बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

राकेश भ्रमर की कहानी - शाश्वत प्रेम

कहानी

शाश्वत प्रेम

राकेश भ्रमर

उस दिन मणिकांत का मन अशांत था. आजकल अक्सर रहने लगा है, इसीलिए दफ्तर में देर तक बैठते हैं. हालांकि बहुत ज्यादा काम नहीं होता है, परन्तु काम के बहाने ही सही वह कुछ अधिक देर तक आफिस में बैठकर अपने मन को सुकून देने का प्रयास करते रहते हैं. दफ़्तर के शान्त वातावरण में उन्हें अत्यधिक मानसिक शान्ति का अनुभव होता है. घर उन्हें काटने को दौड़ता है; जबकि घर में सुन्दर पत्नी है, जवान हो रहे दो बेटे हैं. वह स्वयं उच्च पद पर कार्यरत हैं. दुःखी और अशान्त होने का कोई कारण उनके पास नहीं है, परन्तु घरवालों के आचरण और व्यवहार से वह बहुत दुखी रहते हैं. जिस प्रकार का घर-परिवार वह चाहते थे, वैसा उन्हें नसीब नहीं हुआ. पत्नी उनकी सलाह पर काम नहीं करती; बल्कि मनमानी करती रहती है और कई बार तो वह उसकी नाज़ायज़ फ़रमाशों पर बस सिर धुनकर रह जाते हैं, परन्तु अन्त में जीत पत्नी की ही होती है और वह अपनी सही-गलत मांगें मनवाकर रहती है. उसके अत्यधिक लाड़-प्यार और बच्चों को अतिरिक्त सुविधाएं मुहैया कराने से बच्चे भी बिगड़ते जा रहे थे. उनका ध्यान पढ़ाई पर कम, तफ़रीह में ज्यादा रहता था.

देर रात जब वह घर पहुंचे तो स्वाति उनका इंतजार कर रही थी. वह थोड़ा नाराज़-सी लग रही थी. यह कोई नई बात नहीं थी. किसी न किसी बात को लेकर वह अक्सर उनसे नाराज़ ही रहती थी. वह चुपचाप अपने कमरे में आकर कपड़े बदलने लगे, फिर बाथरूम में जाकर इत्मीनान से फ्रेश होकर बाहर निकले. पत्नी अभी तक कमरे में खड़ी उनके बाथरूम से बाहर निकलने का इंतजार कर रही थी. उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह अभी तक वहां क्यों खड़ी थी. इसके पहले वह जब भी आफिस से घर पहुंचते थे, तो पत्नी बेटों के साथ बैठी टी. वी. देख रही होती थी.

वह कुछ नहीं बोले तो पत्नी ने ही पूछा, ”आज इतनी देर कहां कर दी?“

”बस यूं ही...आफिस में थोड़ा काम था, रुक गया.“ उन्होंने बिना किसी लागलपेट के कहा. पत्नी ने कहा, ”मैं कब से आपका इंतज़ार कर रही हूं.“

”अच्छा, कोई काम है क्या?“ उन्होंने कुछ चिढ़ने के भाव से कहा. अब उनकी समझ में आया कि पत्नी उनके देर से आने के लिए चिन्तित नहीं थी. उसे अपने काम की चिन्ता थी, इसीलिए उनका इंतज़ार कर रही थी.

”हां, नवल को नई बाइक लेनी है. उसने देखी है, कोई स्पोर्ट्स बाइक है, लगभग एक लाख की.“ नवल उनका बड़ा लड़का था, एक नम्बर का लफन्डर. पढ़ाई में कम, घूमने-फिरने और लड़कियों के चक्कर में उसका ध्यान ज्यादा रहता था.

”उसके पास पहले से ही एक बाइक है, दूसरी लेकर क्या करेगा?“ उन्हें मन ही मन क्रोध आने लगा था.

स्वाति ने बहुत ही लापरवाही से कहा, ”क्या करेगा? आप तो ऐसे कह रहे हो, जैसे बच्चों की कोई जरूरत ही नहीं होती. जवान लड़का है, दोस्तों के साथ घूमना-फिरना पड़ता है. स्टेटस नहीं मेनटेन करेगा, तो उसकी इज्जत कैसे होगी? उसके कितने सारे दोस्त हैं, जिनके पास कारें हैं. वह तो केवल एक बाइक ही मांग रहा है. पुरानी वाली बेच देगा.“

”स्टेटस मोटर बाइक या कारों से नहीं बनता, बल्कि पढ़ाई में अव्वल आने और अच्छी नौकरी करने से स्टेटस बनता है. तभी इज्जत मिलती है. मैं हमेशा कहता रहा हूं, बहुत ज्यादा लाड़-प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं; परन्तु तुम ध्यान ही नहीं देती. अपने बेटों की हम हर ज़रूरत पूरी करते हैं, परन्तु क्या वह हमारी इच्छा और आकांक्षा के अनुसार पढ़ाई कर रहे हैं? नहीं, बड़ा वाला न जाने कब बी.सी.ए. पूरा कर पायेगा और छोटा वाला अभी तो कोचिंग ही कर रहा है. प्रेम के क्षेत्र में सभी उत्तीर्ण होते चले जा रहे हैं, परन्तु पढ़ाई की परीक्षा में लगातार फेल हो रहे हैं.“ उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था.

”बेकार की भाषणबाजी से क्या फायदा? बच्चों की ज़रूरतों को पूरा करना हमारा कर्तव्य है. हमारे कमाने का क्या फ़ायदा अगर वह बच्चों के काम न आए.“ फिर उसने चेतावनी देने वाले अंदाज़ में का, ”कल उसको बाइक के लिए चेक दे देना, बाकी मैं कुछ नहीं जानती?“ पत्नी इतना कहकर चली गयी.

वह धम् से बिस्तर पर बैठ गये. यह उनकी पत्नी है, जिसके साथ वह लगभग पच्चीस वर्ष से गुजारा कर रहे हैं. वह दफ्तर से आए हैं और उसने न उनका हाल-चाल पूछा, न चाय-पानी के लिए और न ही खाने के लिए. यह कोई नई बात नहीं थी. रोज ही वह अपने बेटों की कोई नई फरमाईश लिये तैयार बैठी रहती है और जैसे ही वह दफ़्तर से आते हैं, फ़रमान जारी कर देती है. उसका फ़रमान ऐसा होता है कि वह नाफ़रमानी नहीं कर सकते थे. वह न करने की स्थिति में कभी नहीं होते. पत्नी के असाधारण और अनुचित तर्क उनके उचित तर्कों को भी काटने में सक्षम होते थे.

