रविवार, 6 अक्तूबर 2013

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 9 - आकिंचन्य

9. आकिंचन्य

आकिंचन्य भाववाचक संज्ञा है। यह ‘अकिंचन’ से व्युत्पन्न है। आकिंचन्य का अर्थ है - ‘नास्ति किंचन यस्य’- जिसके पास कुछ भी न हो।

आध्यात्मिक साधना में जो समस्त पर-पदार्थों को छोड़ देता है वह अपने को पा लेता है। बड़ी चीज पाने के लिए छोटी चीज को खोना पड़ता है। जब किसी बड़ी चीज के प्रति आकर्षण हो जाता है, तो उससे छोटी चीज के प्रति विकर्षण हो जाता है। एक आयु में बच्चों का आकर्षण खिलौनों से होता है। मानसिक विकास हो जाने पर जब उनका आकर्षण पुस्तकों से हो जाता है तो खिलौनों से विकर्षण हो जाता है। जो व्यक्ति सप्रयास विवेकपूर्ण साधना के द्वारा बाहर का सब कुछ खो देता है, वह पारमार्थिक दृष्टि से अपने भीतर सब कुछ पा लेता है।

आत्मा के साधक को क्या पाना है? उत्तर है- आत्मा। आत्मा चेतन है। आत्मा से व्यक्ति जानता है। जो जान नहीं पाता वह जड़ अनात्म है। पदार्थां का ज्ञान आत्मा को होता है, इन्द्रियों को नहीं। इन्द्रियाँ तो जानने की साधन हैं। चेतना के लुप्त होने पर इन्द्रियाँ नहीं जान पातीं। शरीर छोड़ देने पर आत्मा में पूर्व में कृत कार्यों का स्मरण रहता है। यही कारण है कि तत्काल उत्पन्न शिशु अपनी माँ के स्तनों का पान करने लगता है। जीव वैज्ञानिक इसकी मीमांसा जेनेटिक्स के आधार पर करता है।

आत्मा अर्मूत है, शरीर मूर्त है। जानने की शक्ति से ही आत्मा की अनुभूति होती है। आत्मा से रहित शरीर में चेतना नहीं होती। ‘आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता’।

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोsयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

(गीता, 2/20)

इस प्रकार आत्मा अथवा चेतन तथा जड़, अनात्मा अथवा पुद्गल तात्विक दृष्टि से पृथक-पृथक हैं। व्यवहार से ही इनमें एकत्व है। इसका कारण यह है कि जीव अथवा आत्मा एवं पुद्गल द्रव्य का अनादिकालीन संयोग है। संयोग के कारण इनमें विभाव रूप परिणमन होता है। स्पर्श, रस, गंध, वर्ण,शब्द आदि मूर्त पुद्गलों का निमित्त पाकर जीव को राग, द्वेष, मोह आदि विभाव-शक्ति-जन्य विकार होते हैं। क्रोध, मान, माया, लोभ आदि का कर्ता स्वयं जीव है। जीव में ये कषाय मोह कर्म के निमित्त से प्रकट होते हैं। इस कारण ये जीव के निज स्वभाव नहीं हैं। इन्हीं भावों के द्वारा नवीनबंध होता है। ममत्व एवं मिथ्यात्व आदि भाव ही बंध के कारण हैं। इन्ही भावों से आसक्ति उत्पन्न होती है। बाहरी वस्तुएँ एवं घटनायें सुख-दुःख का निमित मात्र होती हैं। मोह एवं आसक्ति के कारण हमें सुख-दुःख रूप भावों की प्रतीति एवं उनकी प्रबलता का बोध होता है। जो मोह एवं आसक्ति को छोड़ देते हैं, उन्हें हर्ष अथवा विषाद की स्थितियों में सुख-दुःख नहीं होता। जिसको मोह रहता है उसे कारण मिलने पर अथवा बिना कारण के भी केवल अपने संकल्प से सुख-दुःख का अनुभव होता रहता है। साथी का वियोग होने पर किसी को बहुत दुःख होता है, किसी को अपेक्षाकृत कम होता है तथा किसी को बिल्कुल नहीं होता।

