प्रमोद यादव का व्यंग्य : सपना - हजार टन सोने का

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सपने देखना बुरी बात नहीं पर उस पर विश्वास करना भी अच्छी बात नहीं. सपने तो सपने होते हैं- उनकी नियति है-टूटना...फिर भी इस दुनिया में ढेर सारे मूरख हैं जो मुंगेरीलाल की तरह रोज हसीं सपने देखते हैं..सपनों में जीते हैं और जब सपना टूटता है तो धडाम से सर के बल खाट से नीचे ओंधें पड़े मिलते हैं. मैं नहीं कहता की मैं सपने नहीं देखता...मैं भी देखता हूँ..पर उस पर यकीन नहीं करता...अब कल रात ही मैंने देखा कि कैटरीना कैफ के साथ मेरी शादी हुयी है और हम दोनों हनीमून के लिए अफ्रीका के जंगल की तरफ एक प्राइवेट विमान से उडान भर रहे हैं. वो तो अच्छा हुआ की पत्नी ने एन समय पर चादर खींच मुझे जगा दिया और मैं ज्यादा उड़ान नहीं भर सका..कैफ के साथ हनीमून से बच गया अन्यथा...न जाने क्या होता..( कैटरीना का..)

अब भला बताएं- इस सपने में क्या सच्चाई है ? क्या इस पर यकीन कर बालीवुड जाकर कैटरीना को कहूँ कि मैं उसका ‘हसबैंड’ हूँ..वो तो मेरा बैंड ही बजा देगी..और मुसीबत यह कि ऐसी बातें पत्नी से भी ‘ शेयर’ नहीं कर सकता ..वो भी ‘बैंड’ ही बजायेगी. इन अंग्रजों ने भी ‘पति’ का क्या बढ़िया नाम रखा है अंग्रेजी में- ‘हसबैंड’..मतलब कि जिसका हर तरफ से बजना तय है..फिर भी हंसते रहने की उसकी मजबूरी है..

लो जी...मैं विषयान्तर हो रहा हूँ..तो बात सपनों की चल रही थी..मेरी पत्नी बड़ी धार्मिक स्वभाव की सती सावित्री टाइप महिला है..उसे सपने भी उसी टाइप के आते हैं- कभी देवों के देव महादेव..तो कभी देवकीनंदन कृष्ण ..तो कभी दशरथ पुत्र राम..कभी कभार उनके साँप, नंदी, गाय- गोपी भी दीख जाते हैं..और कभी कुछ न दिखा तो उस दिन उनके गुरूजी उपदेश दे चले जाते हैं..रात के सपनों से वह दिन भर नतमस्तक रहती है..सपने में ही अपनी हर छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान मांगती है और देवतागण हमेशा उन्हें ‘ तथास्तु’ कह अंतरध्यान हो जाते हैं और इधर पत्नी झपाटे से पलंग से उठ जाती है. फिर तुरंत मुझे झिन्झोड़कर सारे सपने ‘टेलीकास्ट’ करती है. मैं कुछ नहीं कहता..’हूँ-हाँ’ करते रह जाता हूँ. अब कहूँ भी तो क्या कहूँ ? एक-दो बार जब कहा कि मेरे सपने में तो सिवा बालीवुड की हिरोइनों के और कोई आता नहीं..तो वह बुरी तरह भड़क गयी थी- ‘ चौबीसों घंटे उन्हीं पर ध्यान रहता है..वही सब देखते-सोचते हो तो वो ही तो आयेंगे न..’ अब देवीजी को कैसे समझाता कि भला भगवान उसके सपनों में आकर उसका .क्या भला कर जाता है..खुली आँखों से तो वह दिखता नहीं..बंद आँखों में चोर की तरह क्यों आता है..और आता भी है तो उसे कौन सा मनों ‘सोना-चांदी’ दे जाता है.