दूसरी तरफ बेटे उनकी नाक में दम किए रहते हैं. जब भी घर में पहुंचो, या तो वह टी.वी. देखते रहते हैं या फिर मोबाइल में किसी से बात कर रहे होते हैं या फिर होम थियेटर में आंखें और कान फोड़ते रहते हैं. इससे छुटकारा मिला तो इंटरनेट में अनजान लड़के-लड़कियों से दोस्ती कायम कर रहे होते हैं. इंटरनेट यह एक अजीब बीमारी फैला दी है कि जिस व्यक्ति को हम जानते-पहचानते नहीं, उससे इंटरनेट की अंधी दुनिया में दोस्ती कायम करते हैं और जो सामने होते हैं, उनको फूटी आंख देखना पसंद नहीं करते.

उनके लड़के दुनिया भर के कार्य करते हैं, परन्तु पढ़ाई करते हुए कभी नहीं दिखते. उनके समझाने पर वह भड़क जाते हैं, क्योंकि मां की शह उनके साथ होती है.

वह बिस्तर पर लेटकर विचारों में खो गए.

मणिकांत पचास वर्ष की उम्र पार कर रहे थे. अब तक दाम्पत्य-जीवन और पत्नी-प्रेम के अटूट बंधन पर उन्हें अति विश्वास था, परन्तु अब उसकी सारगर्भिता और शाश्वतता पर उन्हें अविश्वास होने लगा था. उन्हें लगने लगा था कि प्रेमऐसी चीज है, जो टिकाऊ नहीं होती है और यह जीवन भर केवल एक व्यक्ति-पुरुष या स्त्री-से नहीं किया जा सकता है. प्रेम चंचल होता है और इसके पंख आसमान के पंछी की तरह किसी भी तरफ उड़ने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. स्वाति उन्हें कितना प्रेम करती है, वह अब तक नहीं समझ पाए थे, परन्तु अब उसके कर्कश और क्रूर व्यवहार के कारण स्वयं को उससे दूर करते जा रहे थे, तन और मन दोनों से. पत्थरों से सिर टकराना बहुत घातक होता है. अब उन्हें यह अहसास हो गया था कि वह व्यर्थ में ही एक ऐसी स्त्री के साथ दाम्पत्य-सूत्र में बंधकर अपने जीवन को निःसार बनाते रहे हैं, जो उनके मन को बिल्कुल भी समझने के लिए तैयार नहीं थी.

अपनी पत्नी से अब उन्हें एक विरक्ति-सी होने लगी थी और वह जवान हो चुके बच्चों को एक बोझ समझने लगे थे. वह जीवन भर न केवल अपना प्यार पत्नी और बच्चों पर लुटाते रहे, बल्कि उनकी सुख-सुविधा की चिन्ता में रात-दिन खटते रहे. परिवार के किसी व्यक्ति को कभी एक पैसे का कष्ट न हो, इसके लिए वह नौकरी के अतिरिक्त अन्य स्रोतों से भी आय के साधन ढूंढ़ते रहे. परन्तु उनके स्वयं के हितों की तरफ परिवार के किसी सदस्य ने कभी ध्यान नहीं दिया. पत्नी ने भी नहीं. वह तो बच्चों के पैदा होते ही उनके प्रेम-स्नेह और देखभाल में ऐसी मगन हो गयी कि घर में पति नाम का एक अन्य जीव भी है, वह भूल-सी गयी. बच्चों की परवरिश, उनकी पढ़ाई-लिखाई और उनको जीवन में आगे बढ़ाने की उठा-पठक में ही उसने जीवन के बेहतरीन साल गुजार दिये. मणिकांत पत्नी के लिए एक उपेक्षित व्यक्ति की तरह घर में रह रहे थे. वह बस पैसा कमाने और परिवार के लिए सुख-चैन जुटाने की मशीन बनकर रह गये.

दाम्पत्य-जीवन के प्रारंभ से ही पत्नी का व्यवहार उनके प्रति रुखा था और कई बार तो उसका व्यवहार अपमानजनक स्थिति तक पहुंच जाता था. पति की आवश्यकताओं के प्रति वह हमेशा लापरवाह रही, परन्तु बच्चों के प्रति उसका मोह आवश्यकता से अधिक था. बच्चों की गलत-सही बातों पर भी वह उन्हीं का पक्ष लेती. उन्होंने कभी अगर बच्चों को सुधारने के उद्देश्य से कुछ कहना चाहा तो पत्नी बीच में आ जाती.

बच्चों के कपडे-लत्तों, स्कूल की किताबों और फीस, उनके खान-पान और उनके दैनिक खर्च की चिन्ता में वह रात-दिन घुलती रहती, परन्तु कभी यह न सोचती कि पति को भी दिन भर आफिस में काम करने के बाद घर पर एक पल के लिए आराम और सुकून की आवश्यकता है. उनके जीवन में आर्थिक संकट जैसी कोई स्थिति नहीं थी. परन्तु अगर कभी कुछ पल या एकाध दिन के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न होती थी, तो उन्होंने बहुत शिद्दत से इस बात को महसूस किया था कि पत्नी का मुंह तब टेढ़ा हो जाता था और वह बेवजह उनकी परेशानी ने निस्पृह रहकर केवल इस बात का ताना मारती रहती थी कि उनके साथ शादी करके उसका जीवन नरक हो गया था, कभी सुख नहीं देखा, बस परिवार को संभालने में ही उसका जीवन गारत हो गया. तब पति-पत्नी के बीच बेवजह खट-पट हो जाती थी. हालांकि वह तब भी चुप रहते थे, परन्तु पत्नी का चीखना-चिल्लाना उनको कई दिनों तक बेजार किये रहता.

खैर, परिवार के लिए धन-सम्पत्ति जुटाना उनके लिए कोई बड़ी मुसीबत कभी नहीं रही. वह उच्च सरकारी सेवा में थे और धन को बहुत ही व्यवस्थित ढंग से उन्होंने निवेश कर रखा था और अवधि पूरी होने पर अब उनके निवेशों से उन्हें वेतन के अलावा अतिरिक्त आय भी होने लगी थी. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए और उनकी ज़रूरतें बढ़ती गयीं, उसी हिसाब से उनका वेतन और अन्य आय के स्रोत भी बढ़ते गये. सम्पन्नता उनके चारों ओर बिखरी हुई थी, परन्तु प्यार कहीं नहीं था. वह प्रेम की एक बूंद के लिए तरस रहे उस प्राणी की तरह थे, जो नदी के पाट पर खड़ा था, परन्तु उसको ऐसा श्राप मिला हुआ था कि वह पानी को छू तक नहीं सकता था. घर में पत्नी थी, परन्तु उम्र के एक लम्बे पड़ाव और बच्चों के प्रति उसकी अति व्यस्तताओं ने मणिकांत को पत्नी के प्रति उदासीन कर दिया था और अब वह एक ऐसे प्रेम की तलाश में थे, जो शाश्वत भले न हो, परन्तु कुछ पल के लिए वर्षा की फुहारों की तरह उनके तन-मन को शीतलता प्रदान कर सके.

