बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - इक्कीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता और स्त्री लेखन

इक्कीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता और स्त्री लेखन

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Ø डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
E-mail - drsatappachavan@gmail.com

इक्कीसवीं सदी में ‘पत्रकारिता’का अध्ययन एक स्वतंत्र विधा के रूप में हो रहा है. साहित्य की अनेक विधाओं को पत्रकारिता ने प्रस्तुति दी है. सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक, भाषाई और धार्मिक विविधताओं को साहित्य के माध्यम से पत्रकारिता ने पाठकों के सामने रखा है. हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि हिंदी पत्रकारिता ने शुरू से ही भारतीय विविधता को रेखांकित किया है.भारत की पहली महिला पत्रकार हेमंत कुमारी देवी से लेकर वर्तमान महिला पत्रकारिता के जाने−माने हस्ताक्षर मृणाल पांडे, क्षमा शर्मा,अलका सक्सेना, वर्तिका नंदा, श्वेता सिंह, शालिनी जोशी, ऋचा अनिरूद्ध, प्रेमा झा, मनीषा कुलश्रेष्ठ आदि अनेक पत्रकारों का अध्ययन समय की माँग है.

वर्तमान समय ‘साहस’ का समय माना जा रहा है. साहस को केंद्र में रखकर ही मृणाल पांडे जैसी अनेक प्रभावशाली महिला पत्रकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज उन्नती के लिए लड रही हैं.“महिलाओं के लिए आज कोई क्षेत्र नया नहीं है. वह हर क्षेत्र में आगे बढकर नाम कमा रही हैं.यहाँ तक कि जिन क्षेत्रों पर पहले पुरूषों का अधिकार समझा जाता था, उन क्षेत्रों को भी महिलाएँ न केवल अपना रही हैं,बल्कि वहाँ नाम भी कमा रही हैं,पत्रकारिता एक ऐसा ही क्षेत्र है और मृणाल पांडे पत्रकारिता जगत में महिलाओं की गहरी पैठ बनाने वाली ऐसी ही एक महिला का उदाहरण” 1 हिंदी पत्रकारिता का विचार किया जाए तो न्यूज रूम से लेकर एडिटोरियल विभाग,आई.टी. विभाग,न्यूज स्क्रिप्टिंग विभाग, आदि में महिला पत्रकार सक्षमता और आत्मबल के साथ काम करती नजर आती है. खूबसूरती के लिए जान की बाजी लगाती महिलाएँ विज्ञापन क्षेत्र में दिखाई देती है. लेकिन नव समाज निर्माण के लिए लेखनी हाथ में लिए लडनेवाली महिलाओं की संख्या भी दिन−ब−दिन बढ रही है. विश्वविख्यात फ्रैंच लेखिका सीमोन द बोउवार का कथन दृष्टव्य है, “मैंने एक बार किसी होटल की लाबी में फर्श पोंछती हुई नौकरानी को यह कहते सुना −‘मैंने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा.मैंने अपनी सफलता खुद अर्जित की है.’उस नौकरानी के स्वर में आत्मनिर्भरता का उतना ही गर्व था जितना राकफेलर जैसे करोडपति को अपनी सफलता पर हो सकता है.” 2 सामान्य स्त्री के संदर्भ में भी हिंदी पत्रकारिता शुरू से उदारता की दृष्टि से अपना कर्तव्य बजा रही है. अनेक महिला पत्रकार मानवीय पक्ष को प्रस्तुत करती नजर आती है. हिंदी लेखिका – पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं है.अर्चना वर्मा,जयंती,प्रभा खेतान,अनामिक, मैत्रेयी पुष्पा,मृदूला गर्ग, सुधा अरोडा,लवलीन,विभा खरे,प्रतिभा कटियार,राजी सेठी,सुमन केशरी,निशा नाग, सुषम बेदी,नीरजा माधव आदि लेखिकओं ने हिंदी पत्रकारिता को मौलिक लेखन के माध्यम से नई दिशा दी है. “पिछ्ले पच्चीस वर्षों में महिला पत्रकारों की संख्या बढ रही है, किंतु रिपोर्टिंग में अभी भी दो फिसदी महिला पत्रकार नहीं है.”3 टेलीविजन इतिहास का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि भले ही महिला रिपोर्टस की संख्या कम हो लेकिन स्टिंग−आपरेशन के द्वारा भ्रष्टाचारियों का भंडाफोड करने की क्षमता महिला पत्रकारों ने दिखा दी है.