सोने-चांदी की बात से ख्याल आया कि पिछले दो -तीन दिनों से श्रीमतीजी उस संत के सपनों की कहानी सुना रही है जिसके अनुसार यू .पी.में 1857 के जमाने के राजा के किले में हजार टन सोना के दबे होने की बात कही जा रही है.जब से उसने टी.वी. में यह न्यूज देखी है.. पगला गयी है..उसके सपनों को भी जैसे पर लग गए हैं..अब दिन-दहाड़े सपने देखती है..हजार टन सोने के सपने..सोने के सपनों से उसका सोना हराम हो गया है..बार-बार मुझे यू .पी चलने को कह रही है. बार- बार मुझसे हजार टन का भाव पूछती है...जब बताता हूँ कि तीन लाख करोड रूपये तो वह गश खा जाती है..मैं निरंतर उसे समझा रहा हूँ कि सपने...सपने होते है..उस पर यकीन करना मूर्खता है..तब वह तमक जाती है, कहती है- ‘ अरे..ये सपने ‘तेरे मेरे सपने’ की तरह नहीं है..ये एक साधू-संत का सपना है...जिस पर सरकार और उनके नुमाइंदे तक भरोसा किये हैं तो मैं क्यों न करूँ ? तुम तो सदा से ‘ निगेटिव सोच’ के रहे हो..गलत ही सोचोगे....इस बार मेरी बात मानो और जल्दी यू.पी. चलो...वहाँ रोज राजा के सारे वंशज दूर-दूर से पहुँच रहे हैं..उस हजार टन के सोने पर हक जताने और तुम यहाँ हाथ पर हाथ धरे बैठे हो...पचास ग्राम सोना खरीदने कहो तो तुम्हारी जान निकल जाती है.. अब इतना अच्छा मौका हाथ आया है तो क्यों गवां रहे हो ? एकाध मन ही मिल जाए तो बेडा पार..

‘एकाध मन..’ मैं चौंका – ‘ अरे भागवान..तुम्हें भला क्यों मिलेगा सोना ?..क्या उस राजा की तुम कोई वंशज हो ? क्या रिश्तेदारी है उससे तुम्हारी ? ‘

‘ अरे ..कह देंगे...कि उनके दूर के रिश्ते के चाचा की बुआ की लड़की की देवरानी के छोटे लड़के की बहु की बड़ी बहन की ननद के जेठ की छोटी बेटी की बुआ कि चौथी संतान हूँ..तुम पचड़े में मत पडो..मैं सब बना लूंगी.. बस.. तुम साथ भर चलो..रिश्तेदारी काम न आएगी तो दूसरा आइडिया भी है मेरे पास...मेरा ममेरा भई पलटू यू .पी में पटवारी है..उसे कहके उस किले का नक़ल-खसरा निकाल वह जमीन ही अपने नाम दिखा देंगे..तब तो पूरा हजार टन ही हमारा.. ‘

‘ कैसी बातें करती हो यार..दो सौ साल पुराने राजा के किले का खसरा...तुम्हारे नाम..’

‘ तुम कुछ नहीं जानते जी..पटवारी लोग बड़ी ऊंची चीज होते हैं..तुम साथ भर चलो..सब हो जाएगा..’

मरता क्या न करता..सात वचनों का मान रखने मैं मान गया. उन्नाव का कन्फर्म टिकिट ले आया.बार-बार वह ताकीद करती रही कि सिवा एक बड़े खाली सूटकेस के और कुछ भी नहीं ले जाना है. सुबह स्टेशन जाने ऑटो लेकर घर आया तो पत्नीजी गहनों से लदी सज-धज कर बाहर आई तो मैं परेशान हो गया, बोला - ‘ इतना सब पहनकर जाने की क्या जरुरत ? जानती हो..ज़माना खराब है..कोई लूट-पाट हो गया तो ?..जाओ..इसे उतारकर आओ..हम कोई शादी-ब्याह में थोड़े जा रहे हैं..परदेश जा रहे हैं..परदेश..’

‘ अरे ..तुम समझते नहीं..इतना सब पहन कर न जाऊं तो हमें राजा का वंशज कोई कैसे मानेगा..’

मैं निरुत्तर हो गया. ऑटो में बैठ स्टेशन की ओर रवाना हुए तो रास्ते के बीच भीड़-भाड़वाले इलाके में एक बाइक में सवार दो नकाबपोशों ने एक जोर का झपट्टा मार पत्नी के गले का तीन तोले का सोने का हार खींच मिनटों में गायब हो गया. वह चीख सी पड़ी-‘ चोर...चोर..पकड़ो..पकड़ो..मेरा सोने का चैन..हाय मेरा..चैन..’