वह अपनी युवावस्था के खूबसूरत दिनों की यादों में खो गये. इस अवस्था की हसीन वादियों में भटकते हुए उनके बहुत से दोस्त बने थे, उनमें युवतियां भी थीं. उनकी याद आते ही उनके हृदय में एक कंपन-सा हुआ. उन युवतियों के नाम अब भी उन्हें याद थे, परन्तु वह अब कहां होंगी, उन्हें पता नहीं था. सौभाग्य या दुर्भाग्य से एक बार बिछड़ने के बाद उनमें से किसी के साथ उनकी दुबारा मुलाकात नहीं हुई थी. कालेज जीवन के बाद सब अपनी-अपनी राह चल पड़े थे और आज कौन कहां होगा, उन्हें पता नहीं था. बीस-पच्चीस साल के बाद अब वह अपनी महिला मित्रों को याद कर रहे थे. उनको याद करने में उनका स्वार्थ था, परन्तु वह अनिश्चित थे कि भविष्य में अगर उनकी कोई महिला मित्र मिल गई तो उससे मिलकर उनको किसी प्रकार की प्रेम की अनुभूति होगी भी या नहीं. और मिलने के बाद दोनों की एक-दूसरे के प्रति क्या प्रतिक्रिया होगी, यह भी उन्हें नहीं पता था; फिर भी एक नये जीवन में प्रवेश करने की उनकी उत्सुकता में वृद्धि होती जा रही थी. वह अपने जीवन में कुछ नयापन चाहते थे, भविष्य के प्रति अनिश्चित होते हुए भी.

मन ही मन उन्होंने याद किया कि विवाह से पूर्व उनकी सबसे करीबी महिला मित्र कौन थी, ऐसी महिला जो संभवतः उनको मन ही मन प्यार करती थी, परन्तु उन्हें पता नहीं चला था. जब वह जवान थे, उनके पारिवारिक संस्कारों ने सिखाया था कि जवानी के प्रेम में स्थिरता नहीं होती. यह उस यात्री की तरह होता है जो अपना गंतव्य स्टेशन आते ही उतर कर अपने घर चला जाता है. जवानी का प्रेम किसी अंजाम तक नहीं पहुंचता है और अगर पहुंचता भी है तो उसके रास्ते में बहुत-सी रुकावटें आती हैं, और ऐसा प्रेम मंजिल तक पहुंचने के पहले ही लंगड़ा हो जाता है.

इसके अतिरिक्त उनका मानना था कि जवानी में किसी से शाश्वत प्रेम तो क्या साधारण प्रेम भी नहीं किया जा सकता. जवानी में किसी को चाहने या पाने की जिस भावना को हम प्रेम का नाम देते हैं, वह प्रेम नहीं; मात्र सौन्दर्य के आवरण में लिपटा हुआ शारीरिक आकर्षण होता है और यह आकर्षण स्वाभाविक तौर पर यौन आकर्षण होता है जो विपरीत लिंगीय होता है. इस आकर्षण से शारीरिक सम्बन्ध बनाये जा सकते हैं, परन्तु प्रेम नहीं किया जा सकता है, ऐसा प्रेम जिसे विद्वान शाश्ववत प्रेम की संज्ञा से विभूषित करते हैं, वह जवानी में किसी से नहीं किया जा सकता है.

तब वह समझते थे कि शाश्वत प्रेम केवल पत्नी से किया जा सकता है, जो किसी व्यक्ति की जीवन-संगिनी होती है और जीवन भर पति की सुख-सुविधा का ख्याल रखती है, उसके सुख-दुख की भागीदार बनती है. अतएव पति-पत्नी ही एक दूसरे से शाश्वत प्रेम कर सकते हैं, क्योंकि वह सात जन्मों तक एक ही व्यक्ति के साथ रहने की कामना करते हैं. तब उन्होंने इसको तार्किक ढंग से नहीं सोचा था कि पति-पत्नी केवल सात जन्मों तक ही क्यों एक साथ रहने की कामना करते हैं, इससे अधिक या कम क्यों नहीं?

परन्तु...तर्क अपनी जगह होते हैं और मनुष्य की सोच अपनी जगह. दोनों का आपस में कोई मेल नहीं होता.

प्रामाणिक तौर पर उनका मानना था कि पति-पत्नी के अतिरिक्त कोई दूसरा अगर किसी से अटूट प्रेम का दावा करता है तो वह झूठ बोलता है और मात्र अपनी हवस मिटाने के लिए ऐसे प्रेम की डगर पर अपने पांव धरता है.

और जीवन के लगभग पच्चीस वर्ष तक उन्होंने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पत्नी को प्रेम किया था, बच्चों की परवरिश की थी. परन्तु अब उन्हें लगने लगा था कि उन्होंने मात्र एक जिम्मेदारी निभाई थी. न तो पत्नी ने उन्हें कोई प्यार दिया था, न उन्होंने ही पत्नी को सच्चे मन से प्यार किया था. जवानी में वह उसके सौन्दर्य को प्यार करते रहे और अब बुढ़ापे में उसके ढलते शरीर और उसकी व्यस्तताओं के कारण वह उससे विरक्त हो गए थे; अतः उनके बीच शाश्वत प्रेम पनपने जैसी कोई बात नहीं थी.

बहुत मनन करने पर भी उनको किसी ऐसी महिला का ध्यान नहीं आया जो उनके जीवन में बहुत अधिक निकट रही हो और जिससे वह दुबारा अपने सम्बन्ध बना सकें. ले-देकर उन्हें अपने पड़ोस की एक लड़की की याद आई जो रोज उनके घर आया करती थी. वह उनका बहुत ख्याल रखती थी और उनके आगे-पीछे घूमती रहती थी और कई बार वह उसे डांट भी दिया करते थे कि उसके पास कोई दूसरा काम नहीं था क्या जो दिन भर उनके घर में घुसी रहती थी. उनकी डांट खाकर भी वह हंसती रहती थी, जैसे भगवान ने उसे अनवरत हंसते रहने का वरदान दे रखा था. वह कभी दुखी नहीं रहती थी.