व्यवहार से बंध एवं मोक्ष का हेतु अन्य पदार्थ को माना जाता है। यदि हम तात्त्विक दृष्टि से विचार करें तो यह जीव स्वयं बंध तथा मोक्ष दोनों का हेतु है। जीव के राग, द्वेष आदि परिणामों का निमित्त करके ही पुद्गल वर्गणायें कर्मरूप से परिणमन करती हैं। इस प्रकार जीव के राग आदि भावों को निमित्त करके ही कर्म आत्मा से बँधते हैं। कोई दूसरा हमें नहीं बाँधता अपितु हम स्वयं ही अपने किये गये भावों के अनुसार उपार्जित कर्मों से बँधते हैं। साधक को इसको गहराई से आत्मसात करना चाहिए।इसको बिना आत्मसात किए आकिंचन्य धर्म का पालन करना दुष्कर है।सबसे पहले कषायों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक है; मिथ्यात्व भाव एवं राग-द्वेष आदि विकारमूलक भावों को दूर करना आवश्यक है। एक अपेक्षा से कषाय रहित जीव का योग क्षणिक बन्ध का कारण होता है। दूसरी अपेक्षा से कषाय रहित जीव का योग होता है किन्तु नए कर्म का बन्ध नहीं होता। भाव कर्मों से द्रव्य कर्मों का आत्मप्रदेशों की ओर आना क्षणिक बंध का कारण बनता है। कषाय रहित जीव का कार्मण स्कन्धों को ग्रहण न करने के कारण नए कर्म का बंध नहीं होता। कार्मण स्कन्ध वीतराग को पाकर लौट जाते हैं; उनका संश्लेष नहीं होता।

इसकी व्याख्या विस्तार से भी की जा सकती है। मोक्ष का मार्ग रत्नत्रय है - सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान, सम्यग् चारित्र। ‘जैसे वस्त्र की श्वेतता मैल के सम्बन्ध से मिट जाती है वैसे ही संसारी आत्मा का सम्यग् दर्शन गुण मिथ्यात्वरूपी मल से, सम्यग् ज्ञान गुण अज्ञान रूप मल से तथा सम्यग् चारित्र गुण कषाय रूपी मल से अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं।

ध्रौव्य स्वभाव की दृष्टि से आत्मा एवं अनात्मा भिन्न हैं। इनकी अपनी अपनी सत्ता है। पर्याय की अपेक्षा स्वयं उत्पन्न होते हैं, स्वयं विनाश को प्राप्त होते हैं। जीव स्वयं परिणमनशील है। इस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि कर्म जीव को बाँधता है। यह नहीं कहा जा सकता कि क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कर्म जीव को क्रोध, मान, माया, लोभ आदि भाव रूप में परिणमन कराते हैं। जीव स्वयं क्रोध रूप से परिणमन करता है, स्वयं मान रूप से परिणमन करता है, स्वयं माया रूप से परिणमन करता है, स्वयं लोभ रूप से परिणमन करता है। प्रत्येक द्रव्य अपने अन्वय रूप धर्म के कारण ध्रुव स्वभाव है। उत्पाद-व्यय रूप धर्म के कारण परिणामस्वभावी है। चेतन और अचेतन का प्रत्येक समय में पर्याय रूप से परिणमन होता है। वह अन्य किसी का कार्य न होकर उनकी अपनी-अपनी विशेषता है। निश्चय नय से तो एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का न तो भला कर सकता है, न बुरा कर सकता है। उपादान की दृष्टि से प्रत्येक द्रव्य की प्रति समय की पर्याय अपने उपादान से ही उत्पन्न होती है। जीव में राग एवं द्वेष की अथवा कषायों की उत्पत्ति भी अपने ही उपादान से होती है।

