ।
मानव के इस नश्वर,
जीवन को तुम शाश्वत कर दो ॥

11    यह मेरी अभिलाषा 

मेरी यह अभिलाषा है चमकूँ एक दिन अंबर में ,
चन्दा की तरह प्रतिदिन बढ़कर,
उन्नति के शीर्ष को छूं लूँ मैं ।
फूलों की भीनी खुशबू बनकर ,
गुलशन को सुभाषित कर दूँ मैं ।
सूरज की स्वर्णिम किरन बनकर ,
सारे जग को प्रकाशित कर दूँ मैं ।
सागर की तरह गहराई रखकर ,
सब दुख सुख समाहित कर लूँ मैं ।
पर्वत की तरह अटल रहकर ,
हर दुख का सामना कर लूँ मैं ।
धरती की तरह धैर्य रखकर,
अपने अमित प्यार से भर दूँ मैं ।
नदियों की तरह आगे बढ़कर ,
सबको नव जीवन दूँ मैं ।
कर्तव्यपरायण मानव बनकर ,
ख्याति विश्व में फैला दूँ मैं ।
ममता की प्यारी सीढ़ी चढ़कर ,
जन –जन के मन को छूं लूँ मैं ।
मधुर वचन के रथ पर चढ़कर,
उलझन की डगर को सुलझा लूँ मैं ।
जग में दुर्लभ काम सदा कर,
कीर्ति ध्वजा को फहरा दूँ मैं ।
सबका आशीर्वाद प्राप्त कर,
जग में उत्थान शीघ्र कर जाऊ मैं ॥
यह मेरी अभिलाषा है 

              12     माँ गंगा
स्वर्ग लोक में विचरण करती ,दुख हरती नित माँ गंगा ।
शिव की जटा में अठखेली करती ,प्यार लुटाती माँ गंगा ।
हरि चरणों की रज को धुलती ,कल कल बहती माँ गंगा ।
भगीरथ के प्यार में उलझी ,धरती पर प्रकटी माँ गंगा ।
पर्वत के शिखरों से निकली ,पग पग पर मुड़ती माँ गंगा ।
जीवन के कठिन राह पर चलती, नित आगे बढ़ती माँ गंगा ।
चट्टानों से हर क्षण उलझती , है मन बहलाती माँ गंगा ।       
हरि की पौढ़ी को छोड़ चली ,मैदान में आयीं माँ गंगा ।
जन कल्याण की लिए कामना, सबको तारती माँ गंगा ।
पशु पक्षी नर नारी सबका ,मंगल करती है माँ गंगा । 
फल फूलों से उपवन भरती ,भूख मिटाती है माँ गंगा ।
मन के सदा अमृत लुटाती, प्यास बुझाती माँ गंगा।
निपट, निशाचर, कामी, क्रोधी, समझ सकीं न माँ गंगा ।
कपटी नीच की मनोबृत्ति रख, छल से जीता माँ गंगा ।   
मौका देख विष मिला नीर में ,किया प्रदूषित माँ गंगा ।
खुशियाँ कोसों दूर जा निकलीं, दुखी हो गयीं माँ गंगा ।
नैन नीर भर वह चिल्लाया, मैली हो गयीं माँ गंगा ।
मलीन, क्षीर्ण, तन विह्वल, रुधे गले से बोलीं माँ गंगा ।
झर झर नीर नयन से बहते, कातर दृष्टि से देखी माँ गंगा ।
उठ जग मनुष अब लाज बचा, तेरी आश में माँ गंगा ।
उठा शस्त्र अब मिटा प्रदूषण, तुझे आज पुकारे माँ गंगा ।

 

 

 

 

      13    सरिता
सरिता वनिता शैल की ,घर जन्मी एक रोज ।
प्रेम सूत्र में जोड़ दी , अपना सकल समाज ।।
होंठों पर छ्लकी खुशी , ज्यों जल खिला सरोज ।
जीवन दायिनी विश्व की , प्यार बांटती रोज ॥
घर भर दिया दुलार से, हृदय प्रेम रस घोल ।
पक्षी चहकीं डाली से ,बोलीं मीठी बोल ॥
सरिता आई मैदान में ,किया सभी का काज ।
कष्ट मिटा मैदान का ,मीत मिला जो आज ॥  
हरा-भरा उपवन हुआ ,खिले फूल चहुं ओर ।
धरती ने शृंगार किया ,बांध प्रेम की डोर ॥
मंजिल पर आगे बढ़ी , छोड़ चली गिरिराज ।
बिगड़े कारज बन गये ,सुधरा सकल समाज ॥
वृक्ष लदे फल फूल से , भरे भाव पुर ज़ोर ।
कल-कार-खाने चल पड़े, लोग बंधे एक डोर ॥   
भूख बिमारी मिट गई ,खुशी हुए नर नारी ।
नफरत अब गायब हुई ,टुटी घृणा कटारी ॥
रहने लगे सब मिलकर ,घटा व्देष आधार ।
अंधकार का नाम मिटा, टूटी कुटिल दिवार ॥
आपस में एकता बढ़ी, सुविधा मिली हजार ।  
सरिता जा सागर मिली ,लेकर प्यार अपार ॥
समता ,ममता प्यार का , हुआ चतुर दिक राज । 
रामाश्रय ने लिख दिया, सरिता का यह राज ॥

    

  14    सड़क और मुसाफिर

सड़क और मुसाफिर का रिश्ता पुराना,    
यहाँ पर सभी को कहीं न कहीं है जाना ।
न मंजिल का पता न घर का ठिकाना ,
फिर भी आने जाने वालों का रिश्ता पुराना ।
एक राही ने दूसरे राही से पूछा- अरे भाई !
यह सड़क आखिर जाती कहाँ ?
उत्तर मिला तो मैं हैरान रह गया ।
मैं डरा ,सहमा और शशांकित हुआ ,
उसने मेरी भावनाओं को समझा ।
बड़े ही प्यार से उसने मुझे समझाया,
धैर्य से सड़क के मर्म को मुझे बताया ।
ये सड़क ---बालकों को छोडती है स्कूल ,
कार्मिकों को छोडती है उनके कार्यालय ।
वणिक को बाजार , ग्राहक को उसकी मंजिल ,
तुम्हें जाना कहाँ सोच लो अपनी मंजिल ।
ये सड़क:- तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक ले जाएगी।
मंदिर से लेकर मस्जिद ,गिरिजा से ले गुरुद्र्वारा ,
चाल ,चकले से लेकर संगीत गोष्ठी तक ।
मयखाने से लेकर ,राज दरबार तक, 
तुम्हें अपनी मंजिल है निश्चित करना ,
सड़क पर धैर्य रखकर है आगे बढ़ना ,
बाधाओं को पार कर, तुम्हें मंजिल पर चलना ।
एक सुलझा हुआ मुसाफिर है तुमको बनना ॥ 
सड़क और मुसाफिर का रिश्ता पुराना ॥