सामाजिक शिक्षा और जागरूकता के लिए महिला पत्रकारों द्वारा विभिन्न पत्र−पत्रिकाओं और चैनलों के माध्यम से अपने विचारों को प्रस्तुति दी है. औद्योगिकरण और आर्थिक असमानता के युग का सूत्रपात करती हिंदी पत्रकारिता महिला आंदोलन के साथ जुडी हुई दृष्टिगोचर होती है. हिंदी पत्रकारिता ने धर्म और रूढिवादिता के संदर्भ में जाग्रत लेखन करने वाली विकास शील विचारों की महिला पत्रकारों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है. हिंदी पत्रकारिता में कार्यरत महिला पत्रकारों ने समय−समय पर महिला विकास का मुद्दा उठाया है, देश के विकास के लिए महिलाओं के विकास को जरूरी बताया.“जिसतरह से ग्रामीण विकास के बगैर देश का विकास संभव नहीं है ठिक उसी तरह से दलित,आदिवासी और पिछडे वर्ग की महिलाओं का विकास किये बिना इस समाज का आधा हिस्सा पंगु ही रह जाएगा. भूमंडलीकरण के इस दौर में महिलाएँ अपनी पहचान तब तक नहीं बना पाएगी जब तक उनको योजना निर्माण के कार्यों में हिस्सेदारी नहीं दी जाएगी ऐसे में सशक्तिकरण शब्द अधूरा रह जाएगा.”4 मुन्नी भारती के उपर्युक्त विचारों से हमें सहमत होना होगा. वर्तमान हिंदी पत्रकारिता का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि महिला पत्रकार अपनी समस्याओं को विभिन्न विधाओं के माध्यम से प्रस्तुत कर रही है. भारतीय स्त्री तेजी से बदल रही है.स्त्री का आत्मविकास लेखन से जुड जाने के कारण अधिक मात्रा में हो रहा है. समाज की चुनौतियों का सामना करने हेतु प्रेरणा देनेवाला स्त्री लेखन हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से धडल्ले के साथ हो रहा है. आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले से निकालने वाली‘नवोदयम’ पत्रिका में सिर्फ महिलाएँ ही सभी काम देखती है.खेतों में काम करने वाली साक्षर महिलाओं द्वारा हुआ यह प्रयास हिंदी पत्रकारिता को नया आयाम प्रदान करता है. हिंदी पत्रकारिता में स्त्री लेखन को सामाजिक सुधार के रूप में देखा जा सकता है. भले ही घिसे –पिटे विषयों की चर्चा होती होंगी फिरा भी स्त्री लेखन का वैचारिक पक्ष हिंदी पत्रकारिता का आधार सूत्र रहा दृष्टिगोचर होता है.

