मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

समुद्र पार हिंदी ग़ज़ल - विदेश में बसे हिंदी ग़ज़लकारों की ग़ज़लें - 4

यू․ए․ई․ (शारजाह) में हिन्‍दी ग़ज़ल

पूर्णिमा वर्मन

1․

ज़ोर हवाओं का कश्‍ती को वापस जब ले आता है।
सात समंदर पार का सपना, सपना ही रह जाता है।

कितने हैं जो काट सकें तूफ़ानों को पतवारों से
तेज़ हवा में आगे बढ़ना सबसे कब हो पाता है।

सागर गहरा नाँव पुरानी मन में जागे डर रह रह
एक भरोसा ऊपरवाले का ही पार लगाता है।

बिजली बादल आँधी पानी ओलों या बौछारों में
हिम्‍मत करके चलने वाला आखि़र मंजि़ल पाता है।

दुनिया कठिन सफ़र है यारो जिसकी राहें पथरीली
उसकी रहमत संग रहे तो हर सपना फल जाता है।

2

कभी इक़रार चुटकी में, कभी इनकार चुटकी में
कभी सरदी कभी गरमी कभी बौछार चुटकी में

ख़ुदाया कौन से बाटों से मुझको तौलता है तू
कभी तोला कभी माशा कभी संसार चुटकी में।
कभी ऊपर कभी नीचे कभी गोता लगाता सा
अजब बाज़ार के हालात हैं लाचार चुटकी में।

ख़बर इतनी न थी संगीं कि अपने होश उड़ जाते
लगाई आग ठंडा हो गया अख़बार चुटकी में।

न चूड़ी है न कंगन है न पायल है न है घुँघरू
मगर बजती रही फिर भी कोई झनकार चुटकी में।

3

ये चाँद है धुला धुला ये रात ख़ुशगवार है।
जगी जगी पलक में सोए से सपन हज़ार हैं।

ये चाँदनी की बारिशों में धुल रहा मेरा शहर
नमी नमी फि़जाओं में बहक रही बयार है।

ये कौन छेड़ता है गीत मौन के सितार पर
सुना सुना सा लग रहा ये कौन गीतकार है।

नहीं मिला अभी तलक वो पेड़ हरञ्‍सगार का
हवा हवा में घोलता जो ख़ुशबुएँ हज़ार है।

न जाने कौन छा रहा है फिर से याद की तरह
मेरे लिए भी क्‍या कोई उदास बेकरार है।

4

काश सूरज ढला नहीं होता।
दिन मेरा अनमना नहीं होता।

धूप में मुस्‍कुरा नहीं पाते
दिल अगर फूल सा नहीं होता।

मौसमों ने हमें सिखाया है
रोज़ दिन एक सा नहीं होता।

राह खु़द ही निकल के आती है
जब कोई रास्‍ता नहीं होता।

ञ्‍ज़दगी का सफ़र न कट पाता
तू अगर साथ में नहीं होता।

5

हवाओं में भी सर उठाकर चले।
दिये हौसलों के जलाकर चले।

वे अपनों की यादों में रोए नहीं
वतन को ही अपना बना कर चले।

कभी रात रोके अगर रास्‍ता
सितारों की चूनर बिछा कर चले।

खड़े सरहदों पे निडर पहरुए
वो दिन-रात सब कुछ भुला कर चले।

जिए ऐसे माटी के पुतले में वो
नज़र में सभी की खु़दा बन चले।

6

अपनी खु़शी के आयाम ढूँढ़ते हैं।
हम फुरसतों के मारे कुछ काम ढूँढ़ते हैं।

बैठेंगे शांत कब तक अब धैर्य चुक गया है
हम किश्‍तियों के मालिक तूफ़ान ढूँढ़ते हैं।

किस वर्क पे लिखा था एक नाम था हमारा
पन्‍ने पलट पलट के वो नाम ढूँढ़ते ह।ैं

दर खटखटा रहा है बादे सबा हमारा
हम द्वार बंद कर के दीदार ढूँढ़ते हैं।

बाँसों के झुरमुटों में दिन गुनगुना रहा है
हम धूप सेंकते हैं और छाँह ढूँढ़ते हैं।

7

पीठ पर ढोया नहीं था आसमाँ।
हमने पर खोया नहीं था आसमाँ।

राह में तारे बहुत टूटे मगर
थक के भी रोया नहीं था आसमाँ।

हाथ थामे चल रहा था रात दिन
थक के भी सोया नहीं था आसमाँ।

दूब पर शबनम गिरी कैसे सुबह
रात ने धोया नहीं था आसमाँ।

चाह थी हर एक को उसकी मगर
खेत में बोया नहीं था आसमाँ।

8

यादों की घनी छाँव से पर्वत के देवदार।
बचपन के एक गाँव से पर्वत के देवदार।

गरमी की तंग साँस में राहत बने हुए
भीगे हुए तुषार से पर्वत के देवदार।
मौसम की भीड़-भाड़ में मिसरी घुले हुए
शरबत का एक गिलास से पर्वत के देवदार।

साँपों से लिपटती हुई सड़कों का कारवाँ
चंदन के एक दयार से पर्वत के देवदार।

गहमी हुई पहाडि़यों में टट्‌टुओं का शोर
ठहरे हुँ गुबार से पर्वत के देवदार।

9

ख़ुद को जला रहा था सूरज।
दुनिया सजा रहा था सूरज।

दिनभर के लंबे दौरे से
थक कर नहा रहा था सूरज।

लहरों में हलचल फैली थी
सोना बहा रहा था सूरज।

केसर का चरणामृत पीकर
दोना बहा रहा था सूरज।

शांत नगर का धीरे धीरे
होना बता रहा था सूरज।

दिन सलवट सलवट बिखरा था
कोना तहा रहा था सूरज।

10

आओ एक आग की तलाश करें।
गुमशुदा प्‍यास की तलाश करें।
आ मिलें मंजि़लें जहाँ चल कर
एक नई राह की तलाश करें।

जाने दो हो गया जो होना था
फिर नई आस की तलाश करें।

जिसको सुनने से हौसले जागें
फिर नई आस की तलाश करें।

खू़ब सोए सुबह के होने तक
अब तो उत्‍साह की तलाश करें।

बाजुओं में मचल उठा यौवन
आओ अब मुश्‍किलें तलाश करें

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2 blogger-facebook:

  1. पूर्णिमा जी कुशल कवयित्री हैं । उन की ग़ज़लों के कई शेर मार्मिक हैं । अब उन की ग़ज़लों का संग़ह आना चाहिये ।

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  2. gazalen achchhi hui hain badhai sweekaren...............

    उत्तर देंहटाएं

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