15   हिन्दी की ज्योति

मिटा सके जो अंधकार, वह ज्योति हिन्द में जगानी है    
कश्मीर से केरल तक ,आज हिन्दी भाषा को फैलाना है
कच्छ से लेकर कटक तक हिन्दी का परचम लहराना है
आतंक वाद की छाया से, हमको अपना देश बचाना है
भ्रष्टाचार की अमर बेल को ,जड़ समेत हमें मिटाना है
नक्सलियों की बढ़ती आंधी से हम सबको टकराना है
देश का हित सरोपरि, मूल मंत्र हम सबको समझना है
एक सूत्र में बांध सके जो ऐसी हिन्दी को अपनाना है
नफरत की बेड़ी काट सके, जो वह प्रेम बीज को बोना है
हिन्दी से उन्नति संभव है यह कार्य पटल पर लाना है
शंका जो लोगों के मन में है अब हमको उसे मिटाना है
गाँव –गाँव और नगर नगर में हमको उद्योग लगाना है
फैली विषमता जो देश के अंदर हमको उसे मिटाना है
भगत और चंद्रशेखर की कुर्बानी हमको आज बचाना है 
जयप्रकाश के आंदोलन को जन –जन तक पहुंचाना है
निष्कल्ङ्कित व्यक्ति को चुनकर संसद में पहुंचाना है
आजादी की गरिमा को अब हम सबको अक्षुण रखना है
समता ममता का लक्ष्य आज जनता के बीच पहुंचाना है
भारत का जन जन सीख सके ऐसी हिन्दी को लाना है
देश को सुढ़ृण बनाने की हम सबको आज प्रतिज्ञा करना है
सकल विश्व में हिन्दी को हमको सम्मान दिलाना है
मिटा सके जो अंधकार, वह ज्योति हिन्द में जगानी है ॥

16      हिन्दी के दोहे

क्यारी देखी फूल बिन ,माली हुआ उदास ।
कह दी मन की बात सब, जा पेड़ों के पास ॥
हिन्दी को समृद्धि करन हित, मन में जागी आस ।
गाँव गली हर शहर तक ,करना अथक प्रयास ॥
कदम बढ़ाओ सड़क पर ,मन में रख कर विश्वाश ।
मिली सफलता एक दिन ,सबकी पूरी आश ॥
सूरज चमके अम्बर में , करे तिमिर का नाश ।
अज्ञानता का भय मिटे, फैले जग में प्रकाश ॥
चंदा दमकी आसमान  ,गई जगत में छाय ।
हिन्दी पहुंची जन जन में,अड़चन रही न कोय ॥
हिन्दी बैठी ताज आज, सब को रख कर पास ।
फूटा भांडा ढोंग का ,हुई संकीर्णता नाश ॥
घनी अंधेरी राह में जब राह न दिखती होय ।
हिन्दी साथ में तब चली, राह नई ली पाय ॥
हिन्दी बोलें आपस में तो गर्व का अनुभव होय ।
गाँव शहर परदेश में , मस्तक नीचा न होय ॥
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, चहुं दिश हिन्दी आज ।
मिटे जाति धर्म के बंधन , आयी समता आज ॥  
दूध और पानी की तरह ,मिल गए सभी समाज  ॥
पर्वत सोहे न भाल बिन, नदी भए बिन नीर ।
देश न सोहे हिन्दी बिन , जीवन रहित शरीर ॥
ध्वज फहराए विश्व में, नभ तक जाए छाय ।
ममता जागे हृदय में , सभी हिन्दी अपनाय ॥

        17          युग निर्माता
हे युग निमता ! युग प्रवर्तक ! तुम कर्ण धार विद्या निधान ।
तुम शक्ति रूप हो देव तुल्य ,तुमको मेरा हो स्वीकार नमन ॥
नाना शब्दों को स्वय विधान कर ,हिन्दी को जो सम्मान दिया ।
अपने पौरुष के बल पर ,आज हिन्दी का जो संवर्धन किया ॥

उत्तुंग शिखर पर आरोपित कर, एक सूत्र में सबको जोड़ दिया ।
समानता का पाठ सीखकर ,समाज से विषमता को मिटा दिया ॥
अपने प्रयासों के बल पर , घर घर में हिन्दी को पहुंचा दिया ।
छोटे बड़ों को साथ बिठाकर, जन जन में भाईचारा फैला दिया ॥

पराधीनता पर प्रहार कर , दुश्मन की कमजोरी को बता दिया ।
अपने विवेक और संयम के बल पर, नाना प्रान्तों को जोड़ दिया ॥
अपने ज्ञान का सदुपयोग कर ,आपसी प्रेम भावना को जगा दिया ।
अपने त्याग और बलिदान के बल पर, सत्य मार्ग को दिखा दिया ॥

नफरत सबकी दूर भगाकर, आपस में रहना सिखा दिया । 
सब धर्मों को साथ जोड़ कर ,संघ शक्ति में बांध दिया ॥
घर घर निर्मल ज्योति जलाकर, अंधकार को मिटा दिया ।
सरल सरल शब्दों को चुन कर ,शब्द कोश को बढ़ा दिया ॥
अपनी निष्ठा और कर्तब्य के बल पर चारों तरफ प्रचार किया ।
हिन्दी की महिमा समझकर , क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान किया ॥
दुश्मन को निष्कासित कर ,अपने देश के गौरव को बढ़ा दिया ।
हे युग निमता ! युग प्रवर्तक ! तुमको मेरा सत सत नमन ॥