प्रख्यात समाजशास्त्री आशाराणी व्होरा का कथन दृष्टव्य है, “मेरे विचार में, जिस तरह सामाजिक संस्थाओं,सुधारकों,महिला संस्थाओं और महिला विधायकों ने मिलकर सुधार−कानूनों का निर्माण किया है, महिलाओं को समान वैज्ञानिक अधिकार दिलाए है,उसी तरह महिला−पृष्ठ की सामग्रियाँ और महिला−पत्रिकाएँ मिलकर आज वैधानिक अधिकारों व सुधार−कानूनों को सामाजिक आधार प्रदान कर सकती है.यदि महिला पृष्ठ और महिला पत्र ऐसे सामाजिक अध्ययन प्रस्तुत करें, ठोस व सही जानकारी वितरित कर,मार्ग निर्देशित करें तो कोई कारण नहीं कि आज भी बाल−विवाह हों या विधवा−विवाह और तलाक पर उँगलियाँ उठाई जाएँ अथवा दहेज जैसी बुराइयाँ फले –फूलें.सुधारों की बात जाने दें तो भी महिला पृष्ठ में कम −से−कम इतना आकर्षण तो हो ही कि कॉलेजों में पढने वाली नवयुवतियाँ भी उन्हें पढना चाहें और प्रबुद्ध महिलाएँ उनकी उपेक्षा न करें ”5 परंपरागत साहित्य में चित्रित स्त्री की छवि को बदलकर स्त्री सबलीकरण की आवाज स्त्री लेखन के द्वारा हिंदी पत्रकारिता दे रही है. ‘अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य : खंड –एक और खंड –दो’ और ‘स्त्री भूमंडलीकरण’ विशेषांकों का ‘हंस’पत्रिका ने प्रकाशन कर हिंदी पत्रकारिता में हो रहे स्त्री लेखन पर गंभीरता से विचार−विमर्श किया है. ‘हंस’पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव व विशेष संपादिका अर्चना वर्मा के इस प्रयास ने स्त्री लेखन को नई दिशा दी. वंश−परंपरा, जनम −पत्री,संदर्भ और विचार,पितृ−सत्ता के षड्यंत्र और स्त्री छवि आदि स्तंभों के माध्यम से‘हंस’पत्रिका में प्रस्तुति दी है. प्रभा खेतान कहती हैं, “पूरी शताब्दी में जितने भी आंदोलन हुए उसमें स्त्री मुक्ति आंदोलन का ही सबसे दूरगामी प्रभाव है. कारण स्त्री सत्ता,धन, कामना सबके करीब रही और स्त्री की ही सबसे अधिक उपेक्षा हुई.अब तक हम कोई मौलिक नारीवादी विमर्श तैयार नहीं कर सकें हैं, जो मानव समाज को और अधिक मानवीय बनायें.जिन्हें सदियों दबाया गया,उनकी समवेत शक्ति का सामना करने की सत्ता में न हिम्मत है और न काबिलियत.”6 भारतीय स्त्री आंदोलन वर्तमान में अधिक सशक्त बनाने हेतु स्त्री लेखन को अधिक प्रस्तुति मिलनी चाहिए. स्त्री आंदोलन के समर्थक विचार देने वाला साहित्य और अधिक मात्रा में हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से सामने आने की आवश्यकता है.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से स्त्री लेखन जा पहुँचा है. लेखिका अनामिका,नासिरा शर्मा,सुधा अरोडा, मृणाल पांडे,प्रभा खेतान, उर्मिला शिरीष,रमणिका गुप्ता,आदि ने स्त्री लेखन की लंबी परंपरा को संभाला है. स्त्री लेखनके बेहतर भविष्य के संदर्भ में राजी सेठी का कथन दृष्टव्य है,“स्त्री की चिंता आत्म−संपन्नता के लिए होनी चाहिए न कि सामाजिक स्थिति के अभिशाप को एक बचाव की तरह इस्तेमाल करके करूणा बटोर ने की”7 स्त्री की बुनियादी समस्याओं को हिंदी पत्रकारिता ने उजागर किया है. अपनी आत्मकथाओं के माध्यम से अनेक लेखिकाओं ने स्त्री संवेदना को प्रस्तुति दी है. हिंदी पत्रकारिता ने इन आत्मकथाओं पर लंबी बहस चलाई है. स्त्री लेखन को सृजनात्मक स्वास्थ प्रदान करने का काम हिंदी पत्रकारिता ने किया है.स्त्री को आत्मनिर्भर बनाने और साधनहीन स्त्रियों के लिए कार्यरत संस्थाओं को हिंदी पत्रकारिता ने अलग स्तंभ चलाकर नया आयाम दिया है.बदलते भारतीय परिवार का चित्रण स्त्री लेखन के केंद्र में रहा हुआ दृष्टिगोचर होता है.महिलाविषयक साहित्यिक पत्रिकाएँ, कविता संग्रह,वैचारिक निबंध,पत्र साहित्य सभी का जिक्र हिंदी पत्रकारिता ने किया है.परिधि पर स्त्री (मृणाल पांडे),दुर्ग द्वार पर दस्तक (कात्यायनी), स्त्री के लिए जगह (संपादक राजकिशोर),समान नागरिक संहिता (सरला माहेश्वरी), उठो अन्न्पूर्णा साथ चले (उषा महाजन),स्त्री होने की सजा (अरविंद जैन), औरत के हक में (तसलीमा नसरीन),स्त्रीत्व का मानचित्र (अनामिका),स्त्री का समय (क्षमा शर्मा), चुकते नहीं सवाल(मृदुला गर्ग),आदि स्त्री लेखन को प्रस्तुत करती पुस्तकें हिंदी पत्रकारिता की ही देन हैं. ‘हंस’,‘वर्तमान साहित्य’‚‘पल –प्रतिपल’‚ माजरा‚बहुवचन‚जनपद‚कथाक्रम‚आदि लघु पत्रिकाओं ने तो स्त्री लेखन के एक नए आंदोलन को जन्म दिया. ‘ग़ॉडमदर’फिल्म पर‘हंस’ ने बहस की. अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन द्वारा आयोजित संगोष्ठी की रिपोर्ट पर भी हिंदी पत्रकारिता के विभिन्न स्तंभों के माध्यम से चर्चा हुई है. संजय ग्रोवर की कविता ‘हमारी किताबों में हमारी औरतें’स्त्री स्वतंत्रता का सच समाज के सामने रखती है. इक्कीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता ने स्त्री मुक्ति की संकल्पना को स्त्री लेखन को प्रस्तुति देकर सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं व लेखिकओं को प्रोत्साहन दिया है.

