रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

October 2013
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

राजेन्द्र यादवः खट्टी और मीठी यादें

          प्रोफेसर महावीर सरन जैन

कल राजेन्द्र यादव के निधन का दुखद समाचार मिला और राजेन्द्र यादव के साथ जुड़ी घटनाओं की याद आती रही। राजेन्द्र यादव से मेरी पहली मुलाकात केरल के एर्नाकुलम में दिसम्बर, 1965 में हुई थी। उन दिनों केरल विश्वविद्यालय का हिन्दी विभाग त्रिवेन्द्रम (तिरुवनन्तपुरम) में न होकर एर्नाकुलम में स्थित था जिसके अध्यक्ष प्रोफेसर चन्द्रहासन थे। उन्होंने केरल विश्वविद्यालय के तत्वावधान में विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्राध्यपकों की संगोष्ठी आयोजित की थी। केरल विश्वविद्यालय की ओर से भारत के विश्वविद्यालयों को पत्र भेजकर यह अनुरोध किया गया था कि वे अपने विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक प्राध्यापक को संगोष्ठी के लिए प्रतिनियुक्त करें। प्रतिनियुक्त प्राध्यापक से यह अपेक्षा की गई थी कि वे संगोष्ठी में किसी विषय पर शोध निबंध का वाचन करें। मैंने इस संगोष्ठी में जबलपुर के विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया और “भारतवर्ष में अन्य भाषा शिक्षण की समस्याएँ” शीर्षक शोध निबंध का वाचन किया। इसे केरल की सचित्र हिन्दी पत्रिका “युग प्रभात” ने प्रकाशित किया (वर्ष 10, अंक 10, मार्च, 1966, पृष्ठ 15 – 18)। इस संगोष्ठी में प्रोफेसर चन्द्रहासन ने हिन्दी एवं मलयालम के कुछ रचनाकारों को भी आमंत्रित किया था। हिन्दी के जो रचनाकार इस संगोष्ठी में सम्मलित हुए, उनमें रामधारी सिंह दिनकर, मोहन राकेश एवं राजेन्द्र यादव प्रमुख थे। मेरी राजेन्द्र यादव से यहीं पहली मुलाकात हुई। संगोष्ठी के बाद प्रोफेसर चन्द्रहासन के सहयोगी डॉ. एन. ई. विश्वनाथ अय्यर ने यह प्रस्ताव रखा कि हम त्रिवेन्द्रम रुकते हुए कन्याकुमारी की भी यात्रा करें। सात आठ लोगों ने एक दल के रूप में यात्रा की जिनमें राजेन्द्र यादव भी थे। तीर्थ यात्री के रूप में राजेन्द्र यादव का व्यवहार स्नेहपूर्ण, सौम्य, वत्सल एवं अलमस्त था। पूरी यात्रा में कोई विवाद नहीं हुआ। उनका “प्रेत बोलते हैं” शीर्षक  उपन्यास यद्यपि सन् 1951 में ही प्रकाशित हो गया था मगर इसका संशोधित रूप सन् 1959 में राजकमल प्रकाशन द्वारा “सारा आकाश” नाम से प्रकाशित हुआ। इसके बाद ही यह अधिक चर्चित हुआ। मैंने इसे सन् 1960 के आसपास पढ़ा। मैंने इसकी चर्चा राजेन्द्र यादव से यात्रा के दौरान की। सुनकर राजेन्द्र यादव को अच्छा लगा। उन्होंने मुझे अपनी अन्य प्रकाशित रचनाओं (उपन्यासों, कथा-संग्रहों तथा कविता-संग्रह) के बारे में अवगत कराया। 

मैंने राजेन्द्र यादव को साहित्यिक मुद्दों पर बोलते हुए सुना है और “हंस” में उनकी लिखी हुई टिप्पणियाँ भी पढ़ी हैं। मुझे उनमें अँधेरा अधिक नज़र आया है मगर अपने लेखन में वे सर्वत्र अवसाद, टूटन, वितृष्णा को ही महिमामंडित नहीं करते, उजाला भी बिखेरते हैं। “सारा आकाश” का मध्य वर्ग का पढ़ा लिखा नवयुवक नायक घुटन एवं टूटन के बीच आशा और विश्वास भी कायम रख पाता है। “उखड़े हुए लोग” को पढ़ने के बाद “देशबंधुजी एम. पी. उर्फ नेता भैया”   भ्रष्टाचारी एवं चरित्रहीन नेताओं के जीवन्त प्रतीक के रूप में नज़र आते हैं। चुनाव के समय वे किस प्रकार जनसेवा की कसमें खाते हैं किन्तु सत्ता पाने के बाद क्या क्या दुराचरण करते हैं – इसका बिंब हमारे सामने मूर्तिमान हो उठता है। उपन्यास के सभी पात्रों का चरित्र चित्रण सहज नहीं लगता। शरद और जया का रिश्ता राजेन्द्र यादव के लिए आदर्श हो सकता है मगर यह मेरे गले नहीं उतरता। साम्यवादी विचारधारा के पोषक सूरज को शरद और जया से सहानुभूति हो सकती है मगर दाम्पत्य जीवन की मर्यादा में विश्वास करने वाले व्यक्ति के लिए वे सहानुभूति के पात्र नहीं हो सकते। “कुलटा”  आत्म-कथात्मक शैली में समाज के मध्यवर्गीय जीवन का प्रभावी चित्रण प्रस्तुत करता है। “शह और मात” में उदय एवं सुजाता की प्रेम कहानी का चित्रण जीवन की आस्था का दस्तावेज़ है। कुरूप होने के कारण एक अतृप्त नारी की अनियंत्रणीय काम इच्छाओं की मनोविश्लेषणात्मक प्रस्तुति है -“अनदेखे अनजान पुल”। इसकी कथा में सहज प्रवाह है। इसका शिल्प-विधान अपेक्षाकृत अधिक गठित है। “एक इंच मुस्कान” उपन्यास जिस समय रचा गया, राजेन्द्र यादव पति तथा मन्नू भण्डारी पत्नी की सार्थक भूमिकाओं का निर्वाह करते प्रतीत होते हैं। इसका प्रमाण यह उपन्यास है जिसमें दोनों ने उपन्यास के नायक अमर और उपन्यास की नायिका अमला की प्रेम कथा को क्रमशः अलग अलग लिखकर उनमें तारतम्य बैठाने का यथासाध्य प्रयास किया है। इसमें भी नारी का प्रेम अधिक संयत, सहज, स्वाभाविक और सरस प्रतीत होता है। हो सकता है कि मिलजुलकर लिखने के फलस्वरूप प्रणीत उपन्यास ही बाद में दोनों के दाम्पत्य जीवन की दरार का कारण बना हो। उपदेश देना आसान है; जीवन में उसके अनुरूप आचरण करना दुष्कर।

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी साहित्य के इतिहास में सन् 1950 के बाद के प्रथम चरण की जिन कहानिकारों की रचनाओं को “नई कहानी” के नाम से पहचाना जाता है, उनमें जो कहानिकार कहानी के कथ्य और शिल्प में अपेक्षाकृत अधिक नवीनता लेकर आए उसमें तीन रचनाकारों का महत्व निर्विवाद है। मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर के नाम सर्वाधिक उभरकर आते हैं। इनके तुलनात्मक अध्ययन करने का यह प्रसंग नहीं है। वैसे भी मेरे लिए तीनों के अपने अपने सकारात्मक गुण हैं और मेरे लिए सम्प्रति यही कहना अभीष्ट है कि “कौ बड़ छोट, कहत अपराधू”। राजेन्द्र यादव के संदर्भ में यही कहना चाहूँगा कि यदि कोई हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कहानियों का संग्रह प्रकाशित करना चाहेगा तो उसमें “टूटना” एवं “जहाँ लक्ष्मी कैद है” शीर्षक कहानियों को स्थान देना ही होगा।

राजेन्द्र यादव केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की शासी परिषद (ग्वर्निंग कॉउन्सिल) के सन् 1953 से सन् 1955 की अवधि में सदस्य थे। उस अवधि में मेरा उनसे अनगिनत बार मिलना जुलना हुआ। कभी उन्होंने मेरे साथ अपने व्यक्तिगत जीवन के अनेक पहलुओं को बेबाक उजागर किया तो परिषद की बैठकों में कुछ मुद्दों पर अपने मत को दुराग्रह की सीमा तक थोपने का असफल प्रयास भी किया। हमारी तीखी बहसें भी हुईं। मैंने उनके विवादास्पद व्यक्तित्व को जाना ही नहीं, भोगा भी। संस्था का संचालन करते समय हमें संस्था के दूरगामी हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना होता है। निर्णय बहुमत के आधार पर ही सम्भव हो सकता है। निदेशक को शासी परिषद के समस्त सदस्यों से विचार विमर्श करने के बाद संस्था के हित तथा सदस्यों के बहुमत के विचारों को ध्यान में रककर बहस के मुद्दे तय करना होता है तथा सदस्यों के विचारार्थ तदनुकूल प्रस्ताव पेश करना होता है। यदि सदस्यों में एक या दो सदस्य अलग मत व्यक्त करते हैं तो बैठक का अध्यक्ष को वोटिंग करानी पड़ती है। जिस मत के पक्ष में बहुमत होता है, वह पारित हो जाता है। मैं राजेन्द्र यादव को बैठक के पहले हर मुद्दे पर अपनी ओर से समझाने का पूरा प्रयास करता था। मगर कभी कभी वे जो विचार बना लेते थे, उस पर अड़ जाते थे। उदाहरण के रूप में एक मुद्दे पर मेरे समझाने के बावजूद वे नहीं पिघले। इसकी परिणति यह हुई कि बैठक के बाद उन्होंने तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री को अपनी यह राय लिखकर भेज दी कि अब संस्थान को बंद कर देना चाहिए। संस्थान को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। अपने अनुभव के आधार पर मुझे ऐसा लगता है कि जब वे आहत महसूस करते थे तो उनका आक्रोश चरम पर पहुँच जाता था। तप्त लौह पिण्ड की भाँति वे इतना दहकते थे कि उसमें अकल्पित भी कर जाते थे। मगर शांत भी वे उसी तरह हो जाते थे और तब लगता था कि हमारे सम्बंधों में कोई दरार नहीं आई है। 

मैं इस अवसर पर उनके साथ व्यतीत मधुर स्नेहिल क्षणों को ही याद करना चाहता था मगर तीखे एवं खट्टे क्षणों की यादें भी उतनी ही प्रखर हैं कि चाहकर भी उनको भूल नहीं पा रहा हूँ। विनय है, भविष्य में प्रीतिकर स्मृतियाँ ही याद रहें। इसी भावना पूरित संकल्प के साथ उनको नमन करता हूँ।

  -------------------------------------------------------------------------------------------------

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव, चाँदपुर रोड

बुलन्द शहर - 203001               





एक ताज और.../ प्रमोद यादव

  



      न मालूम जिंदगी के हर मोड पर मेरे साथ ऐसा क्यों होता है कि सुख और दुःख..खुशी और गम दोनों एक साथ ही मेरे पहलू में आते हैं. विवशता यह कि न मैं खुलकर रो पाता हूँ..न चाहकर हँस पाता हूँ. सुख-दुःख की मिलीजुली अनुभूतियों से न जाने मन कैसे विचित्र सा हो जाता है.

आज रमी को उसके घरवाले लिवा ले गए. रमी...मेरी दुल्हन...तीन दिन पहले ही तो मेरी-उसकी शादी हुयी है. इस शादी में न ही मेरी रजा थी और ना ही कोई इनकार. अगर इस शादी से इनकार न कर पाने का कोई कारण था...तो वह थी मेरी बूढी माँ. जिसे झुकी कमर से घर के काम-काज करते देख दिल पसीज जाता था. इसके अलावा एक ठोस, महत्वपूर्ण और मूल कारण जो था- वह थी-निकी...उसकी वादाखिलाफी,उसकी बेकार की दी गयी ढेरों तसल्लियाँ.

“निकी”... एक नाम..जिसके साथ मैंने कभी जीने-मरने की कसमें खाई थी. लेकिन अजीब त्रासदी कि न उसके संग मैं कभी जी सका ..और न मर सका. बड़ी खूबसूरत, मासूम, सीधी-सादी, पाक और उदार ह्रदय की लड़की थी-निकी. दस साल पहले उससे परिचय हुआ था.यह सिलसिला उसकी शादी तक चला. इस बीच चार साल में उसे अच्छी तरह देखा..परखा..जाना..और महसूस किया कि ‘आदर्श लड़की’ की परिभाषा शायद निकी ही है. 

सभी स्थितियां अनुकूल होते हुए भी मैं निकी से शादी न कर सका. जात-पांत के बंधन तो मैं तोड़ भी देता पर अपनी मुफलिसी को नजरअंदाज करना..मेरे लिए मुमकिन न था. निकी एक अमीर घराने से थी.फिर भी मुझसे शादी का हौसला रखती,.मुझे विश्वास था मेरी मुफलिसी से वह निर्वाह कर लेगी लेकिन न मालुम क्यों मुझे यह गवारा नहीं था. निकी रोती रही..बिलखती रही..और मैं दूर होता गया..दूर...बहुत दूर.....अंततः वह बुरी तरह टूट गयी...निराशाओं से घिर गयी. एक दिन बोली- ‘ठीक है अज्जू...दिल टूटने की आवाज सुनने से शायद तुम घबरा रहे हो...लेकिन मत घबराओ..क्या मेरा दिल सिर्फ मेरा ही है ? तुम्हारा कुछ भी नहीं ? तुम्हे.. तुमसे ज्यादा मैं जानती हूँ..इतने सारे दर्द ..उस पर मेरे प्यार का बोझ...मेरी यादें लिए तुम क्या ख़ाक जियोगे अज्जू ? फिर भी तुम चाहते हो कि मेरी शादी किसी और से हो जाए...तो तुम्हारी मर्जी..लेकिन क्या तब तक साथ नहीं दोगे ? ‘

और तब मैंने उसकी शादी तक उसे साथ देने का वादा बड़े ही बेमन से किया..एक भयावह सन्नाटा छोड़ निकी चली गयी. यादों को मैं कुचलता रहा..और यादें शिद्दत के साथ सिर उठाती रही. फिर धीरे-धीरे एक सामान्य जिंदगी जीने लगा..छह साल कैसे बीते, पता न चला. इस बीच न कभी निकी मिली न ही उसकी कोई खबर...बस इतनी जानकारी मिली कि उसके दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं. 

फिर अचानक बरसों बाद आगरे के ताजमहल में निकी से भेंट हुई.वह अनोखी रात मैं कभी भूल नहीं सकता....

....शरद पूर्णिमा की रात थी...आगरा ट्रांसफर हुए सात ही महीने हुए थे..ताजमहल की भव्यता देखने उस रात मैं भी गया था. प्रवेश-द्वार पर भीड़ जमा देख उत्सुकतावश मैं भीड़ में घुसा तो देखा- कोई आदमी बेहोश सा पड़ा था...बनारसी साडी में लिपटी एक संभ्रांत महिला उस पर झुकी उसे होश में लाने की कोशिश कर रही थी.करीब ही दो छोटे-छोटे बच्चे भीड़ से आतंकित सहमें खड़े थे. ज्योंही उस महिला ने भीड़ की ओर मुखातिब हो किसी डाक्टर के विषय में पूछते मदद मांगी...मैं स्तब्ध रह गया..आँखों  को विश्वास नहीं हुआ..मुंह से निकल ही गया- ‘ निकी...तुम...’ वह भी जोरों से चौंकी- ‘ अज्जू....तुम..’

यह समझते देर न लगी कि बेहोश व्यक्ति उसका ‘हसबेंड’ इन्दर ही होगा. 

‘ दो कदम दूर ही एक डाक्टर है..मैं अभी लेकर आया..’ इतना कह मैं भीड़ चीरकर  बाहर निकल आया. डाक्टर लेकर लौटा तो तीन-चार मिनटों में ही वह होश में आ गया. कार चलाने की स्थिति में वह था नहीं अतः मैं ही ड्राइव करते उन्हें होटल ले गया जहाँ वे ठहरे थे. उसके सामान्य होते ही , निकी की मानसिकता को ध्यान में रखते हुए मैंने ही अपना परिचय दिया- ‘अजय कहते हैं मुझे...पिछले सात महीनों से यहाँ नौकरी पर हूँ..मैं भी उसी शहर से हूँ जहाँ से आपकी ‘वाइफ’ है..निकी मेरी छोटी बहन की सहेली थी ..प्रायः मेरे घर इनका आना-जाना होता था..इसलिए परिचित था...लेकिन शादी के बाद कभी घर नहीं आई थी....आज अचानक यहाँ देखा तो....’

मेरे सीधे-सपाट परिचय से वह संतुष्ट हुआ और इस आकस्मिक सहयोग के लिए आभार माना. बहुत ही जल्द इन्दर घुल-मिल गया. इस छोटी सी मुलाक़ात में लगा कि वह अच्छे व्यक्तित्व का मालिक है. दोनों बच्चे भी जल्द ही हिल गए.इस बीच निकी अपने आपको व्यस्त रखने की असफल कोशिश करती रही. चाहकर भी वह मुझसे बोल नहीं पाई.बातों ही बातों में मालुम हुआ कि दूसरे दिन ही उनका दिल्ली जाने का कार्यक्रम है तो मैंने औपचारिकता जताते एक दिन और रुकने का आग्रह किया और अपने क्वार्टर में चलने का अनुरोध किया . पहले तो इन्दर इनकार करता रहा फिर एकाएक कुछ सोच कर बोला- ‘ ठीक है अजय...कल दोपहर यहाँ के एक फर्म ने पेमेंट का वादा किया है..कल आपके यहाँ का प्रोग्राम फिक्स ...’ 