 
18      हिन्दी का जादू
आज हिन्दी ने ऐसा कमाल किता है ,
सारे जगत में खूब धमाल किया है ।
हवा में फैली खुशबू ,फिज़ा में दिखा प्यार ,
दिल हो गया अब बेकाबू ,मन में जागा प्यार ,
ये मौसम का है जादू , हर दिशा में बहार ,
यहाँ सभी करते हैं आपस में मिलकर प्यार ,
शत्रु यहाँ डरते हैं, आज देख कर इनका प्यार,
सौ बार सोचते हैं मन में ,करने से टकरार ,
मन मंदिर से निकल रहा ,एक अनोखा प्यार ,
चंदा सूरज दिखा रहें ,नित घर बैठे संसार ,
झलक रहा है सभी जगह, एक सुंदर व्यवहार ,
सारी कटुता मिटा देश से ममता का किया संचार ,
राग बैर सब हटा समाज से, दुश्मन पर किया वार ,
पूरब पश्चिम सभी दिशा से, खुला प्रेम का द्वार ,
पर्वत की ऊंची चोटी से , हिन्दी का किया प्रसार ,
नदियों के पावन संगम से, हिन्दी ने भरी हुंकार ,
रामायण की गीतों से , आज देश में किया प्रचार ,
सागर की उठती लहरों से, दिखा है पहली बार ,
कुरान की पावन आयतों से ,बाँट रहा है प्यार ,
गीता के उपदेशों  से, मिला सभी को सच्चा प्यार।
आज हिन्दी ने ऐसा कमाल किता है ,
सारे जगत में खूब धमाल किया है ॥

 

19  माला की डोरी

हिन्द दिया और हिन्दी बाती ,
हैं बने तेल सब भारत वासी ।
जलकर जग में ज्योति फैलाती,
फैली अज्ञानता को दूर भगाती ।
भ्रम और शंका को तुरंत मिटाती ,
सत्य की सबको पहचान कराती ।
क्षेत्रवाद की फैली दीवार गिराती ,
ऊंच-नीच गहरी खाई को पाटती ।
हिन्दू मुस्लिम को साथ जोड़ती ,
सिक्ख क्रिश्चियन को साथ मिलाती ।
जाति धर्म के झगड़े मिटाती ,
बैर भुला सबको पास बुलाती ।
कन्नड ,मलयालम या पंजाबी ,
उड़िया असमी या फिर गुजराती ।
बंगला ,तेलगु या शुद्ध मराठी ,
तमिल , कोंकणी या कश्मीरी ।
जीवन जीने की कला सिखाती ,
मिलकर रहना हमें सिखलाती ।
बनकर माला की एक पावन डोरी ,
एक प्रेम सूत्र में सबको बांधती ।
अब भारत का संगठन जरूरी , 
विनय पूर्वक कहती यह हिन्दी ॥

      20         प्रभु आशीष

हे ईश आशीष दियो तुम मोहि ,निज चाहत को परिपूर्ण करूँ ।
जन्म मिलै तो वाहिए खंड में ,जहां हिन्दी का गौरुव गान झलै ।
जब मेरो मन में कुछ सोच उठें ,तो देश की सेवा भाव जगै ।
जब मेरो कर्मनि में गति हो ,तो देश को उन्नति भाल मिलै।

मेरो शरीर का कण कण सब ,निज देश के ऊपर बलि बलि जाए ।
मेरो जन्म अकारथ जायों नहीं ,हे ईश हमें तुम शक्ति दियो।
जो मेरो वाणी में गति हो , तो बस देश की सेवा गीत गुनै ,
जब मेरो मुख से कुछ शब्द निकलें,  देश का मंगल गान झलै।

जो कवि हों तो कवित्त लिखूँ ,हर पंक्ति में देश की कीर्त को ।
मैं जन जन से आवाहन करूँ ,अब लालच से सब दूर हटो ।
शिक्षक हूँ तो देऊ मैं शिक्षा ,सत ज्ञान और सत कर्मो की ।
मेरो ज्ञान में बृद्धि करो प्रभु, बालक के चरित्र का निर्माण करूँ ।

सैनिक हूँ तो करूँ मैं देश की रक्षा, दुश्मन के हर अस्त्रों से ।
देश की सीमा मजबूत करूँ ,दिन रात देश की सेवा कर । 
देश का भाल उठाऊ सदा मैं, भविष्य देश का बदल सकूँ।
अन्वेषक होऊ तो आविष्कार करूँ ,नित नव नूतन अस्त्रों की ।
 
कृषक बनूँ तो मैं खेती करूँ, धन धान्य से देश का भंडार भरूँ ।
देश को सदा खुशहाल करूँ , और जन जन में खुशियाँ बाँट सकूँ ।
हे प्रभु छोटा सा परमार्थ करूँ ,मैं भूख गरीबी मिटाऊँ सदा ।
हे ईश आशीष दियो तुम मोहि ,निज चाहत को परिपूर्ण करूँ ।
      21     हिन्दी का स्थान
हिन्द देश में हिन्दी का स्थान है सबसे ऊंचा ,
आज देश में बच्चा बच्चा करता इसकी पूजा ।
सभी दिशा में प्यार बाँटकर कर दी इच्छा पूरी ,
आपस में सब आज मिले हैं कोई नहीं मजबूरी ।
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण कोई जगह न छूटी ,
मंदिर मस्जिद गिरजा है कोई जगह न छूटी ।
नफरत की दीवार तोड़कर कर दी इच्छा पूरी
ईद ,दिवाली साथ मनाकर हटा दिया मजबूरी । 
सब लोंगों को साथ जोड़ दिया बन माला की डोरी,
घूस खोरी की बाजार रुक गई भूल गए सब चोरी ।
बंगला,उड़िया तेलगु से मिलकर खत्म किया सब दूरी,
आपस के सब बैर मिटाकर सबने किया प्रतिज्ञा पूरी ।
ज्ञान दीप की ज्योति जलाकर धरती से अंधकार मिटाया ,
सहज सरल संभव से मिलकर हर भाषा को गले लगाया ।
जन जन को सम्मान दिलाकर सबको अपना दोस्त बनाया ,
क्या बंगला, तमिल को देखो सबने मिलकर रंग जमाया ।
अब भूल गए सब अपना स्वार्थ मिलकर बढ़े हजारों हाथ ,
हुआ स्वप्न बाबा का यथार्थ हिन्दी हो चली सबके साथ ।
शिक्षा देकर किया परमार्थ रूढ़िवादिता अब हुई अनाथ ,
भारत का सौभाग्य जग गया देश हो गया अब एक साथ।
हिन्द देश में हिन्दी का स्थान है सबसे ऊंचा ,
आज देश में बच्चा बच्चा करता इसकी पूजा

 