पितृसत्ता व्यवस्था पर अनेक पत्र− पत्रिकाओं ने विचार−गोष्ठियों का आयोजन किया.‘स्त्री लेखन’ को केंद्रीय स्थान देकर विशेषांक प्रकाशित किए.स्त्री शिक्षा का महत्त्व प्रस्तुत कर ऋग्वेद से लेकर आज तक के स्त्री विमर्श पर प्रकाश डालने का प्रयास करता चित्रा मुदगल का आलेख ‘भारतीय हिंदी समाज और स्त्री लेखन’को प्रकशित कर ‘गगनांचल’पत्रिका ने ‘स्त्री लेखन’ परंपरा को इक्कीसवीं सदी में भी आगे बढाया है. “स्त्री शिक्षा जहाँ भी पहले पहुँची,परिदृश्य बदला.उसने अपनी आवाज शब्दबद्ध करना शुरू कर दिया.लेखन का संबंध चेतना से है. स्त्री चेतना की समुन्नति के परिप्रेक्ष्य में स्त्री शिक्षा का आधारभूत महत्त्व है. ... स्त्री शिक्षा ने ही महाराष्ट्र में लेखिकओं की एक ऐसी युगप्रवर्तक जमात पैदा की, जिन्होंने स्त्री स्वाधीनता की सतत पक्षधरता में अपने जीवन को होम कर दिया. स्त्री मन के अब तक बंद प्रकोष्ठों की चौखटों में से उसके लेखन में रिस कर उसके भीतर की पीडा और आंसुओं का ऐसा हृदयद्रावक सैलाब फूटा कि पितृसत्ता के एक बडे प्रतिशत ने विचलित होकर स्वयं के सामाजिक आचार−व्यवहार के विषय में पश्चात्तापीय मुद्रा में चिंतन−मनन करना आरंभ कर दिया.यह निश्चय लेखिकाओं की बडी सफलता थी.”8 चित्रा मुदगलजी के उपर्युक्त विचारों से हमें सहमत होना होगा. इक्कीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता ‘स्त्री लेखन’ को केंद्र में लेकर ही आगे बढ रही है. अनेक दबाओं को सावधानी से हटाकर स्त्री लेखन प्रामणिकता से हिंदी पत्रकारिता में प्रस्तुत हुआ है. “आजादी से पहले और आज महिला−लेखन के तेवर में निश्चित ही बडा फर्क है. आजादी के पहले की सुभद्राकुमारी चौहान,महादेवी हर सामाजिक, रचनात्मक आंदोलन में बराबरी के स्तर पर शामिल रहीं. अपने समय के सभी जोखिम उठाए.अपने समकालीन रचनाकारों के साथ उनका सौहार्द,जिसका विवरण हम उनके भावपूर्ण संस्मरणों में पढते है,एक स्वस्थ परंपरा में ही संभव हो सका, जो दुर्भाग्य से आज संभव ही नहीं है.”9 गगन गिल के उपर्युक्त विचार समकालीन स्त्री लेखन की स्थिति की ओर संकेत करते है. पुरूष−प्रधान समाज में अपना लेखन कार्य कर रहीं लेखिकाओं को वर्तमान में भी स्वस्थ वातावरण नहीं मिल रहा है.स्त्री लेखन को विशाल स्पेस देने का कार्य इक्कीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता ने किया है. प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों क्षेत्र में स्त्री लेखन का स्वागत हुआ है. पत्रकारिता को माध्यम बनाकर अनेक महिला पत्रकारों, कहनीकारों और उपन्यासकारों ने स्त्रीयों में परस्पर विश्वास की क्षमता बढाने का काम किया है. अपनी स्पष्ट विचारधारा को प्रस्तुति दी है. अतः नारी आंदोलन को आधारभूत तत्त्वों के साथ सही दिशा देने का, स्त्री लेखन को विस्तार देने का महत्त्वपूर्ण कार्य हिंदी पत्रकारिता ने किया है इस में दो राय नहीं.