वह लड़की मणिकांत की मां के साथ चिपकी रहकर उनके घरेलू काम में हाथ बंटाती थी और इस तरह मणिकांत के आस-पास रहने का उसे मौका मिल जाया करता था. इन सब क्रियाओं के पीछे उस लड़की का क्या स्वार्थ था या उस लड़की के मन में क्या था, न तो तब वह समझ पाये थे या समझा भी होगा तो उन्होंने उस लड़की को मात्र एक पागल लड़की समझा होगा, प्रेमिका नहीं और इस नाते वह उससे कभी खुलकर बात नहीं कर सके. उस लड़की ने भी कभी कुछ नहीं कहा, बस निःस्वार्थ उनकी सेवा करती रही.

उन्हें याद आया, उसका नाम नीलिमा था. मणिकांत की शादी से पहले ही उसकी शादी हो गयी थी. शादी के बाद भी वह लड़की जब भी अपने मायके आती थी, उनके घर जरूर आती थी और उसी तरह से उनके आगे-पीछे घूमती रहती थी जैसे शादी के पहले करती थी. उस लड़की के मन में उनके प्रति सेवा भाव था या कोई प्रेम भावना, वह समझ नहीं सके; परन्तु आज जब उनके मन में प्रेम और शाश्वत प्रेम को लेकर एक उधेड़बुन चल रही थी तो उन्हें लग रहा था कि उस लड़की के मन में कहीं न कहीं उनके प्रति कोमल भाव अवश्य थे और वह उन्हें प्रेम करती थी, परन्तु वह उनकी भावनाओं को समझ नहीं पाए और दोनों सदा के लिए एक दूसरे से बिछड़ गये, परन्तु नहीं...पृथ्वी गोल है और यह अपनी धुरी पर चक्कर काटती रहती है.

उन्होंने भले ही पुश्तैनी मकान को बेचकर संभ्रांत नई बस्ती में बंगलेनुमां मकान बनवा लिया था और नीलिमा के मायके से दूर रह रहे थे; परन्तु उन्हें नीलिमा के मायके के घर का पता था. उसमें अब उसका बड़ा भाई रहता था.

उस दिन वह दफ्तर से कुछ पहले ही निकल पड़े और कार को स्वयं चलाते हुए अपनी पुरानी बस्ती में पहुंचे. नीलिमा के मायके में जाकर उसके बड़े भाई से मिले और कुशलक्षेम पूछने के बाद उन्होंने नीलिमा का पता लिया. उसके बड़े भाई ने जब कागज पर लिखकर नीलिमा का पता दिया तो उसे पढ़कर उनका दिल इस तरह धड़का जैसे वह पहली बार नीलिमा को देख रहे हों और उनके दिल में नीलिमा के प्रति एक सुखद अनुभूति हुई हो.

वह उसी शहर में ब्याही थी और उनके मोहल्ले से कुछ ही दूरी पर उसका घर था. हालांकि वह पहले नीलिमा की ससुराल कभी नहीं गये थे, परन्तु आज वह दिल के हाथों मजबूर थे और उसी दिन उन्होंने उसके घर जाने का निर्णय लिया.

नीलिमा के घर के दरवाजे पर खड़े होकर उन्होंने पहले इधर-उधर देखा. लोग अपनी धुन में गली में इधर से उधर और उधर से इधर आ-जा रहे थे. किसी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया. उन्होंने दरवाजे की घण्टी बजाई. थोड़ी देर में दरवाजा खुला और वह उनके सामने खड़ी थी. उसे देखकर उनके मन में एक जलतंरग सी बजी और उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह जलतरंग उन दिनों उनके मन में क्यों नहीं बजी जब दोनों जवान थे और एक दूसरे के पास थे, मिला करते थे और उनके पास इतना समय था कि एक दूसरे के मन की बात को समझ सकते. नीलिमा भी उन्हें देखकर हैरत में पड़ गयी. उसके मुंह से कोई आवाज नहीं निकली. दोनों ही आश्चर्य से एक दूसरे को कई पलों तक निहारते रहे जैसे दो बिछड़े प्रेमी कई युगों के बाद मिले हों, परन्तु क्या वह सचमुच एक दूसरे को प्रेम करते थे?

नीलिमा को जब होश आया तो उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, ”नमस्ते, आप यहां?“

उन्होंने अपनी गंभीर वाणी में कहा, ”हां, मैं यहां और तुम्हें आश्चर्य हो रहा होगा कि मैं तुम्हारी ससुराल के घर पर आया हूं.“

”सचमुच! मैंने तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोचा था.“ वह विह्वल-सी थी, परन्तु उसकी आवाज में पुलक भरी खुशी भी थी, ”आप अन्दर तो आइए.“ आश्चर्य और विह्वलता में भी वह शिष्टाचार नहीं भूली थी.

उन्हें ड्राइंगरूम में बिठाकर वह चंचल हिरनी की तरह किचन में चली गयी. तब तक उन्होंने उसके घर का जायजा ले लिया था. उसके घर में अधिक सम्पन्नता नहीं तो विपन्नता भी नहीं थी. खाता-पीता खुशहाल परिवार लग रहा था. वह पानी लेकर आई तो उन्होंने फिर से नीलिमा को गौर से देखा. अब वह जवानी के दिनों की नीलिमा नहीं थी, विवाहिता स्त्रियों की तरह वह भी थोड़ा मोटी हो गयी थी, परन्तु इतनी मोटी नहीं कि भद्दी लगे. उसकी देहयष्टि अभी भी आकर्षक थी और उसके मुख-सौन्दर्य में कोई कमी नहीं आई थी. उसकी आंखों में अभी भी जवानी की चंचलता विराजमान थी. उन्हें अच्छा लगा कि वह दिलकश थी.

पानी पीकर उन्होंने कहा, ”बैठो,“

”मैं चाय बनाकर लाती हूं.“ वह चलने के लिए उद्यत हुई.

”नहीं, मेरे पास समय कम है. तुम बैठो, कुछ आवश्यक बातें करनी हैं.“ उनके स्वर में गंभीरता थी. वह बैठ गयी और कौतूहल भरे मन से उनके चेहरे को ताकने लगी.

”देखो, नीलू, मैंने कभी तुमसे अंतरंग और आत्मीय बातें नहीं कीं. परन्तु आज मैं कुछ खास बातें तुमसे करने आया हूं. क्यों और कैसे, इन प्रश्न के चक्कर में मत पड़ना. बस मेरी बात सुनना और जो उचित लगे उत्तर देना. हां, अगर मेरी कोई बात तुम्हें बुरी लगे तो बता देना. अच्छा, पहले ये बताओ, तुम्हारे कितने बच्चे हैं और पति क्या करते हैं?“

वह शरमाती हुई बोली, ”बस, एक ही बेटी है, कालेज में पढ़ती है. पतिदेव एक दूकान चलाते हैं. गुजारा हो जाता है.“ कहते-कहते वह अपने में सिकुड़ गयी जैसे उसके बदन का कोई नाजुक अंग उधड़ गया हो.