प्रश्न यह है कि यह क्यों कहा जाता है कि राग-द्वेष आदि भाव पर के आश्रय से उत्पन्न होते हैं। कर्म के उदय की क्या अनिवार्यता है। इसका कारण यह है कि स्व-पर की एकत्व बुद्धि रूप मिथ्या-मान्यता के कारण जीव अनादि से पर का आश्रय लिए हुए है। इसी कारण जीव में वैभाविक शक्ति उत्पन्न होती है। स्व एवं पर का निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है। स्व-पर की एकत्व बुद्धि रूप मिथ्यात्व पर बल देने के लिए व्यवहार दृष्टि से कहा जाता है कि राग-द्वेष आदि भाव पर के आश्रय से उत्पन्न होते हैं। व्यवहार नय से एक पदार्थ दूसरे पदार्थ के कार्य में निमित्त होता है। व्यवहार दृष्टि से ही जीव के राग-द्वेष आदि परिणामों को निमित्त करके पुद्गल वर्गणायें कर्मरूप से परिणमन करती हैं। पुद्गल कर्म को निमित्त करके जीव भी उसी प्रकार राग-द्वेष आदि रूप से परिणमन करता है। इसको इस प्रकार समझा जा सकता है कि जीव की गति क्रिया अपने उपादान से होती है। फिर भी जीव की गति क्रिया के समय धर्म द्रव्य निमित्त होता है। इसी कारण निमित्त का सहकारी महत्व है। यदि जीव में राग-बुद्धि नहीं है तो अश्लील से अश्लील प्रसंग भी उसके चित्त में विकार उत्पन्न नहीं कर सकते। भारतीय सौंदर्य शास्त्रियों ने कला-सौंदर्य की मीमांसा में तथा रस-संप्रदाय के काव्य शास्त्रियों ने रस-निष्पत्ति के निर्वचन में इसका व्यावहारिक उपयोग किया है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राग-द्वेष ही कर्म के बीज हैं। इनके मूल में मोह है। जो आत्मा अपने भीतर से राग-द्वेष रूप भाव कर्म नहीं करती, उसे नए कर्म का बंध नहीं होता। जब तक आत्मा में विकारमूलक भाव हैं तभी तक उन भावों को निमित्त करके कर्म आत्मा से बंधते हैं। इसी कारण व्यवहार में यह कथन है कि कर्म आत्मा को बाँधते हैं। तत्वतः जीव ही कर्मों को बाँधता है।

व्रत पालन, अप्रमाद एवं अकषाय के बाद के तप-ध्यान से कर्म की निर्जरा हो जाती है। सामान्य रूप से दर्शनों में राग-द्वेष के परिहार का विवरण मिलता है। आकिंचन्य के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जैन दर्शन राग-द्वेष आदि विकारमूलक भावों का मूल उत्पादक ‘मोह’ को मानता है। इस कारण यदि मोह का अंश बना रहता है तो संसार-चक्र पुनः आरम्भ होने की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं -

अणाणाम पुट्ठा वि एगे नियट्टंतिं, मदा मोहेण पाउडा

(मोह से आसक्त अज्ञानी साधक पुनः संसार की ओर लौट पड़ते हैं)। (आचारांग, 1/2/2)

आचार्य उमास्वामी ने कषाय एवं मोह-कर्म के अन्तर का प्रतिपादन किया है। मोह-कर्म के दो भेद हैं (1) दर्शन मोह (2) चारित्र मोह। कषाय (राग-द्वेष आदि विकारमूलक भाव) की अपेक्षा चारित्र-मोह अधिक सूक्ष्म है। चित्त में उसकी जडें अधिक गहरी होती हैं।

मोह का अंश मात्र भी शेष रह जाने पर साधक को केवल-ज्ञान नहीं होता, सम्यग् चारित्र्य पूर्ण नहीं होता। जैन दर्शन की भाषा में यदि कहें तो मोह का उपशम करने मात्र से साधक सयोग केवली नहीं होता, मोह कर्म का सम्पूर्ण क्षय आवश्यक है। उपशम एवं क्षय में भेद है। इस अन्तर को हृदयंगम करना आवश्यक है।