निष्कर्ष:–

इक्कीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता और स्त्री लेखन का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि स्त्री लेखन के वैश्विक संदर्भ को हिंदी पत्रकारिता ने प्रस्तुति दी है. उपभोक्ता संस्कृति का विरोध करनेवाली अनेक महिला रचनाकारों, पत्रकारों के विचार धडल्ले से मौलिक एकत्व के साथ प्रकाशित करना हिंदी पत्रकारिता का प्रमुख उद्देश्य रहा है. हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का अध्ययन करने से पता चलता है कि हिंदी पत्रकारिता ने शुरू से ही भारतीय विविधता को रेखांकित किया है.भारत की पहली महिला पत्रकार हेमंत कुमारी देवी से लेकर वर्तमान महिला पत्रकारिता के जाने−माने हस्ताक्षर मृणाल पांडे, क्षमा शर्मा,अलका सक्सेना, वर्तिका नंदा, श्वेता सिंह, शालिनी जोशी, ऋचा अनिरूद्ध, प्रेमा झा, मनिषा कुलश्रेष्ठी आदि अनेक पत्रकारों का अध्ययन समय की माँग है. हिंदी पत्रकारिता का विचार किया जाए तो न्यूज रूम से लेकर एडिटोरियल विभाग,आई.टी. विभाग,न्यूज स्क्रिप्टिंग विभाग, आदि में महिला पत्रकार सक्षमता और आत्मबल के साथ काम करती नजर आती है.

खूबसूरती के लिए जान की बाजी लगाती महिलाएँ विज्ञापन क्षेत्र में दिखाई देती है. लेकिन नव समाज निर्माण के लिए लेखनी हाथ में लिए लडनेवाली महिलाओं की संख्या भी दिन−ब−दिन बढ रही है. सामाजिक शिक्षा और जागरूकता के लिए महिला पत्रकारों द्वारा विभिन्न पत्र−पत्रिकाओं और चैनलों के माध्यम से अपने विचारों को प्रस्तुति दी है. औद्योगिकरण और आर्थिक असमानता के युग का सूत्रपात करती हिंदी पत्रकारिता महिला आंदोलन के साथ जुडी हुई दृष्टिगोचर होती है. हिंदी पत्रकारिता ने धर्म और रूढिवादिता के संदर्भ में जाग्रत लेखन करने वाली विकास शील विचारों की महिला पत्रकारों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है. स्त्री आंदोलन के समर्थक विचार देने वाला साहित्य और अधिक मात्रा में हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से सामने आने की आवश्यकता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से स्त्री लेखन जा पहुँचा है. स्त्री लेखन को अधिक गतिशील और सशक्त बनाने में इक्कीसवीं सदी की हिंदी पत्रकारिता सक्षम नजर आती हैं.

संदर्भनिदेश $Á−

1.www.womenempowerment.jagaranjunction.com Dtd.27.07.2013.

2. सीमोन द बोउवार – स्त्री उपेक्षिता, पृष्ठ−318

3. www.wisdomblow.com Dtd.14.07.2012.

4. वही, Dtd.14.07.2012.

5. आशाराणी व्होरा –आधुनिक समाज में स्त्री, पृष्ठ−173 −174

6. संपादक राजेंद्र यादव−‘हंस’, जनवरी – फरवरी,2000, पृष्ठ−42

7. संपादक राजेंद्र यादव−‘हंस’, मार्च,2000, पृष्ठ−32

8. अजय कुमार गुप्ता – ‘ गगनांचल ’ मार्च –अप्रैल, 2013, पृष्ठ−07

9. डॉ. देवकृष्ण मौर्य –हिंदी साहित्य की कतिपय विशिष्ट महिलाएँ एवं उनकी रचनाएँ, पृष्ठ−213

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Ø डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर414001 (महाराष्ट्र)
दूरभाष09850619074
E-mail -
drsatappachavan@gmail.com

निवास : 6/180, ´पितृ छाया ´ पंपिंग स्टेशन रोड, ताठे मला,

भुतकरवाडी, सावेडी, अहमदनगर.

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