उन्होंने उसके बदन की लहरों को महसूस करते हुए कहा, ”क्या तुम विवाह के पहले मुझसे प्रेम करती थी?“ यह बहुत सीधा सवाल था, बिलकुल उस तीर की तरह जो सीधा हिरनी के सीने में जाकर बिंध जाता है. यह सवाल भी सीधा नीलिमा के सीने में जाकर चुभा था. इस प्रश्न का उसने अपनी जवानी में विवाह के पूर्व इंतजार किया था, परन्तु कभी सुनने को नहीं मिला था और आज जब वह वैवाहिक जीवन की बहुत सारी सीढि़यां चढ़कर अधेड़ावस्था में प्रवेश कर चुकी थी, तब यह मन को अभिभूत और प्रफुल्लित कर देने वाला प्रश्न उसके कानों के रास्ते सीधे असावधान हृदय के अन्तस्र्थल में जा घुसा था. वह विस्फारित आंखों से अपने इष्टदेव को देखे जा रही थी और उसे आश्चर्य हो रहा था कि आज उसके भगवन् को क्या हो गया था? उनकी आंखें इतने वर्षो बाद कैसे खुली थीं? अब तक कहां सोए हुए थे?

उसकी समझ में यह भी नहीं आ रहा था कि वह उनकी बात का क्या जवाब दे? वह चकराकर रह गयी थी, परन्तु उसे जवाब तो देना ही था. भगवन् उससे पूछ रहे थे और भक्त होकर वह चुप कैसे रह सकती थी? उसने अपनी सांसों को खींचा और हृदय को कड़ा करते हुए कहा, ”मैं अब एक विवाहिता हूं. मेरे पति हैं और मैं एक जवान बेटी की मां हूं.“

”मैं आज की नहीं, पहले की बात पूछ रहा हूं?“

”वह अब विगत है, एक भूली-बिसरी कहानी. परन्तु सच तो यह है कि मैं उसे भूल भी नहीं पाती हूं. आज भी जब मैं गाहे-बगाहे आपको याद करती हूं तो हृदय में एक मधुर स्पंदन होता है. नहीं होना चाहिए, परन्तु होता है और मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता कि आपके लिए मेरे हृदय में अभी भी संगीत की मधुर धुन बजती है. आसमान में चांद चमकता है और तारे खिलते हैं. यह क्या है?“

”तो क्या तुम समझती हो कि प्रेम शाश्वत होता है?“ उन्होंने उत्सुकता से नीलिमा की चमकती आंखों को देखते हुए पूछा. उसका चेहरा सुर्ख हो रहा था, बिल्कुल उस कन्या की तरह, जो पहली बार अपने प्रियतम के सामने बैठकर बात कर रही थी.

”शाश्वत, मतलब...?“ वह हिचक गयी.

”मेरा पूछने का अर्थ यह है कि प्रेम क्या अमिट होता है और जिससे एक बार होता है, क्या उससे जीवन भर प्रेम किया जा सकता है? क्या यह बंधन अटूट होता है, अमिट होता है और जीवन भर कायम रहता है.“

”जहां तक मैं समझती हूं, प्रेम एक ऐसी भावना है जो अमिट होती है.“

”तो क्या तुम अपने पति से प्रेम नहीं करती?“

वह सोचने लगी और उसने सोचकर बहुत समझदारी से जवाब दिया, ”प्रेम करती हूं, क्यों नहीं करूंगी. वह मेरे पति हैं और मैंने उनके साथ दाम्पत्य-जीवन बिताने के लिए सात फेरे लिए हैं. वह मेरी बेटी के पिता हैं तो निश्चित ही मैं उनसे प्यार करती हूं.“

”एक औरत एक साथ दो व्यक्तियों से कैसे प्रेम कर सकती है? अगर कर सकती है तो उसे प्यार नहीं कहा जा सकता है. वह केवल प्रेम का नाटक कर रही है और अपनी आवश्यकतानुसार अपने सुख के लिए उसका उपयोग कर रही है. ऐसा प्रेम शाश्वत कैसे हो सकता है?“ उन्होंने स्पष्ट किया.

”प्रेम शाश्वत होता है या नहीं, इस पर मैं बहस नहीं कर सकती. एक औरत होने के नाते मैं इतना अवश्य जानती हूं कि प्रेम होता है और एक साथ कई व्यक्तियों से किया जा सकता है जैसे हम एक साथ ही मां, पिता, बहन, भाई, मित्र तथा अन्य रिश्तेदारों से प्रेम करते हैं, उसी प्रकार एक औरत दो पुरुषों या एक पुरुष दो औरतों से एक साथ प्रेम कर सकते हैं. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है.“ उसने आत्मविश्वास के साथ कहा.

उनके मन का भ्रम या दुविधा दूर नहीं हुई थी. पूछा, ”तुम यह कैसे तय करोगी कि किस व्यक्ति से तुम अधिक प्रेम करती हो?“

”प्रेम कम या अधिक नहीं होता, परन्तु जिस व्यक्ति के साथ हम रहते हैं, उस पर हम दिखावे में अधिक प्यार उड़ेंलते हैं. यह वास्तविकता है. और दूर रहने वाले व्यक्ति के साथ हम मन से जुड़े होते हैं. दूरी प्रेम में कमी नहीं लाती.“

”नीलू, पता नहीं क्यों आजकल मेरा मन भटकने लगा है. मुझे लगता है कि प्रेम शाश्वत नहीं होता और जीवन भर हम एक व्यक्ति से एक समान प्यार नहीं कर सकते. इसके बहुत सारे कारण हो सकते हैं, पारिवारिक और परिस्थितिजन्य, परन्तु मुझे अपनी पत्नी से विरक्ति सी हो गयी है. उसका ध्यान बच्चों की तरफ अधिक रहता है, धन-सम्पत्ति इकट्ठा करने में उसकी रुचि है, बच्चों के भविष्य की उसे अधिक चिन्ता है, परन्तु एक पति की दैनिक जरूरतें क्या हैं, उसकी तरफ वह बिल्कुल ध्यान नहीं देती.“