दूसरे दिन मालूम हुआ कि इन्दर एक आकर्षक व्यक्ति ही नहीं बल्कि एक सफल ‘बिजनेसमैन’ भी है. सुबह-सुबह ही निकी व बच्चों के साथ पहुँच गया और एक कप चाय पी अपने काम के सिलसिले में जो निकला तो कई घंटों बाद लौटा. उन घंटों में निकी के साथ उस दिन जो बातें हुयी,वह आज भी मुझे अक्षरशः याद है. उस दिन निकी मुझे समझाती रही- ‘ अज्जू...तुम्हे शादी के लिए कहूँगी तो तुम कहोगे ...सभी लडकियां अपनी शादी के बाद लड़कों से यही कहती है..पर ऐसी बात नहीं है..और ना ही मेरी इस जिद्द से तुम यह समझना कि शादी कोई मजे की चीज होती है...और इसका तात्पर्य यह भी मत लेना कि मैं अपने वैवाहिक जीवन से दुखी हूँ..विवाह तो एक सामाजिकता है अज्जू...कब तक इससे दूर भागोगे ?.. तुमने कभी मेरी कोई बात नहीं मानी..मेरी हर इच्छा,हर सपने को तुमने रौंदा..मेरे बनाये हर ताजमहल से मुझे निराशा ही मिली..आज मैं अंतिम बार एक ताज और गढना चाहती हूँ...अपने लिए नहीं..केवल तुम्हारे लिए..हाँ अज्जू.. तुम्हारा यह दृढ निश्चय कि आजीवन अविवाहित रहोगे, ठीक नहीं है तुम्हारी हर पसंद और नापसंद से जितना मैं वाकिफ हूँ शायद तुम खुद उतना नहीं..मेरे ससुराल नागपूर के मकान के बगल ही तुम्हारे बिरादरी की एक सुन्दर,सुशील लड़की रहती है जो हर दृष्टिकोण से तुम्हारे काबिल है.तुम्हारे बारे में वह सब कुछ जानती है..चूँकि तुमसे मुलाक़ात की कभी कोई सम्भावना न थी इसलिए उसे कभी कहा नहीं.अब जाकर कहूँगी..आज ही उसे खत लिखती हूँ..डर है कि उसके बाबूजी कहीं जल्दबाजी न कर दे..क्योंकि पिछले साल से उसकी शादी की बात चल रही है..’

एक सांस में वह इतना कुछ कह गयी..उसकी आँखों में आंसू भर आये थे.मैंने वादा किया तो खुशी से वह पागल हो गयी, बोली- ‘ अज्जू..मेरा चुनाव तुम्हे जरुर पसंद आएगा..हमने कभी तुम्हारा बुरा नहीं चाहा...और मरते दम भी हम ‘ जनाब ‘ का भला ही चाहेंगे..’

 ‘ जनाब ‘ शब्द सुन मैं चौंक गया..निकी की ओर देखा ..वह भी एकदम चुप्पी साध गयी..उसकी आँखों में भी अतीत झिलमिला गया था.. ‘ जनाब ‘ निकी का तकियाकलाम हुआ करता था..मैं अक्सर उसे ‘ जनाब ‘ कहने से मना करता और हर बार वह कहती- ‘ ठीक है..अब से नहीं कहूँगी..अब तो जनाब खुश ना ? ‘ और हम दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते. सच पूछो तो उसका ‘ जनाब ‘  कहना मुझे अच्छा ही लगता था.

‘ माफ करना अज्जू..आज सात-आठ साल बाद न जाने कैसे यह लफ्ज एकाएक होठों पर आ गया..ईश्वर गवाह है..इस लंबे अरसे में कभी यह लफ्ज होठों पर नहीं आया..खुदा करे..दुबारा यह लफ्ज इन होठों पर फिर कभी न आये...’

दिल्ली के लिए निकलते वक्त बार-बार वह ताकीद करती रही कि इसी सीजन में शादी करनी है..नागपूर पहुँचते ही बात कर सूचित करेगी..और स्वयं भी शादी में आएगी..मेरा पता ले वह चली गयी.

महीनों मैं निकी के खत का इन्तजार करता रहा पर कोई खत नहीं मिला. फिर दो महीने बीते..तीन महीने बीते..उसका कोई भी पत्र नहीं आया.इस बीच अचानक माँ की तबियत बिगड़ी तो महीने भर की छुट्टी ले घर पहुंचा.वहाँ एकाएक शादी की बात चली तो फिर निकी का ख्याल आया.उसके प्रति मन एक अजीब ही आक्रोश से भर गया.इधर माँ की कमजोरी मेरे दिलो-दिमाग को परेशान करती थी. हश्र यह हुआ कि मैंने अपनी शादी कि स्वीकृति दे दी. बार-बार माँ कहती रही कि गोंदिया जाकर एक बार लड़की को देख आ..पर मैंने इनकार कर दिया.अंततः गोंदिया में रमी के साथ मेरी शादी पक्की हुई और आनन्-फानन में शादी भी हो गयी.

तीन दिन पहले ही सुहागरात थी.मैंने एक नजर उसे देखा भी नहीं. कह दिया - ‘ मेरी तबियत कुछ अच्छी नहीं..अगर तन्हाई दे सको तो आभारी रहूँगा..’ और सोफे पर सो गया. मैंने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि मेरी इस बेरुखी से उस मासूम और  निर्दोष  पर क्या प्रतिक्रिया हुई होगी .यह क्रम कल तक चलता रहा. आज उसके भाई लोग रस्म के मुताबिक आठ-दस दिनों के लिए रमी को लिवा ले गए.

अभी-अभी पलग के सिरहाने पर उसका एक खत मिला है जिसे पढके न मैं मुस्कुरा पा रहा हूँ न ही रो पा रहा हूँ..समझ नहीं आता..मेरे साथ कैसा कुछ घटित हो रहा है..उसने लिखा है-

‘ मेरे सुहाग,...चरण स्पर्श...लड़कियां शादी या सुहागरात के जो सपने संजोकर ससुराल जाती हैं,उसके विषय में जिक्र नहीं करुँगी..सिर्फ इतना कहूँगी... सरसरी तौर पर ही सही, मेरा यह खत तुम पढ़ लो..’तुम’ की धृष्टता के लिए क्षमा चाहती हूँ..तुम्हारी बेरुखी का मुझे कोई गिला नहीं..लेकिन इतनी भी क्या बेरुखी कि ‘जनाब’ ने अपनी दुल्हन की सूरत तक न देखी..सोची थी,.शायद मुझे देख तुम पहचान जाओगे..लेकिन तुमने तो देखना भी गवारा नहीं किया..तुम्हे शायद मालूम न हो..तुमसे मेरी शादी कितनी कठिनाई से हुई है..एक इंजीनियर के साथ मेरी सगाई होने ही वाली थी कि एकाएक निकी जीजी का खत मिला जिसे उन्होंने दिल्ली से ड्राप किया था.....मालूम हुआ कि उसने तुम्हे शादी के लिए राजी कर लिया है... मैंने लड़की होकर भी घरवालों के सामने यह बोलने की बेशर्मी की कि मुझे तुमसे प्यार है..अन्यथा यह सगाई नहीं टलती..और जानते हो अज्जू..ऐसा मैंने क्यों किया ?  क्योंकि यह मेरी निकी जीजी ...मेरी अभिन्न सहेली निकी की अंतिम ख्वाहिश थी..वह चाहती थी कि मेरी शादी तुमसे हो...तीन-चार महीने पूर्व जब तुमसे मिलकर लौट रही थी तो रास्ते में उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई...और इन्दर व निकी जीजी घटना स्थल पर ही दम तोड़ दिए...दोनों बच्चों को खरोंच तक नहीं आई... उसकी मौत से जिन सदमों से मैं गुजरी हूँ..भगवान न करे..तुम गुजरो...मैंने चाहा कि तुम्हें  सूचित करूँ लेकिन आगरे का पता नहीं मिला...जीजी की मौत से मैं पागल हो गयी थी...उसके सिवा मेरा अपना और कोई न था..उसने तुम्हारे बारे में सब कुछ बताया था...यहाँ तक कि तुम्हारी-उसकी मुहब्बत की पूरी दास्तान भी..मैं तुम्हारे बारे में सुन-सुनकर ही तुमसे प्रभावित हो गयी थी ..मैं अक्सर उसे कहती- ‘ जीजी ..अब तो हम तुम्हारे ‘ जनाब ‘ से ही ब्याह रचाएंगे..’

और आज देखो...सचमुच तुमसे रचा ही लिया..यह निकी की प्रबल इच्छा का ही परिणाम है अज्जू कि हम तुम अचानक मिल सके...तुमसे ब्याह की बातों को मैं सपना मानने लग गई थी..मेरी शादी नागपूर से होती तो शायद तुम पहचान लेते पर शादी मामा के घर गोंदिया से हुई इसलिए तुमने भी ध्यान नहीं दिया..अज्जू...निकी तो अब नहीं रही..कोशिश करुँगी कि उसके सपनों को साकार कर सकूँ..निकी के घर मेरा रोज का आना-जाना है..दोनों बच्चों को अब तक मैं ही सम्हालती रही हूँ..सोचती हूँ..इस बार अपने दोनों बेटों को लेकर आऊ..क्या ख्याल है ‘ जनाब ‘ का ..?

ऐ अज्जू..उदास मत होना भई...हम अभी बहुत दूर हैं तुमसे...तुम्हारे आंसू तक नहीं पोंछ पायेंगे..तो जल्द से जल्द मुझे लेने आ रहे हो ना...?

‘ जनाब ‘ के इन्तजार में- ‘ जनाब ‘ की – रमी. ‘

बार-बार पढ़ने पर भी दिल नहीं भर रहा है..बिलकुल निकी जैसी साफ-साफ़ बातें...वही ‘जनाब’ वाला तकियाकलाम...वही प्यारी-प्यारी बातें..निकी के प्रति जो गुस्सा और आक्रोश उपजा था,उसे याद कर खुद से नफरत हो रही है..रमी की स्पष्टवादिता और निकी की अंतिम इच्छा की पूर्ति से जहां संतुष्ट हूँ,वहीँ उसकी कमी से  बार-बार मेरे अंदर कुछ बिलख सा रहा है..महीनों पहले की उसकी एक-एक बात आज याद आ रही है- ‘ हमने कभी तुम्हारा बुरा नहीं चाहा अज्जू..मरते दम तक हम जनाब का भला ही चाहेंगे...अंतिम बार मैं एक ताज और गढना चाहती हूँ..बस..एक ताज और..’

                          xxxxxxxxxxxxxxx

                                               प्रमोद यादव 

                                               दुर्ग,छत्तीसगढ़

                                        मोबाईल- 09993039475    


पाँच मैथिली कविताएं ,अनुवाद सहित ।

1,शहरी सभ्यता

नित ऊपर उठै छै मचान ,

नै आँगन बांचल नै दलान ।

घर स गरबहिया दैत घर ,

ऊपर स नीचा ,घरे घर ।

नै कत्तों कनिओ त जमीन ,

पातर देवार जंगला महीन ।

जौ सोर करै किओ ज़ोर ज़ोर ,

मन भ जायत अछि अति घोर ।

मन भ जायत अछि देखि विकल ,

सभ्यता के ई नव नागफास ।

केहन जुग अब आबी बसल ।

नहीं छै कनिओ उल्लास आब ।

धरती स ऊपर उठैत स्वप्न ,

नीचा पैरक बस परिताप ।

नै मर्यादा के बोल रहल ,

नै मधुर ,मीठ कल्लोल रहल ।

सब दिशा मे तीव्र स तीव्र सोर ,

बहिरा के गाम मे बसल लोक ।

नै आंखि मे पानी एक बूंद ,

नै धरती पर हहराति जल ।

सबटा परिभाषा बदली गेल ,

जुग ठाढ़ एतय ठीठीयाय रहल ।

ई नव नुकूत इतिहास गढ़त ,

शहरी सभ्यता के माया जाल ।।

हिन्दी अनुवाद

नित ऊपर उठता है मचान ,

नहीं आँगन बचा ,नहीं दालान ।

घर से गलबहिया देती घर ।

ऊपर से नीचे घर ही घर ।

यदि आवाज करे कोई ज़ोर ज़ोर ,

मन हो जाता है कटु अति ।

मन हो जाता है देख विकल ,

आधुनिकता का नव नागफास ।

धरती से ऊपर उठते स्वप्न ,

नीचे पाव के बस परिताप ।

ना मर्यादा का बोल रहा ,

न मधुर ,मधुर कल्लोल रहा ,।

सब दिशा मे तीव्र से तीव्र स्वर ,

बहरों के गाव मे बसे लोग ।

ना आँख मे पानी एक बूंद ,

ना धरती पर हहराती जल ।

सब परिभाषा बदल गए

युग खड़ा यहाँ ठहाका लगा रहा ।

यह नयी नवेली इतिहास गढ़ेगा ,

शहरी सभ्यता का माया जाल ।

2 लिखत के प्रेम गीत ?

कदंबक गाछ त कटि /

चुकल छल आब ,

कृशकाय /

एकसरि ठाढ़ राधा /

हेरे छली एखनहु कृष्णक बाट/

सखी सब पहिनहि संग छोड़ लेन्ह,

आब मुरारी सेहो निपता,

केहन घोर कलिकाल ,/

प्रेमक शाश्वत कुसुम कोना मुरुझा गेलै/

नहि रहलै आब ओ राग अनुराग /

पोखरिक घाट /गाछी /ईनार /

सब जेना वीरान ,उजाड़ भ गेलै /

चिड़े चुनमुन चुप्प /

चारहु कात अनहार घुप्प /

हिय के कर्पूर कोना उड़ी गेल /

कत्त ताकू ? कोन कुंज ? कोन बोन ?