गृहस्थ जीवन को छोड़ने के बाद साधक संयस्त जीवन के प्रथम सोपान पर आरूढ़ होता है। साधना के द्वारा आत्म विशुद्धि की मात्रा में वृद्धि करता है। कषायों को जीत लेता है। राग-द्वेष पर विजय प्राप्त कर लेता है। क्रोध को क्षमा से जीतता है। मान को मार्दव से जीतता है। माया को आर्जव से जीतता है। लोभ को शौच एवं संयम से जीतता है। अकषाय हो जाता है। राग, द्वेष आदि विकारमूलक भावों का अन्त हो जाने पर कर्म-परमाणु रूप परद्रव्य का नवीन बंध नही होता। सूक्ष्म कर्म-परमाणु-समूह का आत्मा की ओर आगमन तो होता है, किन्तु वह आत्मा से बँध नहीं पाता। इस प्रकार शरीर में स्थित होने पर भी साधक शरीर के प्रति ममत्वभाव का त्याग कर सकता है, शरीर को आत्मा से भिन्न पदार्थ के रूप में जान सकता है,आत्म तत्व का साक्षात्कार कर सकता है। मगर आध्यात्मिक साधक को धन, सम्पत्ति, पुत्र, पत्नी, मित्र, इद्रिन्य भोगों तथा अंततः स्वयं अपने शरीर की आत्मा से भिन्नता को समझना ही जरूरी नहीं है; पर-द्रव्यों के प्रति ममत्व भाव की सम्पूर्ण निर्जरा भी जरूरी है। आकिंचन्य का अर्थ है- देहादि समस्त भौतिक पदार्थों के प्रति ममत्व का त्याग।

भगवान महावीर ने आत्मस्थ साधकों का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट किया कि मोह को केवल शान्त करने से काम नहीं चलेगा, मोह का केवल त्याग (उपशम) ही पर्याप्त नहीं है, मोह-कर्म का सम्पूर्ण क्षय आवश्यक है। उनका कथन है:

एवं कम्माणि खीयंति, मोहणिज्जे खयं गए

(मोहकर्म के क्षय होने पर अवशेष कर्म भी नष्ट हो जाते हैं)। (दशाश्रुत स्कन्ध, 5)

मोह के उपशम में मोह की काल के क्षणांश में उपशान्ति है। मोह के उपशम में साधक को यह प्रतीति हो सकती है कि उसने मोह पर विजय प्राप्त कर ली है। मगर मोह का पुनः उदय हो जाता है। यदि साधक मोह के उदय को पुनः क्षय नहीं कर पाता तो संसार-चक्र पुनः आरम्भ हो जाता है।

मनोविज्ञान की भाषा में इसकी व्याख्या सम्भव है। उपशमन चेतन मन के धरातल पर होता है। बाहर से सर्वत्र शान्त भाव की प्रतीति होती है। उपशमन स्थायी नहीं होता, क्षण भर के लिए होता है। चेतन मन से हटकर अचेतन मन के धरातल पर चला जाता है। अचेतन मन में दमित मोह को साधक पहचान नहीं पाता।

साधक को अपने मान सम्मान का मोह हो सकता है। साधक को अपनी यश कीर्ति का मोह हो सकता है। साधक को लोक प्रसिद्धि का मोह हो सकता है। साधक को अपनी प्रतिष्ठा का मोह हो सकता है। साधक को ग्रन्थ विशेष के प्रति मोह हो सकता है। साधक को तीर्थ स्थान विशेष के प्रति मोह हो सकता है। साधक को संघ के आचार्य के प्रति मोह हो सकता है। साधक को वैराग्य की मूर्ति विशेष के प्रति मोह हो सकता है। गौतम गणधर को भगवान महावीर के प्रति मोह हो गया था। भगवान महावीर ने इसे भी पहचाना तथा गौतम गणधर को भगवान ने बोध कराया- तुम्हारे से आयु में छोटे साधुओं को केवल ज्ञान प्राप्त हो गया है। तुम्हें केवल ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। इसका कारण तुम्हारा मेरे प्रति प्रगाढ़ स्नेह है। गौतम गणधर को जब भगवान महावीर के प्रति उत्पन्न मोह दूर हुआ, तभी उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई।