नीलिमा हंसी. बहुत दिनों बाद आज वह उनके सामने हंसी थी. उसकी हंसी में भोलापन था, निश्छलता थी. उनको जवानी के वे दिन याद आ गये, जब नीलिमा उनके आगे-पीछे चक्कर लगाया करती थी और कभी-कदा वह खीझकर उसे डांट दिया करते थे, तब भी वह इसी तरह हंसती थी, जैसे किसी ने उसे कोई चुटकुला सुना दिया हो. उनके हृदय में कुछ चटख गया. काश, इस हंसी के पीछे छिपे प्यार को तब वह पहचान पाते, तो आज नीलिमा उनकी होती. उन्होंने मन ही पत्नी और नीलिमा को तराजू के एक-एक पलड़े पर रखकर तौला, तो उन्हें नीलिमा का पलड़ा भारी लगा, परन्तु आंखों से दिखाई देनेवाले सौन्दर्य और प्रेम के मापदण्ड अलग होते हैं तथा यथार्थ में एक दूसरे के साथ रहते हुए, आपस में सुख-दुख, कष्ट और तकलीफों को झेलते हुए जीवन बिताने में अलग तरह का अनुभव होता है.

”बच्चों के प्रति मां-बाप की चिन्ता वाजिब होती है, इसमें कुछ अद्भुत नहीं है.“ नीलिमा ने स्वाभाविक भाव से कहा.

”हो सकता है, तुम्हें इसमें कुछ अद्भुत न लगता हो, परन्तु अपनी पत्नी के साथ रहते हुए जिस प्रकार का जीवन मैं व्यतीत कर रहा हूं, उससे मुझे लगता है कि पारिवारिक रिश्ते केवल पैसे के आस-पास घूमते रहते हैं. उनमें प्रेम नाम का तत्व नहीं होता है या अगर ऐसा कोई तत्व दिखाई देता है तो केवल स्वार्थवश. जब तक स्वार्थ की पूर्ति होती रहती है, तब तक प्रेम दिखाई देता है. जैसे ही परिवार में अभाव की टोली डेरा डालकर बैठ जाती है, वैसे ही परिवार के बीच लड़ाई-झगड़ा आरंभ हो जाता है, तब प्रेम नाम का जीव पता नहीं कहां विलीन हो जाता है.“

नीलिमा सोच में पड़ गयी. उसकी समझ में न आया कि उनकी बात का वह क्या जवाब दे. वह बहुत गूढ़ और दार्शनिकता से ओत-प्रोत बात कर रहे थे. ऐसी बातें बहस के लिए तो ठीक हैं, परन्तु परिवार को चलाने में इससे कटुता ही बढ़ती है. उसने कहा-

”मैं आपके मन को तो नहीं समझ सकती, परन्तु इतना अवश्य कह सकती हूं कि परिवार में इस तरह की छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं, परन्तु मन में गांठ बांधकर इनको बड़ा बनाने का कोई औचित्य नहीं होता.” वह सामने के सोफे से उठकर उनकी बगल में आकर बैठ गयी, निःसंकोच. उसका मन मणिकांत की तरफ खिंच रहा था. वह उनका सामीप्य चाहती थी, चाहे पल भर के लिए ही सही. जीवन में यह मौका प्रथम बार उसे मिला था.

उन्होंने कातर दृष्टि से नीलिमा की आंखों में झांककर देखा. उसने अपनी पलकें बंद कर लीं और एक सर्द एहसास से कांप गयी. मणिकांत ने हौले से उसका बायां हाथ पकड़ लिया. वह फिर से कांप गयी.

उन्होंने पूछा-”क्या तुम अब भी मुझे प्यार करती हो?“

उसने कोई जवाब नहीं दिया, परन्तु अपनी पलकें खोलकर मणिकांत को गौर से देखा, जैसे कह रही हो कि यह प्रश्न विवाह से पूर्व किया होता तो मैं इसका जवाब दे सकती थी. अब मैं क्या जवाब दूं? मणिकांत उसकी आंखों में छलकते हुए आंसुओं की विवशता समझ गये. उसकी हथेली को हल्के से दबाते हुए कहा, ”मैं समझ गया? काश, जीवन के पूर्वार्द्ध में ही अगर इतनी छोटी सी बात मेरी समझ में आ जाती कि जवानी का प्रेम भी शाश्वत होता है, तो मैं इतना दुःखी नहीं होता. और अगर प्रेम शाश्वत नहीं है, तो भी इसे छोटी-छोटी चीजों और बातों से प्राप्त किया जा सकता है.“

नीलिमा ने बेहिचक उनके कंधे पर अपना सिर रख दिया, ”जो शब्द मैं शादी से पूर्व आपके मुख से सुनना चाहती थी, वह मुझे कभी सुनने को नहीं मिले; परन्तु इतने वर्ष बाद ही सही, अगर आपने मेरे प्रेम की गहराई को समझा और मेरे पास आए हैं तो मैं धन्य हो गयी. मैं अब भी आपको उतना ही प्रेम करती हूं, परन्तु प्रेम के लिए कोई भी समझदार नारी अपने परिवार को नहीं तोड़ सकती, पति को नहीं छोड़ सकती और बच्चों को बेसहारा और अनाथ नहीं कर सकती.”

”मैं समझता हूं.“ उन्होंने असहाय भाव से कहा, फिर जैसे उन्हें कुछ याद आया हो, वह चौंककर बोले, ”घर में कोई नहीं है क्या? तुम्हारी बेटी कहां है और पति कब आते हैं?“ उन्होंने घड़ी की तरफ देखा, आठ बजनेवाले थे.

नीलिमा सावधान होकर बैठ गयी, ”बेटी बस आने ही वाली होगी. उसने एक कोचिंग क्लास ज्वाइन कर रखी है. सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही है और वह दस-ग्यारह तक आते हैं. दुकान का काम है. देर हो जाती है.“

”तुम सुखी हो?”

”फिलहाल मुझे कोई ऐसा कारण नहीं दिखाई देता जिससे मैं ये समझूं कि मैं अपने जीवन से दुखी हूं. पति बहुत प्यार करते हैं. घर का पूरा ख्याल रखते हैं. बेटी भी सुन्दर, सुशील और समझदार है. छोटा परिवार है, रुपये-पैसे का अभाव नहीं है. बस, और क्या चाहिए जीवन में सुखी होने के लिए...?“

उन्होंने एक गहरी सांस ली और नीलिमा को देखते हुए सोचा, यही सब कुछ तो उनके पास भी है, परन्तु वह सुखी नहीं हैं, क्यों? क्या सुख केवल भौतिक चीजों से नहीं मिलता? क्या सुख एक भाव है, जो मनुष्य की सोच के अनुसार उसे सुखी या दुःखी करता है? वह अपने को एक बुद्धिमान और समझदार व्यक्ति समझते थे, परन्तु नीलिमा के पास आकर उनकी बुद्धि के पेंच ढीले से लगने लगे थे. नीलिमा उनको प्रेम करती है, परन्तु उनसे उसको कोई प्रेम प्राप्त नहीं हुआ, फिर भी वह सुखी है? तो अपनी पत्नी को प्रेम करके वह सुखी क्यों नहीं हो सकते हैं, भले की पत्नी उनके बजाय बच्चों को अधिक प्यार करती हो. बच्चे भी तो उन दोनों के ही हैं. बच्चों को प्यार करके वह उनको ही तो प्यार कर रही है.