सोचे छथी राधा भरल आंखि स /

की जखन ,प्रियतम नहि अनुरागी ,त

लिखत के प्रेम गीत /

के लिखत जौवन के मधुर मधुर प्रीत /

तकेत छथी व्याकुल भ ,धरती ,अकास के /

गाछ बिरिक्ष/लता ,कुंज ,लग पास के ,

बिलखैत पुछेत छथि/लिखत के प्रेम गीत /

लिखत के प्रेम गीत /

विद्यापति जबाव दौथ ।।

अनुवाद

कदंब का पेड़ /

तो कट चुका था अब /

अकेले खड़ी /

कृशकाय राधा /

निहार रही थी अभी भी कृष्ण की राह ।

सखियो ने पहले ही

तज दिया था साथ /

अब मुरारी भी लापता /

कैसा घोर कलिकाल /

प्रेम की शाश्वत कुसुम कैसे मुरझा गई /

नहीं बचा हृदय मे उद्वेग /

नहीं रहा अब वो राग अनुराग ।

पोखर का घाट ,बगीचा ,कुवां,/

सब जैसे वीरान हो गया /

पक्षिगण चुप्प/

चारो तरफ अंधकार घोर ।

प्रेम कहाँ उड़ गया कर्पूर जैसे /किधर ढूंढें / किस कुंज मे ,किस वन मे ।

सोचती है राधा भरी हुई आंखो से /

कि जब प्रियतम ही नहीं अपना /

तो लिखेगा कौन प्रेमगीत /

कौन लिखेगा यौवन का मधुर मधुर संगीत /

देखती है व्याकुल हो /धरती और आकास को /

पेड़ ,पौधे ,लता कुंज ,आस पास के /

पूछती है व्याकुल हो /लिखेगा कौन प्रेम गीत /

लिखेगा कौन प्रेम गीत /

विद्यापति जवाब दें ।

3 आतंकी गाम ।

हाथ पएर मोड़ने /

ओ सुतल सुतल सन गाम /

जतय एखनो किओ किओ /

गाबैत छल /पराती/झुमरि/आ कजरी /

जतय अखनों पीबैत छल /

विभेदक वावजूद /संग संग / पानि/एके घाट प

बाघ आ बकरी ।

खरिहान मे दूर दूर धरि पसरल धान /

हसैत –ठिठियाति लोक के / छलै भरि मुंह पान ।

नव नुकूत प्रेमक होईत छल चर्च /

नीक बेजाय मे /होईत छल बुद्धि खर्च ।

जतय एखनहु बांचल छल /

आंचरक लाज /

मन जांति क /जन्निजाति/

करैत छल अपन अपन काज ।

जतय एखनो भोर स साँझ धरि /

बनैत छल किसिम किसिम के भानस/

जीवन स तृप्त /सुखासन प बैस

ज्ञानी ध्यानी पढे छलाह मानस ।

जतय एखनों ठाढ़ छल पुआरक /

बड़का टाल/

आ किल्लोल करैत धिया पूता /

होय छल निहाल ।

ओहि सुतल /ओंघायल सन गाम मे /

पैसि गेल छल एक दिन /

किछू अंनचिन्हार /अजगुत /

जेकर बग्गे बानी सेहो कहने दन /

हाथ मे कड़गर/ हरियर हरियर नोट आ बंदूक ।

ओ सब बैसाहे आयल छल /शांति /पसारि क एक गोट भ्रांति /

खेत खरिहान मे उपजाबय लेल /

बारूद /आरडिएक्स।

छीटैत रहल पाय पर पाय /

आ देखैत देखैत /

भ गेलै विषाक्त /

गामक पोखरि/

बन्न भ गेले अजान ,कीर्तन आ पराती/

डेरा गेल बिहुसैत समाज /

ओतय आब काबिज अछि /

भयोंन /गरजैत/

लाल लाल आंखि/मुंह स बोकरेत/

आगि सन /

आतंकक घिनौन साम्राज्य ॥

॥ अनुवाद ॥

हाथ पाव मोड़े /

सोया सोया सा गाँव /

जहां अभी भी कोई कोई गाता था /

प्रभाती /भूमर /नचारी /

जहां अभी भी पीते थे /

विभेद के वावजूद /

पानि / एक ही घाट पर /

बाघ और बकरी ।

खेत /खरिहान मे /दूर दूर तक /फैला हुआ था धान /

हसते /खिलखिलाते लोग/

सबके मुंह मे भरे थे पान ।

नए प्रेम प्रसंगों की होती थी चर्चा /

अच्छी बुरी बातों मे/बुद्धि होती थी खर्च ।

जहां अभी भी बचा था आँचल का लाज /

स्त्रीगण मन मार कर भी /करती थी अपना काम ।

जहां अभी भी सुबह से शाम तक /

बनते थे किस्म किस्म के व्यंजन /

जीवन से संतुष्ट /सुखासन पर बैठ /

ज्ञानी /ध्यानी /बाँचते थे मानस ।

जहां अभी भी खड़ा था /पुआलों का टाल/

शोर मचाते बच्चे /होते रहते थे निहाल ।

उसी सोए सोए /उँघाते जैसे गाँव मे/

घुस गए थे एक दिन /

कुछ अपरचित /

जिनकी वेश भूषा /वाणी भी विचित्र ।

हाथ मे /हरे हरे /कड़े कड़े रुपए और बंदूक /

आए थे वे लोग खरीदने शांति /फैला कर भ्रांति /

उपजाने के लिए /

खेत खरिहान मे /

बारूद /आर डी एक्स /

फेंक रहे थे शब्दों के पिघलते हुए लावे /

और देखते देखते /गाँव का पोखर /हो गया विषाक्त /

बंद हो गए प्रभाती /झूमर /और अजान /

डर गया था समाज /

काबिज है अब वहाँ /

भयानक अट्ठास करता /

लाल लाल आँखें /और मुंह से आग उगलने वाला /

आतंक का /

घिनौना साम्राज्य ॥

4 अहिल्या ।

भेंट फेर भेल छल गौतम के /

अहिल्या स/वएह काया /वएह रूप /

आईयो धरि तरासल /

वएह जौवन /

नदी के धार सन सनसनाइत/

मुदा आंखिक भाखा एकदम भिन्न /

नहि कोनो लोच /नहिं कत्तों संकोच /

एक गोट नब ऊर्जा /नब तेज स भरल अवस्स /

चौंधिया गेला /ओ ओहि तेज स /

जुग कतय स कतय/चलि आयल /

आत्म दर्शन मे ओझरायल /

कोना अनभिज्ञ रहि गेला ओ /

अही भेद स ।धखाइत /घबड़ाइत /

कहुना अपन परिचय ल बढला /

मोंन पाड़ू/गौतम हम /परमेश्वर अहांक पहिला /

वाक जेना मुंह मे अटकि गेल/

आ जुबती आगा बढि क लपकि लेल /

फेर /सभरैत बजली /बड़ मृदु बोल/

हमरो /छल ई अभिलाषा अनमोल /

की कोनो जुग मे आहाँ के देखितौ /

आ आहाँ के कद स अपन काया नपितौ /

सरापक दुनिया मे कत्तेक बुलब टहलब /

की एखनि धरि अहाँ के किओ नहि बुझौलक /

हम त कहब ज्ञानी बनब त बनू/

अहंकार के परंच पचेनेओ सीखू /

जानू देह गेह के निर्धारित सीमा /

आ निर्दोख के माफ केना भी सीखू /

तखन जाके अहांक तप सब सफल हैत/

कएक जनमक उपरांत फेर हमरा स मिलन हैत /

आब हम वृथा कोनो जोड़ स नै बनहेब/

पाथरि बनि अपन जीबन नहिं गमायब /

बड़ पढेलहू धरम अधरमक पोथी /

जेकर थाह आय धरि नै किओ पायल /

फटकार सुनि हुनक ज्ञान जागल /

कएक जुगक अनहार भागल /

धड़ खसौने ऋषि जायत रहला /

पड़ल मों न केलहा सबटा पिछुलका ।

कलिजुग मे होबैत छै सबहक इंसाफ /

दोषी के दंड आ निर्दोख के खून माफ ।

॥ अनुवाद –॥

भेंट फिर से हुआ था /

गौतम का /अहिल्यासे /

वही काया /वही रूप /आज भी /तराशा हुआ वही यौवन /

नदी के धार सी हनहनाती हुई /

लेकिन आँखों की भाषा /एकदम भिन्न /

नहीं कोई शर्म /न हया /

एक नवीन ऊर्जा /

नए ओज से ओतप्रोत अवश्य/

चौंधिया गए वे उस तेज से /

युग कहाँ से कहाँ चला आया /

कैसे अनभिज्ञ रह गए वे इस भेद से /

शर्माते /घबड़ाते /अपना परिचय लिए बढ़े /

मैं गौतम /परमेश्वर तेरा प्रथम ।

शब्द जैसे मुंह मे ही रह गया /युवती आगे बढ़ कर लपकी/फिर बोली मृदु बोल /

मेरी भी थी परम अभिलाषा अनमोल /

कि किसी युग मे आप को देख सकती /

आप के कद से अपना काया नापती /

श्राप की दुनिया मे घूमेंगे कितना /

क्या अभी तक किसी ने आपको नहीं समझाया /

मैं तो कहूँगी की ज्ञानी बनना है तो बनिए /

अहंकार को जब्त करना भी सीखें /

जानिए देह गेह की निर्धारित सीमा /

और बेकसूर को क्षमा करना भी सीखें /

बहुत पढ़ाया धरम अधरम का पोथा /

जिसका थाह अबतक भी किसी ने न पाया ।

फटकार सुन कर उनका ज्ञान जागा /

कितने युगों का अंधकार भागा /

शरीर झुकाए ऋषि जा रहे थे /

याद आ रहा था सब कर्म पिछला /

कलियुग मे होता है सबका इंसाफ /

दोषी को दंड और मासूम को खून माफ ।

5

प्रलाप कंसक ।

कतेक रातिक जागल /

लाल टरेस आंखि/

जेना फटि क बाहरि निकसि आओत।

केहन भूख /के हन पियास/

खेनाय खाय छी/

मुदा क्षुधा त जेना बिला गेल होय /

ई सिंहासन /ई वस्त्राभूषन /ई रनिवास /

किछू सुख नहिं द रहल अछि उद्विग्न मोंन के /

सदिखन ,उठैत/बैसेत/चलैत/बुलईत/

ओकरे चिंतन /ओकरे धियान /

केवल ओ /ओ / ओ ।

लोक कहैत अछि/मक्खन सन /हमर गौर वर्ण /

अही आंच मे झरकि/

एकदम स्याह पड़ि गेल /कारी कचोर /

ओकरे सन एनमेन ।

आकास /पाताल /

दसो दिसा गवाह अछि /हमर व्यथा के /

ई हो लोकेक कहबी छै/

बड़ बेसी नृशंस भेल जा रहल छी हम /

परंच /हमरा त कनिओ अपन शरीरक नहि भान /

नहिं/मोने के /

बबूरक काँट/शरीरक रॉम रोंम बनि गेल /

कारी घुरमल घुरमल /माथक केस /

बरछी जका ठा ढ़ /जिबैत हम मौतक पुतरा/

मुदा कनिओ सुध हमरा कत्त/

हम त मातल चारो पहरि आठो याम /

ओकरे सोच मे ऊब डूब होईत/

भयग्रस्त भ मृत्यु स /

हदस पैसि गेल अछि /

/जेकर स्नेह मे /

कोचवान बनल /बिसरि गेल रहि अपन राजसी ठाट /

ओहि देवकी के आठम संतान /

राति दिन हमर डेरा रहल अछि /

हां /कंस हम /

कोना तड़पि तड़पि क जीबी रहल छी/नहि बूझल किओ हमर पीर /

ने जड़ि/नहिं चेतन /

नहि जानि/कहिया धरि/भटकैत रहब /

जीवन के अंत के पश्चातों //विराम करब वा नहिं / की/किओ / कहि सकैत अछि?

अनुवाद –

कितने रातों का जागा /

लाल सुर्ख आँखें /

फट कर जैसे /बाहर निकल जाएंगी /

कैसी भूख ? कैसी प्यास ?

खाता तो हूँ /

लेकिन भूख तो जैसे विलीन हो गई हो /

यह सिंहासन /ये वस्त्राभूषण /यह रनिवास /

कुछ भी सुख नहीं दे रहा है मन को /

हर पल /उठते /बैठते /

चलते /

फिरते /उसी का ध्यान /

बस वह /वह /केवल वह ।

लोग कहते हैं मक्खन जैसा मेरा गौर वर्ण /

इस आंच से झुलस कर /

एकदम स्याह पड़ गया हूँ /

काली स्याह /उसी के तरह /

अकास /पाताल /दसो दिशा /गवाह हैं /

मेरी व्यथा के ।

ये भी लोग ही कहते हैं कि/

बहुत ज्यादा नृशंस होता जा रहा हूँ मै/

लेकिन मुझे इसका तनिक भी भान नहीं /

बबुल के कांटे /मेरे शरीर का /रॉम रॉम बन गया /

काले /औठिया केश माथे के /

बर्छी कि तरह खड़े हो गए हैं /

मैं जीवित मौत का पुतला /

लेकिन मुझे जरा भी होश नहीं /

मै तो नशा मे मत्त /

रात दिन आठो पहर /

उसी के विषय मे/

गुपचुप पड़ा /

भयग्रस्त हो कर मृत्यु से /

आतंक प्रवेश हो गया है हृदय मे /

जिसके स्नेह मे कोचवान बना /

भूल गया अपना राजसी ठाठ /

उसी देवकी का आठवा संतान /

डरा रहा है मुझे रात दिन /

भोग से नहीं /भय से ग्रस्त /मैं कंस /

कैसे तड़प तड़प कर जी रहा हूँ /

नहीं समझ पाया कोई भी मेरा दर्द /

न ही जड़ /और न चेतन /

न जाने कब तक भटकता रहूँगा /

जीवन के अंत के बाद भी विराम कर सकूँगा ?

क्या इसका जवाब दे सकता है कोई ?

0 0 0 000 000 कामिनी कामायनी ॥

नारी वेदना:आस्था-अनास्था की पगडंडियों पर श्रद्धेय होने की

[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

समाज व्यक्तियों और परिवारों का समूह है। समाज की व्यवस्था में परिवर्तन का वस्तुतः व्यक्तियों और परिवारों पर प्रभाव न्यूनाधिक पड़ता ही है। व्यक्तियों का घटक परिवार होता है और परिवार स्वयं में स्त्री-पुरुष संबंधों का ऐसा केंद्र होता है, जिसका दर्पण समाज होता है। साम्यवाद और इसके विवेचक कार्ल मार्क्स हों या पूँजीवाद और इसके चिन्तक, वर्तमान वैश्विक मनीषी हों या धर्मदूत हों अथवा अध्यात्म के देदिप्य केंद्र हों। स्त्री-पुरुष की पारिवारिक, सामाजिक अन्योन्याश्रयिता को नकारने की स्तिथि में अभी तक नहीं है


हाँ, कुछ परिवार पिता के वंश के होते है, तो कुछ कुल माता के वंश से चलते है स्त्री का महत्व नेपोलियन बोनापार्ट के शब्दों में ‘मुझे तुम दस सच्चरित्र माताएं दे दो, बदले में मैं तुम्हे एक महान और सबल राष्ट्र दे दूंगा।’ उसने तो दस से कम नहीं सच्चरित्र माताएं मांगी थी, पर भारत में केवल और केवल एक सच्चरित्र माता जीजा बाई थीं, जिन्होंने एक शिवाजी ही मात्र नहीं, एक “महाराष्ट्र” भी इतिहास को प्रदान कर दिखाया था।


यह कितना विचित्र है कि ‘रामलीला’ का सामाजिक समारंभ ‘ताड़का वध’ और ‘कृष्णलीला’ का श्रीगणेश ‘पूतना वध’ से होता है। महर्षि वाल्मीकि और महर्षि कृष्णद्वैपायन हमारे व्यास कहना क्या चाहते है? इनके चिंतन का सारतत्व यही है कि सारे राष्ट्र के सभी पुरुष कुमार्गी हो जाएँ, पर एक भी स्त्री सच्चरित्र बची रहे तो एक नया ओजस्वी राष्ट्र हम पुनः बना लेंगे, पर एक भी स्त्री पूतना या ताड़का बनी और उसका उन्मूलन नहीं हुवा तो श्रेष्ठताओं का राष्ट्र भी धूल में जा मिल सकता है। प्राचीन की एक हेलन तत्कालीन दो राष्ट्रों की श्रेष्ठ सभ्यताओं और संस्कृतियों के पतन का कालजयी उदाहरण है। विनोबा जी कहते ही हैं-’एक पुत्र को पढ़ाना केवल पुत्र को पढ़ाना है,पर एक पुत्री को पढ़ाना पूरे परिवार को पढ़ाना है।’


औद्योगिक विश्व जब पैदा हुवा और मशीनों कि सहभागिता बढी तो श्रम की भूमिका घटी और स्त्रियाँ पुरुषों के बराबर कामों में आने लगी। ‘कृषिप्रधान’ युगों की नारी पर पुरुष प्रधानता के स्थान ने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर ला खड़ा कर दिया। औद्योगिक विकास यूरोप में तीव्रतम रहा, अतः स्त्री-पुरुष बराबरी का मनोविज्ञान वहाँ तेजी का वातावरण बन गया। सामाजिक राजनीतिक अधिकारों पर बराबरी का बिगुल बजने लगा। अब स्त्री पुरुष की दासी नहीं, जीवन सहचरी बनने जीवन के क्षेत्र में चल पड़ी! पर, वेदों से पौराणिक तक फ़ैली बस्तियां जानती है कन्या का अपने पर स्वत्व होता है , वह स्वयम जिसे आत्म-समर्पण करती है वही उसका पति होता है, जिसे वह परमेश्वर का सिंघासन देती है। मनु नारी का राष्ट्रीय मानचित्र प्रस्तुत करते हुवे कहते है, जो विधिक दर्शन का प्रथम उपोद्घात है और सदियों को भेद कर आज भी गुंजायमान है-


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।
-मनुस्मृति 3/56


नारी माँ के रूप में प्रथम-वन्दनीय और मार्ग-दर्शक भारत की सदियों ने देखा है। पत्नी रूप में सुख दुःख की दिन-रात रही है नारी भारत में। दोनों के बीच प्रेम के ह्रदय दीप जगमगाते रहे है-जीवन के अंधियारों में जब-जब सूर्य के प्रकाश साथ नहीं खड़े होते रहे। यह भारतीय नारी शेक्सपीयर के शब्दों में ‘विमेन आर ब्लंडर मिस्टेक ऑफ़ गॉड’ या ‘ईश्वर की भयानक भूल नहीं थी’।


उन दिनों के ब्रह्मा,वशिष्ठ,अत्रि,अंगीरा,भृगु,बृहस्पति,शुक्र आदि आज के बुद्धिजीवियों से कहीं अधिक मेधावी मनीषी और चिन्तक थे। ब्रह्मा की सरस्वती, विष्णु की लक्ष्मी, शिव की पार्वती, राम की सीता, कृष्ण की राधा, वर्तमान नारियों की प्रेरणाश्रोत शाश्वत बन गए समय पर स्थापित हैं। स्त्रियाँ रणक्षेत्रों में युद्धरत भी उन दिनों के रणक्षेत्रों में मिलती हैं। ‘महाकाली’ ‘मधुकैटभ’ के विरुद्ध एक सफल अभियान रही है! ‘महालक्ष्मी’ ‘महिषासुर’ के युद्ध-तंत्र को विध्वंस कर डालती है! ‘महासरस्वती’ ‘शुम्भ-निशुम्भ’ के आतंकवादी संगठन को समाप्त कर शांति और समृद्धि के युग का आरम्भ कराती मिलती है। ‘गौरी शंकर’ एक समय ‘अर्द्धनारीश्वर’ बन जाते है उन दिनों के भारत ने देखा है। आज का भारत भी ऐसे महान दृश्य देखने को प्राचीन द्वारा आमंत्रित है।
न जाने कब कहाँ, कैसे नारी को अबला कह दिया गया! दो-दो नवरात्रों के इस देश को, इसके नारी सम्मान के मनोविज्ञान को, कहते-सुनते पढ़ते पाया जाता है -


यो माँ जयति संग्रामे यो मे दर्प व्यपोहति,
यो मे प्रति बलों लोके स मे भरता भविष्यति|
-दुर्गा सप्तशती 5/120


नारी शक्ति है। शक्ति के बिना शिवो-शिव का शैवागम -उद्घोष इस देश के कर्णरंध्र सुनते आ रहे है। पिता से माता सहस्र गुणा पूज्या है-
सहस्त्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्ते।।
मनु .2/145
वेदों की नीति मेंन स्वैरी स्वैरणी कुतः ||
छान्दोग्योपनिषद 5/11/5


सच्चरित्रता दमकती स्त्री-पुरुष की सहगामिनी है। वेद वाणी गृहसूक्त बन कर नारी का उद्बोधन करती है –
सम्राज्ञी श्वशुरे भव, सम्राज्ञी श्वश्रुवां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव, सम्राज्ञी अधि देवृषु।।
-ऋग्वेद 10.85.46.


वेदों में स्त्री ससुर, पति, पुत्रादि की कमाई की मालकिन थी। आज उसे पुरुष के बराबर लाने की कवायद उसे उसके उच्चासन से पदावनत करना जैसा है। सावित्री यमराज पर भरी पड़ती है| शाण्डिली सूर्य के उदय को रोकने की शक्ति से संम्पन्न मिलती है। गार्गी,लोपामुद्रा ऋचाओं की सर्जनात्मक क्षमता से समृद्ध है। कैकेई युद्धभूमि में मूर्छित हुवे दशरथ का स्थान लेकर रणंजई कौशल प्रस्तुत करती मिलती है। ब्राह्मण युग की संक्रांति में यशोधरा, सुजाता, आम्बपाली, जैसी नारियाँ साधकों का उद्धरण बनी है। इसीतरह वेदों और पौराणिक युग में पारिवारिक,सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक सभी क्षेत्रों में नारियाँ अग्रिम पंक्ति में सम्मानित रहीं है। यहाँ तक की राम रावण युद्ध में सुपर्णखा की भूमिका का अपना सैन्य विज्ञानी महत्व है।

इन युगों में नारियाँ शांति सेवा समृद्धि की प्रौद्योगिकी और प्रायोगिकी दोनों भूमिकाओं में मिलती हैं। वैदिक और पौराणिक नारी दिन और रात के मध्य की वह संध्या (वंदना बेला) जहां दिन थक कर उनके आँचल में सिर रख कर विश्राम यामिनी की निद्रा पाता है और एक नयी स्फूर्ति के साथ ऊषा की प्रभात फेरी में पुनः सक्रीयता के औद्योगिक दाग भरने लगता है।[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

YATINDRA NATH CHATURVEDI

पर्यावरण एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता_Author / Environmentalist / Political and Social Activist /

Dynamic Youth Leader of Two National Movement

Student Revolution:1997, A Movement Campaign of Ganga Renaissance:2012

 

E : meyatindranathchaturvedi@ gmail.com

आचार संहिता पर 5 'अचारी कविताएं'
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
हनीमून और आचार संहिता
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
विवाह बाद
कब कहाँ जायेगा
हनीमून
नव विवाहित जोड़ा
बोला समधन से
कन्या का पिता
परिहास से बोली समधन
कैसे जा सकते हैं
जानते नहीं
चुनाव घोषित हो गये
लग चुकी है
आचार संहिता
००


सास बहू ओर आचार संहिता
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
सास ने कहा
बहू से
जानती हूँ मैं
अच्छा लगता है अचार
तुझे
'इन दिनों'
छोड़ चिंता
खा ले तू भी खा ले
जब सारे दल
खा रहे
तोड़ रहे हैं
आचार संहिता
००


आचार मुक्त संहिता
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
लग गई आचार संहिता
तो क्या
हमारे आचार / विचार / संस्कार अलग
क़ानून / दलील / नज़ीर अलग
ठसक / अकड़ / गुरुर जुदा
हमारा भगवान
हमारा खुदा
हमारी अपनी मुक्त संहिता
ठेंगे पे आचार संहिता
सुना नहीं
शत्रुघ्न का जुमला
हम जहाँ खड़े होते
वहीं से लाईन शुरु होती
जो हम कहें
वही है आचार संहिता
हम नोट बाँटे / झाँझ बजाएँ
घुट्टी पिलाएँ
यही आचार है
तुम पकड़ बैठे रहो
लिये अपनी संहिता
००


बेटी ओर आचार संहिता
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
पत्नि ने कहा
तल्ख़ी से पति को
मैं न कहती थी
जल्दी जाओ
बहू को बिदा करा लाओ
अब मना कर देगा
बहू का पिता
हंस कर कहेगा
क्षमा समधीजी
बेटी भेज नहीं सकता
लग चुकी है
आचार संहिता
००


जज और आचार संहिता
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
जज साहब
बहुत हो गया सहते
अब साथ नहीं रह सकते
ख़त्म हो कटुता
अब जारी कर ही दो
तलाक का आदेश
मिटे दुख क्लेष चिंता
जज ने कहा
भुगता है कुछ दिन ओर भुगत
घोषित हो चुकी है
आचार संहिता
००

कुबेर
Mo- 9407685557

1
दांत निपोरना भी एक कला है


बत्तीसी विहीन सुंदरता की कल्पना बेमानी है।

दूध के दांतों के झड़ने और अकल के दांतों (दाढ़ों) के निकलने का रिवाज यदि
नहीं होता तो बड़े-बुजुर्ग छोटों पर अपनी महानता का रौब भला कैसे जमा
पाते?