मोह का संसार अत्यंत व्यापक एवं सूक्ष्म है। जब तक साधक इस रहस्य को नहीं जान पाता उसे केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होता। केवल ज्ञान प्राप्त होने पर पुनः मोह का उदय नहीं होता। इसका कारण है कि अज्ञानी जीव ही मोह से आवृत्त होते हैं। अज्ञानी विशेषण केवलज्ञान की अपेक्षा से है। मोह/मोहनीय कर्म के क्षीण होने पर पुनः कर्म उत्पन्न नहीं होते:

‘................ कम्माणि खीयंति, मोहणिज्जे खयं गए’।। (दशवैकालिक, 5)

कर्म का मूल मोह है।

इस अपेक्षा से कहा गया है कि एक मोह कर्म के क्षय होने पर सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं:

‘................ कम्माणि णस्संति, मोहणिज्जे खयं गए’।। (वही)

गौतम गणधर के मन में भगवान महावीर के प्रति धर्म-स्नेह का बंधन केवल ज्ञान की प्राप्ति में बाधक क्यों बना। भगवान महावीर ने इसे मोह का ही रूपान्तर माना। मोह का अंश मात्र भी शेष रहने पर समता भाव नहीं आ पाता। चारित्र धर्म है। जो धर्म है, वह समता है। समता मोह तथा क्षोभ से रहित आत्मा का परिणाम है। इसी कारण भगवान महावीर ने समभाव की आराधना की तथा उपदेश दिया: सव्वं जगं तु समयाणुपेही। पियमप्पियं कस्सइ नो करेज्जा।।(समस्त संसार (सभी जीवों) को समभाव से देखें। किसी को प्रिय और किसी को अप्रिय न बनाएँ)। (सूत्रकृतांग, 1/10/7)।

मोह कर्म का सर्वथा क्षय होते ही आत्मशक्ति का घात करने वाले शेष तीन घातिया कर्म (1) ज्ञानावरणीय (2) दर्शनावरणीय (3) अन्तराय भी नष्ट हो जाते हैं। आत्मा की वह अवस्था होती है, जिसका कभी क्षय नहीं होता। आत्मा में अनन्त ज्ञान प्रकट होता है। अभेद दृष्टि से अनन्तज्ञान, धर्म, आत्मा, परमानन्द सब पर्याय हो जाते हैं। भेद दृष्टि से आत्मा की कभी क्षय न होने वाली अवस्था के निम्न प्रकार प्रकट होते हैं:

(1) केवल ज्ञान (2) केवल दर्शन (3) दान लब्धि (4) लाभ लब्धि (5) भोग लब्धि (6) उपयोग लब्धि (7) सामर्थ्य एवं बललब्धि (8) सम्यक्त्व लब्धि (9) चारित्र लब्धि

ये आत्मिक भाव घातिया कर्मों के नाश होने पर प्रकट होते हैं। ये सादि अनंत हैं। अभेद दृष्टि से सकल परमात्म दशा प्रकट होती है। साधक ‘सयोगी केवली’ हो जाता है। शरीर एवं वचन की क्रियाएँ चलती रहती हैं। कर्म-बंधन की प्रक्रिया का अभाव हो जाता है।

सयोगी केवली भी तप करते हैं। प्रवचनसार में शंका व्यक्त की गई है कि सकल परमात्म-दशा प्रकट होने के पूर्व तो तप ध्यान की प्रासंगिकता समझ में आती है किन्तु सर्वदर्शी एवं सर्वज्ञ के लिए तपध्यान का क्या प्रयोजन है ? उत्तर है- अक्षातीत बोध वाले अरहंत आत्मा के स्वाभाविक अनन्त सुख का ध्यान करते हैं। उपयोग (ज्ञान-दर्शन) आत्मा का गुण है। उपयोग की एकाग्रता एवं निश्चलता का नाम ध्यान है। सयोग केवली की दृष्टि से अपने स्वरूप में विश्रान्त, आत्म प्रदेशों में परिस्पन्द-रहित चैतन्य की प्राप्ति ही तप है।