    22       हिन्दी विवाद

काहे हिन्दी पर इतना विवाद किए हो ,
यही हिन्दी तो सबको आबाद किए है ।
जोड़ती है दिलों को करके नफरत को दूर ,
देती ममता का पाठ लाकर समता भरपूर ।
हिन्दू मुस्लिम के झगड़ों को दूर किए है ,
सबको आपस में मिलाकर ,क्या कसूर किए हैं
आतंकवाद से लड़ने में दे रही सहयोग ,
सैनिकों के बीच आज बना रही सुयोग ।
देश के दुश्मनों को आज दूर किए है ,
बैरी को मिटाकर क्या कसूर किए है ।     
मजदूर और किसान से करती सच्चा प्यार ,
नेता और मंत्री सब इसपर होते जा निशार ।
राजा और रंक सब को एक समान किए हैं ,
शासक को चुनने अधिकार,क्या कसूर किए है ।
गूढ़ कठिन शब्दों को रखती सदा अपने से दूर ,
भाषा की तंग दीवार करती पल में समाज से दूर।
उत्तर दक्षिण के झगड़ों को बहुत दूर किए है ,
सबको आपस में मिलाकर ,क्या कसूर किए हैं    
गाँव गली शहर में सब बोलते हैं हिन्दी ,
एकता के दरवाजे आज खोलती है हिन्दी ।
व्यापार की उलझन को आज दूर किए है ,
मजदूर और किसान सबको आज एक किए है,  
सबको आपस में मिलाकर ,क्या कसूर किए हैं ॥    

23   सौभाग्य हिन्दी का लौटा दो ।

दुर्भाग्य आज हिन्दी का देखो ,है ठोकर दर दर की खाती ।
घाव हजारों तन पर देखो ,मन मलीन लेकर कुछ कहती ।
अन्तर्मन की आँख से देखो ,आज तुम्हारी किस्मत रूठी ।
सात दसक के मध्य तुम देखो ,जब सत्ता हमसे रूठी थी ।
अंग्रेज़ो के शासन को देखो , जब अंधकार भरा जीवन था ।
व्यापारी की दृष्टि से देखो ,हर पल मेरी सेवा को लेता ।
मनोरन्जन की दृष्टि से देखो, सब मेरी ही सेवा अपनाते ।
देश के हर कोने में देखो ,सब हैं अपनी बात पहुंचाते ।
ग्राहक की मजबूरी को देखो , है मुझसे सा काम चलाता ।
नेता मंत्री को संसद में देखो ,है मुझपर अपना प्यार जताता ।
नेता प्रति पक्ष को गाँव में देखो ,कैसे मंत्री पर चिल्लाता ।
भ्रष्टाचार की जड़ में देखो , है हर जगह कमीशन चलता ।
दुश्मन  के मकसद को देखो , सबके मन में उलटा भरता ।
कुटिल चपल गद्दार को देखो , मेरे पीछे चुगली करता ।
गोल मेज संवाद को देखो ,जो गांधी को विचलित करता ।
अंबेडकर जी के त्याग को देखो,जो गरीब के दिल को छूता ।
भीड़ भरी सड़कों पर देखो ,जहां सबकी मदद मैं करती ।
अब मिलकर सब उस दुष्ट को रोको जो नफरत है करता ।
हिन्दी का सौभाग्य लौटा दो ,आज सभी फिर उसे अपना लो ॥

 

 


    24 हिन्दी और बिंदी

बिंदी जब हिन्दी से मिले ,देश सुशोभित होए ।
लोगों को पावन करे, जब प्यारी हिन्दी होए ॥
फूलों से महकी बाग ,खुशियां चहुं दिश होए । 
डालों पर पक्षी चहके, भय काहू न होए ॥  
चन्दा चमके तिमिर में , जब पूनम की होए ।
ज्ञान की शोभा  निखरे , जब हिन्दी उत्तम होए ॥
नदी सुशोभित नीर से निरझर बहती होए ।
प्यासे को पानी मिले , तन मन शीतल होए ॥
सब लोग मिले स्नेह से, जब हिन्दी समृद्धि होए ।
जड़ता मिटे समाज से , जब सब साक्षर होए ॥
जीत लिया सबका हृदय, जब बोली मुख खोल ।
मीठा रस बहने लगा,हिन्दी हुई अनमोल ॥ 
सूर्य किरण जैसे पड़ी ,आया सब में जोश ।
चिड़ियाँ कलरव कर रहीं , खोकर अपना होश ॥
कलियाँ खिल अब बाग में ,रख कर नाना वेश ।
बोल उठीं मिल प्रेम में ,मिला नया परिवेश ॥
अपनी मंजिल पर बढ़ें , पीछे विपदा छोड़ ।
खुशियाँ अब सबको मिलीं ,सारी बाधा तोड़ ॥
अमर धरा को कर चले , लिख सबको संदेश ।
सबकी भाषा एक बने, संविधान किया पास ॥
बिंदी जब हिन्दी से मिले ,देश सुशोभित होए ।
लोगों को पावन करे, जब प्यारी हिन्दी होए ॥

 

        25   सागर
सागर निरखि अपना आकार ,
कलुषित मन में सोचा बार–बार ।
मैं अपनी तरंगों का करूँ विस्तार ,
धूर्त मानव को दिखा दूँ एक बार ।
अपनी शक्ति और महानता का प्रहार ,
ललकारा जानकर मानव को कमजोर ।
खड़ा था तट पर पकड़ किश्ती की डोर ,
उसने अपनी लहरें बढ़ायीं यह ठान कर ।
छीन लूँ किश्ती हाथ से मर कर ठोकर ,
नष्ट कर दूँ मिटा दूँ आगोस में लेकर ।
लगा दिया अपना पूरे तन का ज़ोर ,
झकझोर कर रख दिया चहूँ ओर ।
फिर समझाया अपने पास बुलाकर,
इधर उधर की बात बताकर ।  
कुटिल ,कपटी की बात समझकर ,
बाबा ने शांत किया, औकात बताकर ।
तैरा दिया बोट सागर के सीने पर ,
पार किया क्षण में संविधान की साहिल लेकर ॥
बौना किया सागर का अंहकार ,
समता का अधिकार सबको दिलाकर ।
मिला सबको स्वतन्त्रता का अधिकार ,
शोषण के सारे औज़ार हो गए बेकार ।
जब शासन सत्ता में सब हुए भागीदार ,
सभी के उत्थान का अब खुल गया द्वार ॥

     26      ट्राफिक लाइट
रूप रंग मेरा सुघर सलोना ,
है मेरी सूरत भोली भाली ।
अजेय दिवाकर जैसे ही जाता ,
मैं घर –घर में आ जाती ।
रजनीकर के स्वागत में मैं ,
हरदम पलक बिछाए रहती ।
उसकी सेवा में रत रह मैं ,
आगे पीछे छाया सी लग जाती ।
करूँ मदद मै हर राही की ,
हर दुर्घटना से उन्हें बचाती ।
जल जल कर मैं जीवन देती,
सब को मैं कुछ सिखलाती । 
भीड़ भाड़ वाली सड़कों पर ,
दिन में भी मैं सेवा करती ।
जो भी मेरा करे निरादर ,
उसको अच्छा मजा चखाती ।
ट्राफिक पुलिस को तुरंत बुलाकर ,
उसको आर्थिक दंड लगवाती ।
चोर उच्चके चलते बचकर ,
सदा बनाते मुझसे एक दूरी ।
सज्जन लोगों की इच्छा पर ,
मैं हर क्षण जग की सेवा करती ।
मेरा नाम सबकी जुबान पर ,
जल रही दिन रात चौराहे की बत्ती ॥ 