अन्य जानवरों के (यदि आदमी को जानवर न माना जाय) बड़े-बड़े घिनौने दांतों
से अपने छोटे-छोटे सुंदर दांतों की तुलना करते ही मनुष्य स्वयं को औरों
से सभ्य और श्रेष्ठ होने का भ्रम पालने लगता है। अगर जानवर कह पाते कि
’अरे मनुष्यों! हमारे दांत बड़े और बेडौल जरूर हैं, पर तुम लोगों के
दांतों के समान हिंस्र और खतरनाक नहीं हैं। दांत खट्टा करने और दांत
निपोरने की आधुनिक कला भी तुम्हीं लोगों को मुबारक हो,’ तो भला इनकी क्या
रह जाती?

कभी न कभी आपने भी दांत निपोरा होगा। यदि कोई अपनी बत्तीसी का प्रदर्शन
हें...हें...हें...की लय बद्ध स्वर के साथ इस प्रकार करे कि हालाकि उसमें
प्रदर्शन की भावना हो या न हो, सामने वाले व्यक्ति के तमतमाए हुए तमाम
तेवर क्षण भर में ही पानी-पानी हो जाए तो इस कला को दांत निपोरना समझिए।
ऐसा करके वे किसी टूथ-पेस्ट या मंजन-पावडर का विज्ञापन नहीं करते, बल्कि
अपनी श्रेष्ठता, महानता और सफलता की आभा से आपको चमत्कृत कर रहे होते
हैं। ऐसे लोगों को यद्यपि दांत निपोरू कह सकते हैं पर उनके सामने ही
उन्हें दांत निपोरू कहने की भूल आप हरगिज न करें। पीठ पीछे चाहे जितनी
बार कह लें, जैसे कि मैं कह रहा हूँ।

दांत निपोरुओं की पहचान एकदम आसान है। इनके दांतों का चमकीला होना हरगिज
जरूरी नहीं है। बल्कि जिन दांत निपोरुओं के दांत चमकीले हों, समझिये वे
इस कला के नये साधक हैं।

दांत निपोरुओं के दांतों का अर्थात बत्तीसी का सही सलामत होना भी जरूरी
नहीं है। बल्कि बत्तीसीविहीन निपोरू ही वेटरन निपोरू होते हैं।
महान दांत निपोरुओं की दांतों और साँसों से किसी टूथ-पेस्ट की चमक और महक
नहीं आती, बल्कि दांतों के ऊपर पान और खैनी की मोटी परत और साँसों से
धूर्तता और मक्कारी की असहनीय गंध आती है। इसी से तो उनकी महानता प्रगट
होती है।

दांत निपोरने की कला एक महान कला है। यह हर किसी के बस की बात नहीं है।
अन्य कलाओं की भांति इस कला में भी महारत हासिल करने के लिए सतत् अभ्यास
और चिर साधना की जरूरत होती है। यदि किसी में यह कला जन्मजात है तो अच्छा
है, नहीं है तो कोई बात नहीं। थोड़े ही दिनों की साधना से (इच्छा हो तो
लगन आ ही जाएगी) इस कला में निपुण हुआ जा सकता है। आपको बस इतना ही करना
है कि यदि आपका कोई प्रतिपक्षी या तलबगार आपके प्रति नाराजगी व्यक्त करे
या आप स्वयं सामने वाले के प्रति अपराध-बोध महसूस करें, तो बिना समय
गँवाए, बिना कुछ सोंचे समझे, अपनी सारी बत्तीसी निकाल कर
हें...हें...हें...की विशेष निपोरू राग के साथ अपना पूरा वाल्यूम कंट्रोल
खोल दीजिए।

यदि प्रथम प्रयास में काम न बने तो दोबारा प्रयास करें। फिर भी काम न बने
तो एक अंतिम प्रयास और करें। (यदि आप इस कला में माहिर हैं तो चैंथे
प्रयास की जरूरत नहीं पड़ेगी) विश्वास रखिए, सामने वाला शर्म से पानी-पानी
हो जाएगा। उसके दांत इतने खट्टे हो जाएंगे कि वह कुछ बोलने लायक नहीं
रहेगा।

दांत निपोरू सर्वव्यापी होते हैं; फिर भी दुकानों, दफ्तरों और मंत्रालयों
में ये थोक के भाव पाए जाते हैं। बाबुओं का बाबू अर्थात बड़ा बाबू वही हो
सकता है जो इस कला में सर्वाधिक दक्ष हो। इस कला में माहिर नेता मंत्री
पद के प्रबल दावेदार होते हैं।

दुकानदारों और व्यापारियों को अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए इसी कला में
दक्ष होना पड़ता है। मिस्त्रियों का तो यह अनिवार्य गुण है। घड़ीसाज हो,
रेडियो मेकेनिक हो, सायकल मिस्त्री हो या कार मेकेनिक, जब तक ये इस कला
का सम्मिश्रण अपनी तकनीकी कला के साथ नहीं करेगें, किसी यंत्र का दुरुस्त
हो पाना नामुमकिन होता है।

लोग कहते हैं, सफलता के लिए कठोर परीश्रम जरूरी होता है। मैं कहता हूं,
ऐसा कहना इस महान कला का सरासर अपमान है। परिश्रम करें आपके दुश्मन। आपको
यदि दांत निपोरना आता है, तो सफलता आपके कदम चूमेगी। मंत्रों में
महामंत्र, चाबियों में मास्टर चाबी और सोलह कलाओं में महानतम है यह कला।

इस कला में हें...हें...हें...की जो अनुनासिक स्वरधारा प्रवाहित होती है,
जिसे इनके साधक निपोरू राग बताते हैं, अवश्य किसी शास्त्रीय राग पर
आधारित होगी वर्ना इसमें इतनी ऊर्जा संभव होती?

दांत निपोरने की कला की व्यापकता, दांत निपोरुओं की संख्या और इसकी सफलता
को देखते हुए इस कला को देश की राष्ट्रीय कला तथा ऐसे कलाकारों के चरित्र
को देश का राष्ट्रीय चरित्र मान लेना चाहिये। हें...हें...हें...।
000
2
पेट के दांत


दांत विषयक इस लेख का उद्देश्य आयुर्विज्ञान के दंत चिकित्सा विज्ञान को
चुनौती देना नहीं है अपितु दांतों की चमत्कारिक शक्तियों को प्रकाशित
करना है।

दांत की शक्तियाँ दो प्रकार की होती हैं - लौकिक और अलौकिक। ईश्वर के
साकार और निराकार स्वरूप की अवधारणा शायद यहीं से प्राप्त हुई होगी। दांत
की इन शक्तियों से संबंधित यह मत दंतयोगवादियों के द्वारा प्रतिपादित है।
इस पर शंका न करें।

संसारी व्यक्तियों के दांत लौकिक होते हैं जबकि सरकारी लोगों के दांत
अलौकिक। लौकिक दांत साकार होते हैं और ये मुंह में पाए जाते हैं। अलौकिक
दांत निराकार होते हैं। लोग कहते हैं, ये पेट में पाए जाते हैं।

दुनिया के सारे कर्म-कुकर्म के कर्ता-धर्ता सिर्फ निराकार दांत ही होते
हैं। बाबा तुलसी इन दांतो के विषय में जानते होते तो इनकी महिमा में कुछ
इस प्रकार की चैपाइयाँ लिखते-

बिनु पद चलहिं,सुनहिं बिनु काना।
दिखत नहीं, पर खावहिं नाना।।

भोगवादियों ने अलौकिक दांतों के तीन प्रकार बताए हैं। दिखाने के दांत,
खाने के दांत और पेट के दांत। धन्य हैं वे, जिन्हें ईश्वर ने ये तीनों
दांत बख्शे हैं। दुनिया में इन्हीं लोगों का बोलबाला है। चारों ओर इन्हीं
लोगों की जय-जयकार हो रही है। दुनिया में पहले ऐसे लोग बिरले होते थे, अब
दिन दूनी रात चैगुनी इनकी आबादी बढ़ रही है।

मुँह में जो दंतावलियाँ होती हैं और जिसे हम बत्तीसी कहते हैं, लौकिक
गुणों से युक्त साकार दांत होते हैं। आम लोग भ्रम वश इसे ही दिखाने, खाने
और पेट के दांत समझ बैठते हैं। लिहाजा न तो वे कुछ खा पाते हैं और न ही
तृप्त हो पाते हैं। फिर तो इनकी अतृप्त आत्माएँ जन्म जन्मांतर तक स्वाद
के भवसागर में भटकती रहती है। जनता नामक योनी में बार-बार जन्म लेती रहती
है। रो-धो कर जिन्दगी बिताती है। बीमारी और लाचारी में जीती है। शाक-भाजी
खा-खा कर आंतों का रोगी हो जाती है।

बत्तीसी के भरोसे न तो कुछ खाया जा सकता है और न खाए हुए को पचाया ही जा सकता है।

खाना और पचाना भी एक कला है। मैं तो कहता हूँ, यह कला ही नहीं,
कला-श्रेष्ठतम है। जिसके पास यह कला होती है वह अन्य सभी पर भारी पड़ता
हैं। ऐसे लोगों पर ऊपर वालों की सदैंव कृपा बनी रहती है। ऊपर वालों की एक
स्थापित, अटूट और मजबूत श्रृँखला होती है। हर ऊपर वाला अपने नीचे वाले का
पालन-कर्ता होता है।

खाने के दांत न सिर्फ खाने के अपितु कुतरने के भी काम आते हैं। एक बार
यदि ये खाने और कुतरने पर आमादा हो जाए तो चूहे भी इनके सामने पानी भरते
नजर आते हैं। दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसे ये खा और पचा न सके।
जीने और खाने का भरपूर और वास्तविक आनंद तो ऐसे दांत वाले ही लिया करते
हैं। संभवतः हमारे नेताओं, अधिकारियों और कर्मचारियों को ईश्वर ने ऐसे ही
दांत नवाजें हों? इनके पूर्वज बंदर तो कतई नहीं हो सकते, हां! चूहे जरूर
हो सकते हैं।

दिखाने के दांतों को साधारण दांत समझने की भूल कदापि न करें। इन्हीं के
पीछे काटने के दांत छिपे होते हैं। जिनके पास ऐसे दांत होते हैं, दुनिया
के सबसे जहरीले प्राणी होते हैं। साँप का काटा तो फिर भी जी जाए, इसका
काटा मजाल है कि पानी भी मांग ले। व्यापारियों, महाजनों-साहूकारों के
दांत जरूर इसी प्रकार के होते होंगे।

पेट के दांतधारी तो साक्षात अवतारी ही होते हैं। जहाँ-जहाँ ईश्वर पाया
जाता है वहाँ-वहाँ ये भी पाये जाते हैं। धर्म-कर्म का ठेका इन्हीं लोगों
के पास होता है। ये स्वयं को ईश्वर की ही औलाद मानते हैं। मजाल है कि ऐसे
दांत वालों से ईश्वर भी बच जाए?
अलौकिक दांतधारियों से ईश्वर इस देश की रक्षा करे।

000

3
आओ पूंछ विकसित करें


पूंछ के ऊपर की बिन्दी हटा लेने से पूछ बन जाता है। पूंछ विकसित करने का
यह सबसे बढ़िया, आसान और फूलप्रूफ तरीका है। आजकल वे सब, जिनके पूंछ उग आए
हैं, इसे छिपाने और पूंछ विकसित करने के लिए इसी तरीके का इस्तेमाल कर रहे
हैं। पूंछ पशुता की निशानी जो ठहरी।

जिस प्रकार बिना पूंछ का कुत्ता, कुत्ता नहीं उसी प्रकार बिना पूंछ का
आदमी आदमी नहीं। आजकल पूंछ का होना निहायत जरूरी है, कुत्ते के लिए भी और
आदमी के लिए भी। पूंछ हो तो नाक की जरूरत नहीं पड़ती। जैसे-जैसे पूंछ विकसित
होती है, नाक कटती जाती है। पहले सबके पास नाक हुआ करती थी, आजकल यह
दुर्लभ होती जा रही है। भविष्य में केवल इसके जीवाश्म ही मिलेंगे। तब
साहित्य और विज्ञान के स्नातक इस पर शोध करके पी. एच. डी. की उपाधि
प्राप्त कर रहे होंगे।

लोग अब नाक की चिंता कम और पूंछ की चिंता ज्यादा करने लगे हैं। हमारे
पूर्वज पूंछ की चिंता कम और नाक की चिंता अधिक करते थे। जमाना नाक का था,
मजाल है कि नाक पर एक मक्खी भी बैठ जाए। नाक की वजह से ही राम को रावण से
लड़ाई लड़नी पड़ी थी। अब नाक के दिन लद गए हैं। जमाना पूंछ का है। नाक वाला
कुत्ता भले ही मिल जाए, नाक वाला आदमी ढ़ूँढ़ कर तो बताओ!

पूंछ और पूंछ, दोनों में असीमित और अक्षय ऊर्जा नीहित होती है। इसी कारण
जहाँ कुत्ते अपनी पूंछ को संभालने में लगे रहते हैं वहीं आदमी अपने पूंछ
की चिंता में रात-दिन घुलते रहता है।

कुत्ते की पूंछ का ऐतिहासिक महत्व है। इसका हिलना परम आनंद-दायी होता है।
हिलती हुई पूंछ कहती है, - ’’तलवे चाटूँगी, लात खाऊँगी, तिरस्कार सहूँगी,
पर नमक हरामी कभी नहीं करूँगी।’’

पूंछ विकसित करता हुआ आदमी भी यही कहता है।

कुत्ते की पूंछ की ऐतिहासिकता पर अभी अमरिकी पेटेंट वालों की नजर शायद
नहीं पड़ी है वरना नीम और हल्दी के समान इसके भी पेटेंट का लफड़ा शुरू हो
चुका होता।

राज हठ, बाल हठ और त्रिया हठ की तरह पूंछ और पूंछ की भी अपनी हठ होती है -
ये सीधी कभी नहीं होतीं।

पूंछ और पूंछ का रिस्ता अटूट है। पूंछ वालों में उनकी ही गिनती होती है
जिसके आसपास हमेशा दो-चार पूंछ वाले पूंछ हिलाते हुए पाए जाते हैं।

कुत्ते की तुलना आदमी से करने की भला है किसी में हिम्मत? पर आदमी की
तुलना कुत्ते से करने में किसी को हिचक नहीं होती। आदमी झगड़ते हुए एक
दूसरे को कुत्ते की औलाद ही कहता है। अब तो अपने आप को कुत्ता कहलवा कर
आदमी गर्वित भी होने लगा है। कुत्ते आपस में झगड़ते वक्त कदाचित ही एक
दूसरे को आदमी की औलाद कहते होंगे। वे इतने गए गुजरे नहीं हैं। कोई आदमी
किसी कुत्ते को आदमी की औलाद कह दे तो कुत्ता शायद उसे कांट ले। नाक के
मामले में कुत्ते निश्चित ही आदमी पर भारी हैं। इतनी ऐतिहासिक पूंछ पाकर
भी उन्होंने अपनी नाक का महत्व कम नहीं होने दिया।

डार्विन अपने प्रसिद्ध विकासवाद के सिद्धांत को आज लिख रहा होता, तो यह
कभी नहीं लिखता कि विकास-क्रम में आदमी की पूंछ लुप्त हो गई है।

जैसे कुत्ते की पहचान उसकी पूंछ से होती है, उसी प्रकार आदमी की पहचान
पूंछ से होती है। दफ्तर में जिस आदमी की पूंछ सबसे ज्यादा होती है, वह बड़ा
बाबू होता है। समाज में जिसकी पूंछ अधिक होती है वह नेता होता है और
नेताओं में सर्वाधिक पूंछ वाला व्यक्ति प्रधान नेता होता है।

समझ-समझ का फेर है। पूंछ और पूंछ में बहुत ज्यादा बुनियादी अंतर नहीं
समझना चहिये। केवल बिंदी ही का तो अंतर है। इसी तरह पूंछ वालों और पूंछ
वालों में भी अंतर नहीं समझना चहिये।

पूंछ विकसित करना बड़ा सरल कार्य है। शायद इसीलिए आज पूंछ वालों की कोई कमी
नहीं है। हर गली-नुक्कड़ पर अपनी पूंछों का प्रदर्शन करते सैकड़ों लोग मिल
जएँगे; पूंछ हिलाते हुए जैसे कुत्ते मिल जाते हैं। चाहें तो आप भी अपनी
पूंछ विकसित कर सकते हैं। विधि बड़ी सरल है, आपको अपनी नाक थोड़ी सी कटवानी
पड़ेगी, बस। कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है। फिर आजकल नाक कटवाने
से कोई फर्क भी तो पड़ने वाला नहीं है न। विश्व के सारे सुदर्शन लोग आज
नकटे ही हैं। रैंप पर थिरकने वाली सुंदरियों की नाक आपने देखी है? फिर भी
यदि आप अपनी नाक न कटवाना चाहें तो कोई बात नहीं, चूने से भी काम चल सकता
है। जैसे कोई चंदन लगाता है, आप थोड़ा सा चूना अपनी नाक पर लगवा लें। बस
फिर क्या, आपकी भी पूंछ विकसित होनी शुरू हो जाएगी। बीच-बीच में धो-रि-भ्र
नामक उर्वरक का छिड़काव करते रहें।

घो-रि-भ्र अर्थात घोटाला, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार। यह हर जगह मुफ्त
में मिलता है। यदि जान-पहचान वालों को चूना लगाना आ जाय तो सोने पर
सुहागा समझो।

पूंछ विकसित करना हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। आओ पूंछ विकसित करें।

000

स्त्री विमर्श के सुलगते सवाल

(डॉ0 पुनीत बिसारिया)‘

image

‘प्राचीन और आधुनिक नारी की स्थिति में जो अंतर नज़र आता है, वो ऐसा जैसे किसी पुरानी किताब पर नया कवर चढ़ा दिया गया हो....’’