वह सोफे से उठकर खड़े हो गए और मन को शांत करते हुए उन्होंने कहा, ”नीलू, अब मैं चलूंगा. परन्तु कभी-कभी अगर मैं तुमसे मिलूं तो क्या तुम्हें कोई आपत्ति होगी?“

”बिल्कुल नहीं,“ वह उनसे चिपककर खड़ी हो गयी, ”आपसे मिलकर बल्कि मुझे खुशी ही प्राप्त होगी. अगली बार मैं अपनी बेटी और पति से आपको मिलवाऊंगी.“ उसकी आवाज में कोयल सी कूक थी.

”तो मैं चलता हूं.“

”आपने चाय भी नहीं पी? आप पहली बार मेरे घर पर आए और मैं आपकी कोई सेवा न कर सकी, मुझे अफसोस रहेगा.“

”तुम्हारी चाय मुझ पर उधार रही. अगली बार चुकता कर देना.“

वह नीलिमा को आशीर्वाद देकर चले आए.

उस रात पलंग पर लेटे-लेटे उन्होंने पत्नी से सवाल किया, ”क्या तुम इस बात पर विश्वास करती हो कि एक व्यक्ति किसी को उम्र भर प्यार कर सकता है?“

”यह कैसा सवाल है? हम सभी एक दूसरे को प्यार करते हैं और हमेशा करते रहते हैं. इसमें कौन सी नई बात है?“ वह दूसरी तरफ करवट बदलकर बोली. अब उससे बात करना व्यर्थ था. उन्होंने सिर टेढ़ा करके पत्नी की अधुखली पीठ देखी, सुन्दर और चिकनी पीठ. काश, इतनी ही सुन्दर और मीठी उसकी बोली होती.

इसके बाद मणिकांत दो भागों में बंट गये. एक भाग में वह नीलिमा के साथ होते. उसके साथ कुछ पल बैठकर और पुरानी बातें करके उन्हें मानसिक शांति मिलती, परन्तु इस क्रिया में कोई स्थायित्व नहीं था. इस बात का उन्हें अहसास था कि कभी-कदा ही सही, नीलिमा के घर में उनकी आवाजाही चर्चा का विषय बन सकती थी. पड़ोसियों की आंखें ऐसे मामलों में सदा खुली रहती हैं और उनके कान दीवार के पीछे की बातें भी सुन लेते हैं. वह नीलिमा के दाम्पत्य-जीवन में आग नहीं लगा सकते थे और न जीवन-पर्यन्त उसके साथ रह सकते थे.

दूसरे भाग में उनका परिवार था, जहां बाढ़ के पानी की तरह हलचल थी, तीव्र वेग था, जो सबकुछ अपने साथ बहा ले जाने के लिए बेताब था. बाढ़ के बाद की तबाही का मंजर उनकी आंखों के सामने अक्सर गुजर जाता और वह परेशान हो जाते. उनकी समझ में न आता कि वह बाढ़ को कैसे रोकें और अपने घर को तबाह होने से कैसे बचायें? बच्चे इतना निरंकुश हो चुके थे कि बड़े बेटे ने सड़क दुर्घटना में अपनी नई बाइक का कबाड़ा कर दिया था. खुद जख्मी हो गया था और हजारों रुपये इलाज में खर्च हो गए थे. अब ठीक होकर घर आया तो फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगा था. दूसरी बाइक की मांग कर रहा था.

छोटा बेटा अपने भाई से पीछे नहीं था. बड़े भाई की देखा-देखी उसने भी बाइक की मांग पेश कर दी थी. दूसरे दिन उसे भी बाइक खरीदकर देनी पड़ी. यह तो खैर, बहुत दुखी करनेवाली बातें नहीं थी, परन्तु सबसे अधिक दुख उन्हें इस बात का था कि वह पढ़ाई में बहुत पिछड़े हुए थे और उनकी मां इसके लिए उन्हें कुछ नहीं कहती थी. वह कुछ कहते तो उसका जवाब होता, ”आप उनकी पढ़ाई को लेकर क्यों परेशान होते रहते हैं? उन्हें पढ़ना है, पढ़ लेंगे. नहीं पढ़ेंगे, तो कोई काम धन्धा कर लेंगे.“

एक अफसर के बेटे दुकानदारी करेंगे. यह उनकी पत्नी की सोच थी. और पत्नी की सोच ने एक दिन यह रंग भी दिखा दिया जब बड़े लड़के ने घोषणा कर दी कि वह अब पढ़ाई नहीं करेगा और कोई काम-धन्धा करेगा. मां की ममता का फायदा उठाकर उसने एक मोबाइल की दुकान खुलवा ली. उन्होंने इसके लिए उसे पांच लाख रुपये दिये.

कुछ दिन बाद बड़े लड़के ने अपनी मनपसंद की लड़की से शादी भी कर ली. मणिकांत टूट से गये, परन्तु पत्नी खुश थी. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था, जब लड़कों को अपनी मर्जी से ही सब कुछ करना है तो वह उनके प्रति कौन सी जिम्मेदारी निभा रहे थे, क्या उन्होंने अपने बेटों का कोई कर्ज खा रखा था, जिसे वह किस्तों में चुकता कर रहे थे. परिवार के लिए क्या वह एक पैसा कमाने की मशीन भर थे और उनका कोई अस्तित्व नहीं था. सब अपने में मस्त थे और उनके कमाए पैसे से गुलछर्रे उड़ा रहे थे. न उनकी कोई सुनता था, न उनके कहे अनुसार कार्य करता था, तो फिर वह क्या थे इस घर में?