       27  सुभाष चन्द्र बोस
सुभाष की वाणी ओज ,भरा सभी में जोश ।
फिरंगी का टूटा होश, सुभाष का पता चला ॥
अपनी सत्ता के अंहकार में फिरंगी थे मदहोश ।
आई सी यस परीक्षा पास कर बोस ने किया खामोश ।
सरकारी नौकरी को छोडकर, दिखा दिया आक्रोश ।
हरी पुरा अधिवेशन में पास हुआ विधिवत आदेश ।
चुने गए अध्यक्ष कांग्रेस के नेता सुभास चन्द्र बोस ।
गांधी जी के आत्म सम्मान को लगा गहरा ठेस ।
धुन्ध से खुली छ्टा, अम्बर में हवा चली।
नई सुबह जब पौ फटी, तो सुभाष का पता चला ॥
सुभाष चन्द्र जी ने छोड़ दिया अति शीघ्र कॉंग्रेस ।
फॉरवर्ड ब्लाक का गठन सबको दिया एक संदेश ।
घर के अंदर नजर बंद हुए नेता सुभाष चन्द्र बोस । 
अंग्रेज़ के आँख में धूल झोंक कर नेताजी पहुंचे रूस ।
घर में था शोक गहरा , चारों तरफ पहरा ।
जब नजर बंद से निकल गये, सुभाष का पता चला ॥
उनके ओजमयी व्यकतब्यों से जागा अब सारा देश ।
सुभाष चन्द्र बोस की वाणी में था बिजली सा आवेश ।
घूम-घूम कार सकल देश में भरते थे लोगों में जोश । 
हिटलर से हाथ मिलाकर जापान से लिया आशीष ।
सिंगापुर में संगठन बनाया लोगों ने किया महसूस ।
आजादी के बदले खून मांग कर सबको दिया संदेश ।


कभी कटक की सभा में, कभी दिखे अटक में ।
सिंगापुर में सैन्य गठन , तो सुभाष का पता चला ॥  
अंडमान में ध्वज फहराया ले गांधी जी से आशीष ।
जब अन्तरिम सरकार बनाया सहमति दिये नौ देश ।
भारत वर्ष की तकदीर बनाया पकड़ ब्रिटिश जासूस ।
सात मई पैंतालीस को जब युद्ध में हारा जर्मन देश ।
सुभाष चन्द्र बोस हैं युद्ध बंदी ब्रिटिश ने दिया आदेश ।
ताइवान के रास्ते अंडमान से निकले सुभाष चन्द्र बोस ।

सेना के नायक बने, देश के रक्षक बने ।
नीति के निर्धारक बने, सुभाष का पता चला ॥

 

 

          28  दीपावली
दीप के इस मंगल पर्व में प्रार्थना है प्रभु से ,
पवन धरा की समस्त कलियाँ जग में खिले।
माँ लक्ष्मी और विष्णु की अनुपम कृपा से ।
विश्व की सम्पूर्ण खुशियाँ हर मानव को मिले ।
भगवान भास्कर की परम दिव्य ज्योति से ।
आज दुनिया मेँ सबका अक्षुण सौभाग्य खुले ।
गहन तिमिर का हटे अंधेरा इसी दीप पर्व से ।
हर गली मेँ ज्ञान की निरंतर ज्योति जले ।
भव,भय, बाधा, सब हटे हर किसी राह से ।
आज मेरा देश उन्नति की बुलंदी को छूले ।
किसी का पग न डिगे विकास की राह से ।
हर किसी को शीघ्र ही अपनी मंजिल मिले ।
कटुता से दूर ,सदा प्यार करें मानवता से ।
मानव के हृदय से नफरत का बीज मिटे ।
सभी लोग गले मिले आपस मेँ खुशी से ।
समाज मेँ समानता का अधिकार सबको मिले ।
छल कपट राग और इर्ष्या निकले मन से ।
सुंदर भविष्य के मंगल दीप घर-घर मेँ जले ।
प्यार के गीत गूँजे हर गली और मुहल्ले से ।
बेकारी और निराशा से सबको राहत मिले ।
आत्म बल के सहारे लड़ सकें तूफान से ।
सब जीते क्षण मेँ जीवन की सारी मुश्किले । 
मंजिल के कठिन दौर मेँ दूर रहें सब हिंसा से ।
सभी को संसार के सारे सुखों का सागर मिले ।

           29  बूंद की कहानी
सागर से निकल बूंद बादल बनी ,
खो गई घमंड में और दहाड़ने लगी ।
सीमाओं को पल में लांघ चली ,
भूल गई गरिमा और कष्ट देने लगी ।
अपना मोहनी रूप दिखलाने लगी । 
वारिद से बूंद फिर पानी बनी ,
समय चक्र में फिर से धारा बनी ।
बहने धरा पर कुछ ऐसे लगी ,
जैसे खुशियों की दरिया मचल सी गयी ।
ग्रीष्म से व्यथित पशु पक्षी को ,
बूंद-बूंद पानी के लिए तरसाने लगी ।
संसार के सभी व्याकुल जीव जहां को ,
दिन में भी तारे दिखलाने लगी ।
अम्बर में आकर कृषक बृंद को ,पल पल में सबको सताने लगी ।
अपनी भूल का एहसास हुआ उसको ,
पश्याताप के आंशू बहाने लगी ।
हर जगह गुणगान हुई उस बूंद की ,
जिसने अपने जीवन में समता देखी ।
गरिमा जहाँ में हर ओर हुई उसकी ,
रूप लावण्य सुंदर समा उसने देखी ।
जो अचानक सीप के मुख में गिरी ,
और पल में एक सुंदर मोती बनी । सौभाग्य मिला जीवन में उसको,
सफलता और सुंदरता जीवन में मिली ।
वह क्षण में हार बनी गले की ,विहार करते जहाँ में सबने उसको देखी ॥


