बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

शरद तैलँग का व्यंग्य - विवाह का एल्बम

विवाह का एल्बम

किसी भी मनुष्य का विवाह के बन्धन मेँ बँधना एक महत्वपूर्ण कार्य माना गया है । यहाँ विवाह जैसे पवित्र रिश्ते के साथ बन्धन तथा उसमेँ बँधना जैसे शब्दोँ का प्रयोग, भाषा के विद्वानोँ ने सँभवत: अपने अनुभवोँ के आधार पर ही तय किये होँगे नहीँ तो वे विवाह के साथ किन्ही और भी सार्थक शब्दोँ का प्रयोग भी कर सकते थे । यहाँ मेरा आशय उन शब्दोँ की व्याख्या करना नहीँ है कि कौन सा शब्द उचित है और कौन सा अनुचित और ना ही मेरा विवाह की परम्परा के पक्ष या विपक्ष मेँ वाद विवाद प्रतियोगिता या अपनी राय प्रदर्शित करना है बल्कि विवाह मेँ जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू मुझे नज़र आता है वह है साडियाँ, गहने, साज सज्जा, खाना पीना बैण्ड बाजे पँडित, लेना देना, ब्यूटी पार्लर ,घोडी, डास, सूट टाई, जूते पॉलिस, प्रेस, ब्लाउज़ और न जाने कितनी चीज़ोँ के इंतज़ाम के साथ साथ ही अब फोटोग्राफर का इंतज़ाम करना, विवाह का एलबम या उसका वीडियो तैयार कराना । यह कार्य इतना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि यदि किसी कारणवश फोटोग्राफर न मिले तो विवाह् की तारीख मेँ परिवर्तन करना पड सकता है । यदि बारात बिना विवाह् किये भी लौटने लगे तब भी उसके वापस जाने का फोटो एलबम तथा वीडियोँ भी होना ही चाहिये ।

यह माना जाता है कि इस अवसर के पलोँ को यादगार बनाने के लिये ही यह सब बन्दोबस्त किया जाता है जिससे आप विवाह के बाद वर्षोँ तक उस एलबम को देख देख कर यह अन्दाज़ लगा सकेँ कि आप भूतकाल मेँ कितनी मूर्खतायेँ कर चुके हैँ । दूल्हे के वेश मेँ किस तरह उजबक बन चुके हैँ तथा कैसी ऊलजुलूल हरकतेँ कर चुके हैँ । यह सब देखना और समझना यदि अपने तक ही सीमित् हो तब तक भी ठीक है परंतु घर मेँ कोई आया नहीँ कि “ बुआ जी को शादी का एलबम दिखाओ” का मँत्रोच्चार प्रारम्भ हो जाता है । मनुष्य का यह एक स्वाभाविक गुण है कि किसी फोटो या एलबम को चाहे वह हज़ारोँ बार पहले देख चुका हो पर यदि कोई दूसरा देख रहा हो तो वह एक बार फिर से आगंतुक के कँधे पर सवार हो कर अवश्य देखेगा । “ ये हमारे मौसा जी है “ ये हमारे दिल्ली वाले चाचा जी के दामाद है “ ये हमारे वो है, ये हमारे ये हैँ , ये हमारे बाप हैँ “ जैसी रँनिग़ कोमेंट्री भी साथ साथ चलती रहती है । यहाँ अपने अनुभव के आधार पर मैँ यह दावे से कह सकता हूँ कि इन सब मेँ देखने वाले की बिलकुल भी रुचि नहीँ होती क्योँकि किसी को किसी के बाप, मामा, चाचा से क्या लेना देना परंतु जब ओखली मेँ सर देना ही पड रहा है तो मूसल की चोट भी सहन करनी पडती है और अच्छा अच्छा कहना पडता है ।

मेज़बान द्वारा एलबम मेँ उपस्थित रिश्तेदारोँ की वँशावली के वर्णन के पश्चात आगँतुक को यह बताना भी अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि इस एल्बम को बनवाने मेँ उसका कितना खर्चा हुआ । “चौबीस हज़ार लिये है फोटोग्राफर ने इसके” दूल्हे की माँ ने अपना रौब जमाना चाहा और यह आशा की कि इस कथन पर बुआ जी आश्चर्य प्रकट करेँगीँ परंतु तुरंत ही बुआजी की बात सुनकर वह आसमान से सीधे ज़मीन पर आ गिरी । “तब तो बहुत सस्ता बन गया मेरे, बेटे की शादी मेँ तो उसने पैतीस हज़ार लिये थे । बुआजी किसी से भी किसी बात मेँ अपने आप को कम प्रदर्शित नहीँ करना चाहतीँ थी । ज़ाहिर था कि बुआजी के इस कथन् मेँ जमकर अतिश्योक्ति थी ।