ऑटो वाले ने एक किनारे ऑटो रोक दी.मैंने पत्नी को घूरा- ‘ कहा था न..मत पहनो..पर तुम्हे तो राज-राजेश्वरी बनने का भूत सवार था..अब भुगतो..बताओ अब कहाँ चलना है- पुलिस स्टेशन कि रेलवे स्टेशन ? ‘

‘रेलवे स्टेशन..’ दबी जुबान से उसने कहा- ‘ नहीं तो ट्रेन छूट जायेगी..दो दिन बाद वहाँ खुदाई है..वक्त पर न पहुंचे तो टनों सोना कोई और दबा लेगा..’

उन्नाव पहुँचते तक पूरे रास्ते वह चुप्पी साधी रही..गले के चैन ने उसका चैन छीन लिया था.किसी तरह पूछते-पाछते उस गांव के किले तक पहुंचे तो वहाँ वह संत मिला जिसने हजार टन सोने का सपना दिखाया था..पत्नी ने उसे प्रणाम कर बताया कि हम राजा के वंशज है.इसलिए हमें भी नियमानुसार इसमें हिस्सा मिलना चाहिए. संत ने कहा- ‘ मैडम जी ..मैंने तो केवल सपना देखा है..उसे साकार करने वाले सरकार के वरिष्ठ अधिकारी वहाँ डेरा जमाये बैठे हैं..उनके पास जाइए..किले को तो पूरे पुलिस ने अपने घेरे में रखा है..कोई परिंदा भी आसपास पर नहीं मार सकता..उधर उस केबिन में कलेक्टर साहब बैठे हैं..उनसे मिलें और अपने हिस्से का सोना बुकिंग कराएँ..’

पत्नी उस संत के चरण-रज ले कृतार्थ हुई और तेजी से कलेक्टर साहब के केबिन की ओर लपकी.उसकी बातें सुन उन्होंने कहा- ‘ आपके पास राजाजी के वंशज होने का कोई न कोई प्रमाण..दस्तावेज आदि तो होगा ही..’ पत्नी ने बात काट दी- ‘ हाँ जी..वो तो है..तभी तो आये हैं..’ . कलेक्टर महोदय ने तब सामने एक बड़ी बिल्डिंग की ओर इशारा कर कहा – ‘ देखिये...आप जैसे लगभग हजार लोग वहाँ ठहरे हैं जो खुद को राजाजी का वंशज कहते हैं..आप भी वहीँ चले जाइए..कल से खुदाई का काम शुरू होगा..जब सोना मिलेगा..आप सबके दस्तावेज देख, जैसा और जितना हिस्सा बन पड़ेगा ,सरकारी नियमानुसार आप सबको आबंटित कर दिया जाएगा..’

‘ सर..यह खुदाई कितने दिनों में पूरी होगी ? ‘ पत्नी जाते-जाते सवाल दाग गयी.

‘ कुछ कह नहीं सकते...हप्ते भी लग सकते हैं..महीने भी...’

हम दोनों एक दूसरे का मुंह ताकने लगे. केबिन से बाहर निकल उसे समझाया कि सपने और सोने के चक्कर में तीन तोला तो आलरेडी गवाँ चुकी हो..अब महीने दो महीने यहाँ टिकने की सोची तो वहाँ घर में कुछ भी न टिकेगा..चोर-उचक्के पूरा घर मैदान कर देंगे.. छोडो भी ये हजार टन का चक्कर..चलो..वापस घर चलो..पर देवीजी टस से मस नहीं हुई..बोली-‘ एक-दो हप्ते रहकर देख लेती हूँ..तुम चाहो तो घर निकल जाओ..पर अपना ए.टी.एम. कार्ड मुझे देते जाओ..क्या पता कितना खर्च आ जाए..अब ओखली में सर दिया है तो...’