          30     नर्मदा
शैल पुत्री शक्ति रूपा ,प्रकटी जब विंध्य में ।
धरती पर हलचल हुआ, कंपन हुआ गगन में ।
नयीं कोपलें खिल उठीं, धरती के हर अंचल में ।
जीवन की आशा जगी, उस प्यार भरे माहौल में । 
अमृत की धारा बही ,धन धान्य भरा जगत में ।
हर लिया पीड़ा सभी की, व्याप्त था जो विंध्य में।
जंगल में मंगल हुआ, पशु पक्षी विचरें आनंद में ।
नदियां बढ़ आगे चलीं, घनघोर जंगलों के आगोश में।
बस प्यार से बहने लगी, सुख ,समृद्धि लेकर हृदय में ।
सदभाव सबको बांटती चली, स्नेह नीर लेकर नैन में ।
जो प्यास से व्याकुल कभी, सब झूम उठे आनंद में ।
अपने कर्म पथ पर बढ़ती, आ गई प्यारे गुजरात में ।
चल –अचल का सौभाग्य बनी, खुशियाँ बरशी देश में ।
सरदार सरोवर बांध बना, नहरें पहुंची अब हर गाँव में ।
धरा से सब संकट मिटा, प्रसन्नता हुई हर आँगन में ।
नर्मदा का सबको वरदान मिला, लहरी फसल वीरान में ।
देश से गरीबी मिटी, सौभाग्य जागा सबके जीवन में ।   
बिजली का उत्पादन हुआ, विकास पहुँच गया हर गाँव में ।
अंधकार का नाश हुआ, ज्ञान का प्रकाश फैला सारे देश में ।
नर्मदा का आशीर्वाद सबको मिला, आज अपने देश में । 
 

 


           31 समुद्र पत्तन मर्मागोवा
भारत के पश्चिम सीमा पर, बना हुआ पत्तन विशाल ।
बढ़ रहा निरंतर प्रगति पर, करता मन से इस्तकबाल ।
दुनिया के सारे देशों से, हर रोज यहाँ आता है माल ।
लेन देन के व्यापार से, फल फूल रहा है वतन विशाल ।
इतनी सुंदर प्रकृति मनोहर, प्रभु ने इसको है रचा संभाल ।
सागर की लहरों से सिंचित,काजू नारियल के कुंज विशाल ।
विश्व की सबसे प्रसिद्ध वारुणी,इसका किसी से नहीं मिशाल ।
व्यापार बढ़ाती दुनिया से, कर देती है सबको माला माल ।
हर रोज यहाँ शैलानी आकर ,कर जाते सबको खुशहाल ।    
भारत का ओसनोग्राफ प्रसिद्ध,शत्रु के लिए है सचमुच काल ।
भारत के सभी पत्तनों में, सर्वाधिक श्रेष्ठ और सबसे विशाल ।
दुनिया के समुद्री पोतों पर, होती हर क्षण गहन देख भाल ।
हम इन पोतों की रक्षा पर, अपनी नौसेना की नहीं मिशाल ।
पोतों की समय सारिणी से, लद जाता है उन पर सारा माल ।
आर्थिक उन्नति का द्वार यही, सबको रखता है खुशहाल ।
  
   

 

 

 

 

    32         दोषी कौन ?
सड़क पर बह रहा निर्दोषों का खून ,
इसमें समाज का कितना है कसूर ?
शरीर से जैसे निकलता मरा नाखून,
उसमें इंसान का वास्तव में क्या कसूर ? 
तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा जरूर ,
कल हमारे पड़ोसी के नैनों का तारा ,
फिर रहा था सड़क पर मारा-मारा ।
उस समय किसी ने न दिया उसे सहारा,
देखते ही देखते वह हो गया आवारा ।
जमा कर लिया बंदूकों का बड़ा खजाना ,
दुश्वार कर दिया लोगों का सड़क पर जाना।
देश और सरकार पर जब लगा निशाना ,
लोगों ने उसे आतंकी कह कर पहचाना ।
नेताओं को देखो ये कहते हैं हम हैं दुखी ,
लोगों को नहीं पता इन नेताओं की बेरुखी ।
समाज में चारों तरफ फैली चुकी है बेबसी ,
देश का हर नौजवान की किस्मत है फूटी ।
इन नेताओं ने घड़ियालू आंशू बहकर लूटी,
चुनाव घोंसणा पत्र में करते सारी बातें झूठी ।  
सच सामने आने पर वे करते नजरें नीची । 
क्या उन नौजवानों को नई दिशा दे पातीं ?
दोस्तों ये नेता ही हर समस्या को जन्म देते ,
हर ज्वलंत समस्या को बातों में टाल देते ।
हर बहते हुए फोड़ों को ये नाशूर बना देते ,
घटना स्थल पर पहुँचकर शांत्वना भी देते ।
समस्या के निदान को अंधेरे में छोड़ देते ,
इसे अपने भविष्य का आधार बना लेते । 
हर मृतक परिवार को आर्थिक मदद भी देते ,
क्या मृतक के शरीर में ये प्राण भी देते ?
केले के बीज का अन्वेषन करने का परिवेश ,
फिर नाना प्रकार से खोजते उसके अवशेष ।
होकर भ्रमित नेतागण देते हैं अपना आदेश,
नष्ट कर दो समाज से सभी केलों का परिवेश।
तरुओं का ढेर लगा ज्यों मिला नेता का आदेश ,  
समाज में सभी जगह व्याप्त हुआ गहरा असंतोष ।
समस्या को नहीं बल्कि उसकी जड़ का किया नाश ,
साथियों अब बताओ इसमें किसका है सारा दोष ॥ 

 

        33          लालच
लालच के वशीभूत मानव क्या क्या जग में करता है ।
मंदिर में जा पत्थर को पूजें प्रभु से वादे फिर करता है ।
मस्जिद में फिर सिजदा कर के झूठी कसमें खाता है ।
गुरु द्वारे में मत्था टेके और रब को अपना कहता है ।
गिरिजाघर में शीश झुकाकर ईश को प्रेम दिखाता है ।
सच्चा सेवक प्रभु का कहकर प्रेम की बातें करता है ।
लालच के वशीभूत मानव जग में क्या क्या करता है ।
दान पुण्य मंदिर में करके मानव धर्मवान कहलाता है ।
छल और कपट से कभी न रुकता प्रभु से जरा न डरता है ।
गिरिजाघर में भोला बनता मानव से धोखा करता है ।
गुरुवाणी का पाठ नित करता निशि दिन गलती करता है ।
लड़ता नित भाई भाई से अपने ही लहू का प्यासा है ।
लालच के वशीभूत मानव क्या क्या जग में करता है ।
हिंसा की परवाह न करता क्षण में जीवन हरता है ।
दया भाव का मूल्य न जाने घृणा के बीज को बोता है ।
पल में रखकर नींव द्वेष की नफरत की खाई खोदता है ।
भूल के सारे रिश्ते नाते जहर समाज में घोलता है ।
दुखियों की सुख शांति बेंचकर अपनी कोठी भरता है ।
लालच के वशीभूत मानव क्या क्या जग में करता है ।
फल सब्जी में जहर मिलाकर नकली दवा बनाता है ।
बेईमानी की हद को तोड़कर कफन की चोरी करता है ।
धरती माँ से गद्दारी कर दुश्मन से रिश्वत खाता है ।
मानवता की बलि वेदी पर ममता ने दम तोड़ा है ।
निर्मम हत्या पशु पक्षी की कुदरत ने मुख मोड़ा है ।
लालच के वशीभूत मानव क्या क्या जग में करता है ।
                34  नदी का घमंड
 
