शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

अशोक गौतम का व्यंग्य/ सुनो हे जश्न मनाती भैंसों!


हे मेरे देश की तमाम तबकों की दूध कम चारा अधिक खाने वाली भैंसों! अब तो तुम्हारे कलेजे में ठंड पड़ ही गई होगी! खूब मनाओ जश्न! खूब फोड़ो पटाखे! आखिर धरती पुत्र को मरवा कर ही चैन की सांस ली न तुमने! किंग  मेकर को  मच्छरदानी लगा सोने के लिए विवश करके ही दम लिया न तुमने ! अब  खूब निकालो विजय यात्राएं! डीसी ऑफिस के सामने छबील लगा कर जी भर पिलाओ देश की नकली दूध पीने वाली जनता को शुद्ध दूध के गिलास पर गिलास! पर तुम्हारे इस शुद्ध दूध से जनता की गिरती सेहत में सुधार नहीं होने वाला! हो सकता है तुम्हारी खुशी में शामिल हो शुद्ध दूध पीने के बाद देश की जनता की सेहत और खराब हो जाए।


असल में बात ये है भैंसों कि  तुम्हारे देशवासियों को अब शुद्ध चीजें पचती ही नहीं।   उन्हें  अब हर चीज मिलावटी ही स्वास्थ्यवर्धक लगती है। जिस चीज में जितनी मिलावट, वह उतनी ही स्वास्थ्यवर्धक!  सांस से लेकर संस्कृति तक आज सभी तो मिलावटी चले हैं।


हे मदमस्त हुई भैंसों!  तुम्हारी खुशी को कम करने के लिए तुम्हें एक सच्ची कथा सुनाता हूं!  हफ्ता पहले मां ने गांव से मेरी नन्ही बेटी के लिए गाय का शुद्ध भेजा था! मैंने बेटी को वह दूध पिलाया तो उसका पेट खराब हो गया।  बात यहीं खत्म हो जाती तो भी गम न होता! आगे सुनो क्या हुआ  हे न्याय मिलने के बहाने  गर्व से भांगड़ा पा पूरे देश की रोड़ों  पर जाम लगाने वाली भैंसों! जब मैं बेटी को डॉक्टर के पास ले गया तो उसने मुझसे मेरी जब में झांकते हुए बड़ी आत्मीयता से क्या पूछा? उसने मुझसे पूछा ,' बच्ची को कौन सा दूध पिलाया है?' तो मैंने सहमते हुए सच कह दिया,' गाय का!'


तो डॉक्टर ने आगे पूछा, 'गाय का दूध पैकेट में था या?'
'नहीं डॉक्टर साहब! गांव से आया था! बाल्टी में था!'
'यहीं तो गलती कर देते हो आप लोग!  कितनी बार आप लोगों को कहा कि यार! बच्चों को पैकेट का दूध ही पिलाया करो! मां का दूध भी नहीं! इससे मां के फिगर खराब हो जाते हैं। पर पढ़े लिखे होने के बाद भी पता नहीं आप लोग ये गलती बार बार क्यों करते हो? अब देखो न, शुद्ध दूध ने बच्ची को  हॉस्पिटल तक पहुंचा दिया! बीस रूपए दूध के पैकेट के बचाए और पांच सौ की दवाई बच्चे को खिला दी! करते क्या  हो?'
'सरकारी नौकर हूं!'


'चलो, फिर तो कोई बात नहीं! पर मान लो, सरकारी नौकर न होते तो? लेने के देने पड़ जाते न?बीमारी में पेशेंट का पेट भले खाली  रहे तो रहे  पर डॉक्टर का पेट भरना मुश्किल होता है समझे! बोलो, क्या खटा अपने गांव से शुद्ध दूध मंगवा कर? असल में क्या है न कि  जब तक कीटनाशकों वाली चीजें हमारे पेट में नहीं जातीं , पेट सही नहीं होता! ये कीट नाशकों वाली चीजें सबसे पहले हमारे पेट के कीड़े मारती हैं। इसलिए जितने अधिक कीट नाशक हमारे खाने में मिले होंगे हमारा पेट उतना ही ठीक रहेगा। इस देश का नागरिक होने के लिए बस सबसे पहली शर्त यही है कि पेट में कुछ जाए या न पर बंदे का पेट बिलकुल ठीक रहे! इस देश में रहना हो तो बस पेट ठीक रखो! दिमाग ठीक रहे या न!'


तुम जब भी मौका मिलता, जहां भी मौका मिलता, जुगाली बंद कर गला फाड़ फाड़ कर   बरसों से चिल्ला रही थीं कि हमें इंसाफ दो, हमें इंसाफ दो! मिल गया न तुम्हें इंसाफ!  अब खाती रहो सोए सोए भी चारा!  चारा खाने से अगर मोक्ष मिल जाए तो जानूं! अरी कम्बख्तो! मोक्ष अपने हिस्से का चारा खुद खाने से नहीं अपने हिस्से का चारा औरों को खिलाने से ही मिलता है, शास्त्र साक्षी हैं। अपने खाए चारे का तो हर हाल में गोबर ही बनता है। पर  इस देश में खाने के सिवाय और काम भी क्या है? खा खा कर भले ही अजीर्ण हो जाए पर यहां खाने से रूकता ही कौन है?   अब तुम्हारा चारा खाना तो दूर , मर जाऊं जो तुम्हारे चारे पर थूकूं भी!

अरे, खाने को इस देश में और भी बहुत कुछ है। पर जरा सोचो , उन्होंने चारा ही खाया! क्यों? पर तुम सोचो तब अगर तुम्हारे पास अकल हो!  उनके चारा खाने पर तुम्हें तो खुश होना चाहिए था कि आदमी होने के बाद भी किसी ने तुम्हारे चारे को अपने काबिल तो समझा! उनका अपना चारा खाना न देख अगर हे भैंसों तुम उनके द्वारा तुम्हारा  चारा खाने में छिपी संवेदना  को पकड़ पातीं तो दुख के इन क्षणों में यों दांत निकाल हंसने के बदले उनके साथ खड़ी होतीं! जरा याद करो, वे सारे काम छोड जब तुम्हें कितने प्यार से नहलाते थे? तुम्हारे गाल सहलाते थे ?पर तुम अहसान फरामोश अहसान क्या जानो! भैंसें जो हो!

अशोक गौतम,
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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