पूनम सिंह की फेसबुक वाल से ( दिनांक 09.11.2012)

समाज सामाजिक सम्बन्धों का जटिल जाल होता है और इन सम्बन्धों का निर्माता स्वयं मनुष्य है। सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ही समाज में संगठन एवं व्यवस्था स्थापित करते हुए इसे प्रगति एवं गतिशीलता की दिशा में ले जाने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहा है, किन्तु पुरूष मनुष्य का अर्थ पुरूषत्व मान लिया गया और स्त्री को इस कोटि से बहिष्कृत कर दिया गया। इसलिए पुरूष स्वभावतः अहंकारी हो गया और वह सामाजिक परिवेश में अपनी स्थिति सर्वोच्च स्तर पर रखने हेतु उत्सुक हो गया। यही मनोभाव पुरूष को पुरूष वर्चस्ववाद की ओर ले गया। फलतः यदि उसने स्त्री को अधिक पढ़ी लिखी, जागरूक, तर्कशील तथा बुद्धिमान पाया तो उसने उससे अपने लिए अन्दर ही अन्दर खतरा महसूस किया। यही सर्वोच्चता के बनावटी सिंहासन पर खतरे को हर एक झूठे अहंकारवाद का शिकार व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर पाया, क्योंकि पुरूष स्वभावतः अहंकारी है। वह अपनी सामाजिक स्थिति को सर्वोच्चतम स्तर पर रखकर देखता है, और स्त्री को न्यूनतम स्तर पर रखना पसन्द करता है। यदि स्त्री अधिक पढ़ी लिखी, जागरूक, तर्कशील, बुद्धिमान है तो उसकी सर्वोच्चता को शायद खतरा पैदा हो जायेगा और झूठे अहंकारवाद का शिकार व्यक्ति यह सब कैसे सहन कर लेगा कि एक स्त्री की सामाजिक आर्थिक स्थिति उससे उच्च हो जाये या उसके बराबर हो। आज तक यही होता आया है और आज भी उसके भीतर यही सोलहवीं शताब्दी की ग्रंथि काम कर रही है कि स्त्री उसकी ‘निजी सम्पत्ति‘ है, लेकिन इस सम्पत्ति की गुणवत्ता को वह कतई बढ़ाना नहीं चाहता। उसे कमजोर करके रखने में ही वह अपनी सुरक्षा समझता है। पुरूष के मन में यह भय, असुरक्षा की भावना और स्त्री को दबाकर कुचलकर नियन्त्रण में रखने की स्त्री विरोधी दृष्टि सदियों से काम कर रही है। कल का राजतंत्र का राजा अपने हरम के लिये हजारों रानियाँ जुटा सकता था और आज का प्रजातंत्र का क्लिंटन व्हाइट हाउस में मोनिका लेविंस्की से यौनाचार कर सकता है। आज का मध्य और निम्न वर्ग भी कोई अपवाद नहीं है। वह कभी सौतन, कभी सहेली, कभी कजिन, कभी क्लाइंट, कभी कुलीग, कभी कुछ और बहाने बनाकर औरत के दिल में लगातार छेद करता आया है। अब विद्धत्जनों को ‘सौतियाडाह‘ एवं ‘‘फीमेल जेलिसी‘ के पुर्लिंगों ‘रकीबी-डाह‘ एवं ‘मेल-जेलिसी‘ को शब्दकोशीय मान्यता दे देनी चाहिये।

आज शिक्षित-कामकाजी, अधिकार-सजग, बौद्धिक, अर्थस्वतंत्र पत्नियों ने पुरूषों के लिए अनेक तथाकथित समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। शिक्षा, राजनीति, खेल, धर्म, फिल्म, सेना, साहित्य, प्रशासन, मीडिया, संविधान और विज्ञान ने पत्नियों के लिए नए क्षितिज खोल दिये हैं। यह पति अनुगामिनी एक दिन सहगामिनी बन जाएगी, ‘आदम की पसली‘ से जन्म लेने वाली उसके सम्मुख हकूक की बात करेगी, पौराणिक कथाओं का अध्ययन करने वाली विश्वविद्यालयों में लाॅ क्लासेज लगाएगी अथवा नारीवादी नारे उछालेगी, नाखूनों से लेकर सिर के बालों तक अपने को ढँककर तीर्थयात्राएँ करने वाली के प्राण ब्यूटी पाॅर्लर में बस जायेंगे, बालाएँ अन्तरिक्ष को मुट्ठी में भर लेंगी, ऐसा तथाकथित पति परमेश्वरों ने कभी नहीं सोचा था।

जैसे-जैसे समाज में नारी की निरीह स्थिति में बदलाव आया है और वह अबला से सबला बनने की तरफ अग्रसर हुई है, वैसे-वैसे वह अपने अधिकारों के प्रति सजग और सचेत भी हुई है। परिणामस्वरूप पुरूष प्रधान समाज के बंधनों के खिलाफ उसने विद्रोह किया है। स्त्री के क्रांतिवीर तेवरों से परिवार की बुनियादें हिल गयी हैं और पारिवारिक विघटन भिन्न-भिन रूपों में समाज में पसरता जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि पुरूष का परम्परागत मध्ययुगीन मानस स्त्री के मौलिक अधिकारों को स्वीकार नहीं कर पाता। वह उसे दबाना चाहता है और स्त्री अपनी गुलाम मानसिकता वाली सती-साध्वी, प्रेयसी या पति-परमेश्वरी छवि को तोड़कर अपना स्वतंत्र वजूद बनाना चाहती है। सामंती समाज में स्त्री माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, दासी आदि के रूप में थी-उसका अपना अलग वजूद नहीं था। आधुनिकता और बौद्धिकता के कारण वह अपने निजी स्वरूप और अपनी भावनों एवं इच्छाओं के प्रति सचेत हुई है। इस सजगता से उसकी आकांक्षाओं एवं पुरूष के वर्चस्ववादी अहं में टकराहट हुई है और यहीं से उनके सम्बन्धों में दरार पड़नी शुरू हो गयी है। अभी भी पुरूष स्त्री में परम्परागत कुललक्ष्मी/कुलवधू वाले स्वरूप को ही ढूँढता है, वह उसी का आकंाक्षी है। स्त्री का आधुनिक होना उसे बर्दाश्त नहीं है, ऐसी स्त्री को वह कुलटा और परिवार तोड़ने वाली आदि विशेषणों से नवाजने लगता है तथा उस पर चरित्रहीनता और स्वैराचार का आरोप लगाना शुरू कर देता है।

‘समर्पण लो सेवा का सार‘ कहकर सम्भवतः प्रसाद जी नारी के उसी सामंती वर्चस्व को प्रिय लगने वाले रूप को प्रोत्साहित करते हैं जो अपनी सारी आकंक्षाओं को पुरूष के चरणों में समर्पित कर देती है। अपने व्यक्तित्व को पुरूष के ‘महान‘ व्यक्तित्व में गला-घुला देती है, किन्तु आधुनिक स्त्री नर-नारी समता में विश्वास करती है। आज की नारी मानती है कि पुरूषों से वह किसी मायने में कम नहीं है। इस तथ्य को डाॅ0 रमेश कुन्तल ‘मेघ‘ भी स्वीकार करते हैं - ‘‘आजकल नारी की ऐतिहासिक कर्म भूमिकाएँ (गृहिणी, धात्री, जननी, उपचारिका, सेविका, दासी आदि) जो शय्या और रसोई की धुरी में केन्द्रित थीं, अब बदल रही हैं। वह गृह के बाहर के काम-धन्धों को अपना रही हैं और गृह के अन्दर की नीरस मजदूरी से स्वतंत्र हो रही हैं। गृह की धुरी के ढीला होने के साथ ही विवाह की संस्था के अस्तित्व पर प्रश्न उठ रहे हैं अर्थात श्रम के विभाजन (घरे और बाहिरे) के सामंती आधार टूट रहे हैं और नई स्त्री ‘एक-यौनता की धारणा को स्वीकार कर रही है।‘‘

नारी जागरण का इतिहास

पूँजीवाद के उदय के साथ जीवन में आधुनिकता, बौद्धिकता का प्रवेश होता है, वैज्ञानिक दृष्टि का विकास होता है, स्त्री-पुरूष के समान अधिकारों की घोषणा होती है। इसके साथ ही हजारों सालों की बेडि़यां एक झटके के साथ टूट जाती हैं और स्त्री के कदम आत्मसम्मान की दिशा में बढ़ चलते हैं। स्त्री को कानूनी अधिकार मिलते हैं। सन् 1956 ई0 के पहले स्त्री का कानूनी अधिकार शून्य था। धीरे-धीरे अब उसमें बढ़ोत्तरी हो रही है और यहां से स्त्री की अपनी स्वतंत्र पहचान बननी शुरू होती है। स्त्री विमर्श की व्यापक जानकारी पाने के लिए विश्व स्तर पर घटने वाली चार महत्वपूर्ण घटनाओं को रेखांकित करना बेहद जरूरी हैः-

ऽ प्रथम, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, जिसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसी चिरवांछित मानवीय आकांक्षाओं को नैसर्गिक मानवीय अधिकार की गरिमा देकर राजतंत्र और साम्राज्यवाद के बरक्स लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के स्वस्थ और अभीप्सित विकल्प को प्रतिष्ठित किया।

ऽ द्वितीय, भारत में राजा राममोहन राय की लम्बी जद्दोजहद के बाद सन् 1829 में सतीप्रथा का कानूनी विरोध हुआ, जिसने पहली बार स्त्री के अस्तित्व को एक मनुष्य के रूप में स्वीकारा।

ऽ तृतीय, सन् 1848 ई0 में सिनेका फालस न्यूयार्क में ग्रिम बहनों की रहनुमाई में आयोजित तीन सौ स्त्री-पुरूषों की सभा, जिसने स्त्री दासत्व की लम्बी श्रंृखला को चुनौती देते हुए स्त्री मुक्ति आन्दोलन की नींव रखी।

ऽ चतुर्थ, सन् 1867 में प्रसिद्ध अंग्रेज दार्शनिक और चिंतक जाॅन स्टुअर्ट मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में स्त्री के वयस्क मताधिकार के लिए प्रस्ताव रखा जाना, जिसने स्त्री-पुरूष के बीच स्वीकारी जाने वाली अनिवार्य कानूनी और संवैधानिक समानता की अवधारणा को बल दिया।

संयुक्त रूप से ये चारों घटनायें एक तरह से विभाजक रेखाएँ हैं, जिनके एक ओर पूरे विश्व में स्त्री उत्पीड़न की लगभग एक सी सार्वभौमिक परम्परा है तो दूसरी ओर इससे मुक्ति की लगभग एक सी तड़प और अकुलाहट भरी संघर्ष कथा है।

भारतीय सन्दर्भ में स्त्री-विमर्श दो विपरीत धु्रवों पर टिका है। एक ओर परम्परागत भारतीय नारी की छवि है, जो सीता और सावित्री जैसे मिथकों में अपना मूर्त रूप पाती है, जिसे पश्चिम ‘होम मेकर‘ का नाम देता है, तो दूसरी ओर घर परिवार तोड़ने वाली स्वार्थी और कुलटा रूप में विख्यात तथाकथित आधुनिका एवं पाश्चात्य नारी की छवि है जो अक्सर सातवें-आठवें दशक की पुरानी फिल्मों में खलनायिका के रूप में उकेरी जाती है, और जिसे पाश्चात्य शब्दावली में ‘होम ब्रेकर‘ कहा जा सकता है।

साहित्य-जीवन की भावनात्मक अभिव्यक्ति होते हुए भी भावनाओं द्वारा अनुशासित नहीं होता। मूलतः वह बीज रूप में विचार से बंधा होता है, जिसका पल्लवन-पुष्पन भविष्य में होता है तो जड़ों का जटिल जाल सुदूर अतीत तक चला जाता है। अपने भौतिक अस्तित्व से ऊपर उठकर विराट को महसूसने की क्षमता ही लेखक के ज्ञान और संवेदना को उन्मुक्त और धनीभूत करते हुए विजन का रूप दे डालती है। यह विजन ही मुक्तिबोध के शब्दों में ज्ञान को ‘संवेदनात्मक ज्ञान‘ और संवेदना को ‘ज्ञानात्मक संवेदन‘ का रूप दे रचना में वांछित बौद्धिक संयम और अनुशासन बनाए रखता है। आलोचक को धड़कते जीवन से सीधे मुखातिब होना है, एक हाथ जीवन की नब्ज पर रखकर दूसरे हाथ से जीवन को प्रतिबिम्बित करती रचनाओं की नब्ज को टटोलना है। उसका दायित्व दोहरा और चुनौती भरा है।

विमर्श का अर्थ है ‘जीवन्त बहस‘। साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसे ‘विचार का गहन विचार‘ और ‘सर्वस्व की प्राप्ति की आकांक्षा‘ कहा जा सकता है। अंग्रेजी में इसके लिये ‘डिस्कोर्स‘ शब्द का प्रयोग किया जाता है, अर्थात किसी भी समस्या या स्थिति को एक कोण से न देखकर भिन्न मानसिकताओं, दृष्टियों, संस्कारों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं का समाहार करते हुए उलट-पलट कर देखना, उसे समग्रता से समझने की कोशिश करना और फिर मानवीय संदर्भों में निष्कर्ष प्राप्ति की चेष्टा करना या दूसरे शब्दों में किसी विषय पर अभी तक जो लेखन या विचार होता आया है, उस पर पुनः विचार कर उसकी दशा का मूल्यांकन करना ही विमर्श के अन्तर्गत आता है।

हिन्दी साहित्य में नारी विमर्श की जड़ें हम अत्यन्त प्राचीन काल से पाते हैं। ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी‘ अद्र्धाली लिखने वाले बाबा तुलसीदास को भी कुछ स्त्रियों की प्रशंसा करनी पड़ी थी।

नारी विमर्श की भोर की खुमार भरी नींद तोड़ने के लिए ‘देवरानी जेठानी की कहानी‘ और ‘भाग्यवती‘ सरीखी-रचनाओं को निश्शंक भाव से प्रभात फेरियों का दर्जा दिया जा सकता है। समाज सुधार के सजग और सायास गढ़े उद्देश्य, पात्र, कथानक और घटनाओं से बुनी इन रचनाओं में राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, रानाडे, महर्षि कर्वे, महर्षि दयानन्द तक के समाज सुधार आंदोलन की परम्परा, अनुगूंज और छाप साफ दिखाई पड़ती है। बाल विवाह विरोध, विधवा विवाह समर्थन, स्त्री शिक्षा आदि इनके प्रमुख विषय थे।

सन् 1760 ई0 में विद्यासागर बहुत ही मशक्कत के बाद कानूनी तौर पर लड़कियों के लिये विवाह की न्यूनतम आयु दस वर्ष करा पाये थे। सन् 1829 ई0 में बहुतेरे प्रयासों के बाद यह आयु बढ़ाकर तेरह वर्ष ही हो पाई थी। अठारह वर्ष न्यूनतम आयु का प्रावधान शारदा ऐक्ट 1856 ई0 के बाद ही सम्भव हो पाया था, जबकि ‘भाग्यवती‘ में श्रद्धाराम फिल्लौरी पं. उमादत्त के जरिये लड़के और लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु क्रमशः अठारह और ग्यारह वर्ष का संदेश देकर वक्त से थोड़ा आगे चलने का संकेत देते हैं।

सदी का वर्क बदलने का हिन्दी साहित्य में उभर कर आने वाला स्त्री-विमर्श इतना जड़, उपदेशात्मक और इकहरा नहीं रह गया था। लेकिन यह भी तय है कि उसका रेखांकन अब भी पुरूष और परिवार के सन्दर्भ में ही किया जाता था। इसकी प्रमुख वजह थी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में पुरूष नायकों के साथ स्त्रियों की प्रत्यक्ष भागीदारी। प्रारम्भ में समाज सुधारकों के परिवारों की स्त्रियाँ प्रादेशिक स्तर पर आम जनता के उद्बोधन का मंत्र फूंकने हेतु आगे बढ़ाई गई थीं, वक्त के साथ उन्होंने दो उल्लेखनीय कार्य किये। प्रथम, उन्होंने वैयक्तिक तौर पर परिवार के पुरूष अनुशासन, दिशा निर्देशन से मुक्त हो स्वायत्त सत्ता महसूस की। दूसरे, अपनी आवाज को संगठित कर उसे अखिल भारतीय पहचान देने की कोशिश की। सन् 1897 ई0 में ‘वीमेंस इंडियन एसोसियेशन‘ की स्थापना, सन् 1925 ई0 में ‘नेशनल काउंसिल आॅफ वीमेन इन इंडिया‘ की स्थापना और सन् 1927 ई0 में ‘अखिल भारतीय महिला परिषद‘ का अस्तित्व में आना अपने आप में ऐतिहासिक और क्रान्तिकारी घटनायें थीं, जिनकी अनुगूंज आज भी स्वतंत्र भारत के संविधान और कानून में सुनी जा सकती है। सन् 1946 ई0 में ‘अखिल भारतीय महिला परिषद्‘ द्वारा प्रस्तुत अधिकारों और कर्तव्यों के चार्टर में वर्णित कुछ मांगों को भारतीय संविधान में ज्यों का त्यों स्थान दिया गया। जैसे धारा 44 के अन्तर्गत लिंग, जाति धर्म के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक क्षेत्र में भेदभाव न किया जाना। धारा 16 के अन्तर्गत लिंग, जाति, धर्म के आधार पर सरकारी नौकरियों और दफ्तरों में भेदभाव न किया जाना। इसने स्त्री को अपनी चिरपोषित ‘अबला‘ छवि को तोड़कर एक नये जुझारू व्यक्तित्व और रचनाशील भूमिका में आविर्भूत होने के लिये प्रेरित किया। सामाजिक उथल-पुथल के इस दौर में हिन्दी कथा साहित्य भी नारी स्वायत्तता और स्वतंत्र चेतना को शिद्दत से चित्रित करता रहा। लेकिन विडम्बना यह रही कि इस बिन्दु पर आकर लेखक निर्वैयक्तिक नहीं रह पाया। उसका पुरूष अहं या संस्कार, जो भी कहें स्त्री की इस आत्मनिर्भर विचारवान संघर्षशील छवि को स्वीकार नहीं पाया।