सरिते ! तू कल जिस घमंड पर, इतना इतरा कर कह रही थी ।
अपनी पूरे वेग से निकल कर, किनारों पर प्रहार कर रही थी ।   
सामने आने वाले हर किसी पर, अपना रौद्र रूप दिखा रही थी ।
चारों तरफ हाहाकार मचाकर ,घरों को जड़ से उजाड़ रही थी ।
अज्ञानता के बीज को बोकर लोगों को आपस में लड़ा रहीं थी ।
हर क्षण नफरत घोल घरों में लोगों की मुस्कान छीन रही थी ।  
सरिते ! अब तू उन सबको जा भूल, सावन पीछे छूट गया ।
हुआ तेरी शक्तियों का अकाल, तेरा गौरव तुझसे रूठ गया ।
शक्ति में तेरे साथ रहने वाला भी आज तुझसे जुदा हो गया ।
पड़ोसी भी तेरे से कुछ कम नहीं कमजोरी तेरी समझ गया ।
तेरे रास्ते में अवरोध खड़ा कर तुझे कितना मजबूर कर गया । 
तेरे फटकार का बदला लिया तेरी धारा पर विराम लग गया ।
सरिते ! अब तेरे रास्ते को बंद कर तुझे मजबूर कर दिया ।
तंग गली से निकाल टर्बाइन चलाने को मजबूर कर दिया ।
उर्वरा विहीन तेरे अंचल में फिर फसलों से हरा कर दिया ।
आज तेरा पड़ोसी तेरे किनारों को फिर से आबाद कर दिया।
तेरी शक्ति का उपयोग कर आज उसे खुशियों से भर दिया ।
सरिते !तेरी गति परिवर्तन ने आज किया है जग में कमाल ।   
चारों तरफ फैला प्रकाश लोगों के जीवन से अब हटा अकाल ।
आज तेरे पश्याताप ने संसार में किया करोड़ों को मालामाल ।
तेरे घमंड का आज हुआ सत्यानाश कल जो हो गए थे बेहाल ।
आज तेरी शक्ति का हुआ चमत्कार सभी लोग हुए खुशहाल । 

 

            35   अंधेरे पर चाँद की  विजय
एक अकेले चाँद चाँदनी , दुनियाँ को प्रकाशित करती ।
बाल रूप में दूज को आती, दर्शन देकर फिर छुप जाती ।
अंधकार आडंबर करता , सबको अपना खौफ दिखलाता।
चोर उच्चक्कों को आमंत्रित करता सज्जन को डरवाता ।
एक अकेली चंदा रानी दुनियाँ से डटकर लड़ जाती ।
अंबर में अठखेली करती और नवयौवन को पा जाती ।
जीत की आशा मन में लेकर अंधकार को मार भगाती । 
दुश्मन को हर क्षण घायल कर मैदान फतह कर जाती ।
ज्ञान प्रकाश को पाकर जग में अज्ञानता है मिट जाती ।
धरती पर छा जाती खुशहाली जैसे ही पूर्णमा आती ।
अंधकार छुप जाता कुंज में जहाँ चंदा पहुँच न पाती ।
नाना रूप को धर समाज में कहीं गली में छुप जाता ।
अंबर में छाया बादल को देख वह फिर बाहर है आता । 
लाख बुराई फैली हो जग में फिर भी टिक नहीं पाती ।
आतंक और भ्रष्टाचार से लड़ना हमको सदा है बतलाती ।
राहू केतू की बुरी आत्मा चंदा पर जब है छा जाती ।
ज्ञानी भी अपनी सुध बुध खोकर असमंजस्य दिखलाती ।
एक अकेली चंदा रानी हमको सदा है यह सिखलाती ।
         

 


      36   स्वागत गीत

पाइके अधीक्षक को मन हरशायों है
स्वागत करत मन अनत सुख पायो है,
ज्ञान का प्रकाश चहुं ओर फैलायो है
आपसी बैर भाव सब लोग बिसरायों है
करुणा की थाल सब लोग भरिलायो है
हृदय में हिलोर तरंग जस आयो है ,
सुमधुर गीत सब बाल गण गायों है
स्वाति की बूंद ज्यों पपीहा मन भायो है
निज भूल सारे दुख अब प्रीत बरसायों है  
मन में उमंग भरी पास चले आयो है
शांति का प्रतीक श्वेत ध्वज फहरायों है
निर्जन मरुस्थल में प्रेम बीज बोयों है
भाईचारा का संदेश जग में पहुंचायों है
गाँव गली शहर से नफरत मिटायों है
कष्ट मिटाई मन में धीरज बंधायो है
ज्ञान के उपदेश से मन आश दिलायो है
कटुता समाज की क्षण मात्र में मिटायों है
उन्नति के शीर्ष पर विद्यालय पहुंचायो है
स्वागत गीत लिख राम आश्रय पहुंचायो है
गाई गीत बालगण सभी परम सुख पायो है  
      37     खुशियों के बीज