आकिंचन्य का विरोधीभाव वस्तुओं के प्रति आसक्ति, ममत्व एवं मन का अंहकार है। इनके कारण व्यक्ति की दृष्टि भौतिकवादी हो जाती है। वह अधिक से अधिक संग्रह करना चाहता है। परिग्रह के विस्तार से उसमें अहंकार एवं लोभ का विस्तार होता है। व्यक्ति संगृहीत वस्तुओं के कारण अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। उसकी अंहकार वृत्ति के कारण समाज में भेदभाव की भावना विकसित होती है। व्यक्ति अपना मान-सम्मान चाहता है। उसके मन में लोक-प्रतिष्ठा की कामना अंकुरित होती हैं। परिग्रह के विस्तार के साथ साथ वह अपने को समाज का प्रतिष्ठित नागरिक मानने लगता है। प्रतिष्ठा की कामना से प्रमाद को प्रोत्साहन मिलता है। प्रमाद से संयम की नींव हिलने लगती है। यदि कामना के अनुरूप मान प्राप्त नहीं हो पाता, तो उसका मन क्षुब्ध हो जाता है। मन में क्रोध बढ़ता है, क्षमा वृत्ति पराजित हो जाती है।

सांसारिक दृष्टि से व्यक्ति सम्पन्न होना चाहता है। पदार्थों को जोड़ना चाहता है। इसका अर्थ है कि आध्यात्मिक दृष्टि से वह सब कुछ छोड़ना चाहता है। जब तक पदार्थों के प्रति अपनेपन का भाव रहता है, तब तक वह पर के प्रति अपनत्व की चेतना से रिक्त नहीं हो पाता। उसके जीवन-पात्र में आत्मज्योति अपने शुद्ध रूप में प्रकाशित नहीं हो सकती।

आकिंचन्य की स्थिति तक पहुँचने के लिए रागद्वेषशून्यता तथा ज्ञान की दृष्टि से सत्य, कर्म की दृष्टि से तप, तथा भावनाओं की दृष्टि से त्याग की आराधना आवश्यक है। यही कारण है कि आकिंचन्य को क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच तथा सत्य, संयम, तप एवं त्याग के बाद विवेचित किया गया है।

आकिंचन्य एवं अपरिग्रह परस्पर पूरक हैं। अपरिग्रह महाव्रत है। आकिंचन्य धर्म है। अपरिग्रह परिग्रह का निषेध हैं। जो साधक पर-पदार्थों के प्रति अपनी ममत्व बुद्धि का त्याग कर देता है, वही परिग्रह का त्याग करने में समर्थ हो सकता है। परिग्रह का निषेध कर, व्यक्ति अपरिग्रह-व्रत को पूरा करने के लिए आगे बढ़ता है। साधना की अवस्था में आकिंचन्य अपरिग्रह तक पहुँचने का साधन है। सिद्धि की अवस्था में अपरिग्रह की स्थिति में आकिंचन्य आत्मा का धर्म है, आत्मा का स्वभाव है।

आकिंचन्य का अर्थ परिग्रह-शून्यता मात्र नहीं है, परिग्रह-शून्यता के मनोभाव की सहज स्वीकृति भी है। जब तक साधक के मन में किसी वस्तु के अपने पास होने का अहंकार विद्यमान रहता है अथवा वस्तु की प्रप्ति की आकांक्षा रहती है अथवा किसी भी पर-पदार्थ के प्रति मोह होता है तब तक आकिंचन्य धर्म नहीं होता। आकिंचन्य आत्मा के अतिरिक्त अन्य सभी पर-पदार्थों का त्याग एवं उनके प्रति मोह का ध्वंस है; समस्त परिग्रहों एवं कर्मों से शून्य होने की सहज स्थिति है।

उपर्युक्त विवेचना के पश्चात आकिंचन्य शब्द से निम्नलिखित अर्थ प्रकट होते हैं:

(1) वस्तु-अभाव-स्थिति।

(2) परिग्रह-शून्यता।

(3) किसी भी अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति की इच्छा का अभाव।