हिन्दी के अति आरम्भिक उपन्यासों का उद्भव स्त्री-चेतना से ही हुआ, यह एक अटल सत्य है। स्त्री चेतना के बीज मन्त्र से हिन्दी के अति आरम्भिक उपन्यास अनुप्राणित रहे हैं, और इनका प्रारम्भिक उद्देश्य स्त्री चेतना की सर्वप्रथम प्राथमिकता में स्त्री शिक्षा निहित है। प्रथम गद्य रचना ‘देवरानी जेठानी की कहानी‘ से स्पष्ट है कि अशिक्षिता और मूर्ख महिलाएं परिवार के जीवन को अत्यन्त दुःखद और शिक्षित महिलाएं नरक तुल्य घर को स्वर्ग जैसा सुखद बना देती है। ‘‘हिन्दी में उपन्यास की रचना का श्रीगणेश स्त्री शिक्षा के निमित्त ही हुआ था। इस स्त्री शिक्षा के मूल में स्त्री चेतना ही है। ‘देवरानी जेठानी की कहानी‘, वामा शिक्षक‘, ‘भाग्यवती‘, सुन्दर शीर्षक, परीक्षागुरू आदि पूर्व के उपन्यासों में स्त्री चेतना ही मूलाधार है। आधुनिक काल में प्रेमचन्द की निर्मला में कितनी पच्चीकारी करके सामाजिक कुरीतियों की पृष्ठभूमि में नायिका निर्मला के जरिये औसत भारतीय स्त्री की आंसू भरी अनूठी तस्वीर गढ़ने की कोशिश की गई है। लेकिन उसे तोड़कर सुधा के रूप-रंग-रेखा विहीन चरित्र की आउटलाइंस दिलोदिमाग पर हावी हो जाती हंै। निर्मला की पीड़ा और दीनता के सेलीबे्रशन से सुधा के चरित्र का आकस्मिक एवं अविश्वसनीय टर्न कहीं ज़्यादा ज़रूरी लगता है। दूसरा उदाहरण ‘गोदान‘ की मालती के रूप में लिया जा सकता है जिसके पर कतरने के प्रयास में बेचारे प्रेमचन्द पसीने-पसीने हो गये हैं। मालती यानी सुशिक्षित, स्वतंत्रचेता आत्मनिर्भर प्रोफेशनल युवती जो पुत्र की तरह घर के दायित्वों को संभाले है और मित्र की तरह पुरूष मंडली में घूमती है, वर्जनाओं और कुण्ठाओं से मुक्त एक स्वस्थ व्यक्ति की तरह। उसकी यह पारदर्शी उन्मुक्तता ‘मेहतानुमा‘ पुरूषों के लिये खतरा है। इसलिये वे खिसियाकर फतवेबाजी करने लग जाते हैं- ‘स्त्री में जब पुरूष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है।‘‘

प्रेमचंद जो भी हों (मेहता या पुरूष) सर्जक के रूप में समाज को ‘कुलटाओं‘ का रोल माॅडल अपनी रचनाओं के जरिये नहीं दे सकते थे। इसलिये मालती की ऊर्जा और तेजस्विता को ‘चैनेलाइज‘ करते हुये वे उसे समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के वृहत्तर आयामों से जोड़कर विपरीत दिशा की ओर मोड़ देते हैं।

महादेवी वर्मा के अनुसार- ‘‘हमें न किसी पर जय चाहिये न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुत्व चाहिये, न किसी पर प्रभुता। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिये जिनका पुरूषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी।‘‘ (श्रंखला की कडि़याँ, अपनी बात से-महादेवी वर्मा)। अपनी सीमाओं के चलते प्रेमचंद भले ही युगानुरूप स्त्री की बदलती छवि अपनी रचनाओं में नहीं उकेर सके, लेकिन उन्हीं के समकालीन जैनेन्द्र ने निर्भीकतापूर्वक उसे मानवीय अस्मिता से दीप्त अवश्य किया, असल में हिन्दी कथा-साहित्य में यहीं से पहली बार स्त्री-विमर्श एक गम्भीर मानवीय-चिंता के रूप में नये आयाम और ऊँचाइयां लेने लगता है। कभी-कभी लगता है वह इंग्लैण्ड रिटन्र्ड मालती ही थी जो मेहता और प्रेमचन्द द्वारा थोपे गये कानूनों, वर्जनाओं, अनुशासनों के बीच भी अपने वजूद को पूरी ऊँचाई और फैलाव दे पाई। कोई सामान्य स्त्री होती तो शायद कल्याणी (उपन्यास-कल्याणी) की तरह स्वतन्त्रता और वर्जना, अस्मिता और पति सापेक्ष पत्नी की परतंत्र भूमिका के निरंतर द्वंद्व तले पिसे आत्मपीड़न और हिस्टीरिया की शिकार हो जाती। यह ठीक है कि प्रेमचन्द की तरह जैनेन्द्र के यहाँ सामाजिक सरोकार अपनी तमाम स्थूलता और व्यापकता में उपस्थित नहीं है, लेकिन ‘पत्नी‘ कहानी की सुनंदा और ‘त्यागपत्र‘ की मृणाल, अज्ञेय रचित ‘रोज‘ की मालती‘ और ‘नदी के द्वीप‘ की रेखा भी क्या बहुत गहराई से उस व्यवस्था को प्रश्न चिन्हित नहीं कर देतीं जो स्त्री को तिल भर भी स्पेस देने को तैयार नहीं है ?

स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में बाधक होने के कारण विवाह संस्था के प्रति पूर्णतया अनास्थावान होते हुये भी विवाह द्वारा मिलने वाली सामाजिक, मानसिक, आर्थिक सुरक्षा ने स्त्री कोे हमेशा निर्णायक रूप से दुर्बल बनाया। फलतः गालियों और आँसुओं के जरिये अपने आवेश और आक्रोश की ‘पनीली‘ अभिव्यक्ति और फिर पुरूषों तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के समक्ष विकल्पहीन समर्पण। उदाहरण के लिये शशिप्रभा शास्त्री के ‘नावें‘, एवं ‘सीढि़याँ‘ उपन्यास, मृदुला गर्ग का ‘उसके हिस्से की धूप‘, मंजुल भगत का ‘अनारो‘, कुसुम अंसल का ‘उसकी पंचवटी’, उषा प्रियंवदा का पचपन खंभे लाल दीवारें’ और रूकोगी नहीं राधिका’, मन्नू भण्डारी का ‘आपका बन्टी‘। आज अमृता प्रीतम (रसीदी टिकट), इस्मत चुगताई (लिहाफ), कृष्णा सोबती (सूरजमुखी अंधेरे के, मित्रों मरजानी) ममता कालिया (बेघर) प्रभा खेतान (छिन्नमस्ता, पीली आंधी), राजी सेठ (तत्सम), मेहरून्निसा परवेज (अकेला पलाश) कुसुम अंसल (अपनी अपनी यात्रा) मृणाल पाण्डेय (लड़कियां), अलका सरावगी कलिकथा-वाया बाइपास), नासिरा शर्मा (ठीकरे की मंगनी, शाल्मली), दीप्ति खण्डेलवाल (प्रतिध्वनियां, देह की सीता) आदि लेखिकायें स्त्री विमर्श को सुविचारित रूप में कथा साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत कर रही हैं। स्त्रियों के बहुआयामी जीवन की विसंगतियों और विडम्बनाओं को कतरा-दरकतरा निचोड़ता हुआ रेशा-दर-रेशा बुनता हुआ यह कथात्मक साहित्य उनकी जिन्दगी के अंधेरे कोनों में सूर्य रश्मियों की भाँति घुसकर आर-पार देखने का जोखिम उठा रहा है।

कृष्णा सोबती की नारी स्थूल दृष्टि में देखने पर कामनाओं द्वारा संचालित विशुद्ध देह के स्तर पर जीवन जीती नारी है, लेकिर जरा सी गहराई में उतरते ही वह स्त्री अस्मिता की ऊँचाइयों को छूने के प्रयास में जिन मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था व्यक्त करती हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। मित्रों और रत्ती के जरिये वर्जनात्मक स्त्री को उन्होंने पहले-पहल हिन्दी कथा साहित्य में इंट्रोड्यूस किया, वह पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ नब्बे के दशक में कर्मक्षेत्र में उतरी हैं। मैत्रेयी पुष्पा की नारी बनी-बनाई कसौटियों को तोड़ने या उन पर स्वयं कसने के तनाव भरे द्वन्द्व से मुक्त होकर समाज में अपनी पुख्ता पहचान बनाने के लिये विशेष रूप से आग्रहशील हुई है। मंदा (इदन्नमम), सारंग (चाक) और कदम बाई (अल्मा कबूतरी) इसकी उदाहरण हैं। आखिरी दशक के हिन्दी कथा साहित्य की स्त्री तमाम कोशिशों के बाद सहचर पुरूष को उतना मानवीय नहीं बना सकी, लेकिन अपने लिये आत्मसम्मानपूर्वक जीवन जीने का रास्ता अवश्य तलाश सकी है। मेहरून्निसा परवेज ने निश्चित रूप से स्त्री लेखन की जरूरत को स्पष्ट किया है कि नारी के मौन को शब्द नारी ही दे सकती है, उसके दुःख को औरत ही समझ सकती है। वह ही पहचान सकती है, औरत के शरीर पर अंकित घावों के निशानों को। पुरूष के लिये अब तक वह क्या थी ? ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो‘, रमणी, प्रेयसी, रुमानी ख्याल, यादों की सुन्दरी! लेकिन स्त्री ने देह पर अंकित खूनी घावों के निशानों को दिखाया है कि किस प्रकार वह उत्पीडि़त, उपेक्षित है।

निजी सुखों की झोंक में क्या व्यक्ति समाज को बदरंग भविष्य नहीं देगा ? ये कल्चर स्पर्म बैंक, सरोगेटेड मदर, ह्यूमन क्लोनिंग की सम्भावनाएं, समलिंगी सम्बन्धों के प्रति बढ़ती आसक्ति। इन पर गम्भीरतापूर्वक पहली बार दो टूक राय उठाने का जोखिम उठाया गया है मृदुला गर्ग ने अपने ‘कठगुलाब‘ उपन्यास में। मृदुला गर्ग मानती हैं कि पुरूष अनादिकाल से प्रकृति का अनवरत दोहन और स्त्री का मानसिक शोषण करता आया है जिसके चलते आज धरती और स्त्री दोनों बंजर हो गई हैं। दुलार और स्नेहिल स्पर्श से दोनों लहलहा सकती हैं। बशर्ते पुरूष डूबकर उनकी परिचर्या में जुट जाएं। आने वाला समय यदि बीहड़ और बंजर है तो हुआ करे, उर्वर सम्भावनाओं के बीज तो मुट्ठी में बंद हैं। उपन्यास का आस्थावादी स्वर तमाम वैज्ञानिक पेचीदगियों से मुठभेड़ कर अंततः मनुष्यता का जयघोष करता है। इक्कीसवीं सदी के स्त्री-विमर्श का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी‘ में देखा जा सकता है। विपिन के समरूप यहाँ रघुवर है और पत्नी सोनाली के आने से वह कार्य अपने स्तर पर तथा सोनाली के उपयोग के आधार पर करता है और सम्पूर्ण सृष्टि जैसे उसकी अभ्यर्थना में व्यस्त और नत हो जाती है।

डाॅ0 निर्मला अग्रवाल की मानंे तो यह कथा लेखन मुक्ति का मार्ग खोजती हुई आधुनिक स्त्री के जीवन के विविध पहलुओं को परत-दर-परत बड़ी ताकत के साथ उजागर करता है। यौन सम्बन्धों को लेकर स्त्री देह की शुचिता का प्रश्न हो, अपने व्यक्तित्व की स्वतंत्रता स्थापित करने की छटपटाहट हो, पुरूष की हवस का शिकार होती हुई स्त्री का प्रतिक्रियावादी आक्रोश हो, विवाहेतर या विवाहपूर्व पर पुरूष से दैहिक सम्बन्ध बनाने की बात हो या फिर स्वेच्छाचारी पति से किनारा करने का साहस हो, गरज यह है कि बहुत से मिथक जो समाज ने स्त्री के लिये रचे हैं, स्वच्छन्द और स्वायत्त होती हुई महानगरीय स्त्री के बिना किसी अपराध बोध के वे किस प्रकार टूट रहे हैं, यह देखने लायक है।

इसलिये आज ज़रूरी हो उठा है कि जो कुछ भी उपलब्ध हैः- समाज या परम्परा के रूप में, संस्थाओं, इतिहास और संस्कार के रूप में- उसका बेबाक भाव से मूल्यांकन किया जाये, वर्ग-वर्ण आदि लौकिक भेदों से ऊपर उठकर व्यक्ति को समाज तथा समाज को व्यक्ति के सन्दर्भ में पढ़-सुनकर उन्हें निरंतर ग्रो करने के लिये भरपूर स्पेस दिया जाये। स्त्री लेखिकाओं के लेखन के केन्द्र में स्त्री की भयावह समस्यायें हैं। पितृसत्तात्मक मर्यादाओं की तीखी आलोचना है जिसने स्त्री समाज का खुला दमन किया है। पाश्चात्य स्त्री लेखन की बात करें तो मेरीबाॅल स्टोनक्राफ्ट, बेट्टी फ्राउडन, सिमोन दी बोउवा, जर्मेन गियर, ब्लारा जेट किंग की कलमें स्त्री विमर्श पर अजीब शक्लें अख्तियार कर रही हैं, वहीं भारतीय स्त्री लेखन में कृष्णा सोबती का लेखन हो अथवा महाश्वेता देवी का, मन्नू भण्डारी का लेखन हो अथवा आशापूर्णा देवी या इस्मत चुगताई का अथवा गगन गिल का, चित्रा मुद्गल का लेखन हो अथवा मेहरून्निसा परवेज का, उसमें स्त्री मुक्ति के लिये जो फीडबैक आ रही है वह स्त्री समाज की चेतना का विकास कर सकेगी। हालाँकि इस दिशा में एक लम्बी, बीहड़ यात्रा तय करनी है।

स्त्री चेतना का सीधा सम्बन्ध संस्कारों, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से है। अक्सर यह देखने में आता है कि आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच साहित्य के मुख्य सरोकार पीछे छूट जाते हैं। स्त्रियों की समस्या समूचे राष्ट्र की समस्या है, जिसने विकास की प्रक्रिया को बाधित ही नहीं किया है बल्कि उसे अवरूद्ध भी किया है क्योंकि भारतीय समाज में लिंग असमानता के आधार पर जो विभाजन/बंटवारा हुआ उसकी ही देन है, स्त्रियों को हाशिए में कर देना। पुरूष अभी भी स्त्री की प्रगति को पचा नहीं पाता है और उसकी प्रगति के पथ को सीमित करने की चेष्टा करता रहता है। यही सोच उसे संकीर्णता के दायरे में ला देती है। इन मत/मतान्तरों को लेकर साहित्य जगत दो खेमों में बंटता स्पष्ट नजर आ रहा है। हिन्दी साहित्य में स्त्री लेखन/चिंतन पर लगातार बहस चल रही है। इस पर तरह-तरह के आरोप/प्रत्यारोप लगाये जा रहे हैं, और स्त्री लेखिकायें उसका सम्यक उत्तर भी दे रही हैं लेकिन स्त्री साहित्य पर लगाये जा रहे आरोपों का सबसे बड़ा उत्तर स्त्री लेखन साहित्य का रचनात्मक उत्थान ही सिद्ध हो रहा है।

किसी भी समय व समाज की वास्तविक स्थिति जाननी हो तो उसमें स्त्री की स्थिति पर विचार करना लाजमी/प्रासंगिक होगा। दलित प्रश्न की तरह ही नारी प्रश्न आज ज्वलंत विषय है। वास्तविकता यह है कि ये दोनों दलित वर्ग आज अपने अस्तित्व और अस्मिता पर स्वयं विचार करने के लिये जागे हैं। इनकी समस्त बेचैनी मनुष्य को और अधिक मनुष्य अर्थात मानवीय बनाने के प्रयत्न हैं। जब स्त्री को लगा कि उसका अस्तित्व, स्थान, अधिकार और आज़ादी संकट में है ऐसे समय में उसे अपने विचारों को अभिव्यक्ति देनी पड़ी। इसलिये स्त्री-विमर्श का मूल स्वर प्रतिरोध का रहा। उसका विचार लोक स्वाभाविक रूप से विकास नहीं पाता क्योंकि छवि के बने बनाये चैखटों को तोड़कर बाहर निकलने की छटपटाहट स्त्री के अन्दर युगों से चल रही है। हकीकत यह है कि जब नारीवाद नाम का ब्रांड बिकाऊ नहीं बना था तब भी मुक्ति और परिवर्तन की कामना स्त्री की चेतना में गहरे बैठी थी।