आगे मैं कुछ भी नहीं सुना.तुरंत ट्रेन पकड़ अपने शहर आ गया. घर पहुंचा तो वही हुआ जिस बात का अंदेशा था..दरवाजे का ताला टूटा था..अंदर जाकर मालुम हुआ कि कुछ भी नहीं बचा..टी.वी. ,फ्रिज , माइक्रोवेव ,वाशिंग मशीन ,सब गायब...आलमारी में रखे नगद पच्चीस हजार रूपये भी नदारद..सिर पकड़कर बैठ गया. पत्नी को फोन कर बताया कि उसके सपने और सोने के चक्कर में घर में जलजला आ गया है ..तुरंत आओ..तब भी वह नहीं मानी,बोली- ‘ अब जब सब कुछ लुट ही गया है तब तो और अनिवार्य हो गया है कि कुछ न कुछ लेकर आऊ..अब तो सोना लेकर ही आउंगी..’ सुनकर मैं पागल हो गया.

अचानक चौथे दिन बिना किसी सूचना के उदास और उखड़ा-उखड़ा थकान भरा चेहरा लिए जब ऑटो से उतरी तो अचंभित रह गया..दौडकर सूटकेस को उठाया तो काफी भारी लगा.. मैं खुशी से झूम उठा..घुसते ही उसे खोला तो एक दस –पन्द्रह किलो का चौकोर संगमरमरी पत्थर मिला..उसकी ओर देखा तो वह फफक पड़ी- ‘मुझे माफ कर दो...तुम ठीक कहते थे...सपने..सपने होते हैं...उस पर यकीन करना मूर्खता है..मैं..मुरख थी जो उस संत के सपनों में आ गई...वहाँ कुछ भी नहीं निकला सिवा संगमरमरी पत्थरों के...कलेक्टर ने सबको हँस-हँस कर यही दिया है..मैं आज से अब कभी सपने नहीं देखूंगी..और देखूँगी भी तो उस पर यकीन करने नहीं कहूँगी..’ रोते-रोते वह सो गई.

दूसरे दिन सुबह जब सोकर उठी तो मुझे विचित्र नज़रों से देखने लगी. मैं समझ गया कि जरुर कोई सपना देखी होगी .पर बताने से हिचक रही है.मैंने फुसलाया तो आखिर बता ही दी कि उसने देखा कि कोई चोर रात को उसके आलमारी से चुपके से सारे जेवर निकाल भाग गया..और वह डर के मारे चुपचाप देखती रह गयी...

.न मालुम क्यों मुझे लगा कि यह सपना नहीं है..दौडकर आलमारी खोला तो देखा, सारे जेवर सचमुच गायब थे. मैं चिल्ला उठा - ‘ बेवकूफ..तुम पागल हो गयी हो..यह सपना नहीं-हकीकत है.. काश तुम केवल सपने ही देखती... ‘ मैं माथा पकड़ बैठ गया.

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-प्रमोद यादव

दुर्ग , छत्तीसगढ़

मोबाईल- 09993039475

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10 टिप्पणियाँ "प्रमोद यादव का व्यंग्य : सपना - हजार टन सोने का"

  1. आपकी इस उम्दा पोस्ट को "http://hindibloggerscaupala.blogspot.com/ दिन शुक्रवार में शामिल किया गया हैं कृपया कल अवलोकनार्थ पधारे

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  2. नीलिमाजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..प्रमोद यादव
    प्रसादजी, आपका भी बहुत-बहुत शुक्रिया...प्रमोद यादव

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  3. Akhilesh Chandra Srivastava10:58 pm

    sunder rachna sachmuch lalach buri bala hai fir bhi aadmi lalch nahin chhodta

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    1. श्री अखिलेशजी,ललिताजी,गुप्ताजी,शिवेंद्रजी...आप सब का शुक्रिया कि आप सबने रचना पसंद किया..यूँ ही सहयोग बनाए रखें..आपका- प्रमोद यादव

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  4. सपनों को सच मानने वालों के लिए एक बहुत उम्दा शिक्षा |

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  5. चरण सिंह गुप्ता1:06 pm

    सपनों को सच मानने वालों के लिए एक उम्दा शिक्षा

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  6. हा हा हा हा। …। बहुत सुंदर व्यंग

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