मैंने बोए थे बचपन में खुशियों के बीज ।
अपने पावन मन मंदिर के आँगन में ।
तूफानों से उसे बचाया रख हृदय के बीच ।
अपने जीवन में हमने बसाया मन में ।
बड़ा किया हमने उस को प्रेम नीर से सींच ।
झूठी शान को दूर भगाया हमने जीवन से ।
खुशियों को खूब संवारा रह अपनों के बीच ।
आज सभी ने हमें उबारा कठिन मुसीबत से । 
नाना कष्ट सहे सब हमने अपनी मुट्ठी भींच ।
कभी घबराया नहीं मैं जीवन में संघर्षों से  ।
जो आयीं विपत्तियाँ मेरे जीवन पथ के बीच ।
सब हँसकर सह डाला मैंने अपने जीवन में । 
आकार मिल गया सपने को, मंजिल के बीच ।
बीज अंकुरित होकर फैला आज वृक्ष रूप में ।
आ गई सुखद बसंत ऋतु मेरे आँगन के बीच ।
कुछ फूल खिल गए आज मेरे भी जीवन में ।
महक उठा उपवन मेरा हो कलियों के बीच । 
भवरों ने गुलजार किया मन भावन छटा में ।
चहक उठीं चिड़ियाँ सारी मेरे गुलशन के बीच ।
सँवर गया जीवन मेरा इस पावन धरा में ।
पक्षियों ने बनाया उसमें अपना प्यारा नीड़ ।
कुछ समय के बाद मेहमान आए घोंसले में ।
आज मेरे सपनों को मिली जगत में जमीन ।
मैंने बोए थे बचपन में खुशियों के बीज ।
      38    मैंने उन्हें देखा,
मैंने उन्हें देखा, मंजिल पर आगे बढ़ते ,

खुली आँखों से स्वप्न देखते उजाले में ।
मतभेद मिटा जीवन पथ पर आगे बढ़ते,
छोटे –छोटे डग भरते अपने मंजिल में ।
जीवन के पथ पर हर क्षण आगे बढ़ते ,
गिर-गिर कर भी चलने की कोशिश में ।
अगले पल फिर और संभल कर पग रखते,
बाधाओं को पीछे छोड़ आगे बढ़ते राह में । 
मैंने उन्हें देखा, मंजिल पर आगे बढ़ते
मन की वेदना को व्यक्त करते शब्दों में ।
मुख बिना खोले मन की सारी बात कहते,
वे हँसते हँसते करते असंभव कार्य जीवन में ।
लक्ष्य को साध स्वयम मंजिल पर चलते,
अपनी बात को कहते टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं में ।
सहज प्रवृति से कलम पकड़ रंगों को भरते,
सुख दुख का वर्णन करते अपनी भाषा में ॥
मैंने उन्हें देखा, मंजिल पर आगे बढ़ते ,
अपने नन्हें –नन्हें हाथों से व्यस्त कुछ करने में ।
नाना रंगों से भर कर जीवन को सार्थक करते,
कल्पना के रंग भरते चिनतंशील विचारों में ।
फूलों से हंसी चुराकर सबकी झोली में भरते
बोल उठते चित्र पक्षी उड़ान भरते आकाश में ।
कभी-कभी हम बढ़े भी सोच कर यह दंग रहते,
हम सदा प्रणाम करते उनकी निराली सोच में । 
, मैंने उन्हें देखा, मंजिल पर आगे बढ़ते ॥

 

         39         रक्षा बंधन

भाई बहन का अमर प्यार, दिखलाता है रक्षा बंधन , 
एक धागे जोड़ से जगत को, खुशियाँ देता जीवन में ।
सावन की पूनम को आता नया प्यार ले रक्षा बंधन ,
पेड़ों से सजती धरती , भरती उमंग है कण कण में ।
बचपन के बीते लमहों की है याद कराता रक्षा बंधन ,
दिव्य ज्योति बन फैल रहा, अँधियारा हरता जीवन में । 
शिकवे मिटते क्षण में जब बहना बांधे राखी के बंधन , 
प्रेम नीर बरसाता बादल सब कटुता हर लेता जीवन में ।
भाई- बहन के रिश्तों में संवृद्धि लाता है रक्षा बंधन ,
कष्ट भरे दिन पल में कटते दूरी मिटती रिश्तों में ।  
मन की पीड़ा बहन बांटती भैया को बांध रक्षा बंधन ,
सौभाग्य लाता बाँट सुख अपनों को मिलाता आपस में ।

 

 

 

 

 


         
            40   पवन
   कण कण में तू व्याप्त है, जड़ चेतन में आज ।
   वायु बिना सब शून्य है, मानव और समाज ॥ 
बिन तेरे सूरज की किरणें, रहती जग में बिन आभा के ।
धरती पर फिर जीव न होते, रहती धरती बिन जीवन के ।      
चंदा आज रहती बिन दमके, धरती रहती फिर बिन चमके ।
उपवन फिर गुलजार न होते, बगिया रहती बिन मधुकर के । 
अमर प्यार होता फिर कैसे, जीवन लीला चलती कैसे।
तेरे बिन सब सपने अधूरे , जीवन आश न होते पूरे ।
तेरी महिमा को जो समझे , अमर धरा पर जीवन होवे ।     
         सृजन अधूरा जगत का, बिन तेरे व्याहार ।
          तेरे सकल श्रंगार का, मिलता नहीं आधार ॥ 
बिन आकार सकल जग घूमें, तन मन वाणी सब को छूले ।
जड़ चेतन सब एक रस डोले, जीव जन्तु सब प्रेम में बोले । 
फूल, कली, डाली सब झूलें, सब मिल साथ सृजन को छूलें ।
भेद मिटा सब आपस में झूमें, रख कर हाथ गले में झूमें ।
गिरिवर की चोटी को चूमें , सागर की लहरों पर घूमें  ।
हाथ बढ़ाकर ममता रख बोले, युगों की प्रीत परस्पर डोले ।
अब आज सृजन सर्वत्र बिराजे, जल थल नभ में जीवन साजे । 
     बढ़ी प्रीत जब सूर्य से, मन में हुआ उल्लास ।
     क्लेश मिटाया जगत से, दे अपना आशीष ।
सूरज से कभी प्रीत बढ़ाये , सागर धन पर हाथ बढ़ाये ।
बेसुध सागर समझ न पाये, मेघ से मिलकर वर्षा लाये ।
सम्मुख तेरे टिक नहीं पाये, पर्वत आकर शीश झुकाये ।
मोती जग में खूब लुटाये, जग जीवन की प्यास बुझाये ।
तीनों लोक में धाक जमाये, कभी किसी को नजर न आए ।
घटे घमंड फिर गिरिवर रोये, सुखी नदियां जीवन पाये ।
ब्रह्मा विष्णु महेश जी गायें, तेरे बिना कोई जी न पाये ।
    
     अम्बर धरती जलचर तू, करती जीवन पार । 
     सकल विश्व में श्रेष्ठ तू , सबकी है आधार ।

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  1. बेनामी8:27 pm

    कविताएं दिल को छु गईं। ऐसी कविताएं उत्कृष्ट सोंच का कोई व्यक्ति ही लिख सकता है। कविताओं के लिए मेरी ओर से बहुत सारी बधाइयाँ।

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