पत्नी से एक दिन पूछा उन्होंने, ”अगर तुम्हारे पास ढेर सारा पैसा हो, परन्तु मैं न रहूं, तो क्या तुम खुश रह लोगी?“

पत्नी ने पहले तो उन्हें घूरकर देखा और फिर मुंह टेढ़ा करके पूछा, ”इसका क्या मतलब हुआ? क्या आप कहीं जा रहे हैं?“

”कहीं जा तो नहीं रहा, परन्तु मान लो ऐसा हो जाए या मैं इस दुनिया में न रहूं, तो क्या तुम मेरे बिना खुश रह लोगी?“

”जब देखो तब आप टेढ़ी-मेढ़ी बातें करते रहते हो. कभी कोई सीधी बात नहीं की. दुनिया का प्रत्येक प्राणी मृत्यु को प्राप्त होता है, इसमें नया क्या है? घर के लोग कुछ दिन शोक मनाते हैं, फिर जीवन अपने ढर्रे पर चलने लगता है.“ पत्नी व्यावहारिक बात कर रही थी, परन्तु उसकी बातों में रिश्तों की कोई मिठास नहीं थी. उसमें भावुकता और संवेदनशीलता नाम की भी कोई चीज नहीं थी. वह एक जड़ वस्तु की तरह व्यवहार कर रही थी.

धीरे-धीरे पति-पत्नी के बीच एक संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न होती जा रही थी. वह अब अधिकतर समय नीलिमा के साथ व्यतीत करते थे. नीलिमा बदनाम न हो, इसके लिए उन्होंने एक तरीका ईजाद किया था. वह उसके घर न जाकर सप्ताह में एक दिन उसे रेस्टोरेंट में बुलाते थे. नीलिमा को भी परेशानी नहीं होती थी. दो-तीन घंटे एक साथ बिताकर वह अपने-अपने घर चले जाते थे.

जीवन में संवादहीनता की स्थिति बहुत खतरनाक होती है, परन्तु इस स्थिति से उबरने के लिए समझदार व्यक्ति रास्ता तलाश कर लेता है. मणिकांत ने भी नीलिमा के माध्यम से अपने खुश रहने के तरीके ढूंढ़ लिए थे, परन्तु यह तरीका भी एक हद के बाद खतरनाक स्थिति से गुजर सकता था. अक्सर मिलते रहने से उन दोनों के हृदय में अनायास ही एक दूसरे के प्रति चाहत बढ़ती जा रही थी और यह चाहत ऐसी थी कि रोज मिलने का मन करता था. उन्होंने नीलिमा से कहा-

”क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि हम रोज मिलें और मिलते ही रहें. सप्ताह में एक बार मिलने से मन नहीं भरता.“

उसने अपनी आंखों को नीची करते हुए कहा-”लगता तो मुझे भी है, परन्तु यह चाहत खतरनाक है. अब हम न तो जवान हैं, न गैर-जिम्मेदार. हम कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकते हैं, कि हमारे घर-परिवार और बच्चों पर उसका असर पड़े.“

”सामाजिक और पारिवारिक बंधन भी तो मनुष्य को सच्चा सुख और प्यार नहीं देते. हम जीवन भर प्रेम तलाशते रहते हैं, वहां जहां यह नहीं होता और जहां यह होता है, वहां हमारे बंधन हमें जाने नहीं देते. बताओ, मनुष्य करे तो क्या करे? उसका मन नहीं करता कि वह सच्चा और अटूट प्रेम प्राप्त करे और जीवन भर सुखी रहे.“

”परन्तु आपका तो यह मानना है कि सच्चा और शाश्वत प्यार होता ही नहीं.“ नीलिमा ने जिज्ञासावश पूछ लिया.

”नहीं, मेरा विश्वास था कि सच्चा और शाश्वत प्यार होता है, परन्तु जहां इसके होने का विश्वास था, वहां नहीं मिला. विडंबना यह है कि ऐसा प्यार मुझे वहां मिला जहां इसके होने की मुझे कतई उम्मीद नहीं थी. मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि तुम्हारे रूप में मुझे यह प्रेम प्राप्त हो गया.“ भावुक होकर उन्होंने नीलिमा के दोनों हाथ पकड़ लिए. वह सिहर कर अपने में सिमट गयी.

”परन्तु आप यह मत भूलना कि हम दोनों शादीशुदा हैं और हमारी कुछ जिम्मेदारियां हैं.“

”नहीं नीलू, मैं इस बात को कभी नहीं भूलूंगा. तुम्हारे रूप में मुझे शाश्वत प्रेम की देवी के दर्शन हुए हैं, मैं तुम्हें अपवित्र नहीं करूंगा. परन्तु तुम्हारे प्रति प्रेम की भावना से मुझे जीवन की डगर पर आगे बढ़ने का हौसला प्राप्त होता रहेगा. तुमसे बस मेरी केवल एक ही विनती है कि जीवन-पर्यन्त, जब तक हम दोनों जीवित हैं, तुम अपने प्रेम की बौछार मेरे नीरस जीवन के रेगिस्तान में करती रहना, मैं पूरे हौसले के साथ अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करता रहूंगा. प्रयत्न करूंगा कि मेरी पत्नी भी तुम्हारी तरह बने और अगर मेरे मन को वह समझ सके, तो हमारे परिवार में भी खुशियों की बारात आ जायेगी.“

”आप एक धैर्यवान व्यक्ति हैं और मुझे आशा है कि आप अपने परिवार को सही रास्ते पर ला सकेंगे. कोई भी व्यक्ति जड़ नहीं होता. अगर वह जीवन में गल्ती करता है तो एक दिन सही रास्ते पर आ ही जाता है,. अगर वह किसी के समझाने से सही राह पकड़ लेता है तो बहुत अच्छा है; वरना परिस्थितियां उसे सही मार्ग अवश्य दिखा देती हैं.“

”मेरी पत्नी समझाने से तो सही राह पर नहीं आनेवाली, परन्तु परिस्थितियां उसे एक दिन अवश्य सही राह पर चलने के लिए मजबूर करेंगी.“

”आपको देखकर मुझे तरस आता है, परन्तु मैं मजबूर हूं.“ नीलिमा उनके हाथों के बीच दबी अपनी हथेलियों को छुड़ाकर उनकी उगंलियों को सहलाने लगी.

”मुझे अफसोस नहीं है. मैंने तुम्हें खोकर भी दूसरे रूप में पा लिया है. यही शाश्वत सत्य है, यही शाश्वत प्रेम है. प्रेम किसी के शरीर में नहीं होता, प्रेम एक भाव है, जिसे हम महसूस करते हैं और यह भावना शाश्वत होती है.“

उन्होंने भावुक होकर कहा और नीलिमा की उंगलियों को अनायास चूम लिया. शाश्वत प्रेम की निशानी!

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(राकेश भ्रमर)

ई-15, प्रगति विहार हास्टल,

लोधी रोड, नई दिल्ली-110003

मोबाइलः 9968020930

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