स्त्री लेखन पर यह आरोप कि यह संभावनापूर्ण नहीं है, यह सीमित यथार्थ को लेकर चलना है या चहारदीवारियों के बीच ही घुमड़ते रहना है, उसे और उसके यथार्थ को लेकर बेजा प्रश्न उपस्थित करना है। सिद्धान्त के स्तर पर यद्यपि यह बात बहुत प्रीतकर नहीं लगती कि लेखन के क्षेत्र में लेखकों या लेखिकाओं में भेद किया जाये, क्योंकि सृजन जिस प्रकार की मानसिक सक्रियता का परिणाम है, वह दोनों में एक-सी है और सृजन-परिणाम भी रचना में निहित अर्थवत्ता के अनुपात से नापा जाता है, जातिगत विशिष्टताओं से नहीं, फिर भी भेद का प्रश्न यदि उठता है तो मुख्यतः रचनात्मक प्रतिभा की मूल प्रकृति को जानने के लिये, जो अपनी क्रियाशीलता में उन दोनों के लेखन में प्रायः किन्हीं तत्वों की भिन्नता के रूप में प्रकट होती है। उदाहरण के लिये कथ्य का चुनाव किन्हीं चीजों के प्रति भिन्न प्रकार की एकाग्रता या उदासीनता, कुछ पूर्वाग्रह, चिंतायें और सरोकार इसका तात्कालिक सम्बन्ध अपने-अपने अनुभव वृत्तों से जुड़ा रहता ही है परन्तु इसका मुख्य और महत्वपूर्ण आधार एक सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश भी है जो दोनों को भिन्न करता है जैसे कि परिवेश के प्राथमिक भिन्न-भिन्न दबाव और तनाव के केन्द्र अलग-अलग, स्वीकृति के स्थल और संस्कार अलग-अलग, अधिकारों-कत्र्तव्यों का विधान अलग-अलग, परिणाम में व्यक्तित्व की बनावट अलग-अलग और अंततः तो जहाँ पहुँचना है उसका संघर्ष भी जुदा-जुदा, पुरूष स्वीकृत हो चुका है और स्त्री स्वीकृति के लिये संघर्षरत है। यहां हमारे अन्वेषण का यह विषय होगा कि दोनों के व्यक्तित्व के घटकों को कैसे एक दूसरे के समक्ष रखा जाये ? जो दोनों के जीवन को देखने और समझने के रवैये को भिन्न कर देते हैं साथ ही उसी अनुपात में लेखन के भेद को भी रेखांकित करता है, यहीं से/इसी बिन्दु से उस भेद को समझा जा सकता है जो स्त्री-लेखन और पुरूष-लेखन के मूल में है।

साहित्य की रचना प्रक्रिया में सहानुभूति और स्वानुभूति में वैसा फर्क नहीं रह जाता, जैसा कि विचारों के स्तर पर हम समझते हैं। वहाँ सब रचनाकार की आत्मानुभूति का अंग/भाग बन जाता है क्योंकि रचना प्रक्रिया में सहानुभूति और आभ्यंतरीकरण के साथ-साथ अंगीकरण भी होता है। यही कारण है कि रचनाकार की चेतना में रच-बसकर रचनाकार की संवेदनशीलता का अंग बन जाता है। रचनाकार रचना करता है/सृजन करता है। वह अपने विस्तृत/अपार काव्य संसार का प्रजापति होता है। रचना के जरिये दूसरों को जगाता है, नई चेतना/नये मूल्य/नये सम्बन्ध का निर्माण करना चाहता है। रचनाशीलता की इस विकास यात्रा ने कई सदियों का लम्बा सफर तय किया है। इस महासफर में कई धाराओं, मत मतान्तरों से गुजरकर हिन्दी साहित्य अपने रूप में आया है। साहित्य में अनेक धारायें विकसित होना उसकी गौरवशाली परम्परा/समृद्धता और उसके उत्कर्ष की निशानी है परन्तु इस उत्कर्ष में समय-समय पर इस मत/मतान्तरों और धाराओं को लेकर रचनाकारों में मतभेद उठना स्वाभाविक/सहज है।

वैसे देखा जाये तो स्त्री के अधिकारों एवं उसकी विडम्बनाजन्य/त्रासदीपूर्ण स्थिति को लेकर संघर्ष का इतिहास काफी पुराना है। परन्तु पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में इस स्थिति में कुछ अंतर अवश्य आया है क्योंकि आज यह विमर्श की शक्ल में परिणत हो चुका है। इस विमर्श/चिंतन की सबसे बड़ी सार्थकता इस अर्थ में भी है कि सदियों से पुरूषत्ववादी ‘गुलामी एवं शोषण‘ के विरूद्ध अपनी सामाजिक-अस्मिता, स्वतन्त्रता, समानता, मुक्ति एवं अधिकारों के सन्दर्भ में वैश्विक स्तर पर सभी वर्ग की स्त्रियों में एकजुटता दिखलाई पड़ती है। यह ध्रुव सत्य है कि किसी भी समाज का अस्तित्व स्त्री-पुरूष दोनों के पारम्परिक सम्बन्धों के सन्तुलन पर निर्भर करता है क्योंकि समाज को बनाये रखने में यदि बाह्य स्तर पर पुरूष का योगदान है तो वहीं समाज के महत्त्वपूर्ण हिस्से परिवार को आधार प्रदान करने का श्रेय स्त्रियों के खाते में जाता है। फिर इन मर्यादाओं का बंधन स्त्री के ही ऊपर ही क्यों ? समाज में स्त्री की दोयम दर्जे की स्थिति क्यों ? वर्तमान समय में इन्हीं प्रश्नों की मूल में रखकर स्त्री चिंतन/लेखन आन्दोलन का एक नया आयाम ग्रहण कर चुका है। स्त्री के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्थितियों से जुड़े हुये वे सभी प्रश्न इन विमर्शों के मूल में हैं। इस पर व्यापक विमर्श/चिंतन अपेक्षित है एवं इस पर विवेकपूर्ण अन्वेषण/अनुसंधान की आवश्यकता है।

‘वह’ और हम

    ‘उसकी’ कीटनाशक दवाओं को आदमियों पर ही इतना प्रेम क्यों?
    ज़हर...जब मिथाइल आइसो साइनेड़ के छद्म वेष में...
    शहर पर टूट पड़ी- तब
    उन अंधियारे क्षणों के सामने हीरोशिमा और नागासाकी की बमबाजी ही नहीं,
    ‘नौ ग्यारह’ वाले आतंकवादी हमले भी नगण्य हैं।
    टोपीवाले का मायाजाल ही कुछ ऐसा है...

    उसकी चालबाजी ऐसी है कि-
    खुली हवा का बहाना देकर हमारे दरवाजे में ही छेद कर डालेगा!
    बहुत पुराने जमाने में वास्को-द-गामा आकर काली मिर्च का पौधा माँगना हो या-
    कम्पनी वाले का आकर तीन कदमों की ज़मीन माँगना...
    हमारी आँखें छिपाकर हमारी खोपड़ी में उसका झण्डा गाड़ने के लिए ही!
    हमारी मांसपेशियों को मसलकर
    हमारी फसलों को जहाजों पर लादकर ले जाने के लिए ही!
    यह सब तो अब पुरानी कहानी हो चुकी।
    नयी कहानी में हम कहाँ ठहरे हैं?
    वामन के वर माँगने से पहले ही अपना सिर दिखाने वाले सम्राट बलि हैं हम!
    पृथ्वी को चटाई की तरह मोड़कर-
    ‘उसके’ पैरों तले बिछाने के लिए होड़ाहोड़ी करने वाले कलियुग-कर्ण हैं हम!
    अपने रूपये की प्राणवायु को
    ‘उसके’ डॉलर की जीविका हेतु तिनके की भांति समर्पित कर देने वाले बावले सौदागर हैं हम!
    हमारी दरियादिली तो इतनी है कि-
    अपने गाँवों को ढ़हाकर, सड़कों को चौड़ा बनाते हैं..
    ताकि उसके हवाई जहाज ठीक से ज़मीन पर उतरें!
    उसकी जीभ सीधी नहीं चल सकती- इसलिए
    हमारी अपनी जुबान को टेढ़ा बनाने में भी हम संकोच नहीं करते!
    उसकी अणुदुकानों के लिए -
    अपनी अन्नपूर्णा के पेट में आग लगाने के लिए भी हम तैयार!
    हमारी ‘सर्व प्रभुत्व संपन्नता’ एक तमाशा है-
    उसे देखकर खुशी के मारे तालियाँ बजाना ही हमारा बड़प्पन है।
    अणु समझौते के कारण भविष्य में संपन्न होने वाले भारतीय चेर्नोबिल नाटक के लिए
    पच्चीस साल पहले ही शुरू हो चुका है-
    ‘भूपाल राग’....सुनते हो कि नहीं!

।।।।।
तेलुगु मूल :- कर्लपालेम् हनुमन्त राव
अनुवाद :- दण्डिभोट्ला नागेश्वर राव

Dr. D. Nageswara Rao, Assistant Professor, 

Department of Hindi, 

Faculty of Sanskrit and Indian Culture, 

SCSVMV (Deemed) University, Kanchipuram 631561

http://www.kanchiuniv.ac.in/hindi/faculty/faculty1.html

धूमिल की कविता में आदमी

डॉ. विजय शिंदे

प्रस्तावना –

सुदामा पांडे ‘धूमिल’ जी का नाम हिंदी साहित्य में सम्मान के साथ लिया जाता है। तीन ही कविता संग्रह लिखे पर सारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था और देश की स्थितियों को नापने में सफल रहें। समकालीन कविता के दौर में एक ताकतवर आवाज के नाते इनकी पहचान रही हैं। इनकी कविताओं में सहज, सरल और चोटिल भाषा के वाग्बाण हैं, जो पढ़ने और सुनने वाले को घायल करते हैं। कविताओं में संवादात्मकता है, प्रवाहात्मकता है, प्रश्नार्थकता है। कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि मानो हम ही अपने अंतर्मन से संवाद कर रहे हो। आदमी हमेशा चेहरों पर चेहरे चढाकर अपनी मूल पहचान गुम कर देता है। नकाब और नकली चेहरों के माध्यम से हमेशा समाज में अपने-आपको प्रस्तुत करता है, पर वह अपने अंतर आत्मा के आईने के सामने हमेशा नंगा रहता है। उसे अच्छी तरह से पता होता है कि मैं कौन हूं और आदमी होने के नाते मेरी औकात क्या है।

‘धूमिल’ की कई कविताओं में रह-रहकर ‘आदमी’ आ जाता है और आदमी यह शब्द ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ का प्रतिनिधित्व करता है। 1947 को आजादी मिली और हर एक व्यक्ति खुद को बेहतर बनाने में जूट गया। देश विभाजन के दौरान आदमीयत धर्मों के कारण दांव पर लगी थी। विभाजन के बाद दो अलग-अलग राष्ट्र हो गए पर एकता गायब हो गई, हर जगह पर आदमी आदमी को कुचलने लगा। आजादी के बाद जो सपने प्रत्येक भारतवासी ने देखे थे वह खंड़-खड़ हो गए और उस स्थिति से निराशा, दुःख, पीडा, मोहभंग, भ्रमभंग से नाराजी के शब्द फूटने लगे। इन स्थितियों में हर बार इंसानियत, मानवीयता और आदमीयत दांव पर लगी, वह चोटिल होकर तड़पने लगी तथा उसे तार-तार किया गया उसका शरीर चौराहे पर टांगा गया। धूमिल की कविता में इसी आदमी का बार-बार जिक्र हुआ है।

1. गायब चेहरे -

आबादी की दृष्टि से दुनिया का नंबर वन देश। बच्चे पैदा करने की होड़ में सबसे आगे है। अब ऐसी स्थितियां है कि कितनी भी रोक लगे बढ़ना जारी रहेगा। आदमी का हनन हो गया है और उसे चिटियां माना जाने लगा है। भीड़ में चेहरे गायब हो गए हैं। गति और व्यस्थता इतनी बढी कि भीड़ के भीतर भी हर व्यक्ति अकेलापन महसूस कर रहा है। कई झंडों तले बिखरा आदमी जुलूस तो निकाल रहा है पर प्रश्न निर्माण होता है क्यों? जुलूस से भीड़ तो बनती है पर आवाज गायब है और चेहरा भी। एक ‘चीख’ सुनते ही सारा नगर सजग होता था पर अब इंसानियत खत्म हो चुकी है। गायब, खोए चेहरे और हजारों चीखों में भी हमारे कान बहरे हो गए हैं। अतः धूमिल आवाहन कर रहे हैं कि बगल के आदमी के चेहरों को पढ़ने की कोशिश करो।

"अगर हो सके तो बगल से गुजरते हुए आदमी से कहो –

लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,

यह जुलूस के पीछे गिर पडा था।"

(कविता – ‘संसद से सड़क तक’)

‘लोहे का स्वाद’ कविता में इस स्थिति को और कारगर तरीके से कवि व्यक्त कर रहे हैं –

"शब्द किस तरह

कविता बनते हैं

इसे देखो

अक्षरों के बीच गिरे हुए

आदमी को पढो।"

आजादी के बाद अमीर अमीर और गरीब गरीब होते जा रहा है। अमीर और गरीबों के बीच में गहरी खाई निर्माण हो गई है। भारत में एक साथ दो देश निवास कर रहे हैं, एक अमीर देश और एक गरीब देश। कडी मेहनत, धूप, तूफान, बारिश, संघर्ष गरीबों की जिंदगी खाने लगता है और आदमी समय से पहले अनेक तनावों के चलते बूढा होने लगता है।

"यह कौनसा प्रजातांत्रिक नुस्खा है

कि जिस उम्र में

मेरी मां का चेहरा

झुर्रियों की झोली बन गया है

उसी उम्र की मेरी पड़ोस की महिला

के चेहरे पर

मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा

लोच है।"

(‘अकाल दर्शन’ – संसद से सड़क तक)

2. तटस्थता –

आदमी की तटस्थता और चुप्पी हमेशा घातक होती है। आप दुनिया के भीतर रहकर दुनिया से अलग और तटस्थ नहीं रह सकते हैं। आस-पास हजारों घटनाएं घटित होती है पर हम आंख मूंद कर बैठे हैं, यह स्थिति निर्जीविता दिखाती है। खैर हम अपनी मन शांति के लिए तटस्थता का जामा पहना देते हैं पर असल में ऐसी स्थितियां जिंदा लाश जैसी ही होती है। देशभक्ति, क्रांति, संघर्ष, लडाई, विरोध, एकता... आदि शब्द आम आदमी के लिए अबूझ लगते हैं। रोजमर्रा की मुश्किलों से समय ही बचा नहीं कि इस पर सोचे। छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करते-करते उसकी सारी ताकत पस्त हो रही है।

"वे इस कदर पस्त है

कि तटस्थ हैं।

और मैं सोचने लगता हूं कि इस देश में

एकता युद्ध की और दया

अकाल की पूंजी है।

क्रांति –

यहां के असंग लोगों के लिए

किसी अबोध बच्चे के –

हाथों की जूजी है।"

(‘अकाल दर्शन’ – संसद से सड़क तक)

3. समझदार लोग –

भारत में मध्यवर्ग नुकीली कीलों पर कसरत करता है। थोडा-सा भार इधर-उधर हुआ कि कीलें पैरों में धंसने की संभावनाएं होती हैं। आर्थिक स्थितियों की कमजोरी महंगा खरेदने नहीं देती और कम कीमतों वाला सुहाता नहीं, अजीब उलझन है। एक झूठ के पीछे दौड़ हमेशा जारी रहती है। अच्छा चाहिए और कम कीमत में और कीमत भी छीपी रहे ऐसी मानसिकता। रुपए दो रुपयों के लिए घंटों विवाद करना और कूतना उसकी फितरत है। समझदार लोगों की बेमतलब की समझदारी पर धूमिल आघात करते लिखते हैं –

"वसंत

मेरे उत्साहित हाथों में एक

जरूरत है

जिसके संदर्भ में समझदार लोग

चीजों को

घटी हुई दरों में कूतते हैं

और कहते हैः

सौंदर्य में स्वाद का मेल

जब नहीं मिलता

कुत्ते महुए के फूल पर

मूतते हैं।"

(‘वसंत’ – संसद से सड़क तक)

4. बोल बच्चन –

देश में नेताओं की भीड़ बढ़ चुकी हैं और हर एक आदमी भाषा के बलबूते पर सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहा है। काम करना या बात को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश कोई भी नहीं कर रहा है। केवल मुंह से हां-हूं कर हवा छोड़ना ही उसका कार्य हुआ है। अर्थात् बोल बच्चनों की संख्या देश में बढ़ चुकी है। भीड़ में, सड़कों पर, बहसों में आदमी हमेशा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है। यह स्थिति संसद से लेकर सड़क तक देखी जा सकती है। ऐसे लोगों पर करारा व्यंग्य करते धूमिल उनकी पोल खोल देते हैं –

"जब

सड़कों में होता हूं

बहसों में होता हूं;

रह-रह चहकता हूं

लेकिन हर बार वापस घर लौटकर

कमरे के अपने एकांत में

जूते से निकाले गए पांव-सा

महकता हूं।"

(‘एकांत कथा’ – संसद से सड़क तक)

यह सड़न, बदबू की उपमा अकर्मण्य आदमी और बोल बच्चनों के लिए जोरदार थप्पड़ है।

5. चापलूसी –

कुत्ता ईमानदारी का प्रतीक है वैसे ही चापलूसों के लिए भी सही उपमान है। चंद टुकडों के लिए सारी ईमानदारी मालिक के पैरों पर झोंकना कुत्ते का धर्म है। इस धर्म का बडी ईमानदारी से चापलूस आदमी भी अनुकरण करता है। ईमानदारी बुरी चीज नहीं है पर स्वार्थ और लालच तले की ईमानदारी चापलूसी होती है। वर्तमान में ऐसे चापलूसों की संख्या बडी तादाद में हैं केवल नजर दौडाने का अवकाश चापलूस पकड़ में आ जाते हैं। ऐसे लोगों को मालिक भी खास समय के लिए पालता-पोसता है। केवल आवाज देने का अवकाश कि ऐसे लोग दौड़कर पैर चाटना शुरू कर देते हैं। बेवजह दूम हिलाने लगते हैं। ऐसे लोगों का मन कभी-कभार अपनी स्थिति से नाराज होता है, एकाध बार ही ऐसा मौका आ जाता है। नहीं तो हमेशा चापलूसी करने में मस्त रहते हैं।