एल्बम मेँ फोटो विवाह की रस्मोँ के हिसाब से ही लगाये गये थे । पहले सगाई फिर दूसरी रस्मेँ ,फिर बारात ,उसके बाद शादी ,रिसेप्शन, विदाई, सुहागरात और हनीमून् आदि । चित्र मेँ दिखाये अनुसार दुल्हन ने जो गहने पहन रखे थे उनके वारे मेँ किसी को भी यह विश्वास नहीँ था कि वे असली हैँ सभी जानते थे कि ब्यूटी पार्लर से किराये पर लिये गये हैँ लेकिन हाँ उसके कपडे ज़रूर किराये के नहीँ थे जबकि दूल्हे के आँतरिक पहनावे के अलावा सब कुछ किराये का था वरना उसने जो शेरवानी और ज़री का साफा पहन रखा था वैसा आजकल कौन समझदार पहनता है इसके अतिरिक्त उसने गले मेँ जो मोतियोँ की माला पहन रखी थी यदि असली होती तो उसकी कीमत मेँ तो पूरी शादी का खर्च निपट जाता । विदाई के फोटो आते आते दूल्हे की माँ “ चाय बनाती हूँ “ कहकर अन्दर चली गई क्योँकि उसके बाद सुहागरात के चित्रोँ की बारी थी और उन के चित्रोँ का वर्णन करना उनकी सामर्थ्य से बाहर था । एक चित्र मेँ दूल्हे द्वारा दुल्हन का घूँघट उठाते हुए दिखाया गया था । इसी तरह कुछ और भी चित्र थे जिनसे यह प्रतीत होता था कि उस दिन सुहागरात मेँ दूल्हा दुल्हन के साथ कमरे मेँ फोटोग्राफर भी उपस्थित था । वैसे उस अवसर के जितने भी चित्र थे किसी मेँ भी कोई आपत्तिजनक बात नहीँ थी शायद फोटोग्राफर को किसी अन्य विवाह के भी फोटो लेने जाना था इसलिये वह चला गया था और आगे के फोटो रह गये थे फिर अन्धेरे मेँ फोटो ठीक आते भी नहीँ हैँ ।

किसी भी फोटो मेँ दुल्हन अपने असली रूप मेँ नहीँ दिखाई दे रही थी उस समय यदि उसका वज़न लिया जाता तो निश्चित ही उसके असली वज़न से दुगना होता । व्यूटी पार्लर वालोँ या वालियोँ ने उस पर प्रसाधन के जितने भी औजार और पदार्थ थे सब प्रयोग कर दिये थे तथा कोशिश ये की गई थी कि शरीर का कोई भी अँग कही छूट न जाये जहाँ उसकी फर्म का विज्ञापन न हो रहा हो । लेकिन दर्शनार्थियोँ को दुल्हन के असली रूप के दर्शन करने मेँ ज़्यादा धैर्य नहीँ रखना पडा क्योँकि हनीमून के चित्र प्रारम्भ हो गये थे । हनीमून की ये विशेषता होती है कि वहाँ पर दुल्हन कभी भी पारम्परिक वस्त्रोँ को धारण नहीँ करती है तथा यह दर्शाती है कि अँग्रेज जब हिन्दुस्तान से गये तो उसके लिये भी कपडोँ के बहुत से डिज़ायन छोड गये थे बस लोगोँ को ये जताने के लिये कि उसका भी विवाह हो सकता है और हो गया है वह अपने प्रत्येक हाथोँ मेँ कलाई से लेकर कोहनी के ऊपर तक कुछ लाल सफेद चूडियाँ पहन रखी थीँ , वो तो अच्छा हुआ कि उसकी कलाई की मोटाई तथा कोहनी के ऊपर के हिस्से की मोटाई मेँ काफी अंतर होता है वरना चूडियाँ उसके कन्धे तक पहुँच जातीँ । अब चूँकि हनीमून पर साथ मेँ फोटोग्राफर को नहीँ ले जाया जा सकता है इसलिये वहाँ उसका काम भी दूल्हे को ही सँभालना पडता है नतीजा यह हुआ है कि अधिकाँश फोटो दुल्हन के ही थे तथा दूल्हे के फोटो जो मजबूरी मेँ दुल्हन द्वारा खीँचे गये थे उनमेँ यह पहचानना मुश्किल हो रहा था कि यह दूल्हा ही है या कोई काला दानव क्योँकि दुल्हन कोई फोटोग्राफर तो थी नहीँ । दूल्हा दुल्हन के साथ साथ जो फोटो थे वो हनीमून मनाने आये दूसरे किसी जोडे के सहयोग से खिचवाये गये थे अर्थात तुम उनकी खीँच दो, वो तुम्हारी ।

इससे भी खतरनाक स्थिति तो तब होती है जब आपको विवाह की वीडियो सीडी दिखाई जाये । लगभग दो तीन घंटे के इस आयोजन मेँ पहले बीस मिनट तो आसानी से गुज़र जाते हैँ उसके अगले तीस मिनट यह सोचकर कि चलो अब खत्म ही होने वाली होगी गुज़ारने पडते है किंतु अँतिम बचे हुए समय मेँ लगता है कि यदि यह जल्दी खत्म नहीँ हुआ तो शायद कहीँ आप ही न इस सँसार से गुज़र जायेँ ।

0 शरद तैलँग

240 माला रोड (हाट रोड)

कोटा ज़ँ. 324002 राजस्थान

मो. 09829903244

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