(4) परिग्रह-शून्य रहने की इच्छा एवं उसके लिए अभ्यास।

(5) प्राप्त वस्तुओं के प्रति ममत्व का अभाव।

(6) अहंकार, लोभ, तृष्णा, असन्तोष एवं ममत्व आदि का त्याग।

(7) आत्मा एवं अनात्मा के भेद की प्रतीति। समस्त भौतिक पदार्थो का त्याग एवं अपने के इतर अन्य सभी के प्रति मोह एवं ममत्व का त्याग।

पर-पदार्थों के प्रति आसक्त्ति के अभाव का अर्थ उनके प्रति उपेक्षा, घृणा अथवा उनका तिरस्कार नहीं है। यह समभाव की आराधना है। सभी के प्रति प्रेम है। जब व्यक्ति किसी के प्रति आसक्त होता है, तो उसके मन में उसके प्रति राग होता है, उसके विरोधी के प्रति उसके मन में द्वेष होता है। जब व्यक्ति को आत्मा एवं अनात्मा का भेद स्पष्ट हो जाता है, तो उसे संसार के समस्त प्राणियों की आत्माओं के प्रति आत्मतुल्यता का बोध होता है। अपनी शुद्ध आत्मा को जानकर वह सबको जान लेता है। आध्यात्मिक धरातल पर एक को जानने का अर्थ है, सबको जानना तथा सबकेा जानना भी अपने को ही जानना है। अस्तित्व की दृष्टि से प्रत्येक आत्मा स्वतन्त्र है किन्तु स्वरूप की दृष्टि से सभी आत्माएँ समान हैं। साधक की दृष्टि विस्तृत से विस्तृततर हो जाती है और उसे बोध होता है कि स्वरूप की दृष्टि से सभी आत्माएँ समान हैं। इस कारण उसे अनात्माओं से अनासक्ति एवं संसार के सभी प्राणियों के प्रति आत्मतुल्यता के भाव की अनुभूति होती है। कामायनीकार के शब्दों में कहें तो “चेतनता एक विलसती, आनन्द अखण्ड घना था”। इसी कारण यह कहा गया है कि जो इस लोक में छोटे-बड़े सभी प्राणियों को आत्मतुल्य देखते हैं, षट्द्रव्यात्मक इस महान लोक का सूक्ष्मता से निरीक्षण करते हैं तथा अप्रमत्त भाव से संयम में रत रहते हैं, वे ही मोक्ष के अधिकारी हैं।

सामाजिक जीवन में व्यक्ति यद्यपि आकिंचन्य का पूर्ण रूप से पालन नहीं कर सकता। आकिंचन्य के चिंतन से, वह पर-पदार्थों के प्रति अपने आसक्तिभाव को अवश्य घटा सकता है। ऐसी स्थिति में किसी वस्तु के अभाव से मानसिक पीड़ा नहीं होती। जीवन में सन्तोष का संचार होता है। परिग्रह-परिमाण-व्रत के पालन का अभ्यास कर पाता है।सामाजिक स्तर पर आकिंचन्य धर्म के पालन की दृष्टि से राजा जनक का जीवन प्रतिमान है तथा लोक जीवन की दृष्टि से गांधीवादी ट्रस्टीशिप की भावना।

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अहमिक्को खलु सुद्धो, दंसणणाणमइओ सदाsरूपी।

ण वि अत्थि मज्झ किंचि वि, अण्णं परमाणुमित्तं पि।।

मैं एक, शुद्ध, दर्शन-ज्ञानमय, नित्य और अरूपी हूँ। इसके अतिरिक्त अन्य परमाणु मात्र भी मेरे नहीं हैं।

होऊण य णिस्संगो, णियभावं णिग्गहित्तु सुहदुहदं।

णिद्दंदेण दु वट्टदि, अणयारो तस्साssकिचण्णं।।

जो मुनि समस्त प्रकार के परिग्रह का त्यागकर उनके प्रति विरक्त हो जाता है, अपने सुखद एवं दुखद भावों का निग्रह कर, निर्द्वन्द्व विचरता है, उसको आकिंचन्य धर्म होता है।

एग विगिंचमाणे पुढो विगिंचइ। (जो मोह का नाश करता है वह अन्य अनेक कर्मों का नाश करता है)।

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