"साल में सिर्फ एक बार

अपने खून से जहर मोहरा तलाशती हुई

मादा को बाहर निकालने के लिए

वह तुम्हारी जंजीरों से

शिकायत करता है

अन्यथा, पूरा का पूरा वर्ष

उसके लिए घास है

उसकी सही जगह तुम्हारे पैरों के पास है।"

(‘कुत्ता’ – संसद से सड़क तक)

6. आदमी की तलाश –

धूमिल प्रत्येक कविता के भीतर आदमी को ढूंढने की कोशिश करते हैं। उसकी सही नाप, लंबाई, चौडाई आंकने की कोशिश जारी रखते हैं पर वह हर बार कवि को चकमा देता है। कवि के लिए आदमी मानो वेताल बन गया हो जो हमेशा विक्रम को बातों में उलझाकर भाग जाता है। आदमी की हंसी-खुशी सब कुछ झूठी लगती है और उस खुशी को आंकने की कवि कोशिश भी धोका खाती है। पल-पल रंग बदलता आदमी धूमिल की पकड़ में आते-आते अगले पन्ने पर जाकर बैठता है।

"जब वह हंसता है उसका मुख

धक्का खाई हुई ‘रीम’ की तरह

उदास फैल जाता है

मेरे पास अक्सर एक आदमी आता है

और हर बार मेरी डायरी के अगले पन्ने पर

बैठ जाता है।"

(‘एक आदमी’ – संसद से सड़क तक)

7. मोहभंग -

आजादी सबके लिए खुशहाली लेकर आएगी ऐसा प्रत्येक भारतवासी का सपना था पर सपना टूटता है। टूटे बिखरे सपने से चकनाचूर लोग दुःखी और पीडित हैं। कभी-कभार यह भी कहते पाए जाते हैं कि इससे बेहतर अंग्रेजों का शासन था। आज आजादी के पहले वाली पीढी बहुत कम बची है। अतः ऐसे स्थितियों की तुलना करना थोडा मुश्किल होगा परंतु यह बात सबके लिए स्वीकार्य है कि असल आजादी का सुख आम आदमी के हिस्से नहीं है। प्रत्येक आदमी का बाप कहीं न कहीं मौजूद है और वह उसे गुलाम बनाए रखता है। सिर झुकाए हां में हां मिलाना मजबूरी बनी है। मजबूरी, शोषण के तले आज का प्रत्येक आदमी पीडादायी जिंदगी जी रहा है। स्पर्धात्मक युग की दौड़ में कौन क्या कर रहा है, किसकी क्या पीडाएं हैं, किसके आंखों में आंसू भरे हैं देखने का समय नहीं और कोई देखना भी नहीं चाहता। मन तो करता है कि आक्रोश करें, छाती पीटे पर हलक से आवाज ही बाहर नहीं निकलती। कवि के शब्दों में –

"सभी दुःखी हैं

सबकी वीर्य-वाहिनी नलियां

सायकिलों से रगड-रगड कर

पिंची हुई है

दौड़ रहे हैं सब

सम जड़त्व की विषम प्रतिक्रिया

सबकी आंखें सजल

मुट्ठियां भिंची हुई है।

(‘नगर कथा’ – कल सुनना मुझे)

8. आदमी का षड़यंत्र और नकार -

जब से संसार में आदमी ने कदम रखा है तब से वह अपने जैसे ही दूसरे आदमी के विरुद्ध षड़यंत्र करते आ रहा है। एक-दूसरे के पैर खिंचना और विरोधी माहौल बनाना कोई आदमी से सीखे। हमेशा दूसरे की छाती पर पैर रखकर अपनी उंचाई बढाने की और जान बचाने की कोशिश होती है। भारतीय प्रजातंत्र में सत्ता की कुर्सी तक आदमी को मौत के घाट उतार कर ही पहुंचा जा सकता है। सत्ता केवल राजनैतिक ही नहीं तो हर जगह की कुर्सी और उसकी गर्मी आदमी को आकर्षित करती है वहां आदमीयत बाकी रहना तो नामुमकिन है।

"न कोई प्रजा है

न कोई तंत्र है

यह आदमी के खिलाफ

आदमी का खुला-सा

षड़यंत्र है।"

(सुदामा पांडे का प्रजातंत्र – एक)

स्वार्थ, अहं, घमंड़ और गुर्मी बढ़ चुकी है। हर कुर्सी वाला गुर्रा रहा है। अपनी गोटियां बिठाने के लिए और अपने लाभ के लिए आदमी होकर भी आदमी को पहचानने से इंकार कर रहा है। सत्ता की गर्मी से मस्त जिस आदमी के कारण अपनी कुर्सी बनी है उसे ही नकारता है।

"कल सुदामा पांडे मिले थे

हरहुआ बाजार में। खुश थे।

बबूल के वन में वसंत से खिले थे।

टकारते हुए बोले, यार! खूब हो

देखते हो और कतारने लगते हो,

गोया दोस्ती न हुई, चलती-फिरती उब हो

आदमी देखते हो, सूख जाते हो

पानी देखते ही गाने लगते हो।"

(सुदामा पांडे का प्रजातंत्र - एक)

9. आदमी की बेबसी और मूल्य हनन –

आजादी के बाद देशी काले अंग्रेजों ने अपना सिर ऊपर उठाया और अपने लोगों पर अत्याचार करना शुरू किया। जिसके हाथों में सत्ता, संपत्ति और अधिकार आए वह शेर हो गया और आम जनता को मेमना समझ डराने-धमकाने लगा। सामान्य आदमी के पास कोई ताकत न होने के कारण दिनों-दिन बेबस होता गया और उसकी आवाज भी गायब हो गई। उसकी भाषा गिर गई और बेबस स्थिति में उसको चेहरा छुपाने की नौबत आ गई ताकि जुल्म करने वालों से बचा जाए। पर उसको ढूंढ-ढूंढकर मारा-पीटा जा रहा है, उसका शोषण किया जा रहा है। अर्थात् आदमी हल्का होता गया।

"हल्का वह होता है,

लेकिन हर हाल में

आदमी को बचना है

गिरी हुई भाषा के खोल में

चेहरा छिपाता है

लेकिन क्या बचता है?"

(‘वसंत से बातचीत का लम्हा’ – सुदामा पांडे का प्रजातंत्र)

‘मोचीराम’ नामक एक लंबी कविता धूमिल जी ने लिखी जिसमें आदमी का सर्वांग मूल्यांकन कवि ने किया है और आदमीयत के हनन का भी जिक्र किया है। जैसे मोची के लिए फटे जूते और चप्पल एक जैसे होते हैं वैसे ही सत्ताधीशों के लिए आदमी का मूल्य जूतों से ज्यादा नहीं। वर्तमान युग में आदमीयत का मूल्य हनन हो चुका है उस पर व्यंग्यात्मक प्रकाश डालते धूमिल ‘मोचीराम’ के माध्यम से कहते हैं -

"बाबूजी सच कहूं – ‘मेरी निगाह में

न कोई छोटा है

न कोई बढा है

मेरे लिए हर आदमी एक जोडी जूता है

जो मेरे सामने

मरम्मत के लिए खडा है।"

10. किसान की दयनीयता –

हमारा देश कहने के लिए कृषि प्रधान है, कहने के लिए किसानों का देश है। किसानों के देश में सबसे ज्यादा अन्याय किसानों पर ही होता है और सबसे ज्यादा उपेक्षा भी किसानों की ही होती है। जो अनाज की उपज कर रहा है उसके लिए रोटी नहीं, शरीर सूख चुका है, आंखें भरी है और कमर झुकी हुई है। रात-दिन मेहनत करके भी उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं पर छोटा-सा व्यवसाय करने वाला दुकानदार भी कालाबाजारी करते हुए देश को लूटकर, घपले कर दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर करता है। हरित क्रांति के झूठे नारों पर प्रकाश डालते धूमिल ने देश की वास्तविक स्थिति पर करारा व्यंग्य कसा है –

"इतनी हरियाली के बावजूद

अर्जुन को नहीं मालूम उसके गालों की

हड्डी क्यों उभर आई है।

उसके बाल सफेद क्यों हो गए हैं।

लोहे की छोटी-सी दुकान में बैठा आदमी

सोना और इतने बडे खेत में खडा आदमी

मिट्टी क्यों हो गया है।"

(कविता – ‘हरित क्रांति’)

11. दलाल आदमी –

पैसे कमाने का आसान तरीका दलाली है। आजादी के बाद इनकी तादाद इतनी बढी कि गिनती करना भी मुश्किल। कोई काम नहीं एक ही धंधा दलाली, बिचौली। भाषा और चालाकी ही इनके धंधे की पूंजी है, इसके बदौलत लाखों कमाना कोई दलाल आदमी से सीखे। इनका मन करे तो परिवार के सदस्यों को भी बेच-बाचकर दलाली करने से पीछे हटेंगे नहीं। भगवान से लेकर देह बेचकर दलाली पाने की मंशा आदमी रखता है। अपने आपको उठाने के लिए आदमीयत को दांव पर लगाने का असम्मानजनक कार्य दलाल करता है। ऐसी स्थिति पर धूमिल प्रकाश डालते हैं –

"और बाबूजी! असल बात तो यह है कि

जिंदा रहने के पीछे

अगर सही तर्क नहीं है

तो रामनामी बेचकर या रंडियों की

दलाली करके रोजी कमाने में

कोई फर्क नहीं

और यहीं वह जगह है जहां हर आदमी

अपने पेशे से छूटकर

भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है।"

(कविता – ‘मोचीराम’)

12. आदमी, रोटी और संसद –

धूमिल द्वारा लिखित ‘रोटी और संसद’ छोटी कविता है पर इसकी चर्चा हमेशा होती है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में संसद कि मौनता, आंखें होकर भी अंधा होना बहुत बडी विड़बना है। देश के भीतर लूट मची है और लुटेरों को राजनीतिक सहयोग है। अर्थात् संविधान और संसदीय प्रणाली में अवैध को वैध बनाने का गोरखधंधा शुरू है – चुपचाप। काम करने वाले मेहनतकश का पसीना पानी-सा बहाया जा रहा है, उसका खून चूसा जा रहा है। पेट भरने के बाद रोटी से खेलता अमीर कवि ने हमेशा देखा और दूसरी तरफ गरीबी से पीडित घरों का आक्रोश भी। अतः धूमिल का मन विद्रोह कर उठता है –

"एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूं...

‘यह तीसरा आदमी कौन है?’

मेरे देश की संसद मौन है।"

(कविता – ‘रोटी और संसद’)

13. आदमी की साहसिकता –

कालों से और बरसों से समाज में साहित्य परिवर्तन करता आया है। साहित्य आदमी को ताकत प्रदान करता है, साहस देता है और सही रास्ता भी दिखाता है। कविता और आदमी को जोड़कर धूमिल ने कई बार देखा है और कविता आदमी को ताकत देती है इसका भी विवेचन किया है।

1.

"एक सही कविता

पहले

एक सार्थक वक्तव्य होती है।"

2.

"कविता

भाषा में

आदमी होने की

तमीज है।"

3.

"कविता घेराव में

किसी बौखलाए हुए

आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।"

4.

"कविता

शब्दों की अदालत में

अपराधियों के कटघरे में

खडे एक निर्दोष आदमी का

हलफनामा है।"

उपर्युक्त उदाहरणों में कवि ने कविता आदमी की अभिव्यक्ति का जरिया है यह बताने की कोशिश की है। आदमी के सारे दुःख-दर्द और पीडाओं को कविता समेट लेती है तथा उन्हें समाज के सम्मुख रख न्याय की मांग करती है। अकेले आदमी को समूह और समूह को साहस में बांधने का काम भी कविता करती, इस पर प्रकाश डालते धूमिल कहते हैं –

"मेरे शब्द उसे जिंदगी के कई स्तरों पर खुद को

पुनर्रीक्षण का अवसर देते हैं,

वह बीते हुए वर्षों को एक-एक कर खोलता है।

वर्तमान को और पारदर्शी पाता है

उसके आर-पार देखता है।

और इस तरह अकेला आदमी भी

अनेक कालों और अनेक संबंधों में

एक समूह में बदल जाता है।

मेरी कविता इस तरह अकेले को

सामूहिकता देती है और समूह को साहसिकता।"

(‘कविता के द्वारा हस्तक्षेप’ – कल सुनना मुझे)

14. सजगता –

आदमी सजग रहे, जागृत रहे। उसने अपने आस-पास को आंखें खोलकर देखना चाहिए। सच और झूठ के अंतर को समझना चाहिए। दुनिया में अपना अस्तित्व कायम रखते हुए अपने आपको कभी भी कमजोर न समझे इसकी हिदायत धूमिल देते हैं। अकेली बूंद भी समुद्र का आकार ग्रहण कर सकती है, अतः बूंद के समान प्रत्येक आदमी का मूल्य है। पहाड़, समुद्र और चोटियां अपनी विशेषताओं के कारण आदमी को बौना तथा लघु कर सकते हैं पर धूमिल इन बातों से सजग रहने की सूचना दे हैं –

"और कोई आंख

छोटी नहीं है समुद्र से

यह केवल हमारी प्रतीक्षाओं का अंतर है

जो कभी

हमें लोहे और लहरों से जोड़ता है।"

(‘अंतर’ – कल सुनना मुझे)

15. ‘चीख’ और ‘चुप’ –

पूंजीवादी समाज में गरीबों का कोई विशेष महत्त्व नहीं, ऐसी आम मानसिकता गरीबों की बनती है। आत्मविश्वास की कमी के कारण कंधे और सर झुक जाता है। परंतु कवि का कहना है कि गरीब और आम आदमी अन्याय न सहे, आवाज उठाए, आक्रोश करे। समझ में आना चाहिए कि कहां चीखे और कहां चुप बैठे। ‘चीख’ और ‘चुप’ बहुत असरदार होती है और सामने वाले के गलत इरादों पर रोक लगा देती है। जरूरी है इन दो अस्त्रों का उचित और सार्थक प्रयोग हो। कवि के शब्दों में –

"जबकि मैं जानता हूं कि ‘इंकार से भरी हुई एक चीख’

और ‘एक समझदार चुप’

दोनों का मतलब एक है –

भविष्य गढ़ने में ‘चुप’ और ‘चीख’

अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से

अपना-अपना फर्ज अदा करते हैं।"

(कविता – ‘मोचीराम’)

16. परिवर्तन –

शिक्षा और पढाई से परिवर्तन हो सकता है इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बच्चों की पढाई को नजरंदाज करते हुए प्रौढों को पढाने की कसरत की और ‘प्रौढ़ शिक्षा अभियान’ को सारे देश में चलाया। कुछ सफल पर ज्यादा जगहों पर कागजी खानापूर्ति। हमारे देश में किसान, मजदूर और गरीब हमेशा अज्ञानरूपी अंधेरी गुफाओं में ठोकरें खा रहे हैं। शिक्षा का लाभ उठाने से और बच्चों की पढाई पर भी विशेष ध्यान देने से परिवर्तन की आस बनती है। धूमिल ने ‘प्रौढ़ शिक्षा’ कविता में आम आदमी के अज्ञान पर आघात करते हुए अकड़ने का आवाहन किया है –

"काले तख्ते पर सफेद खडिया से

मैं तुम्हारे लिए लिखता हूं – ‘अ’

और तुम्हारा मुख

किसी अंधी गुफा के द्वार की तरह

खुल जाता है – ‘आऽऽ’

• • •

इसलिए मैं फिर कहता हूं कि "हर हाथ में

गीली मिट्टी की तरह ‘हां-हां’ मत करो

तनो

अकडो

अमरबेलि की तरह मत जिओ

जड़ पकडो

बदलो अपने आपको बदलो।"

(कविता – ‘प्रौढ़ शिक्षा’)

निष्कर्ष –

समकालीन कविता के प्रमुख आधार स्तंभ के नाते धूमिल ने बहुत बढा योगदान दिया है। उनकी कविता में राजनीति पर जबरदस्त आघात है। आजादी के बाद सालों गुजरे पर आम आदमी के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, अतः सारा देश मोहभंग के दुःख से पीडित हुआ। इस पीडा को धूमिल ने ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘सुदामा पांडे का प्रजातंत्र’ इन तीन कविता संग्रहों की कई कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया है। उनकी कविता में पीडा और आक्रोश देखा जा सकता है। आम आदमी का आक्रोश कवि की वाणी में घुलता है और शब्द रूप धारण कर कविताओं के माध्यम से कागजों पर उतरता है। बिना किसी अलंकार, साज-सज्जा के सीधी, सरल और सपाट बयानी आदमी की पीडाओं को अभिव्यक्त करती है। धूमिल का काव्य लेखन जब चरम पर था तब ब्रेन ट्यूमर से केवल 38 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु होती है। तीन कविता संग्रहों के बलबूते पर हिंदी साहित्य में चर्चित कवि होने का भाग्य धूमिल को प्राप्त हुआ है।

संवादात्मक और व्यंग्यात्मक शैली में लिखी धूमिल की कविताओं का केंद्र आदमी रहा है। बार-बार कविताओं को पढ़ते आर. के. लक्ष्मण का ‘कॉमन मॅन’ नजरों के सामने आकर खडा होता है। संसद और संसद को चलाने वाली राजनीतिक व्यवस्था ‘आम आदमी’ के भलाई की बात करती है पर असल में वे अपनी ही भलाई सोचते हैं। राजनीति में प्रवेश कर चुका हर एक खद्दरधारी, टोपीधारी आम आदमी के खून को चुस रहा है। वर्तमान राजनीति में राजनेताओं के चेलों की भी एक लंबी फौज तैनात हो गई है। अर्थात् संसद (राजनीति) से जुडे प्रत्येक व्यक्ति का मूलमंत्र ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’ वाला बन चुका है। चुपचाप तुम भी खाओ और मैं भी खाता हूं का धर्म बडी ईमानदारी से निभाया जा रहा है। यह व्यवस्था चूहों के समान आम आदमी के सपनों को कुतर-कुतर खा रही है। धूमिल की कविताओं में ऐसी स्थितियों के विरोध में आक्रोश है। बार-बार आवाहन कर कवि ‘आदमी’ की कमजोरियों पर उंगली रखकर चेतित करने का प्रयास कर रहा है। अर्थात् ‘आम आदमी’ के सामने धूमिल की कविता जीवन सत्य उघाड़कर रख देती है।

डॉ. विजय शिंदे

image

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद-431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

ईमेल – drvtshinde@gmail.com

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget